भूमि की पुत्री, जनक की दुलारी, राम की वल्लभा — लक्ष्मी का वह अवतार जिसने वैभव नहीं, वनवास चुना। सीता रामायण की धुरी हैं: उनका धैर्य रावण के दस सिरों से बड़ा शस्त्र सिद्ध हुआ।
माता सीता रामायण की वह धुरी हैं जिनके बिना राम-कथा घटती ही नहीं — हरण उन्हीं का हुआ, खोज उन्हीं की हुई, युद्ध उन्हीं के लिए लड़ा गया; पर परंपरा उन्हें केवल "कथा का कारण" नहीं, कथा की सह-नायिका और शक्ति-स्रोत मानती है। वे भूमि से प्रकट हुईं और भूमि में लौट गईं — जन्म-मृत्यु के सामान्य चक्र से बाहर; इसीलिए "अयोनिजा" कहलाती हैं। वैष्णव दर्शन में वे साक्षात् लक्ष्मी हैं जो नारायण के राम-अवतार का साथ देने पृथ्वी पर उतरीं; रामानुज-परंपरा में तो जीव और प्रभु के बीच अनुग्रह-सेतु (पुरुषकार) सीता ही हैं — शरणागत पहले माँ के पास जाता है, माँ प्रभु से मिलाती है (सुंदरकांड में काकासुर एवं विभीषण-रक्षा के सीता-प्रसंग इसके शास्त्र-बीज हैं)।
सीता-चरित्र की विलक्षणता उसका संतुलन है — वे कोमल भी हैं और वज्र भी। स्वयंवर के पूर्व की लाड़ली राजकुमारी, वन की सहयात्री, अशोक वाटिका की बंदिनी — हर रूप में उनका धैर्य ही उनका शस्त्र है; पर यही सीता रावण को तिनके की ओट से उत्तर देती हैं, अग्नि-परीक्षा में उतरने से पहले राम तक को कटु-सत्य कहती हैं, और अंतिम बार बुलाए जाने पर लौटने से मना कर देती हैं — क्षमा उनका स्वभाव है, आत्म-गरिमा उनकी सीमा-रेखा। मिथिला आज भी उन्हें "बेटी" कहकर पूजती है — जगज्जननी जो सदा के लिए मायके की लाडो भी है।
परिवार एवं संबंध
Family
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पिताराजा जनक (सीरध्वज) — मिथिला के विदेह-वंशी दार्शनिक सम्राट
मातारानी सुनयना (पालक); मूलतः भूमि-पुत्री — हल-रेखा से प्राप्त
बहनेंउर्मिला (सगी); मांडवी एवं श्रुतकीर्ति (चचेरी — कुशध्वज-पुत्रियाँ)
पतिश्रीराम — धनुष-भंग स्वयंवर से वरण
पुत्रलव एवं कुश — वाल्मीकि-आश्रम में जन्मे जुड़वाँ
मूल-स्वरूपलक्ष्मी-अवतार (वैष्णव परंपरा); वेदवती-पूर्वजन्म की पुराण-धारा (कथा 1 देखें)
प्रमुख कथाएँ
Major Stories — प्रत्येक कथा न्यूनतम 1,000 शब्दों में
मिथिला के विदेह-वंश की गद्दी पर तब सीरध्वज जनक थे — वह राजा जिसे उपनिषद्-परंपरा तक "राजर्षि" कहती है: याज्ञवल्क्य-जैसे ब्रह्मवेत्ताओं की सभा जिसके दरबार में जुड़ती थी। परंपरा कहती है कि राज्य में अनावृष्टि-अकाल पड़ा और ऋषियों ने उपाय बताया कि राजा स्वयं यज्ञ-भूमि पर हल चलाएँ। जनक ने स्वर्ण-हल थामा — और खेत की रेखा खींचते हुए हल की नोक (सं. "सीता" = हल-रेखा) किसी कठोर वस्तु से टकराई। मिट्टी हटाई गई तो स्वर्ण-कलश में तेजोमयी कन्या मिली — धरती की गोद से सीधे राजा की गोद में। जनक निःसंतान थे; उन्होंने आकाश-वाणी/ऋषि-वचन से उसे "पृथ्वी की भेंट" मानकर पुत्री रूप में स्वीकारा और हल-रेखा के नाम पर नाम रखा — सीता। वाल्मीकि रामायण में जनक स्वयं धनुष-यज्ञ की सभा में यह जन्म-वृत्त कहते हैं: "भूतल से उठती हुई यह कन्या मुझे यज्ञ-भूमि शोधते समय मिली — क्षेत्र से उत्पन्न होने से सीता नाम पड़ा, यह मेरी अयोनिजा पुत्री है।" इसीलिए उनके नाम भूमि से जुड़े हैं — भूमिजा, धरणी-सुता, अवनि-तनया; और पिता-पक्ष से जानकी, वैदेही, मैथिली।
पूर्वजन्म-धाराएँ — वेदवती का संकल्प
सीता कौन थीं, इस पर परंपरा की कई धाराएँ हैं और यह ज्ञानकोश उन्हें बिना घोलमेल के अलग-अलग दर्ज करता है। मुख्य वैष्णव धारा: वे साक्षात् लक्ष्मी हैं जो विष्णु के राम-अवतरण का संग देने आईं। दूसरी प्रसिद्ध पुराण-धारा (वाल्मीकि उत्तरकांड में भी संकेतित) वेदवती की है — विष्णु-प्राप्ति के लिए तप करती वह कन्या जिसे रावण ने केश खींचकर अपवित्र करना चाहा; उसने उसी क्षण देह अग्नि में त्याग दी और घोषणा की — "तेरे ही विनाश के लिए फिर जन्म लूँगी।" यह वेदवती ही अगले जन्म में सीता हुईं — रावण का काल स्वयं उसके द्वार तक हल-रेखा से चलकर आया। कुछ परवर्ती/क्षेत्रीय पाठ (अद्भुत रामायण, कुछ जैन-लोक धाराएँ) सीता को रावण-मंदोदरी से भी जोड़ते हैं — वह कन्या जिसे अशुभ-भविष्यवाणी पर जल/भूमि में विसर्जित किया गया; यह धारा मुख्य वाल्मीकि-मानस परंपरा का भाग नहीं है और यहाँ केवल पाठ-इतिहास की सूचना रूप में दर्ज है (ग्रेड C/D)। मानस की अपनी मार्मिक पूर्वकथा भी है — सती-प्रसंग की छाया-रेखा और मनु-शतरूपा का तप, जिन्हें पुत्र-रूप में स्वयं भगवान और गृहलक्ष्मी रूप में आदिशक्ति मिलीं।
विदेह-आँगन की पाठशाला — दर्शन में पली कन्या
सीता जिस आँगन में बड़ी हुईं, वह भारतवर्ष का अनूठा विश्वविद्यालय था। जनक "विदेह" कहलाते थे — देह में रहकर देह-भाव से मुक्त; बृहदारण्यक उपनिषद् की याज्ञवल्क्य-जनक संवाद-सभाएँ इसी मिथिला-दरबार की हैं, और अष्टावक्र-जनक संवाद (अष्टावक्र गीता) परंपरा ने इसी वंश-पीठ से जोड़ा है। जिस बालिका के पिता का विश्राम-कक्ष ब्रह्मचर्चा से गूँजता हो, उसका संस्कार-पाठ्यक्रम सहज ही असाधारण था — सीता की वह शास्त्रार्थ-क्षमता, जो आगे वन-गमन के तर्क-युद्ध (कथा 2) और अंतिम सभा के मौन-उत्तर तक में दिखेगी, इसी आँगन की देन है। रामायण-परंपरा उन्हें वेद-विदुषी, संगीत-कला-निपुण और सेवा-कुशल — तीनों एक साथ — चित्रित करती है; मिथिला-लोक आज भी अपनी कन्याओं को "सिया-सी सयानी" होने का आशीर्वाद देता है। सुनयना की गोद और जनक की ज्ञान-छाया में पली यह कन्या इसीलिए राजमहल छोड़ते समय नहीं काँपी — जिसे बचपन से सिखाया गया हो कि वैभव देह का है, देही का नहीं, उसके लिए वल्कल और रेशम में भेद ही कितना था?
गौरी-पूजन और वह पहली दृष्टि
स्वयंवर-पूर्व का सबसे कोमल अध्याय मानस ने रचा है — पुष्प-वाटिका। विश्वामित्र संग मिथिला आए राम-लक्ष्मण प्रातः पूजा हेतु पुष्प लेने वाटिका गए; उधर सीता सखियों संग गौरी-पूजन को निकलीं (मिथिला-परंपरा में कन्याएँ वर-कामना से पार्वती पूजती हैं)। दृष्टि मिली — और तुलसी ने उस क्षण को युग-युग का श्रृंगार-मंगल बना दिया: सीता ने मन-ही-मन वरण कर लिया, पर वाणी से कुछ नहीं माँगा; गौरी-मंदिर में प्रार्थना की, और गिरिजा की प्रतिमा मुस्कुराई — आशीर्वाद मिला कि मनोवांछित वर मिलेगा ("मन जाहिं राच्यो मिलहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो")। यह प्रसंग वाल्मीकि में नहीं है — वहाँ विवाह शुद्ध धनुष-शर्त से तय होता है; मानस ने भक्ति-श्रृंगार का यह पूर्वरंग जोड़ा (पाठ-भेद चिह्नित)। दोनों पाठों का संगम-बिंदु एक ही है: सीता का वरण संयोग नहीं, संकल्प था — देवी ने वर पहले चुना, धनुष ने बाद में पुष्टि की।
धनुष-शर्त — पिता की कसौटी
जनक के पास शिव का पिनाक था — देवराज-वंश से चली आई धरोहर, जिसे मिथिला पूजती थी। बाल्यकाल की एक परंपरा-कथा (परवर्ती/लोक — आनंद रामायण-धारा, ग्रेड B/D) कहती है कि नन्ही सीता ने खेल-खेल में उस धनुष को उठाकर खिसका दिया था जिसे सैकड़ों क्षत्रिय हिला न पाते थे — उसी दिन जनक ने प्रण किया कि पुत्री का विवाह उसी से होगा जो यह धनुष चढ़ा दे: जो कन्या के बल की बराबरी न कर सके, वह उसका रक्षक क्या बनेगा? वाल्मीकि-पाठ में शर्त का आधार सीता की "वीर्य-शुल्का" (पराक्रम ही जिसका शुल्क है) प्रतिष्ठा है। स्वयंवर-सभा में संसार भर के राजा हारे — रावण तक की उपस्थिति और असफलता की धाराएँ परंपरा में हैं (मानस में बाण-वर्जित उल्लेख-भेद; वाल्मीकि की मुख्य-सभा में रावण नहीं — पाठ-भेद दर्ज)। जनक का हताश-उद्गार, लक्ष्मण का क्षोभ, और फिर विश्वामित्र का संकेत — इसके आगे का धनुष-भंग क्षण राम-पक्ष से D013 पर सविस्तार है; सीता-पक्ष से वह क्षण यों घटा: जयमाला लिए खड़ी राजकुमारी की साँस धनुष उठने तक थमी रही, टंकार-भंग के साथ मिथिला के आकाश में फूल बरसे, और सीता ने वह माला पहनाई जो केवल गले का नहीं, युगों का बंधन थी।
विवाह पंचमी — चार बहनों की डोली
दशरथ बारात लेकर आए; मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को वह विवाह हुआ जिसे मिथिला-नेपाल आज भी "विवाह पंचमी" पर्व रूप में मनाते हैं। एक ही मंडप में चार जोड़ियाँ बनीं — सीता-राम, उर्मिला-लक्ष्मण, मांडवी-भरत, श्रुतकीर्ति-शत्रुघ्न: जनक-कुशध्वज की चारों कन्याएँ रघुकुल की चार बहुएँ हुईं। मैथिल लोक-गीतों में यह विवाह आज तक गाया जाता है — "बेटी" की विदाई का वह करुण-मंगल स्वर जिसमें मिथिला हर वर्ष अपनी सीता को फिर विदा करती है। अयोध्या में नव-वधू सीता का जो चित्र वाल्मीकि-मानस देते हैं, वह आदर्श-गृहिणी का है — सासुओं की सेवा, पति की छाया, पर व्यक्तित्व अक्षुण्ण: आगे कथा 2 में दिखेगा कि आवश्यकता पड़ने पर यही कोमल वधू शास्त्रार्थ-कुशल विदेह-पुत्री भी है।
आध्यात्मिक अर्थ
सीता-प्राकट्य का प्रतीक-शास्त्र गहरा है। वे बीज से नहीं, भूमि से जन्मीं — श्रम (हल) और धर्म (यज्ञ-भूमि) के संगम पर प्रकट होने वाली संपदा: लक्ष्मी वहीं मिलती है जहाँ राजा स्वयं हल थामे — शासन जब श्रम से जुड़ता है, समृद्धि धरती फोड़कर निकलती है। "वीर्य-शुल्का" शर्त बताती है कि श्री (सीता/लक्ष्मी) का वरण बल-प्रदर्शन से नहीं, अहं-भंग (शिव-धनुष का टूटना) से होता है — D013 पर यही सूत्र राम-पक्ष से कहा गया है। वेदवती-धारा जोड़ती है कि सीता-हरण रावण के लिए नया पाप नहीं, पुराने पाप की परिपक्वता थी — काल अपराधी के घर स्वयं चलकर आता है, कभी-कभी हल-रेखा से। और पुष्प-वाटिका का मौन-वरण भक्ति की रीति सिखाता है: माँगो मत, चुन लो और प्रतीक्षा करो — गौरी मुस्कुरा दें तो धनुष स्वयं टूटता है।
स्रोत टिप्पणी: हल-रेखा प्राकट्य एवं "वीर्य-शुल्का" जनक-वचन — वाल्मीकि बालकांड (ग्रेड A); वेदवती-पूर्वजन्म उत्तरकांड/पुराण-धारा (ग्रेड A/B); पुष्प-वाटिका एवं गौरी-पूजन मानस बालकांड (ग्रेड A — तुलसी-परंपरा; वाल्मीकि में अनुपस्थित, भेद चिह्नित); बाल्य-धनुष-प्रसंग आनंद रामायण/लोक (ग्रेड B/D); मंदोदरी-कन्या धारा अद्भुत रामायण आदि (ग्रेड C/D — मुख्य-परंपरा से पृथक् दर्ज); विवाह पंचमी मिथिला-परंपरा (ग्रेड B — जीवित पर्व)।
कथा 2 / 3
अशोक वाटिका — बंदिनी नहीं, अपराजिता
स्रोत: वाल्मीकि रामायण — अरण्य एवं सुंदर कांड (सीता-पक्ष)
पृष्ठभूमि — "जहाँ राम, वहीं अयोध्या"
वनवास-आदेश की घड़ी सीता के चरित्र की पहली सार्वजनिक कसौटी थी। राम ने उन्हें अयोध्या में रहकर सास-सेवा का धर्म समझाया; उत्तर में विदेह-पुत्री ने जो तर्क-माला दी, वाल्मीकि (अयोध्याकांड 27-30) ने उसे पूरा शास्त्रार्थ बनाया है — पत्नी पति के कर्म-फल की अर्धभागिनी है; माता-पिता, पुत्र, भाई अपने-अपने भाग्य भोगते हैं, पर पत्नी का भाग्य पति-संग ही चलता है; मुझे वन के कंटक राजमहल के फूल लगेंगे। और जब कोमल तर्क पूरे हुए तो वह वाक्य भी आया जो सीता की वाणी की धार दिखाता है — "क्या मेरे पिता ने यह जानकर तुम्हें जामाता बनाया था कि तुम देह में पुरुष हो, कर्म में स्त्री?" (वाल्मीकि 2.30 का प्रसिद्ध उपालंभ — प्रेम की झिड़की, जो जीत गई)। राम झुके; सीता वन चलीं — और चौदह वर्ष के वन को उन्होंने वनवास नहीं, सहवास बनाया: चित्रकूट-पंचवटी के पर्ण-कुटीरों की गृह-लक्ष्मी, ऋषि-पत्नियों (अनसूया-भेंट, पातिव्रत्य-संवाद और दिव्य-वस्त्राभरण) की प्रिय अतिथि, मृग-मयूरों की सखी। हरण-पूर्व का एक सूक्ष्म-प्रसंग वाल्मीकि दर्ज करते हैं जो सीता की धर्म-दृष्टि का प्रमाण है: उन्होंने राम को टोका था कि वनवासी होकर निरपराध वन-जीवों/राक्षसों पर शस्त्र-संकल्प (जनस्थान-प्रतिज्ञा) कहीं क्षत्रिय-धर्म का अति-विस्तार न बन जाए — शस्त्र पास हो तो प्रयोग की इच्छा जन्म लेती है (अरण्यकांड 9 का "अग्नि-संग" दृष्टांत)। राम ने ऋषि-रक्षा का वचन-धर्म समझाया — पर यह संवाद दिखाता है कि सीता अनुगामिनी ही नहीं, विवेक-सहचरी थीं।
हरण — तिनके की ओट
स्वर्ण-मृग, माया-पुकार और लक्ष्मण के जाने का वृत्त D013 पर है; सीता-पक्ष से उस दोपहर का सत्य इतना है कि भिक्षु-वेश में आए अतिथि का उन्होंने अतिथि-धर्म से सत्कार किया — और वेश उतरते ही रावण को जो मिला वह भयभीत बंदिनी नहीं, अग्नि-वाणी थी: "मैं महाबली राम की पत्नी हूँ — तू सिंहनी को छूने वाला सियार है; समुद्र और मंदराचल उठा ले, पर राम की पत्नी को छूकर जीवित नहीं लौटेगा।" वाल्मीकि की सीता हरण-क्षण में भी याचना नहीं करतीं, चेतावनी देती हैं। पुष्पक पर उन्होंने आभूषण उतार-उतारकर नीचे गिराए — ऋष्यमूक पर बैठे वानरों की ओर बाँधी गई वह पोटली आगे राम-सुग्रीव मिलन की पहली कड़ी बनी: बंदिनी ने अपहरण-मार्ग को ही खोज-मानचित्र बना दिया — यह उपस्थिति-बुद्धि सीता-चरित्र का उपेक्षित पर उजला पृष्ठ है। जटायु-युद्ध उनकी आँखों के सामने हुआ — वृद्ध पक्षी का वह बलिदान सीता की पहली सांत्वना थी कि धर्म-पक्ष सोया नहीं है।
अशोक वाटिका — एक वर्ष का सत्याग्रह
लंका में रावण ने पहले वैभव दिखाया — अंतःपुर, ऐश्वर्य, "पटरानी बना दूँगा"; फिर भय — बारह मास की अवधि, तलवार लिए राक्षसियों का घेरा। सीता ने महल ठुकराकर अशोक वाटिका की शिंशपा-छाया चुनी और वहाँ वह आचरण रचा जिसे आधुनिक भाषा में सत्याग्रह ही कहा जा सकता है — असहयोग (रावण से सीधे संवाद तक का निषेध: प्रसिद्ध "तृण धरि ओट" — बीच में तिनका रखकर बोलना, जो मानस में मुखर और वाल्मीकि में तृण-अंतरित संवाद रूप में है: तिनका बोले कि तू मेरी दृष्टि में इससे अधिक नहीं), अस्वीकार (रावण का हर प्रलोभन-चक्र विफल), और आत्म-बल (व्रत-कृश देह, पर वाणी वज्र)। वाल्मीकि का सुंदरकांड उन्हें "पंक-लिप्त कमलिनी" कहता है — कीचड़ में, पर कीचड़ की नहीं। त्रिजटा-प्रसंग इस अंधकार का दीप है — राक्षसियों में से ही एक वृद्धा ने स्वप्न देखा: श्वेत गज पर राम, जलती लंका, तेल में डूबा रावण — और सहेलियों को चेताया कि इस देवी के चरण पकड़ो। संकट-काल में करुणा शत्रु-शिविर में भी अंकुरित होती है, और सीता ने त्रिजटा को माँ-जैसा मान दिया। फिर भी एक रात्रि निराशा चरम पर पहुँची — आत्मघात तक का विचार (वेणी से प्राण-त्याग का क्षण, सुंदरकांड 28) — और ठीक तभी शुभ शकुन फड़के: वृक्ष पर छिपे हनुमान ने राम-कथा गानी शुरू की। मुद्रिका मिली, संदेश मिला, और हनुमान का प्रस्ताव भी — "मेरी पीठ पर बैठिए, अभी राम तक पहुँचा दूँ।" सीता का अस्वीकार उनके धर्म-विवेक का शिखर है: स्वेच्छा से पर-पुरुष का स्पर्श नहीं (हरण बलात् था); और राम का यश भी तो देखना है — चोरी से लौटूँ तो रावण-वध का धर्म-प्रयोजन ही न रहे। चूड़ामणि देकर उन्होंने काकासुर-प्रसंग (चित्रकूट में इंद्र-पुत्र काक का अपराध और राम का ब्रह्मास्त्र-तृण) की वह स्मृति-कथा सुनाई जो केवल राम-सीता जानते थे — प्रमाण भी, प्रेम-संदेश भी। लंका-दहन की लपटों के बीच अग्नि से हनुमान-रक्षा की प्रार्थना करने वाली भी वही थीं — बंदिनी जो अपने दूत के लिए देवताओं से लड़ गई।
माया-शीश और सरमा — अंतिम प्रहार भी विफल
युद्ध-काल में रावण ने सीता पर अपना क्रूरतम मनोवैज्ञानिक अस्त्र चलाया — विद्युज्जिह्व मायावी से राम का कटा हुआ माया-शीश और माया-धनुष बनवाकर सीता के सम्मुख रखवा दिया: "तुम्हारा राम सोते में मारा गया; अब तो मान जाओ।" उस क्षण का विलाप वाल्मीकि ने पूरी करुणा से लिखा है — पर यहीं लंका के भीतर की करुणा भी प्रकट हुई: विभीषण-पत्नी सरमा (जो छिपकर सीता की सेवा-संवाद करती थी) ने सत्य बताया — यह इंद्रजाल है, राम-लक्ष्मण सेतु पार कर चुके हैं, वानर-सेना तट पर गरज रही है (युद्धकांड 31-34)। त्रिजटा के बाद सरमा — शत्रु-गृह की दूसरी सखी: सीता की सत्य-निष्ठा ने राक्षस-कुल की स्त्रियों तक में अपना पक्ष रच लिया था। माया टूटी, और उसी के साथ रावण का अंतिम दाँव भी — जो एक वर्ष में भय, प्रलोभन और छल तीनों से एक मन को नहीं जीत सका, वह दस सिरों समेत भी हार चुका था; रणभूमि की घोषणा तो शेष औपचारिकता थी।
प्रतीक्षा का अर्थ-शास्त्र
युद्ध के महीनों में सीता ही वह कारण थीं जिसने लंका को भीतर से तोड़ा — मंदोदरी बार-बार रावण से सीता लौटाने की विनती करती रही, विभीषण का धर्म-पक्ष प्रबल होता गया, और माल्यवान-जैसे वृद्ध मंत्री तक कह उठे कि जबसे यह देवी आई है, लंका के शकुन उलटे हैं। वाल्मीकि सूक्ष्म संकेत देते हैं कि रावण सीता को स्पर्श क्यों न कर सका — नलकूबर/ब्रह्मा का वह शाप (उत्तरकांड) कि बलात् स्त्री-स्पर्श पर उसका शीश फटेगा; अर्थात् सीता की रक्षा उनका अपना सत् भी कर रहा था और रावण का पूर्व-पाप भी। युद्ध-विराम पर विजय-सूचना लेकर हनुमान ही आए; सीता के पास उस क्षण देने को शब्द नहीं थे — बोलीं कि इस संवाद के तुल्य संसार में कोई रत्न नहीं। और उन राक्षसियों के लिए — जो वर्ष भर तर्जनाएँ देती रहीं — क्षमा माँग ली: "कृतापराधों पर भी आर्य कृपा ही करते हैं; कोई कभी अपराध नहीं करता, ऐसा कौन है?" वाल्मीकि (युद्धकांड 113) का यह सीता-वचन क्षमा-शास्त्र का शिखर-श्लोक है — प्रतिशोध का अधिकार जिस क्षण मिला, उसी क्षण उसे त्याग देना।
आध्यात्मिक अर्थ
अशोक वाटिका साधक-चेतना का चित्र है — शरीर बंदी हो सकता है, निष्ठा नहीं। रावण के दो अस्त्र — प्रलोभन और भय — माया के ही दो मुख हैं, और सीता का उत्तर दोनों को एक है: स्मरण (अखंड राम-चिंतन)। "तृण धरि ओट" तुच्छता-बोध का शस्त्र है: बुराई से संवाद भी करना पड़े तो बीच में तिनका रखो — उसे अपने भीतर प्रवेश मत दो। हनुमान की पीठ ठुकराना सिखाता है कि मुक्ति भी मर्यादा से आनी चाहिए — साधन पवित्र न हो तो सिद्धि भी दूषित है। और राक्षसियों की क्षमा वह अंतिम पाठ कि वर्ष भर की पीड़ा का प्रतिकार करुणा से देना ही वास्तविक विजय है — रावण तो राम के बाण से मरा, लंका की क्रूरता सीता की क्षमा से मरी। इसीलिए रामानुज-परंपरा सीता को "पुरुषकार" कहती है — जीव और प्रभु के बीच वह ममता-सेतु जो अपराध गिनने से पहले क्षमा लिख देती है।
अग्नि-परीक्षा से भूमि-प्रवेश — गरिमा की अंतिम गाथा
स्रोत: वाल्मीकि रामायण — युद्ध एवं उत्तर कांड; मानस; पाठ-स्तर विवाद दर्ज
पृष्ठभूमि — विजय के बाद का घाव
रावण-वध के बाद का प्रसंग सीता-पक्ष से पढ़ने पर उसकी पूरी वेदना खुलती है। स्नान-श्रृंगार कराकर शिविका में लाई गई सीता को राम ने भरी सभा में जो कहा (लोकापवाद-भय, "दिशाएँ खुली हैं" तक के वाक्य — युद्धकांड 115), वह उनके जीवन का सबसे कठोर आघात था — रावण की तर्जनाओं ने जो न कर सकीं, वह प्रिय के संशय-वचन ने किया। पर उत्तर में सीता का जो भाषण वाल्मीकि ने रखा है (युद्धकांड 116), वह प्राचीन साहित्य के महान आत्म-गरिमा वक्तव्यों में है: "तुम प्राकृत पुरुष की भाँति क्यों बोल रहे हो? पराधीन देह का स्पर्श मेरा अपराध नहीं — हृदय तो सदा तुम्हारे अधीन रहा। जन्म-परिचय भी तुमने नहीं समझा — मैं जनक-आँगन में नहीं, भूमि से जन्मी हूँ।" फिर लक्ष्मण से चिता — और अग्नि-प्रवेश से पूर्व की वह प्रतिज्ञा-वाणी: "यदि मन-वचन-कर्म से राम के अतिरिक्त किसी का चिंतन नहीं किया, तो हे अग्नि, मेरी रक्षा करो।" अग्निदेव उन्हें गोद में उठाकर प्रकट हुए — "यह पवित्रता की भी पवित्रता है, इसे ग्रहण करो" — और तभी ब्रह्मादि देवों ने राम का विष्णुत्व घोषित किया। वाल्मीकि-पाठ का अपना उत्तर यह है कि राम को संशय था नहीं — लोक-साक्ष्य चाहिए था ("मैं जानता था — पर संसार को अग्नि की साक्षी चाहिए"); मानस-अध्यात्म रामायण की छाया-सीता धारा (D013 पर विस्तृत) इस प्रसंग की पीड़ा को ही विलीन कर देती है — वास्तविक सीता कभी लंका गई ही नहीं। दोनों पाठ यहाँ साथ दर्ज हैं; पर सीता-पक्ष का सत्य दोनों में एक है — उनकी शुद्धता कभी प्रश्न नहीं थी, प्रश्न सदा संसार की दृष्टि का था।
अयोध्या की रानी — और दूसरा वनवास
राज्याभिषेक के स्वर्ण-वर्षों में सीता अयोध्या की हृदय-सम्राज्ञी थीं — वाल्मीकि लिखते हैं कि राम-सीता का पारस्परिक अनुराग वर्षों में और गहराता गया। गर्भवती सीता ने एक दिन ऋषि-आश्रमों (गंगा-तट के तपोवन) के दर्शन की इच्छा कही — राम ने कल ही ले चलने का वचन दिया। उसी रात्रि गुप्तचर-मुख से धोबी-प्रसंग आया (उत्तरकांड — जन-अपवाद कि रावण-गृह में रही रानी को राम ने ग्रहण कैसे किया), और राजा राम ने वह निर्णय लिया जो रामकथा का शाश्वत विवाद-बिंदु है: लक्ष्मण सीता को "आश्रम-दर्शन" के बहाने गंगा-पार छोड़ आए। परित्याग-सूचना सुनकर सीता मूर्छित हुईं — पर उनका संदेश-वचन देखिए (उत्तरकांड 48): विलाप में भी उन्होंने राम को दोष नहीं, धर्म दिया — "राजा को प्रजा-अपवाद से बचना ही चाहिए; भाइयों-सासुओं को प्रणाम कहना; मेरी चिंता न करें — मुझे तो अपने तप से उनके यश की रक्षा करनी है।" यह प्रतिक्रिया परित्यक्ता की नहीं, उस माता की है जो अपने से बड़े धर्म-तंत्र को समझती है — सहमति और स्वीकृति में जो भेद है, सीता उसे जानती थीं: उन्होंने निर्णय स्वीकारा, उचित कभी नहीं कहा — अंतिम सभा में उनका मौन-प्रस्थान इसका उत्तर बना। (यह पूरा वृत्त उत्तरकांड का है, जिसका पाठ-स्तर विवाद — परवर्ती/प्रक्षिप्त होने की शोध-धारा — D013 की भाँति यहाँ भी सूचित है; भवभूति के "उत्तररामचरित" से लेकर आधुनिक विमर्श तक यह प्रसंग भारतीय साहित्य का सबसे मंथित पृष्ठ है।)
तपस्विनी माता — लव-कुश का गुरुकुल
वाल्मीकि-आश्रम ने राजरानी को तपस्विनी रूप में अपनाया; ऋषि ने कन्या-वत् आश्रय दिया, आश्रम-स्त्रियों ने परिवार। वहीं जुड़वाँ पुत्र जन्मे — कुश और लव (परंपरा नामकरण का सूत्र कुश-घास और उसके अग्र/लव से जोड़ती है)। सीता का यह अध्याय एकल-माता के गौरव का आदि-पाठ है — बिना राजछत्र, बिना पिता-नाम के प्रकट किए (आश्रम उन्हें "वनदेवी"-वत् जानता), उन्होंने दोनों राजकुमारों को ऐसा गढ़ा कि वे शस्त्र में अजेय और शास्त्र में अद्वितीय हुए; वाल्मीकि ने उन्हें अपनी नव-रचित रामायण कंठस्थ कराई — चौबीस हज़ार श्लोक, वीणा-स्वर में। नियति की विडंबना-लीला देखिए: पिता की गाथा पुत्र गा रहे थे, और तीनों एक-दूसरे से अपरिचित। अश्वमेध का घोड़ा आश्रम-सीमा में बँधा (लव-कुश का घोड़ा-रोकना और राम-सेना से युद्ध की कथाएँ परवर्ती जैमिनि-भारत/लोक-धारा में विस्तृत हैं — ग्रेड B/D; वाल्मीकि-मूल में ऋषि-आदेश से गान-प्रसंग केंद्र में है), और यज्ञ-सभा में दो बालकों के स्वर में राम ने अपनी ही कथा सुनी — दर्पण के सामने खड़े सम्राट की आँखें भर आईं। पूछा गया — इनकी माता कौन? उत्तर आया — वाल्मीकि-आश्रम की तपस्विनी। राम ने सीता को सभा में "शपथ" हेतु आमंत्रित किया — एक और सार्वजनिक परीक्षा, अब पुत्रों के सामने।
भूमि-प्रवेश — अंतिम उत्तर
वाल्मीकि स्वयं सीता को लेकर आए और ऋषि-प्रतिज्ञा की — "मेरे सहस्रों वर्षों के तप की शपथ: मैथिली निष्पाप है।" राम ने कहा — मुझे प्रतीति है, पर लोक के लिए शपथ हो। तब कषाय-वस्त्रा सीता ने हाथ जोड़े, दृष्टि नीची रखी, और वह अंतिम वाक्य कहा जो भारतीय साहित्य का सबसे गरिमामय पूर्ण-विराम है: "यदि मैंने मन से भी राम के अतिरिक्त किसी का चिंतन नहीं किया, तो माधवी देवी (पृथ्वी) मुझे स्थान दें।" धरती फटी — दिव्य सिंहासन पर भूमि-देवी प्रकट हुईं, पुत्री को गोद में लिया, और सबके देखते-देखते रसातल में समा गईं। देव-पुष्प बरसे; सभा स्तब्ध; राम का शोक क्रोध तक गया — पृथ्वी से सीता लौटाने की माँग — तब ब्रह्मा ने अवतार-प्रयोजन और मिलन के परम-धाम का स्मरण कराया। सीता ने तीसरी परीक्षा नहीं दी — यही उनका उत्तर था। जो भूमि से आई थी, वह भूमि में लौट गई — बीच का पूरा जीवन उधार की उस मर्यादा को निभाते बीता जिसे संसार बार-बार परखता रहा; अंतिम बार उन्होंने परीक्षा-पत्र लौटा दिया और परीक्षक को निरुत्तर छोड़ गईं। सीतामढ़ी (जन्म-परंपरा) और सीता समाहित स्थल, संग्रामपुर (भदोही-भूमि-प्रवेश परंपरा) — गंगा-मैदान के दो छोर आज भी इस आदि और अंत के तीर्थ-साक्षी हैं।
आध्यात्मिक अर्थ — क्षमा, गरिमा और शक्ति
सीता-चरित का अंतिम अध्याय भक्ति-दर्शन को तीन कठिन पाठ देता है। पहला — शुद्धता स्वयंसिद्ध है, प्रमाण समाज की आवश्यकता है; साधक लोक-साक्ष्य दे सकता है (पहली अग्नि-परीक्षा), पर आत्म-गरिमा की एक सीमा के बाद मौन-प्रस्थान भी धर्म है (भूमि-प्रवेश)। दूसरा — क्षमा और स्वाभिमान विरोधी नहीं: जिसने राक्षसियों को क्षमा किया, उसी ने अंतिम सभा में लौटने से मना किया; क्षमा दूसरों के अपराध पर होती है, स्वाभिमान अपने सत्य पर। तीसरा — शक्ति का सीता-रूप: दुर्गा असुर मारकर शक्ति दिखाती हैं, सीता सहकर — शास्त्र दोनों को एक ही देवी के दो मुख कहते हैं (जानकी को शाक्त-ग्रंथ "मूल-प्रकृति" रूप में भी स्तुत करते हैं — सीता उपनिषद् उन्हें त्रिविध शक्ति कहता है)। इसीलिए "सीता-राम" युगल-नाम में सीता पहले हैं — कृपा (माता) द्वार है, न्याय (प्रभु) भवन; और मिथिला से रामेश्वरम तक करोड़ों कंठ जब "सियावर रामचन्द्र की जय" बोलते हैं, तो राम की जय भी "सिया-वर" होकर ही बोली जाती है — यह भारतीय भक्ति का सबसे सुंदर व्याकरण है: राम की पहचान भी सीता से है।
अर्थ: जो (शक्ति-रूप में) सृष्टि-स्थिति-संहार की कारिणी हैं, क्लेश हरने वाली हैं, समस्त कल्याण करने वाली हैं — उन राम-वल्लभा सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
सीता उपनिषद् के स्तुति-अंश एवं जानकी-स्तोत्रों के पूर्ण-पाठ शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।
पर्व एवं व्रत
Festivals
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जानकी नवमी / सीता नवमी
वैशाख शुक्ल नवमी — प्राकट्य-दिवस; सौभाग्य-कामना का व्रत, मिथिला-जनकपुर में विशेष।
विवाह पंचमी
मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी — सीता-राम विवाहोत्सव; जनकपुर (नेपाल) और अयोध्या के बीच जीवित बारात-परंपरा।
रामलीला में सीता-प्रसंग
आश्विन की रामलीलाओं का भाव-केंद्र — स्वयंवर से अग्नि-परीक्षा तक के मंचन।
राम नवमी / दीपावली
युगल-रूप में पूजन — जन्मोत्सव एवं अयोध्या-आगमन के दीप (D013 देखें)।
मंदिर एवं तीर्थ
Temples
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जानकी मंदिर, जनकपुर (नेपाल)
मिथिला-हृदय का शिखर-तीर्थ — "नौलखा मंदिर"; विवाह पंचमी का केंद्र।
पुनौरा धाम, सीतामढ़ी (बिहार)
हल-रेखा प्राकट्य की जन्मस्थल-परंपरा का प्रमुख दावेदार तीर्थ।
सीता समाहित स्थल, संग्रामपुर (भदोही, उ.प्र.)
गंगा-तट पर भूमि-प्रवेश की स्थल-परंपरा — "सीतामढ़ी" तीर्थ।
सीता अम्मन मंदिर, नुवारा एलिया (श्रीलंका)
अशोक वाटिका की स्थल-परंपरा से जुड़ा "सीता एलिया" मंदिर (जीवित लोक-दावा — ग्रेड D)।
बच्चों के लिए ज्ञान
For Children
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सरल परिचय: माता सीता धरती से प्रकट हुई थीं — राजा जनक को वे खेत में हल चलाते समय मिलीं। वे श्रीराम की पत्नी और लक्ष्मी जी का अवतार हैं। रावण उन्हें छल से लंका ले गया, पर उनका धैर्य इतना बड़ा था कि रावण की कोई धमकी काम नहीं आई।
रोचक तथ्य:
"सीता" का अर्थ है — हल से बनी रेखा।
उनके पिता जनक इतने ज्ञानी थे कि बड़े-बड़े ऋषि उनसे चर्चा करने आते थे।
अशोक वाटिका में हनुमान जी उनके लिए श्रीराम की अँगूठी लाए थे।
उनके जुड़वाँ बेटे लव-कुश ने वाल्मीकि ऋषि से पूरी रामायण गाना सीखा।
सीख: मुश्किल समय में धीरज रखो और सही बात पर अडिग रहो — सच्ची ताकत चिल्लाने में नहीं, डटे रहने में है।