नासिका से निकला त्राता — पृथ्वी का दंष्ट्रा-उद्धार
पृष्ठभूमि — डूबी हुई धरती और द्वारपालों का शाप
कथा के तल में दो धाराएँ मिलती हैं। पहली — सृष्टि-क्रम की: स्वायंभुव मनु को प्रजा-विस्तार का आदेश मिला, पर बसने के लिए पृथ्वी ही स्थान पर नहीं थी — वह रसातल (गर्भोदक/प्रलय-जल) में निमग्न थी। ब्रह्मा चिंतन में डूबे — "जिसे मैंने रचा, वह धरा कहाँ?" दूसरी धारा — वैकुंठ की: सनकादि कुमारों को द्वार पर रोकने वाले जय-विजय को शाप मिला कि तीन जन्म भगवद्-विरोधी होकर लेने होंगे (यह शाप-शृंखला आगे तीन अवतारों की कथा-रीढ़ है — पहले जन्म में हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, फिर रावण-कुंभकर्ण, फिर शिशुपाल-दंतवक्र)। दिति के गर्भ से जन्मे उस पहले युगल में छोटा हिरण्याक्ष ("स्वर्ण-नेत्र") ऐसा बलोन्मत्त हुआ कि गदा घुमाता समुद्रों को रौंदता वरुण तक से युद्ध माँगने पहुँचा; वरुण ने कूटनीति से कहा — मुझमें अब वह बल कहाँ, युद्ध चाहिए तो उनसे माँगो जो सबका संहार करते हैं। और पुराणों की एक प्रबल धारा (विष्णु पुराण-परंपरा एवं लोक-प्रचलित पाठ) में पृथ्वी के रसातल-गमन का कारण भी यही दैत्य है — उसने धरती को समेटकर जल में डुबो दिया; भागवत-पाठ में पृथ्वी प्रलय-जल में निमग्न है और हिरण्याक्ष जल-क्रीड़ा करता वहीं मिलता है — दोनों पाठ-रूप यहाँ ईमानदारी से साथ दर्ज हैं (भेद चिह्नित): फल एक ही है — धरती नीचे, दैत्य जल में, और सृष्टि रुकी हुई।
अंगुष्ठ से आकाश तक — नासिका-प्राकट्य
ब्रह्मा के चिंतन-क्षण में विलक्षण घटना घटी — उनकी नासिका (नथुने) से अंगुष्ठ-प्रमाण एक नन्हा वराह-शिशु निकला और देखते-देखते आकाश में पर्वताकार होता गया — गज-सा, फिर गिरि-सा, फिर लोक-व्यापी: सत्यलोक तक गूँजती उसकी घुरघुराहट (गर्जन) सुनकर जनलोक-तपोलोक के ऋषियों ने पहचान लिया — यह यज्ञ-पुरुष का ही रूप है, और वेद-स्तुतियों से अभिनंदन किया। यह प्राकट्य-रीति अपने-आप में सूत्र है — ब्रह्मा की "नाक से" यानी प्राण से, विचार की सूक्ष्मतम श्वास से निकला समाधान, जो आरंभ में अँगूठे-भर दिखता है और आवश्यकता के नाप से बढ़ता जाता है (मत्स्य की वृद्धि-लीला का थल-संस्करण)। महावराह ने गर्जना कर जल में गोता लगाया — खुरों से जल चीरता, गंध-संकेत से (शूकर-प्रकृति की ही दिव्य-विधि) पाताल-पथ सूँघता वह वहाँ पहुँचा जहाँ धरा मलिन-वसना डूबी पड़ी थी। दंष्ट्रा ने उसे कोमलता से उठाया — पुराण-कवियों का प्रिय चित्र यही है: लोक-मंडल उन श्वेत दाँतों पर ऐसे शोभित हुआ जैसे (जयदेव की उपमा में) चंद्रमा पर उसका कलंक-चिह्न, या कमल-दल पर जल-बिंदु। भागवत में इस क्षण ऋषियों की जो वेद-गर्भ स्तुति है (3.13.34 आदि), वही "यज्ञवराह" दर्शन का मूल-पाठ है — छंद जिसके रोम हैं, वेदी जिसका स्कंध, हवि जिसकी गंध: ऋषि कह रहे हैं कि हमारे सामने पशु नहीं, मूर्तिमान यज्ञ-तंत्र जल चीर रहा है; इसी स्तुति-परंपरा से शिल्पियों ने वे प्रतिमाएँ गढ़ीं जिनकी देह पर देव-ऋषि-मंडल उकेरा जाता है। जल-सतह की ओर लौटते त्राता का मार्ग गदा लिए हिरण्याक्ष ने रोका — "अरे वनचर पशु! यह धरा छोड़कर जा!" — त्राण और अहंकार आमने-सामने थे।
गदा-युद्ध — सहस्र वर्ष का द्वंद्व
वराह ने पहले कार्य पूरा किया — यह क्रम ध्यान देने योग्य है: पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित कर, उस पर अपनी योग-शक्ति से आधार (धारण-शक्ति) रखकर ही वे युद्ध को मुड़े; रक्षक का धर्म पहले रक्षा है, प्रतिशोध बाद में। फिर वह गदा-द्वंद्व हुआ जिसे भागवत देव-दानव युद्धों का आदि-मल्ल कहता है — ब्रह्मांड काँपता रहा; दिति के हृदय में अपशकुन दौड़े। हिरण्याक्ष के छल-बल — माया-अंधकार, शिला-वर्षा, अदृश्य-प्रहार — वराह-तेज के आगे बुझते गए; ब्रह्मा ने स्मरण कराया कि संध्या-वेला आ रही है, दैत्य वर-बल से रात्रि में और प्रबल होगा — खेल समाप्त कीजिए। और तब कान की जड़ पर वराह के एक थप्पड़-प्रहार (कर्ण-मूल पर तल-प्रहार) से वह महादैत्य घूमकर गिरा — जिसके भय से लोक काँपते थे, वह ऐसे गिरा जैसे आँधी से उखड़ा वट। भागवत की श्रद्धांजलि-पंक्ति दैत्य को भी गरिमा देती है — मरते हुए उसका मुख भगवान के चरण-स्पर्श से दमक रहा था; ऋषियों ने कहा — धन्य है यह भी, जिसका अंत स्वयं यज्ञ-पुरुष के हाथों हुआ: वैर-मार्ग से भी जो प्रभु-चिंतन में जिए, उसकी गति भी छू ही ली जाती है (जय-विजय की मुक्ति-यात्रा का पहला चरण पूरा हुआ — अगला चरण D019 नृसिंह-कथा में)।
भूदेवी-संवाद और वराह पुराण
उद्धार के बाद की धारा दक्षिण-परंपरा में विशेष विकसित है — कृतज्ञ भूदेवी का वराह-अनुराग: वे विष्णु की नित्य-संगिनी (श्रीदेवी-भूदेवी युगल की द्वितीया) हुईं; तिरुमला-परंपरा में तो विधान ही है कि वेंकटेश्वर-दर्शन से पूर्व भू-वराह स्वामी (स्वामी पुष्करिणी-तट) का दर्शन हो — क्योंकि वह क्षेत्र मूलतः वराह-क्षेत्र है, वेंकटेश्वर को निवास वराह-अनुमति से मिला (स्थल-पुराण, ग्रेड B)। वराह पुराण इसी युगल-संवाद का ग्रंथ है — वराह-मुख से भूदेवी को कहे गए धर्म, व्रत, तीर्थ और भक्ति-प्रकरण; "वराह-कल्प" की गणना भी इसी अवतार से — वर्तमान कल्प का नाम ही श्वेतवराह कल्प है: हर संकल्प-मंत्र में जब पुरोहित "श्वेतवराहकल्पे..." पढ़ता है, वह इसी उद्धार-लीला की स्मृति है — हिंदू काल-गणना की घड़ी वराह-क्षण से चल रही है। और भूदेवी-वंश का एक काँटा भी परंपरा दर्ज करती है — पुत्र नरकासुर (भौम), जो माता के पुण्य-कवच के बावजूद अधर्मी हुआ और अंततः कृष्ण-सत्यभामा के हाथों मुक्त हुआ (D014): धरती का बेटा भी बिगड़ सकता है, और तब स्वयं धरती उसकी ढाल नहीं बनती — भूदेवी-नीति का यह कठोर पक्ष भी कथा-परंपरा ने बचा रखा है।
आध्यात्मिक अर्थ — डूबे हुए को दाँतों पर उठाना
वराह-कथा का प्रतीक-कोश थल-जीवन का है। पृथ्वी यहाँ केवल ग्रह नहीं — जीव की धर्म-भूमि है: कर्तव्य, मर्यादा, आजीविका, संबंध — वह सब जिस पर जीवन "बसता" है; हिरण्याक्ष ("सोने की आँख") वह दृष्टि है जिसे हर वस्तु में केवल स्वर्ण दिखता है — लोभ जब चरम पर जाता है तो धर्म-भूमि ही रसातल में चली जाती है। उद्धारक रूप शूकर का चुना जाना पुराण-विनोद नहीं, गहन संकेत है — कीचड़ से उठाने का काम वही कर सकता है जो कीचड़ में उतरने से घिनाता नहीं; प्रभु ने पतितोद्धार के लिए वह देह धरी जिसे संसार "अशुद्ध" कहता है — करुणा शुद्धता-अहंकार से बड़ी है। दंष्ट्रा-उद्धार की कोमलता (दाँत — जो चीरने के उपकरण हैं — यहाँ पालने बने) सिखाती है कि शक्ति की सार्थकता संहार में नहीं, संधारण में है। और यज्ञवराह-स्तुति का सार: रक्षा-कर्म ही सबसे बड़ा यज्ञ है — जो डूबते को उठाए, उसके पाँव वेद और श्वास मंत्र हो जाते हैं, भले उसका रूप संसार की आँख में शूकर-सा ही क्यों न हो।