झंझावात, जिह्वा और हल्दी का सरोवर — रोक देने वाली की कथा
प्रलय-झंझा — जब गति ही संकट बनी
प्राकट्य-कथा की प्रधान धारा यों है (तंत्र-निबंध परंपरा — ग्रेड B): सत्ययुग में एक महाझंझावात उठा — ऐसा प्रलयंकर वात्याचक्र जो सृष्टि की व्यवस्था ही उखाड़ने लगा; न वह असुर था जिसे मारा जा सके, न शाप जिसे काटा जा सके — वह शुद्ध अनियंत्रित गति थी। त्रस्त विष्णु (D002) ने सौराष्ट्र-क्षेत्र के हरिद्रा-सरोवर (हल्दी-जल के सरोवर) के तट पर तप किया; सरोवर से पीत-ज्योति फूटी और पीताम्बरा देवी प्रकट हुईं — बगलामुखी; उन्होंने झंझावात को स्तम्भित कर दिया — मारा नहीं, नष्ट नहीं किया: थाम दिया। कथा का पहला पाठ यहीं है: कुछ संकट ऐसे होते हैं जिनका उत्तर संहार नहीं — विराम है; तूफ़ान को तलवार से नहीं काटा जाता, उसे थमना सिखाया जाता है। दूसरी प्रचलित धारा मदन/रुरु-दैत्य की है: वाक्-सिद्धि पाकर उन्मत्त हुआ दैत्य — जो बोल दे, वही हो जाए; उसकी उठी हुई जिह्वा ही संसार के लिए शस्त्र बन गई; देवी ने युद्ध में वही जिह्वा पकड़ ली — वाक्-वेग स्तम्भित, दैत्य निरस्त्र; ध्यान-चित्र इसी क्षण का है। दोनों धाराएँ एक ही व्याकरण बोलती हैं: बगलामुखी अनियंत्रित वेग की — वायु का हो या वाणी का — नियंत्रक-देवी हैं।
स्तम्भन — विराम का दर्शन
"स्तम्भन" को समझना इस विद्या की कुंजी है — और उसे समझने का सूत्र यह कि ब्रेक गाड़ी का शत्रु नहीं होता। गति भारतीय दर्शन में जीवन-लक्षण है (वायु-तत्त्व D041 — प्राण स्वयं गति है); पर अनियंत्रित गति मृत्यु-लक्षण है — बिना ब्रेक की गाड़ी, बिना विराम का वाक्य, बिना ठहराव की महत्त्वाकांक्षा। बगलामुखी उस विराम-बिंदु की देवी हैं जो गति को अर्थ देता है: संगीत में सम, वाक्य में विराम-चिह्न, युद्ध में संधि, क्रोध में वह एक श्वास जो थप्पड़ और क्षमा के बीच खड़ी होती है। ध्यान-चित्र की जिह्वा-पकड़ इसी की मूर्ति है — परंपरा स्पष्ट कहती है कि देवी ने दैत्य की जिह्वा पकड़ी है, काटी नहीं: वाणी का वध नहीं — वाणी का संयम; गदा उद्यत है पर रुकी हुई — दंड-क्षमता की उपस्थिति ही अनुशासन है, प्रयोग नहीं। इस दर्शन का दैनिक अनुवाद हर मनुष्य के पास है: वह ई-मेल जो क्रोध में लिखी गई पर भेजी नहीं गई; वह उत्तर जो जिह्वा तक आया पर होंठों पर थम गया — हर ऐसा विराम बगलामुखी-क्षण है। परंपरा उन्हें ब्रह्मास्त्र-विद्या कहती है (तंत्र-परंपरा पद — ग्रेड B) — और अर्थ गहरा है: ब्रह्मास्त्र वह जो अचूक हो; अचूक शक्ति वही है जो रोक सके — क्योंकि जो रोक सकता है, उसे चलाने की प्रायः आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
कचहरी की देवी — लोक-पक्ष का ईमानदार चित्र
बगलामुखी का लोक-रूप एक विशेष दिशा में विकसित हुआ है, जिसे यह कोश बिना लाग-लपेट दर्ज करता है: वे मुक़दमे-विवाद की देवी मानी जाती हैं। दतिया और नलखेड़ा की पीठों में अर्जियों का ताँता उन्हीं का है जो अदालती उलझनों, झूठे आरोपों, संपत्ति-विवादों में घिरे हैं — "शत्रु की जिह्वा थाम दो, माँ" की पुकार। इस लोक-भाव की जड़ स्वस्थ है: जो व्यक्ति झूठी गवाही, कुयुक्ति और अपवाद-प्रचार से घिरा हो, उसके लिए "कुवाणी का स्तम्भन" न्याय-प्रार्थना है — देवी यहाँ निर्बल के पक्ष की ढाल हैं; परंपरा-वचन भी यही मर्यादा कहता है कि बगला-कृपा सत्य-पक्ष पर होती है। पर इसी लोक-धारा की छाया में वह बाज़ार भी पनपा जिस पर कोश की स्थायी चेतावनी यहाँ सबसे कठोर स्वर में दोहराई जानी चाहिए: "शत्रु-नाश प्रयोग", "विरोधी की ज़बान बंद" के विज्ञापन-तांत्रिक — यह शास्त्र नहीं, ठगी और प्रायः अपराध है; वास्तविक परंपरा स्तम्भन-प्रयोगों को कठोरतम गुरु-मर्यादा में रखती है और द्वेष-प्रेरित प्रयोग को साधक के ही विनाश का द्वार कहती है — जो विद्या जिह्वा थामना सिखाती है, वह सबसे पहले अपनी जिह्वा और अपने द्वेष पर लगती है। न्याय चाहिए तो न्यायालय और सत्य-आचरण साथ चाहिए — देवी ढाल हैं, षड्यंत्र-अस्त्र नहीं।
हल्दी — पीत का औषध-शास्त्र
देवी का पीत-वर्ण केवल सौंदर्य-चयन नहीं — उसकी धुरी में भारतीय जीवन की सबसे बहुमुखी वनस्पति है: हल्दी। प्राकट्य-कथा का सरोवर ही "हरिद्रा-सरोवर" है — हल्दी-जल; और बगला-पूजन की सामग्री-सूची (हल्दी-माला, हल्दी-तिलक, बेसन-नैवेद्य) उसी की परिक्रमा है। अब हल्दी का लोक-शास्त्र देखिए: आयुर्वेद में वह व्रण-रोपक और रक्त-शोधक अग्रणी औषधि है — कटे-घाव पर पहला घरेलू उपचार, यानी रक्त-स्राव का स्तम्भन: देवी का तत्त्व उनकी प्रिय वनस्पति के गुण में ही लिखा है — हल्दी वही करती है जो बगला: बहते को थामती है। विवाह-मंडप की हल्दी-रस्म भी इसी घेरे में है — मांगलिक आरम्भ से पहले वर-वधू का हल्दी-लेप: शुद्धि, रक्षा और (लोक-भाव में) नज़र-कुदृष्टि का स्तम्भन। यह संगति इस कोश की चिर-परिचित पद्धति दोहराती है — शीतला के नीम (D092) और अन्न-देवी के धान की तरह, बगला की हल्दी भी बताती है कि भारतीय देवता प्रायः किसी जीवित लोक-विज्ञान के अधिष्ठाता हैं: पूजा-विधान औषध-स्मृति का ही मंगल-रूप है।
दतिया-नलखेड़ा — पीत-पीठों का जीवित भूगोल
बगलामुखी-भक्ति का आधुनिक इतिहास मध्य-भारत की दो पीठों से चमकता है। दतिया (मध्यप्रदेश) की पीताम्बरा-पीठ — 20वीं सदी में स्वामीजी महाराज (पूज्य अनाम-परंपरा से "श्री स्वामीजी" ही कहलाते हैं) द्वारा स्थापित वह तपःस्थली, जिसने तंत्र को विद्वत्-मर्यादा और राष्ट्र-सेवा से जोड़ा; परिसर में बगलामुखी के संग धूमावती (D076) का विरल मंदिर भी है — मंडल की दो क्रमागत विद्याएँ एक आँगन में। पीठ-परंपरा का सबसे चर्चित अध्याय 1962 का है — चीन-युद्ध संकट में राष्ट्र-रक्षा हेतु यहाँ विशेष अनुष्ठान हुआ था; युद्ध-विराम की तिथि-संगति को परंपरा कृपा-चिह्न रूप में स्मरण करती है (पीठ-परंपरा अभिलेख — ग्रेड B; ऐतिहासिक-कारण बहुआयामी, कोश तटस्थ)। दूसरी — नलखेड़ा (आगर-मालवा) की प्राचीन बगलामुखी: लखुंदर-तट का वह मंदिर जिसे लोक महाभारत-कालीन (युधिष्ठिर-स्थापित धारा) कहता है (लोक-मान्यता — ग्रेड C) — त्रिमूर्ति-बगला विग्रह, हल्दी-चोला, और नवरात्रों में उमड़ता मालवा। दोनों पीठों की साझी शिक्षा वही है जो इस पूरी विद्या की है: पीला रंग हल्दी का है — औषधि का रंग: स्तम्भन चिकित्सा है, हथियार नहीं; रोग रुकना चाहिए, रोगी नहीं। मंडल अब अपनी वाक्-देवी की ओर बढ़ता है — मातंगी (D078): जिसने वाणी थामना सीखा (बगला), वही अब वाणी की महारानी (मातंगी) के द्वार का अधिकारी है — विराम के बाद ही सार्थक शब्द। ॥ पीताम्बरा माँ की जय ॥