वृंदा से तुलसी तक — युगल का घर-घर उतरना
जालंधर — शिव-अंश से जन्मा प्रतिपक्ष
यह कथा वहाँ से शुरू होती है जहाँ शिव-कोप समुद्र में गिरा। परंपरा कहती है — शिव के तीसरे नेत्र का तेज (एक धारा में इन्द्र पर क्रोध का अंश) सागर-संगम में जा गिरा और वहाँ से एक बालक उठा — जालंधर: जल से धारण हुआ। समुद्र (सिंधु) ने उसे पुत्र-रूप में पाला; ब्रह्मा से उसे प्रचंड वर मिला, और बढ़ते-बढ़ते वह त्रिलोक-विजयी दैत्येन्द्र हो गया — इतना प्रबल कि देवता हारते गए और स्वयं शिव से उसका महायुद्ध ठनने की नौबत आई (स्तर: शिव पुराण युद्ध-खंड धारा — ग्रेड A/B; पाठ-भेदों में जन्म-विवरण भिन्न)। पर जालंधर की शक्ति का असली रहस्य उसकी सेना नहीं थी — उसकी पत्नी थी: वृंदा, कालनेमि-कुल की वह परम पतिव्रता, जिसके सतीत्व का तप पति के चारों ओर अभेद्य कवच बन गया था। शास्त्र-तर्क साफ़ है: जब तक वृंदा का पातिव्रत्य अखंड है, जालंधर अवध्य है — त्रिशूल भी उस कवच को नहीं भेद सकता। यहाँ कथा अपना पहला — और गहरा — वाक्य कह देती है: एक स्त्री की निष्ठा ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति से भी बड़ी हो सकती है; दैत्य की ढाल कोई अस्त्र नहीं, उसके घर की मर्यादा थी।
छल, शाप और वह पत्थर — नारायण का मूल्य चुकाना
देवताओं के आग्रह पर अब वह प्रसंग आता है जिसे पुराण स्वयं असहज होकर सुनाते हैं — और यह कोश भी उसे वैसे ही सुनाएगा, चमकाकर नहीं। जालंधर-वध का मार्ग एक ही था: वृंदा का व्रत-कवच टूटे। विष्णु ने जालंधर का रूप धरकर वृंदा के सम्मुख जाकर छल किया; वृंदा ने "लौटे हुए पति" का स्पर्श किया — और उसी क्षण उसका तप-कवच खंडित हुआ; उधर रण में शिव का त्रिशूल चला और जालंधर गिरा। सत्य जानते ही वृंदा का हृदय जल उठा — और उसने वह किया जो पुराणों में विरल है: भगवान को शाप दिया। धाराओं में शाप के पाठ भिन्न हैं — प्रधान धारा में: "तुमने पत्थर-हृदय होकर छल किया — जाओ, पत्थर हो जाओ!" — और परंपरा कहती है, विष्णु ने वह शाप सिर झुकाकर स्वीकार किया: वही शिला-रूप शालिग्राम है — गंडकी नदी (नेपाल) के गर्भ से मिलने वाली वे काली चक्रांकित शिलाएँ, जिन्हें वैष्णव घर साक्षात् नारायण मानकर पूजते हैं। यह प्रसंग जितना असहज है, उतना ही ईमानदार इसका दार्शनिक भार है: धर्म-संकट में देवता ने छल का मार्ग लिया, पर मूल्य चुकाए बिना नहीं — छले गए की वाणी को शाप बनकर फलने दिया और स्वयं पत्थर होकर युग-युग वह दंड धारण किया। भारतीय कथा-नीति अन्याय को विजेता के पक्ष में चुप नहीं कराती — वृंदा हारकर भी वह अकेली पात्र है जिसका वचन भगवान पर चला। सती वृंदा चिता में समाई (धारा-भेद: देह-त्याग विवरण भिन्न), और उसकी राख से — या समाधि-भूमि से — एक पौधा उगा: तुलसी।
वरदान — शाप का विवाह में बदल जाना
पर कथा यहाँ समाप्त होती तो केवल त्रासदी होती — और पुराण त्रासदी पर घर नहीं बसाते। विष्णु ने वृंदा-तुलसी को वरदान दिया, जो शाप का ठीक उलटा दर्पण है: "तुम मुझे सदा शिरोधार्य रहोगी — तुम्हारे पत्र के बिना मेरा कोई भोग पूर्ण नहीं होगा; और प्रति वर्ष मैं तुमसे विवाह करूँगा।" देखिए यह विनिमय: वृंदा ने कहा था "पत्थर हो जाओ" — विष्णु ने कहा "तुम मेरे सिर पर रहोगी"; छल का उत्तर सम्मान की पराकाष्ठा से। यहीं से भारतीय घर की दो अनुष्ठान-धाराएँ फूटीं। पहली — शालिग्राम-तुलसी की युग्म-पूजा: तुलसी-चौरे में शालिग्राम-शिला; तुलसी-दल के बिना नारायण का नैवेद्य अपूर्ण (और स्मरणीय — लक्ष्मी-पूजा में भी तुलसी-सहित विष्णु-स्मरण ही फल देता है); घर का सबसे छोटा मंदिर — एक पौधा और एक पत्थर — असल में लक्ष्मी-नारायण युगल का ही लोक-संस्करण है, क्योंकि परंपरा तुलसी को लक्ष्मी-स्वरूपा (श्री-अंश) कहती है। दूसरी — तुलसी-विवाह: कार्तिक शुक्ल एकादशी — देवउठनी/प्रबोधिनी — को चातुर्मास की योग-निद्रा से जागे विष्णु (शालिग्राम-रूप) का तुलसी से विधिवत् विवाह: मंडप गन्ने के, वस्त्र-चुनरी पौधे को, मंगलाष्टक, कन्यादान तक — पूरा वैवाहिक विधान, घर-घर में, हर वर्ष। और इस विवाह की सामाजिक चाबी यह कि इसी दिन से भारतीय विवाह-ऋतु खुलती है — देव जब तक सोए थे, मंगल-कार्य रुके थे; देव जागे, पहले स्वयं विवाह किया, फिर मनुष्यों के मंडप सजे। एक शापित प्रेम-कथा का वार्षिक-विवाह में रूपांतरण — पुराण-साहित्य की सबसे सुंदर क्षति-पूर्तियों में है।
तुलसी-विज्ञान और घर की देहरी
तुलसी-चौरे की परंपरा में लोक-बुद्धि की एक और परत है, जिसे कथा के साथ पढ़ना चाहिए। घर के आँगन के मध्य में तुलसी का स्थान वास्तु-विधान ने सुनिश्चित किया — प्रातः जल, संध्या दीप, परिक्रमा: यानी दिन में कम-से-कम दो बार पूरा परिवार उस पौधे के पास पहुँचे। आयुर्वेद तुलसी को अग्रगण्य औषधियों में गिनता है — ज्वर, कास, श्वास की घरेलू चिकित्सा का पहला नाम; परंपरा ने औषधि को देवी बनाकर उसकी नित्य-देखभाल को धर्म बना दिया — विज्ञान और भक्ति का ऐसा गूँथा हुआ रूप भारतीय संस्कृति की पहचान है। और एक मार्मिक विधि-निषेध भी: तुलसी-दल तोड़ने के दिन-नियम हैं, रात में पत्ता नहीं तोड़ा जाता, बिना प्रयोजन पौधे को क्लेश नहीं दिया जाता — छल से छली गई वृंदा को परंपरा ने ऐसा घेरा दिया कि अब उसकी अनुमति के शिष्टाचार के बिना उसे छुआ भी नहीं जा सकता।
श्री-तत्त्व — युगल का दर्शन-पक्ष
तुलसी-कथा युगल का घरेलू द्वार है; उसका शास्त्रीय द्वार श्रीसूक्त से खुलता है — ऋग्वेद-खिल का वह पंद्रह-ऋचा सूक्त जो हिरण्यवर्णा, हरिणी, सुवर्ण-रजत-स्रजा श्री का आवाहन करता है (पाठ-परंपरा D007 पर)। वैष्णव-दर्शन — विशेषतः रामानुज की श्रीवैष्णव धारा — ने इस श्री को नारायण की नित्य-अवियुक्ता घोषित किया: विष्णु-पुराण की प्रसिद्ध घोषणा है कि श्री विष्णु से नित्य-संयुक्ता हैं — जगत्-पिता विष्णु हैं तो जगन्माता श्री; वे अलग होते ही नहीं, इसलिए "श्रीमन्" कोई अलंकार नहीं — तत्त्व-वाचक है। यहीं वह प्रश्न भी सुलझता है जो लोक पूछता है: लक्ष्मी "चंचला" क्यों कही जाती हैं? उत्तर युगल-दर्शन में है — लक्ष्मी वहाँ-वहाँ से चली जाती हैं जहाँ नारायण (धर्म) नहीं हैं; नारायण के वक्षस्थल से वे कभी नहीं हिलतीं। अर्थात् चंचलता लक्ष्मी का स्वभाव नहीं — धर्म-विहीनता की प्रतिक्रिया है: धन उसी घर टिकता है जहाँ धर्म बसा हो। यही इस युगल का गृहस्थ-सूत्र है, जिसे दीपावली की सबसे बड़ी बारीकी दोहराती है — लक्ष्मी-पूजन में लक्ष्मी अकेली नहीं पूजी जातीं: गणेश साथ हैं, और विष्णु-स्मरण अनिवार्य — क्योंकि परंपरा जानती है कि श्री को निमंत्रण देना हो तो नारायण का आसन पहले बिछाना पड़ता है। ॥ श्रीमन्नारायणाभ्यां नमः — ऐसा भाव; शब्द-रूप में: लक्ष्मी-नारायण युगल की जय ॥