शिलाद का पुत्र — मृत्यु-लेख मिटाकर अमर हुआ बालक
भूमि से मिला बालक — और आठ वर्ष का लेख
शिलाद मुनि तपस्वी थे — पर वंश-प्रश्न ने घेरा: पितरों ने स्वप्न में संतति माँगी। मुनि ने संतान के लिए वह मार्ग चुना जो उनके नाम (शिला-द) के अनुरूप था — भूमि-तप: इन्द्र से नहीं (धारा-प्रसंग: इन्द्र ने अयोनिज-अमर पुत्र देने में असमर्थता कही), महादेव से माँगा; और यज्ञ-भूमि जोतते हुए हल की नोक से उन्हें मिला — अग्नि-सा दमकता बालक: अयोनिज, भूमि-प्रसूत (सीता-जन्म D015 की सजातीय धारा)। नाम रखा नंदी — जिसने आनंदित किया। बालक अलौकिक निकला — वेद-वेदांग कण्ठ, सेवा-परायण; पर सप्तम-अष्टम वर्ष में आश्रम आए मित्र-वरुण ऋषियों ने उसे देखकर जो कहा, उसने पिता को तोड़ दिया: "बालक सर्वलक्षण-सम्पन्न है — पर अल्पायु: आयु का लेख बस एक वर्ष शेष है।" शिलाद विलाप में डूबे। और यहाँ आठ वर्ष के बालक का वह उत्तर आता है जो इस कथा का पहला रत्न है — नंदी हँसा: "पिता, रोते क्यों हैं? आयु का लेख विधाता लिखता है — पर विधाता के भी विधाता का नाम मैंने आपसे ही सीखा है। मृत्यु मुझे तभी छू सकती है जब महाकाल न चाहें — मैं उन्हीं की शरण जाता हूँ।" मृत्यु-भय का उत्तर पलायन नहीं, शरणागति — बालक भुवन-नदी तट पर शिव-तप में बैठ गया।
मृत्युंजय-द्वार — आयु-लेख का मिटना
घोर बाल-तप ने कैलास हिला दिया। महादेव प्रकट हुए — और नंदी की माँग फिर विलक्षण: दीर्घायु नहीं माँगी — "आपके सान्निध्य का नित्य-वास चाहिए, प्रभो; आयु से क्या — आपसे दूर अमरता भी मृत्यु है।" शिव ने जो किया, वह वर-कथाओं का शिखर है: बालक को गले लगाकर कहा — "मृत्यु तुझे क्या छुएगी — तू मृत्यु के स्वामी का अपना हो गया; तू अजर-अमर होगा, मेरे गणों का अध्यक्ष, मेरा वाहन, मेरा द्वार-अधिकारी — मेरा नित्य-सहचर।" अपने कंठ की वनमाला और अपना नाम-चिह्न देकर उन्होंने बालक को नंदीश्वर — नंदी-ईश्वर — पद दिया: वाहन को "ईश्वर"-प्रत्यय — देव-कोश में किसी वाहन को यह गौरव नहीं; और मरुत्-कन्या सुयशा से उसका विवाह कर कैलास-परिवार में सदा को जोड़ लिया (शिव पुराण शतरुद्र-धारा — ग्रेड A/B)। कथा का दर्शन-सूत्र गहरा है: मृत्युंजय-तत्त्व (D003-महामृत्युंजय धारा) का बाल-संस्करण — मृत्यु का उत्तर आयु-वृद्धि नहीं, सम्बन्ध है: जो अविनाशी का हो गया, विनाश उसका क्या करे; और वर-याचना का पाठ भी: नंदी ने वस्तु नहीं — सान्निध्य माँगा, और सान्निध्य के भीतर सब वस्तुएँ स्वयं चली आईं (D069-सिद्धि क्रम की सजातीय नीति)।
द्वार की मुद्रा — प्रतीक्षा, कर्ण और रावण-प्रसंग
नंदीश्वर-पद के साथ वह मुद्रा जन्मी जो आज हर शिवालय की पहचान है — और उसकी हर रेखा विधि-अर्थ रखती है। स्थान: गर्भगृह के ठीक सम्मुख, लिंग-दृष्टि-रेखा में — इसीलिए विधान कहता है कि नंदी और शिवलिंग के बीच से नहीं गुज़रते (दृष्टि-सेतु नहीं काटा जाता); दर्शन-रीति यह कि नंदी के कंधे-पार (सींग-कान के बीच) से लिंग-दर्शन करो — अर्थ: शिव को वैसे देखो जैसे नंदी देखता है — अनन्य होकर। कर्ण-निवेदन: भक्त नंदी के कान में झुककर मनोकामना कहता है — भारत की कोमलतम मंदिर-विधि; लोक-व्याख्या: महादेव ध्यान-लीन रहते हैं, पर नंदी सदा जागा है — उसके कान से बात स्वामी तक अवश्य पहुँचती है; विधि-मर्यादा यह भी कि कहते समय दूसरे कान को हथेली से ढँका जाता है — निवेदन गोपनीय रहे: प्रार्थना प्रदर्शन नहीं। और द्वार-अधिकार का कठोर-पक्ष रावण-प्रसंग में है: कैलास-द्वार पर नंदी ने दशग्रीव को रोका; अहंकारी रावण ने "वानर-मुख" कहकर उपहास किया — नंदीश्वर ने शाप दिया: इन्हीं वानरों के हाथों तेरी लंका का विनाश होगा (वाल्मीकि उत्तरकांड-धारा — ग्रेड A/B): रामकथा का वानर-सूत्र (D012/D099) एक द्वारपाल के अपमान से बँधा है — द्वार पर बैठे को छोटा समझने वाला इतिहास से यही सीखे।
ताल और नाट्य — कला-गुरु नंदिकेश्वर
नंदी का एक मुख कला-जगत् में खुलता है, जो प्रायः अनजाना रह जाता है: दक्षिण की नाट्य-संगीत परंपरा नंदिकेश्वर को अपने आदि-आचार्यों में गिनती है — नृत्य-शास्त्र का प्रतिष्ठित ग्रंथ अभिनय-दर्पण नंदिकेश्वर-नाम से ही चला आया है (भरत-परंपरा का सहवर्ती स्तम्भ — रचयिता-काल शोध-विमर्शित, ग्रेड B), और ताल-वाद्य परंपरा कहती है कि शिव के तांडव (D025-नटराज) में मृदंग-ताल नंदी ही सँभालते हैं — चिदम्बरम्-चित्रों में नटराज-सभा के वादक नंदी। संगति गहरी है: जिसकी साधना ही "स्थिर बैठना" है, ताल उसी को सौंपा गया — क्योंकि ताल का प्राण सम है: लय कितनी भी दौड़े, लौटना स्थिर-बिंदु पर है (D077-विराम सूत्र); नृत्य शिव करते हैं, पर नृत्य को व्यवस्था नंदी देते हैं — कला-जगत् का यह श्रम-विभाजन नंदी-तत्त्व की ही घोषणा है: हर तांडव के नीचे कोई अचल सम चाहिए।
पत्थर में धैर्य — शिल्प, प्रदोष और बसव-धारा
भारतीय शिल्पियों ने नंदी-प्रेम पत्थर में उँडेला — महानंदी परंपरा: तंजावुर बृहदीश्वर का एकाश्म महानंदी (चोल), मैसूर चामुंडी-पहाड़ी का विशाल नंदी, लेपाक्षी (D098-क्षेत्र!) का उत्कृष्टतम एकाश्म वृषभ, हम्पी-बेंगलुरु (बसवनगुडी "बुल टेम्पल") — दक्षिण का हर युग अपना महानंदी गढ़ता गया (कला-इतिहास — ग्रेड A); उत्तर में खजुराहो से पशुपतिनाथ (नेपाल) के स्वर्ण-नंदी तक वही धारा। पूजा-चक्र में नंदी की अपनी तिथि प्रदोष है (त्रयोदशी-संध्या — D085-सूत्र): परंपरा कहती है कि प्रदोष-वेला में शिव नंदी के शृंगों के मध्य नृत्य करते हैं — इसीलिए प्रदोष-दर्शन नंदी-सम्मुख से विशेष फल का माना गया; महाशिवरात्रि-श्रावण में नंदी-अलंकरण, और कृषि-लोक में पोला-मट्टु पोंगल-बैलपोळा जैसे वृषभ-पर्व — अन्नदाता बैल की वार्षिक पूजा: नंदी-संस्कृति का खेत-मुख। भक्ति-इतिहास में नंदी-नाम की सबसे बड़ी गूँज कर्नाटक से उठी — 12वीं शती के बसवण्णा (बसव = वृषभ/नंदी का ही लोक-रूप नाम): लिंगायत-धारा के प्रवर्तक, जिनका नाम ही "नंदी" था और जिन्होंने शिव-भक्ति को कर्म-समता ("कायकवे कैलास" — श्रम ही कैलास) का आंदोलन बनाया (इतिहास — ग्रेड A; बसव-नंदी अवतार-मान्यता परंपरा-स्तर)। समापन-पाठ नंदी की मुद्रा पर लौटता है: संसार दौड़ने वालों से भरा है — नंदी बैठने की महिमा है: लक्ष्य पर दृष्टि टिकाकर स्थिर बैठ जाना — न ऊबना, न भटकना; ध्यान-शास्त्र जिस "स्थिर-सुखमासनम्" को साधना कहता है, नंदी उसका युग-युग का विग्रह है — प्रतीक्षा जब प्रेम से भरकर की जाए, तो वह प्रतीक्षा स्वयं ही सबसे ऊँची और सम्पूर्ण पूजा बन जाती है। ॥ नंदीश्वराय नमः ॥