हल के देवता — संकर्षण से श्वेत-शेष तक
पृष्ठभूमि — जन्म से पहले की यात्रा
बलराम की कथा गर्भ से ही असाधारण है। कंस-कारागार में देवकी का सातवाँ गर्भ वही था — पर उसे छठे भाइयों की गति नहीं मिलनी थी। भगवद्-निर्देश पर योगमाया ने वह गर्भ "संकर्षित" कर (खींचकर) गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के उदर में स्थापित किया — मथुरा में प्रचार हुआ कि देवकी का गर्भ गिर गया। इसी संकर्षण-विधि से उनका पहला नाम जन्मा — संकर्षण; गर्गाचार्य ने गुप्त नामकरण में "राम" (रमण कराने वाला) कहा और बल-आधिक्य देख परंपरा ने "बलराम" (विस्तृत नामकरण-प्रसंग D014 कथा 1 पर)। इस तरह वे दो माताओं के पुत्र हुए — देवकी की कोख के, रोहिणी की गोद के; और जन्म से ही वह भूमिका मिली जो आजीवन रही: कृष्ण-लीला का अग्र-रक्षक। गोकुल-वृंदावन में दोनों भाई साथ पले — पर भागवत ध्यान से पढ़ें तो बड़े भाई का अपना स्वतंत्र वीर-खाता भी है, जो प्रायः कृष्ण-प्रकाश में अलक्षित रह जाता है।
ताल-वन और भांडीर-वन — दाऊ के अपने युद्ध
धेनुकासुर-वध बलराम की पहली स्वतंत्र वीर-कथा है (भागवत 10.15)। यमुना-तट का ताल-वन पके ताड़-फलों से महकता था, पर गर्दभ-रूप धेनुक और उसके दल के आतंक से अछूता — ग्वाल-मंडली की फल-लालसा पर दाऊ आगे बढ़े, वृक्ष झकझोरे, और दुलत्ती मारते झपटे धेनुक को पिछले पैरों से पकड़कर ताड़-शिखर पर दे मारा; दल-बल समेत असुर-गण उसी विधि से गिरे, और ताल-वन बालकों के लिए खुल गया। दूसरा प्रसंग और गहरा है — प्रलंबासुर (10.18): खेल में ग्वाल-वेश धरकर घुसा वह मायावी दानव हार के दंड में बलराम को कंधे पर बैठाकर भागा; आकाश-मार्ग में विकराल निज-रूप खोला। क्षण-भर को बालक सहमे — फिर स्मरण हुआ कि मैं कौन हूँ, और वह मुष्टि-प्रहार हुआ जिसे भागवत इंद्र-वज्र की उपमा देता है: प्रलंब का मस्तक विदीर्ण, रक्त-वमन करता गिरा। ध्यान दें — कृष्ण-कथा में जहाँ असुर-वध प्रायः कृष्ण-नाम पर दर्ज हैं, वहाँ पूतना-सम भार वाले ये दो वध शुद्ध बलराम-खाते के हैं; परंपरा का सूत्र-वाक्य बना कि "बल" नाम व्यर्थ नहीं — यह वह बल है जो अपने कंधे पर बैठे संकट को भी उतार फेंकता है।
यमुना-आकर्षण और रेवती — हल की दो अद्भुत लीलाएँ
बलराम-चरित की सबसे विलक्षण छवि वह है जहाँ उनका हल नदी तक को अनुशासित करता है। द्वारका-काल में ब्रज-भेंट पर आए बलराम वारुणी-मद में यमुना-स्नान की इच्छा से बोले — यमुने, इधर आ; प्रवाह न मुड़ा तो हल की नोक से खींच लिया — यमुना कृशगामिनी होकर उनके पीछे-पीछे बही (भागवत 10.65; वृंदावन में "बलदेव-घाट" धाराओं की स्थल-स्मृति)। पुराण-भाष्य इस प्रसंग के मद-अंश को छिपाते नहीं — वारुणी (मधु) बलराम-चरित का घोषित अंग है (ग्रेड A पाठ; उपासना-परंपरा इसे शेष-तत्त्व की उन्मुक्तता कहती है) — पर रेखांकित यह करते हैं कि उन्मत्तता में भी उनका हल अधर्म पर नहीं, प्रकृति की अकड़ पर चला। दूसरी हल-गाथा विवाह की है, और वह भारतीय वाङ्मय की सबसे वैज्ञानिक-कल्पना कथाओं में है (भागवत 9.3): राजा ककुद्मी अपनी पुत्री रेवती के योग्य वर पूछने ब्रह्मलोक गए; ब्रह्मा का उत्तर-गान सुनकर लौटे तो पृथ्वी पर सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके थे — जिनके लिए कन्या सोची थी, उनके वंश तक विस्मृत थे; ब्रह्मा ने कहा — अब शेष-अंश बलराम ही योग्य वर हैं। युग-लंघन से आई वधू पूर्व-युग की काया के अनुसार अति-दीर्घ थीं — वर ने हल-अग्र से कोमल संकेत-दाब देकर उन्हें युग-अनुरूप किया (लोक-प्रिय ब्योरा — ग्रेड B/D) और रेवती-बलराम का वह विवाह हुआ जिसमें वधू दूल्हे से लाखों वर्ष "बड़ी" थीं। काल-सापेक्षता की इस पुराण-कथा पर आधुनिक पाठक चकित होता है — ब्रह्मलोक का एक प्रहर, पृथ्वी के युग: time dilation की यह अंतर्दृष्टि हमारे कथाकारों के पास कब से थी, यह प्रश्न ही इस कथा का आनंद है।
तटस्थ योद्धा — गदा-गुरु की तीर्थयात्रा
महाभारत-संग्राम में बलराम की भूमिका उनके चरित्र की कुंजी है। वे दोनों पक्षों के गुरु थे — भीम और दुर्योधन दोनों ने गदा-विद्या उन्हीं से पाई; और शिष्य-स्नेह की तुला में दुर्योधन का पलड़ा भारी था (सुभद्रा-विवाह प्रकरण में वे दुर्योधन-पक्षधर थे — कृष्ण की युक्ति से ही अर्जुन-हरण संभव हुआ)। युद्ध ठना तो उन्होंने वह किया जो महाकाव्य में कोई और नहीं कर सका — पक्ष लेने से इनकार: "दोनों मेरे अपने हैं; यह कुल-संहार मैं देख नहीं सकता" — और अठारह दिनों के महायुद्ध की अवधि वे सरस्वती-तीर्थों की यात्रा पर निकल गए (महाभारत शल्य पर्व का तीर्थयात्रा-पर्व उन्हीं की यात्रा-सूची से चलता है — तीर्थ-माहात्म्यों का वह अनुपम अभिलेख)। लौटे ठीक उस दिन जब भीम-दुर्योधन गदा-द्वंद्व पर थे; भीम के अधर्म-प्रहार (कमर-नीचे) पर हल उठाकर क्रुद्ध हुए — कृष्ण ने रोका-समझाया। यह तटस्थता पलायन नहीं थी — यह उस देवता का शोक-विवेक था जिसे दोनों ओर अपने ही दिखते थे; युद्ध-ज्वर से घिरे महाकाव्य में बलराम अकेला स्वर हैं जो कहता है कि कुछ विजयें लड़े बिना ही हारी जा चुकी होती हैं। इसी न्याय-कोप का दूसरा दृश्य द्यूत-प्रसंग का रुक्मी-वध है, और तीसरा हस्तिनापुर-प्रकरण — साम्ब (कृष्ण-पुत्र) को कौरवों ने बंदी किया तो दाऊ ने नगर-सीमा पर हल अड़ाकर हस्तिनापुर को ही गंगा में खींचना आरंभ कर दिया; काँपते कौरव वधू-सहित साम्ब को लेकर क्षमा माँगने दौड़े (भागवत 10.68) — नगर के परकोटे में वह "खिंचाव-दरार" लोक-स्मृति में आज भी हस्तिनापुर के नाम से जुड़ी है।
श्वेत-निर्गमन और बलभद्र-पीठ — विदा जो विदा नहीं
मौसल-संध्या (D014 कथा 3) में बलराम का महाप्रयाण उनके तत्त्व के अनुरूप मौन-गंभीर है: प्रभास-तट पर ध्यानस्थ देह के मुख से श्वेत महासर्प निकला — सहस्र-फन शेष, जिसे समुद्र और नाग-गण अर्घ्य देते प्रणाम करते ले गए; अंश अपने अंशी में लौट गया। पर उपासना-लोक में दाऊ गए नहीं — ब्रज के बलदेव (दाऊजी) मंदिर में वे आज भी बड़े भैया हैं जिन्हें हुरंगा की होली में भाभी-सखियों की प्रेम-लाठियाँ झेलनी पड़ती हैं; ओडिशा की जगन्नाथ-त्रयी में वे ज्येष्ठ "बलभद्र" रूप में रथयात्रा के पहले रथ (तालध्वज) पर चलते हैं — करोड़ों की उस यात्रा में पहला जयकारा आज भी बड़े भाई का ही है; और छठ-परिवारों की हल षष्ठी (भाद्रपद कृष्ण षष्ठी) पर माताएँ हल-जुते अन्न का त्याग कर संतान-दीर्घायु का व्रत रखती हैं — बलराम-जन्मतिथि का यह व्रत कृषि, संतान और बल — तीनों के देवता को एक धागे में बाँधता है।
आध्यात्मिक अर्थ — बल की विनम्र परिभाषा
बलराम-तत्व के पाठ सीधे हैं, पर गहरे। पहला — हल बनाम खड्ग: देव-मंडल में सुदर्शन भी है, त्रिशूल भी; पर एक देवता ऐसा है जिसका आयुध अन्न उपजाने का यंत्र है — परंपरा का संकेत कि सृजन-श्रम भी उतना ही दिव्य शौर्य है जितना संहार; किसान का हल उठे तो नदियाँ तक मार्ग बदल दें, यह बलराम-आश्वासन है। दूसरा — छाया-धर्म: शेष का काम शयन-आधार बनना है — दिखना नहीं, धारण करना; बलराम आजीवन कृष्ण-कथा के "आधार-स्तंभ" रहे और श्रेय-सूची से बाहर — D017 कूर्म की तरह यह भी नीचे रहने वालों की महिमा का अध्याय है। तीसरा — तटस्थता का साहस: जब सब पक्ष चुन रहे हों, तब "दोनों मेरे हैं" कहकर तीर्थ चल देना कायरता नहीं — वह करुणा है जिसे इतिहास देर से समझता है। और चौथा — गुरु-पाठ: जिसने भीम को भी गढ़ा, दुर्योधन को भी, और अंत में दोनों के द्वंद्व पर आँसू भरे — आचार्य का हृदय शिष्यों के पक्षों में नहीं बँटता। बल-राम अर्थात वह राम (आनंद) जो बल में भी रहे — पर बल को कभी अपना धर्म न बनने दे: यही दाऊजी हैं।