श्री बलराम

Balarama · हलधर · संकर्षण · बलभद्र दाऊजी

कृष्ण के अग्रज, शेषनाग के अवतार — जिनका आयुध तलवार नहीं, किसान का हल है। गौर-वर्ण, नीलांबर, मूसल-हल धारी दाऊजी: बल ऐसा कि नाम ही "बल-राम", और सरलता ऐसी कि छल उन्हें छू नहीं सका।

श्रेणी: शेष-अवतार / नवम-सूची धारा परंपरा: वैष्णव / पैन-हिंदू ग्रंथ: भागवत दशम स्कंध · हरिवंश पर्व: हल षष्ठी · रथयात्रा
प्रमुख कथा पढ़ें
शेष-अवतारजगत्-आधार का मानव-रूप
हलधरकृषि-आयुध का देवत्व
गदा-आचार्यभीम-दुर्योधन के गुरु
बलभद्रजगन्नाथ-त्रयी के ज्येष्ठ

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

बलराम कृष्ण-गाथा के वे स्तंभ हैं जिन पर कथा टिकी तो है, पर दृष्टि कम जाती है — ज्येष्ठ भ्राता, जो जन्म से महाप्रयाण तक छाया की तरह साथ रहे। परंपरा उन्हें शेषनाग का अवतार कहती है — वही शेष जो क्षीरसागर में विष्णु की शय्या और ब्रह्मांड का आधार है: त्रेता में लक्ष्मण बनकर अनुज-रूप में सेवा की, द्वापर में अग्रज-रूप में (लोक-भाष्य की प्रिय सममिति — ग्रेड B/D)। गौर-वर्ण, नील वस्त्र, कानों में एक कुंडल, आयुध हल (संकर्षण-चिह्न) और मूसल — यह रूप-रेखा उन्हें भारतीय देव-मंडल का अनूठा "कृषक-देव" बनाती है: जिस देवता का शस्त्र ही किसान का औज़ार हो, वह श्रम-संस्कृति का स्वाभाविक अधिष्ठाता है।

दशावतार-गणनाओं में उनका स्थान परंपरा-सापेक्ष है — अनेक (विशेषतः दाक्षिणात्य/श्रीवैष्णव) सूचियाँ उन्हें नवम अवतार गिनती हैं (जहाँ बुद्ध नहीं — D022 पर सूची-भेद विस्तृत); जयदेव की माला में वे अष्टम "हलधर" हैं (कृष्ण को स्वयं-स्रोत "केशव" मानकर)। पांचरात्र-दर्शन में "संकर्षण" चतुर्व्यूह का द्वितीय व्यूह है — वासुदेव-संकर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध की उस प्राचीन उपासना-चौकड़ी में बलराम का तात्त्विक पद कृष्ण के तत्काल बाद है; मथुरा-क्षेत्र के प्राचीनतम पुरातात्त्विक देव-अंकनों में संकर्षण-वासुदेव युगल की उपस्थिति इस उपासना की ऐतिहासिक गहराई की साक्षी है (ग्रेड B — पुरातत्व-सामान्यज्ञान)। ब्रज आज भी उन्हें "दाऊजी" कहकर घर के बड़े भाई-सा पूजता है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पितावसुदेव (यदुवंश)
  • माताएँदेवकी (गर्भ-धात्री) एवं रोहिणी (जन्म-पालक) — संकर्षण-विधि से गर्भ-स्थानांतरण
  • अनुजश्रीकृष्ण (D014); बहन सुभद्रा
  • पत्नीरेवती — रैवत ककुद्मी की पुत्री (युग-लंघन कथा नीचे)
  • संताननिशठ एवं उल्मुक (पुराण-परंपरा)
  • मूल-स्वरूपशेषनाग-अवतार; पांचरात्र-व्यूह "संकर्षण"; नवम-अवतार सूची-धारा (D022 भेद-टिप्पणी)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

हल के देवता — संकर्षण से श्वेत-शेष तक

पृष्ठभूमि — जन्म से पहले की यात्रा

बलराम की कथा गर्भ से ही असाधारण है। कंस-कारागार में देवकी का सातवाँ गर्भ वही था — पर उसे छठे भाइयों की गति नहीं मिलनी थी। भगवद्-निर्देश पर योगमाया ने वह गर्भ "संकर्षित" कर (खींचकर) गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के उदर में स्थापित किया — मथुरा में प्रचार हुआ कि देवकी का गर्भ गिर गया। इसी संकर्षण-विधि से उनका पहला नाम जन्मा — संकर्षण; गर्गाचार्य ने गुप्त नामकरण में "राम" (रमण कराने वाला) कहा और बल-आधिक्य देख परंपरा ने "बलराम" (विस्तृत नामकरण-प्रसंग D014 कथा 1 पर)। इस तरह वे दो माताओं के पुत्र हुए — देवकी की कोख के, रोहिणी की गोद के; और जन्म से ही वह भूमिका मिली जो आजीवन रही: कृष्ण-लीला का अग्र-रक्षक। गोकुल-वृंदावन में दोनों भाई साथ पले — पर भागवत ध्यान से पढ़ें तो बड़े भाई का अपना स्वतंत्र वीर-खाता भी है, जो प्रायः कृष्ण-प्रकाश में अलक्षित रह जाता है।

ताल-वन और भांडीर-वन — दाऊ के अपने युद्ध

धेनुकासुर-वध बलराम की पहली स्वतंत्र वीर-कथा है (भागवत 10.15)। यमुना-तट का ताल-वन पके ताड़-फलों से महकता था, पर गर्दभ-रूप धेनुक और उसके दल के आतंक से अछूता — ग्वाल-मंडली की फल-लालसा पर दाऊ आगे बढ़े, वृक्ष झकझोरे, और दुलत्ती मारते झपटे धेनुक को पिछले पैरों से पकड़कर ताड़-शिखर पर दे मारा; दल-बल समेत असुर-गण उसी विधि से गिरे, और ताल-वन बालकों के लिए खुल गया। दूसरा प्रसंग और गहरा है — प्रलंबासुर (10.18): खेल में ग्वाल-वेश धरकर घुसा वह मायावी दानव हार के दंड में बलराम को कंधे पर बैठाकर भागा; आकाश-मार्ग में विकराल निज-रूप खोला। क्षण-भर को बालक सहमे — फिर स्मरण हुआ कि मैं कौन हूँ, और वह मुष्टि-प्रहार हुआ जिसे भागवत इंद्र-वज्र की उपमा देता है: प्रलंब का मस्तक विदीर्ण, रक्त-वमन करता गिरा। ध्यान दें — कृष्ण-कथा में जहाँ असुर-वध प्रायः कृष्ण-नाम पर दर्ज हैं, वहाँ पूतना-सम भार वाले ये दो वध शुद्ध बलराम-खाते के हैं; परंपरा का सूत्र-वाक्य बना कि "बल" नाम व्यर्थ नहीं — यह वह बल है जो अपने कंधे पर बैठे संकट को भी उतार फेंकता है।

यमुना-आकर्षण और रेवती — हल की दो अद्भुत लीलाएँ

बलराम-चरित की सबसे विलक्षण छवि वह है जहाँ उनका हल नदी तक को अनुशासित करता है। द्वारका-काल में ब्रज-भेंट पर आए बलराम वारुणी-मद में यमुना-स्नान की इच्छा से बोले — यमुने, इधर आ; प्रवाह न मुड़ा तो हल की नोक से खींच लिया — यमुना कृशगामिनी होकर उनके पीछे-पीछे बही (भागवत 10.65; वृंदावन में "बलदेव-घाट" धाराओं की स्थल-स्मृति)। पुराण-भाष्य इस प्रसंग के मद-अंश को छिपाते नहीं — वारुणी (मधु) बलराम-चरित का घोषित अंग है (ग्रेड A पाठ; उपासना-परंपरा इसे शेष-तत्त्व की उन्मुक्तता कहती है) — पर रेखांकित यह करते हैं कि उन्मत्तता में भी उनका हल अधर्म पर नहीं, प्रकृति की अकड़ पर चला। दूसरी हल-गाथा विवाह की है, और वह भारतीय वाङ्मय की सबसे वैज्ञानिक-कल्पना कथाओं में है (भागवत 9.3): राजा ककुद्मी अपनी पुत्री रेवती के योग्य वर पूछने ब्रह्मलोक गए; ब्रह्मा का उत्तर-गान सुनकर लौटे तो पृथ्वी पर सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके थे — जिनके लिए कन्या सोची थी, उनके वंश तक विस्मृत थे; ब्रह्मा ने कहा — अब शेष-अंश बलराम ही योग्य वर हैं। युग-लंघन से आई वधू पूर्व-युग की काया के अनुसार अति-दीर्घ थीं — वर ने हल-अग्र से कोमल संकेत-दाब देकर उन्हें युग-अनुरूप किया (लोक-प्रिय ब्योरा — ग्रेड B/D) और रेवती-बलराम का वह विवाह हुआ जिसमें वधू दूल्हे से लाखों वर्ष "बड़ी" थीं। काल-सापेक्षता की इस पुराण-कथा पर आधुनिक पाठक चकित होता है — ब्रह्मलोक का एक प्रहर, पृथ्वी के युग: time dilation की यह अंतर्दृष्टि हमारे कथाकारों के पास कब से थी, यह प्रश्न ही इस कथा का आनंद है।

तटस्थ योद्धा — गदा-गुरु की तीर्थयात्रा

महाभारत-संग्राम में बलराम की भूमिका उनके चरित्र की कुंजी है। वे दोनों पक्षों के गुरु थे — भीम और दुर्योधन दोनों ने गदा-विद्या उन्हीं से पाई; और शिष्य-स्नेह की तुला में दुर्योधन का पलड़ा भारी था (सुभद्रा-विवाह प्रकरण में वे दुर्योधन-पक्षधर थे — कृष्ण की युक्ति से ही अर्जुन-हरण संभव हुआ)। युद्ध ठना तो उन्होंने वह किया जो महाकाव्य में कोई और नहीं कर सका — पक्ष लेने से इनकार: "दोनों मेरे अपने हैं; यह कुल-संहार मैं देख नहीं सकता" — और अठारह दिनों के महायुद्ध की अवधि वे सरस्वती-तीर्थों की यात्रा पर निकल गए (महाभारत शल्य पर्व का तीर्थयात्रा-पर्व उन्हीं की यात्रा-सूची से चलता है — तीर्थ-माहात्म्यों का वह अनुपम अभिलेख)। लौटे ठीक उस दिन जब भीम-दुर्योधन गदा-द्वंद्व पर थे; भीम के अधर्म-प्रहार (कमर-नीचे) पर हल उठाकर क्रुद्ध हुए — कृष्ण ने रोका-समझाया। यह तटस्थता पलायन नहीं थी — यह उस देवता का शोक-विवेक था जिसे दोनों ओर अपने ही दिखते थे; युद्ध-ज्वर से घिरे महाकाव्य में बलराम अकेला स्वर हैं जो कहता है कि कुछ विजयें लड़े बिना ही हारी जा चुकी होती हैं। इसी न्याय-कोप का दूसरा दृश्य द्यूत-प्रसंग का रुक्मी-वध है, और तीसरा हस्तिनापुर-प्रकरण — साम्ब (कृष्ण-पुत्र) को कौरवों ने बंदी किया तो दाऊ ने नगर-सीमा पर हल अड़ाकर हस्तिनापुर को ही गंगा में खींचना आरंभ कर दिया; काँपते कौरव वधू-सहित साम्ब को लेकर क्षमा माँगने दौड़े (भागवत 10.68) — नगर के परकोटे में वह "खिंचाव-दरार" लोक-स्मृति में आज भी हस्तिनापुर के नाम से जुड़ी है।

श्वेत-निर्गमन और बलभद्र-पीठ — विदा जो विदा नहीं

मौसल-संध्या (D014 कथा 3) में बलराम का महाप्रयाण उनके तत्त्व के अनुरूप मौन-गंभीर है: प्रभास-तट पर ध्यानस्थ देह के मुख से श्वेत महासर्प निकला — सहस्र-फन शेष, जिसे समुद्र और नाग-गण अर्घ्य देते प्रणाम करते ले गए; अंश अपने अंशी में लौट गया। पर उपासना-लोक में दाऊ गए नहीं — ब्रज के बलदेव (दाऊजी) मंदिर में वे आज भी बड़े भैया हैं जिन्हें हुरंगा की होली में भाभी-सखियों की प्रेम-लाठियाँ झेलनी पड़ती हैं; ओडिशा की जगन्नाथ-त्रयी में वे ज्येष्ठ "बलभद्र" रूप में रथयात्रा के पहले रथ (तालध्वज) पर चलते हैं — करोड़ों की उस यात्रा में पहला जयकारा आज भी बड़े भाई का ही है; और छठ-परिवारों की हल षष्ठी (भाद्रपद कृष्ण षष्ठी) पर माताएँ हल-जुते अन्न का त्याग कर संतान-दीर्घायु का व्रत रखती हैं — बलराम-जन्मतिथि का यह व्रत कृषि, संतान और बल — तीनों के देवता को एक धागे में बाँधता है।

आध्यात्मिक अर्थ — बल की विनम्र परिभाषा

बलराम-तत्व के पाठ सीधे हैं, पर गहरे। पहला — हल बनाम खड्ग: देव-मंडल में सुदर्शन भी है, त्रिशूल भी; पर एक देवता ऐसा है जिसका आयुध अन्न उपजाने का यंत्र है — परंपरा का संकेत कि सृजन-श्रम भी उतना ही दिव्य शौर्य है जितना संहार; किसान का हल उठे तो नदियाँ तक मार्ग बदल दें, यह बलराम-आश्वासन है। दूसरा — छाया-धर्म: शेष का काम शयन-आधार बनना है — दिखना नहीं, धारण करना; बलराम आजीवन कृष्ण-कथा के "आधार-स्तंभ" रहे और श्रेय-सूची से बाहर — D017 कूर्म की तरह यह भी नीचे रहने वालों की महिमा का अध्याय है। तीसरा — तटस्थता का साहस: जब सब पक्ष चुन रहे हों, तब "दोनों मेरे हैं" कहकर तीर्थ चल देना कायरता नहीं — वह करुणा है जिसे इतिहास देर से समझता है। और चौथा — गुरु-पाठ: जिसने भीम को भी गढ़ा, दुर्योधन को भी, और अंत में दोनों के द्वंद्व पर आँसू भरे — आचार्य का हृदय शिष्यों के पक्षों में नहीं बँटता। बल-राम अर्थात वह राम (आनंद) जो बल में भी रहे — पर बल को कभी अपना धर्म न बनने दे: यही दाऊजी हैं।

स्रोत टिप्पणी: संकर्षण-गर्भ भागवत 10.2; धेनुक 10.15; प्रलंब 10.18; यमुना-आकर्षण 10.65; साम्ब-हस्तिनापुर 10.68; रेवती-ककुद्मी 9.3; रुक्मी-वध 10.61 (सभी ग्रेड A); तीर्थयात्रा-तटस्थता महाभारत शल्य पर्व, श्वेत-सर्प निर्गमन मौसल पर्व (ग्रेड A); लक्ष्मण-शेष सममिति एवं रेवती-ऊँचाई ब्योरा लोक/परवर्ती (ग्रेड B/D); दाऊजी-हुरंगा, बलभद्र-रथयात्रा, हल षष्ठी जीवित परंपराएँ (ग्रेड B); संकर्षण-व्यूह पांचरात्र (ग्रेड B)।

नाम एवं अर्थ

Names
बलराम
बल में रमण करने वाले राम — बल-आधिक्य से मिला लोक-नाम।
संकर्षण
गर्भ-संकर्षण से जन्मा नाम; पांचरात्र-व्यूह का द्वितीय तत्त्व।
हलधर / हलायुध
हल जिनका आयुध — कृषक-देव की पहचान।
बलभद्र
जगन्नाथ-त्रयी के ज्येष्ठ — ओडिशा-पीठ का प्रधान नाम।
दाऊजी
ब्रज का वात्सल्य-संबोधन — घर के बड़े भैया।
रौहिणेय / रेवती-रमण
रोहिणी-पुत्र; रेवती के स्वामी।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ बलरामाय नमः ॥ · ॐ संकर्षणाय नमः ॥

दशावतार-स्तोत्र — हलधर-वंदना (जयदेव)

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥

अर्थ: (हे हलधर!) अपने गौर-विशद शरीर पर तुम मेघ-आभ (नीला) वस्त्र धारण करते हो — मानो हल-प्रहार के भय से आ मिली यमुना की आभा हो; हे हलधर-रूपधारी केशव! जय जगदीश हरे।

संकर्षण-व्यूह मंत्र (पांचरात्र) एवं बलभद्र-स्तुति शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
हल षष्ठी / बलराम जयंती
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी — संतान-मंगल व्रत; हल-जुते अन्न का त्याग, तालाब-खेती (भैंस-दूध) की विधि-परंपरा।
रथयात्रा (पुरी)
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया — तालध्वज रथ पर बलभद्र अग्रगामी; त्रयी-यात्रा का प्रथम जयघोष।
दाऊजी का हुरंगा
होली के परदिवस बलदेव (ब्रज) का विश्व-प्रसिद्ध हुरंगा — भाभी-देवर की लोक-होली।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
दाऊजी मंदिर, बलदेव (मथुरा)
ब्रज का प्रधान बलराम-पीठ — रेवती जी सहित युगल-दर्शन; हुरंगा-परंपरा का केंद्र।
जगन्नाथ मंदिर, पुरी — बलभद्र
रत्नवेदी पर त्रयी के ज्येष्ठ; तालध्वज रथ के स्वामी।
बलदेवजीउ मंदिर, केंद्रापड़ा (ओडिशा)
"तुलसी-क्षेत्र" का प्रसिद्ध बलदेव-पीठ — ओडिशा की स्वतंत्र बलराम-उपासना।
उञ्चागाँव (ब्रज) — लर्ली-लाल परंपरा
रेवती-बलराम युगल की ब्रज-स्थली धाराएँ (ग्रेड D — क्षेत्रीय)।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: बलराम जी श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं — शेषनाग के अवतार। उनका हथियार है किसान का हल! वे इतने बलवान थे कि उन्होंने यमुना नदी को हल से खींच लिया, पर स्वभाव के इतने सीधे कि सब उन्हें प्यार से "दाऊजी" कहते हैं।

रोचक तथ्य:

  • भीम और दुर्योधन — दोनों ने गदा चलाना बलराम जी से ही सीखा।
  • महाभारत के युद्ध में उन्होंने किसी का पक्ष नहीं लिया — वे तीर्थयात्रा पर चले गए।
  • पुरी की रथयात्रा में सबसे आगे बलभद्र जी का रथ चलता है।
  • उनकी पत्नी रेवती दूसरे युग से आई थीं — ब्रह्मलोक में समय धीमा चलता है!

सीख: ताकतवर वही अच्छा है जो सीधा-सच्चा भी हो — और झगड़े में पक्ष लेने से बेहतर कभी-कभी दोनों को समझाना होता है।

मिनी क्विज़:

  1. बलराम जी किसके अवतार हैं?
  2. उनका मुख्य आयुध क्या है?
  3. उनकी पत्नी का नाम क्या है?
  4. पुरी में उन्हें किस नाम से पूजा जाता है?