जो बचा रहता है — शेष का तप, शय्या और सहस्र-नाम
कुल-त्याग और तप — पहला शेष
महाभारत का आदि-पर्व शेष की कथा एक नैतिक बग़ावत से खोलता है। कद्रू-पुत्रों को माता का आदेश मिला था — उच्चैःश्रवा की पूँछ से लिपटकर छल में भागीदार बनो (D094/D096-चक्र); ज्येष्ठ शेष ने देखा कि उसका पूरा कुल असत्य की डोर में बँध रहा है — और उसने वह किया जो ज्येष्ठ के लिए कठिनतम है: कुल छोड़ दिया। न विद्रोह का शोर, न भाइयों से युद्ध — बस विरक्ति: "जहाँ छल स्वभाव हो, वहाँ मेरा भाग नहीं।" गंधमादन-बदरी आदि तीर्थों में उन्होंने ऐसा घोर तप तपा कि देह सूख गई; ब्रह्मा (D001) प्रकट हुए — वर माँगो। शेष ने जो माँगा, वह वर-इतिहास का विलक्षणतम क्षण है: "मेरी बुद्धि धर्म में स्थिर रहे — बस यही।" स्थैर्य माँगने वाले को ब्रह्मा ने स्थैर्य का महाकार्य सौंपा: यह चंचला पृथ्वी — पर्वत-वन-सागर समेत काँपती हुई — इसे अपने फणों पर धारण करो। शेष पाताल में उतरे और शीश पर धरणी धरी — उस दिन से वे धरणी-धर हैं। कथा का व्याकरण ध्यान से पढ़िए: पृथ्वी उसे नहीं सौंपी गई जो बल का दावेदार था — उसे सौंपी गई जिसने स्थिर बुद्धि माँगी थी; संसार का भार उठाने की योग्यता कंधों में नहीं, चित्त की अचंचलता में होती है। भूकम्प की लोक-व्याख्या भी यहीं से चली — शेष जब फण बदलते हैं... — पर परंपरा का बल इस पर है कि वे बदलते नहीं: युग-युग एक आसन, एक भार, एक मौन।
क्षीरसागर की शय्या — विश्राम जो सेवा है
शेष की दूसरी महाछवि क्षीरसागर में है — शेषशायी विष्णु: दूध-से श्वेत सागर में कुंडली मारे अनंत, उस कुंडली पर योग-निद्रा में नारायण, चरण दबातीं श्री (D084-चित्र), नाभि-कमल पर ब्रह्मा — भारतीय चित्र-शिल्प की वह छवि जो देवगढ़-गुप्त शिल्प से लेकर पद्मनाभस्वामी (तिरुवनन्तपुरम् — "अनन्त-पुरम्": नगर का नाम ही शेष पर) के महाविग्रह तक दोहराई गई। इस छवि का दर्शन-पाठ बहुस्तर है। पहला — विश्राम का आधार: सृष्टि-पालक को भी विश्राम चाहिए, और विश्राम के लिए चाहिए विश्वास-योग्य आधार — नारायण वहीं सोते हैं जहाँ शेष जागता है; हर घर जानता है यह सत्य — कोई चैन से तभी सोता है जब कोई भरोसे का जागता हो। दूसरा — ऊर्जा-दर्शन: भागवत (5.25) शेष को संकर्षण कहता है — वह आदि-शक्ति जो सृष्टि को खींचकर (कर्षण) एक सूत्र में बाँधती है; आधुनिक पाठक चाहे तो यहाँ गुरुत्व-बंधन की काव्य-पूर्वछाया देखे (दर्शन-साम्य मात्र — विज्ञान-दावा नहीं; D073-नीति): जगत् को धारण करने वाला वही है जिस पर पालक टिका है। तीसरा — प्रलय-सूत्र: कल्पांत में जब सब समेटा जाता है, तब भी यह शय्या बची रहती है — नाम इसीलिए "शेष" है: सृष्टियों के बीच के महाविराम में परमात्मा जिस पर विश्राम करता है, वह पिछली सृष्टि का बचा हुआ नहीं — वह चिर-अवशेष तत्त्व है जो कभी समेटा नहीं जाता; वेदांत की भाषा में विनाश के पार का अविनाशी — "शेष" उस अविनाशी का नाग-रूप नाम है।
लक्ष्मण और बलराम — सेवा की अवतार-निरंतरता
शेष-चरित की तीसरी धारा अवतार-गाथाओं में बहती है: परंपरा कहती है कि जब-जब विष्णु उतरते हैं, शेष साथ उतरते हैं — शय्या स्वामी को अकेला नहीं छोड़ती। त्रेता में वे लक्ष्मण हुए (रामायण-परंपरा — D013-मंडल): चौदह वर्ष का वह अखंड जागरण — राम-सीता की कुटिया के द्वार पर धनुष थामे खड़ी सेवा — शेष-स्वभाव का ही मानव-रूप था: स्वामी विश्राम में, सेवक जागरण में। द्वापर में क्रम पलटा — शेष बलराम हुए, और अग्रज होकर आए (D024 — जहाँ यह शेष-सूत्र, हल-मूसल और वारुणी-कथाएँ विस्तार से हैं): परंपरा इस पलट में भी रस लेती है — त्रेता में सेवा अनुज-रूप में थी, द्वापर में अग्रज-रूप में; सेवा पद नहीं देखती, सम्बन्ध निभाती है। और विद्या-जगत् में इस धारा की तीसरी किरण — पतंजलि: योगसूत्रकार को परंपरा शेष-अवतार कहती है (आदिशेष का विद्या-अवतरण; व्याकरण-महाभाष्यकार पतंजलि से अभिन्नता-परंपरा सहित — ग्रेड B, परंपरा-स्तर चिह्नित) — नटराज-चित्रों (D025) में चिदम्बरम्-सभा के साक्षी पतंजलि नाग-देह ही चित्रित होते हैं। संगति सुंदर है: जो नाग देह से पृथ्वी धारता है, वही विद्या से चित्त धारण करना सिखाता है — योग "चित्त-वृत्ति-निरोध" है, और निरोध का आदि-आचार्य वही हो सकता है जो युगों से अ-कम्पित फण साधे बैठा है।
अनंत-चतुर्दशी — चौदह गाँठों का धागा
लोक-जीवन में शेष-अनंत की उपासना का दिन अनंत-चतुर्दशी है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी: व्रती भुजा पर अनंत-सूत्र बाँधते हैं — चौदह गाँठों का रक्षा-डोरा (चौदह लोक-प्रतीक), अनंत-रूप विष्णु का पूजन, और वह व्रत-कथा जिसमें महाभारत-सम्बद्ध धारा के अनुसार श्रीकृष्ण ने वनवासी युधिष्ठिर को यह व्रत बताया था — खोया वैभव लौटाने वाला अनंत-अनुग्रह (कौण्डिन्य-सुशीला उपाख्यान: सूत्र का अनादर करने पर वैभव-नाश, पुनः-धारण से पुनरुदय — व्रत-साहित्य, ग्रेड B)। आज यह तिथि गणेश-विसर्जन (D004-चक्र) की तिथि रूप में अधिक प्रसिद्ध है — पर दोनों का संगम भी अर्थ रखता है: विसर्जन सिखाता है कि रूप जाता है; अनंत-सूत्र सिखाता है कि तत्त्व बचा रहता है — एक ही दिन में मूर्ति का विदा-गीत और अविनाशी की गाँठ: भारतीय पर्व-शिल्प का यह संयोग शेष-दर्शन का ही उत्सव-रूप है। अनंत-भूगोल भी दर्शनीय है: तिरुवनन्तपुरम् के अतिरिक्त कासरगोड (केरल) का अनन्तपुर झील-मंदिर — सरोवर-मध्य का वह विरल क्षेत्र जिसे पद्मनाभ का "मूल-स्थान" कहती है परंपरा; श्रीरंगम् का आदिशेष-शयन रंगनाथ महाक्षेत्र; और तिरुमला-सप्तगिरि (D087) — जहाँ देह ही पर्वत-शृंखला मानी गई: दक्षिण का पूरा वैष्णव-भूगोल मानो शेष-कुंडली पर बिछा है। समापन-सूत्र: हर मनुष्य के जीवन में प्रलय आते हैं — हानि के, वियोग के, पराजय के; शेष-दर्शन उन क्षणों की विद्या है — पूछो: सब जाने के बाद क्या बचा है? जो बचा है (साँस, सत्त्व, सम्बन्धों का सार, स्वयं चेतना) — वही तुम्हारा अनंत है; उसी पर नई सृष्टि की शय्या लगती है — प्रलय झेल चुका मनुष्य जब अपने "शेष" को पहचान लेता है, तो वह अगली सृष्टि का आधार-नाग स्वयं बन जाता है: टूटे हुए का बचा हुआ अंश ही फिर से उठने वालों की सच्ची और स्थायी नींव बनता है। ॥ अनंताय नागराजाय नमः ॥