श्रीनिवास-कल्याण — जिस विवाह का ऋण आज तक चल रहा है
वल्मीक-वास — विरही विष्णु पृथ्वी पर
पूर्व-पीठिका D007 से जुड़ती है: भृगु-प्रसंग के बाद रुष्ट लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर भू-लोक (कोल्हापुर-धारा) चली गईं; विरही विष्णु भी वैकुंठ में न रह सके — खोजते-खोजते वेंकटाद्रि आए और वल्मीक (बाँबी) में तप-वास करने लगे — वैकुंठ का स्वामी दीमक-मिट्टी के घर में! क्षेत्र-कथा यहाँ कोमल प्रसंग जोड़ती है: गौ-रूप धरकर स्वयं लक्ष्मी-सरस्वती धाराओं की देवियाँ (पाठ-भेद: ब्रह्मा-शिव गौ-बछड़ा रूप में) उन्हें दूध पिलाने आतीं; चोल-राजा का ग्वाला रहस्य जान बैठा, गौ पर प्रहार कर बैठा — और प्रहार झेलने स्वयं श्रीनिवास उठ खड़े हुए (ग्वाल-दंड कथा-धारा)। इन प्रसंगों का स्वर एक है: यह भगवान ऊपर से उतरा हुआ वैभव नहीं — नीचे से उठी हुई करुणा है: बाँबी में रहा, गौ का दूध पिया, प्रहार अपने शरीर पर लिया। कलियुग-दैवम् की लोक-प्रियता की जड़ यही है — वह भक्त की मिट्टी में रहकर भगवान हुआ।
पद्मावती — कल्याण और कुबेर का ऋण
फिर कथा का वसंत आया: आखेट-भ्रमण में श्रीनिवास ने नारायणपुर के राजा आकाश-राज की पुत्री पद्मावती को देखा — कमल-सरोवर से प्राप्त वह कन्या जो स्वयं श्री-अंश थी (वेदवती-पूर्वजन्म धारा: रामायण-काल की वह तपस्विनी जिसे अगले जन्म में श्री-पद का वर था — पाठ-भेद सहित)। प्रेम हुआ, विवाह ठना — और तब आया वह प्रसंग जिसने इस क्षेत्र का अर्थ-शास्त्र ही रच दिया: विवाह वैभव-योग्य हो, पर वैकुंठ-कोष तो श्री के साथ रूठा हुआ था! समाधान अभूतपूर्व था — श्रीनिवास ने कुबेर (D053) से ऋण लिया: क्षेत्र-परंपरा ऋण-पत्र की शर्तें तक सुनाती है — कलियुग के अंत तक मूल, तब तक ब्याज की किश्तें (क्षेत्र-परंपरा — ग्रेड B; कुबेर-निधि सूत्र D053-पूर्व-प्रकाशित)। विवाह महावैभव से हुआ — श्रीनिवास-कल्याणम् आज भी तिरुमला की नित्य-उत्सव विधि है — और ऋण? आज तक चल रहा है: यही तिरुपति की हुंडी का दर्शन है — विश्व-प्रसिद्ध वह दान-पात्र जिसमें प्रतिवर्ष अरबों का अर्पण गिरता है; लोक-भाव कहता है कि भक्त हुंडी में जो डालता है, वह भगवान का ऋण चुकाने में हाथ बँटाना है। इस उलट-दर्शन को ठहरकर देखिए: सब मंदिरों में भक्त याचक है — यहाँ भगवान ऋणी है; सब जगह मनुष्य देवता का कृपा-पात्र — यहाँ देवता मनुष्य का साझेदार: भक्ति ऋण-सम्बन्ध बनी, और ऋण-सम्बन्ध कभी टूटता नहीं — किश्त दर किश्त चलता रिश्ता है। यही मनोविज्ञान तिरुपति की अखंड भीड़ का रहस्य है — भक्त वहाँ माँगने नहीं, चुकाने जाता है: मनौती फली तो हुंडी में अर्पण — भगवान से बराबरी का लेन-देन जिस साहस से इस क्षेत्र ने रचा, वह भक्ति-इतिहास में अद्वितीय है।
केश-दान और गोविंदा-घोष — समर्पण की विधियाँ
तिरुमला की दो जीवित विधियाँ इस दर्शन की देह हैं। पहली — केश-दान: प्रतिदिन सहस्रों यात्री (स्त्री-पुरुष-बालक) कल्याणकट्टा में मुंडन कराकर दर्शन को बढ़ते हैं; कथा-मूल में लोक-प्रसंग है (नीला देवी की केश-भेंट धारा — जिनके नाम नीलाद्रि पहाड़ी), पर विधि का दर्शन साफ़ है: मनुष्य का सबसे प्रत्यक्ष सौंदर्य-गर्व केश है — उसी को देहरी पर उतार देना अहं-मुंडन का स्थूल-अभ्यास है; भगवान को बाल नहीं चाहिए — भक्त को हल्का होना चाहिए। दूसरी — गोविंदा-घोष: तिरुमला-पथ की सीढ़ियों से गर्भगृह-पंक्ति तक एक ही महाध्वनि — "गोविंदा! गो-विं-दा!" — थके यात्री की साँस भी यही नाम लेती है; अन्नमाचार्य (15वीं शती के महाकवि, जिन्होंने वेंकटेश्वर पर 32-सहस्र संकीर्तन रचे — ताम्र-पत्रों पर सुरक्षित, ग्रेड A इतिहास) से त्यागराज-परंपरा तक दक्षिण का संगीत इसी नाम पर बहा। और भोर की विधि — वेंकटेश-सुप्रभातम्: "कौसल्या सुप्रजा राम..." से उठता वह प्रबोधन-गान (प्रतिवादि-भयंकर अण्णन्-रचित, 15वीं शती) जो एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी के स्वर में करोड़ों घरों की भोर बना — भगवान को जगाने का गीत मनुष्यों की नींद खोलता है। लड्डू-प्रसाद (जी.आई.-सुरक्षित पाक-परंपरा), गुरुवार-शुक्रवार के विशेष सेवा-दर्शन, ब्रह्मोत्सव की गरुड़-सेवा (D096-वाहन महारात्रि) — विधि-विधान का यह पूरा जाल एक ही सूत्र पर कसा है: कलियुग का व्यस्ततम मनुष्य भी यहाँ पंक्ति में खड़ा होकर प्रतीक्षा करना सीखता है — दर्शन दो क्षण का, दीक्षा पूरे दिन की: श्रद्धा की क़तार ही तिरुपति की पाठशाला है। ॥ गोविंदा गोविंदा ॥
आळवारों का वेंकटम् — संगम-युग से बहती धारा
तिरुमला की प्राचीनता का साहित्य-प्रमाण दक्षिण की आळवार-परंपरा से मिलता है — वे बारह वैष्णव संत-कवि (लगभग 6ठी-9वीं शती) जिनकी तमिल "दिव्य-प्रबंधम्" वाणी को श्रीवैष्णव परंपरा वेद-तुल्य मानती है: उनके पदों में "वेंकटम्" बार-बार गूँजता है — तिरुमला उनके 108 दिव्य-देशों (पवित्र विष्णु-क्षेत्रों) में अग्रगण्य है। कुलशेखर आळवार की वह अमर प्रार्थना इसी पहाड़ की है — कि अगले जन्म में मुझे वेंकट-गिरि की देहरी का पत्थर बना देना, ताकि आते-जाते भक्तों के चरण मुझ पर पड़ें; गर्भगृह की भीतरी देहरी आज भी "कुलशेखर-पड़ि" कहलाती है (श्रीवैष्णव परंपरा — ग्रेड A/B)। भक्ति की यह पराकाष्ठा — देवता नहीं, देवता के द्वार का पत्थर होने की माँग — तिरुपति-दर्शन की आत्मा है: यहाँ बड़ा होना नहीं, छोटा होना सिद्धि है; केश-दान से कुलशेखर-पड़ि तक हर विधि वही एक पाठ दोहराती है।
श्री-पुनर्मिलन — कथा का धागा जुड़ता है
और अंत में वह गाँठ, जो D007 से चला धागा बाँधती है। पद्मावती-विवाह के समाचार से कोल्हापुर की महालक्ष्मी का मान और गहरा हुआ — धाराएँ मान-मनुहार के मार्मिक प्रसंग सुनाती हैं; परिणति यह विधि-व्यवस्था बनी कि श्री वक्षस्थल पर लौट आईं (व्युह-लक्ष्मी — विग्रह के वक्ष पर नित्य-विराजित), और क्षेत्र-भूगोल में दोनों देवियाँ अपने-अपने पीठ पाईं: पद्मावती तिरुचानूर में (नियम यह कि तिरुमला-यात्रा उनके दर्शन बिना अपूर्ण), महालक्ष्मी कोल्हापुर में (D007)। एक भगवान, दो देवी-पीठ, और दोनों का सम्मान अखंड — पुराण-लेखकों ने रूठने-मनाने की इस महागाथा से अंततः सम्बन्धों का शास्त्र ही लिखा: प्रेम में मान भी सत्य है, मनुहार भी धर्म है, और समाधान वह जिसमें किसी की गरिमा न टूटे। वेंकटेश्वर-दर्शन इस तरह तीन ऋणों की कथा है — कुबेर का ऋण (धन), पद्मावती का ऋण (प्रेम), और श्री का ऋण (क्षमा) — और तीनों को चुकाते भगवान ही "कलियुग-प्रत्यक्ष दैवम्" हैं: क्योंकि कलियुग के मनुष्य का जीवन भी तो यही है — क़र्ज़, रिश्ते और क्षमा की किश्तें; जिस भगवान ने यह सब स्वयं जिया हो, वही इस युग का अपना भगवान हो सकता है। ॥ श्रीनिवासाय नमः ॥