यक्षराज कुबेर

Kubera · वैश्रवण · धनाधिपति · उत्तर-दिक्पाल · नर-वाहन

देव-मंडल के एकमात्र "कोषाध्यक्ष" — नौ निधियों के अधिपति, अलकापुरी के स्वामी, शिव के सखा। जिनकी कथा वैभव की नहीं — वैभव के प्रबंधन की है: तप से पाया, अहंकार से खोया, मर्यादा से फिर रचा। लक्ष्मी धन का प्रवाह हैं; कुबेर उसका संचय और संरक्षण।

श्रेणी: दिक्पाल-उत्तर · यक्षराज पिता: विश्रवा · वंश: पुलस्त्य नगरी: अलकापुरी (कैलास-सन्निध) निधियाँ: नव-निधि (पद्म-शंख आदि)
प्रमुख कथा पढ़ें
धनाधिपतिनव-निधियों का प्रबंधक-देव
उत्तर-दिक्पालहिम-निधियों की दिशा का रक्षक
शिव-सखादेव-मंडल की दुर्लभ "मैत्री"-पदवी
तप-सिद्ध वैभवधन जो साधना से मिला, छीना नहीं

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

कुबेर देव-मंडल की एक विलक्षण नियुक्ति हैं — धन के देवता, जो देवता होकर भी "देव" नहीं, यक्ष हैं। पुलस्त्य-वंश (ब्रह्मा-पौत्र धारा) के विश्रवा मुनि के पुत्र; रावण, कुंभकर्ण और विभीषण (D100-धारा) के वैमात्रेय ज्येष्ठ-भ्राता — अर्थात् रामायण के खलनायक-कुल के ही सत्पुरुष। यक्ष — निधियों और प्रकृति-कोषों के रहस्यमय रक्षक-गण — के वे राजा हैं; उत्तर दिशा के दिक्पाल; और नव-निधियों (पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील, खर्व — सूची-भेद धाराओं में) के अधिपति। मूर्ति-शिल्प उन्हें स्थूल-काय, निधि-कलश-धारी, गदा-हस्त, नकुल-थैली (रत्न उगलने वाला नेवला) सहित दिखाता है — भारतीय कला के आरम्भिक स्तरों (भरहुत-सांची यक्ष-प्रतिमाएँ) में कुबेर-यक्ष सबसे पुराने पूज्य रूपों में हैं।

लक्ष्मी (D007) से उनका श्रम-विभाजन समझना इस पृष्ठ की कुंजी है — लक्ष्मी श्री हैं: धन का प्रवाह, अनुग्रह, आगमन; कुबेर कोष हैं: संचय, लेखा, संरक्षण, वितरण-मर्यादा। इसीलिए धनतेरस-दीपावली की परंपरा दोनों को युग्म में पूजती है — आगमन भी चाहिए और प्रबंधन भी। वैदिक स्तर पर कुबेर का उल्लेख देर से (अथर्व-परिशिष्ट/शतपथ-धाराओं में "वैश्रवण" रूप में) मिलता है और वहाँ उनका चरित्र अस्पष्ट-रहस्यमय है; पूर्ण देव-पद उन्हें इतिहास-पुराण युग में मिला — यह विकास-रेखा नीचे कथा में चिह्नित है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पितामह-धारापुलस्त्य ऋषि (ब्रह्मा-मानस-पुत्र) → विश्रवा
  • पिता-माताविश्रवा मुनि — माता इलविला/इडविडा (भरद्वाज-धारा)
  • वैमात्रेय भ्रातारावण, कुंभकर्ण, विभीषण (कैकसी-पक्ष) — रामायण-कुल
  • पत्नी-पुत्रभद्रा/ऋद्धि (धारा-भेद); पुत्र नलकूबर-मणिग्रीव (भागवत 10.10 उद्धार-प्रसंग — D014 सूत्र)
  • सखाशिव (D003) — कैलास-सान्निध्य की मैत्री-पदवी
  • दिक्-पदउत्तर-दिक्पाल; यम (D052) के सम्मुख ध्रुव-अक्ष

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

उत्तर का कोषाध्यक्ष — तप से पाया, खोकर सीखा, मर्यादा से रचा

तप का उत्तराधिकार — लंका और पुष्पक

कथा का आरम्भ रामायण के उत्तरकांड से है — वहीं कुबेर-चरित्र की सबसे व्यवस्थित वंश-गाथा मिलती है। पुलस्त्य-पुत्र विश्रवा मुनि के घर इलविला से जन्मे वैश्रवण ने बाल्यकाल से एक ही संपत्ति जानी — तप। सहस्रों वर्षों की घोर साधना से प्रसन्न होकर ब्रह्मा (D001) ने उन्हें वह पद दिया जो त्रिलोक-व्यवस्था में रिक्त था: धनेश्वर — समस्त निधियों का अधिपतित्व, लोकपाल-पंक्ति में चौथा आसन, और वाहन-रूप में वह अद्भुत यान जो आगे इतिहास बदलेगा — पुष्पक विमान: मन की गति से चलने वाला, इच्छानुसार विस्तीर्ण होने वाला आकाश-रथ। निवास पूछा गया तो पितामह-मंत्रणा से वैश्रवण ने वह नगरी माँगी जो विश्वकर्मा ने समुद्र-मध्य त्रिकूट पर्वत पर रची थी और जो निर्जन पड़ी थी — लंका: स्वर्ण-प्राकार, रत्न-तोरण। कुबेर लंकेश्वर हुए — ध्यान रखिए, रावण से बहुत पहले लंका के प्रथम राजा कुबेर हैं; रामायण की भूगोल-कथा यहीं से खुलती है। पिता विश्रवा की सेवा में उन्होंने राजस्व का नियम भी यहीं गढ़ा — अर्जित वैभव का अंश ज्येष्ठों और याचकों तक पहुँचता रहे; यक्ष-गण उनके प्रजा-सैनिक हुए — निधियों के वे रहस्यमय रक्षक जो भारतीय लोक-स्मृति में आज भी गड़े धन के "चौकीदार" कहे जाते हैं।

रावण-हरण — वैभव की पहली शिक्षा: जो दिखता है, वह छीना जा सकता है

पर वैभव का प्रदर्शन अपने ही कुल में ईर्ष्या बो चुका था। विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी (राक्षस-कन्या) के पुत्र रावण ने ज्येष्ठ-भ्राता की समृद्धि देखी — स्वर्ण-लंका, पुष्पक, लोकपाल-पद — और माता के उकसावे पर वह तप करने बैठा जिसकी कथा शिव-पृष्ठों (D003/D026) से जुड़ती है। वर पाकर रावण ने पहला काम किया — भाई से सब छीन लिया: लंका भी, पुष्पक भी। धाराएँ कहती हैं कि विश्रवा के परामर्श पर कुबेर ने रक्तपात के बदले त्याग चुना — नगरी छोड़ दी, उत्तर की ओर चले गए। यह पलायन नहीं था — पुनर्रचना थी। हिमालय में कैलास-सन्निध उन्होंने नई नगरी बसाई — अलकापुरी (कालिदास के "मेघदूत" की वही अलका — यक्ष-प्रिया की नगरी, कवि-परंपरा की स्वर्ग-तुल्य पुरी); शिव (D003) का सान्निध्य साधा, और घोर तप से महादेव की वह पदवी पाई जो देव-मंडल में किसी और के पास नहीं — सखा। देवता शिव के भक्त हैं, गण सेवक हैं — कुबेर अकेले "मित्र" कहे गए। रावण-प्रकरण का उत्तरार्ध सब जानते हैं — पुष्पक अंततः राम (D013) के काम आया लंका-विजय के बाद अयोध्या-वापसी में, और फिर विधि-अनुसार कुबेर को लौटा; छीना हुआ लौटता ज़रूर है — मार्ग चाहे कितना लंबा हो। कुबेर-कथा की यह पहली नीति-रेखा है: संपत्ति का प्रदर्शन निमंत्रण है; संपत्ति की मर्यादा सुरक्षा।

सभा-वैभव और सीमाएँ — महाभारत की आँख से

महाभारत (सभा पर्व) में नारद युधिष्ठिर को चारों लोकपाल-सभाओं का वर्णन सुनाते हैं — वहाँ कुबेर-सभा का चित्र मिलता है: शत-योजन विस्तार, वायु-वाहित विमान-सी चलायमान, स्वर्ण-दीप्त; गंधर्व-अप्सराओं का संगीत, यक्ष-किन्नर-राक्षस-गुह्यक गण, और शिव-पार्वती तक का आवागमन — मित्र की सभा में महादेव अतिथि होते हैं। पर इतिहास-पुराण कुबेर को निरा वैभव-चित्र नहीं रहने देते; उनकी सीमाओं की कथाएँ भी दर्ज हैं, और वे ही चरित्र को गहराई देती हैं। भागवत (10.9-10) का नलकूबर-मणिग्रीव प्रसंग — कुबेर-पुत्र मद में गंगा-तट पर निर्वस्त्र क्रीड़ा करते नारद-अपमान कर बैठे; शाप से यमलार्जुन वृक्ष हुए, और द्वापर में ऊखल घसीटते बाल-कृष्ण (D014) ने उन्हें उद्धार दिया — धन-मद पुत्रों तक उतरा तो देवर्षि ने कोषाध्यक्ष के घर को भी नहीं बख्शा। शिव-परिवार से जुड़ी वह मार्मिक धारा भी स्मरणीय है जिसमें कुबेर की एक आँख पार्वती-सौंदर्य पर ईर्ष्या-दृष्टि से देखने पर विकृत हुई — "एकाक्षि-पिंगल" पद की कथा-व्युत्पत्ति (शिव-पुराण धाराएँ, पाठ-भेद सहित): मित्रता की निकटता भी मर्यादा-रेखा नहीं मिटाती। हर कथा का स्वर एक — कोष का अधिकार विवेक-सापेक्ष है; जहाँ विवेक चूका, वहाँ यक्षराज भी दंड-परिधि में हैं।

उत्तर दिशा का अर्थशास्त्र — दिक्पाल-पद का भूगोल

कुबेर को उत्तर ही क्यों मिला — यह प्रश्न दिक्पाल-व्यवस्था की बुद्धि खोलता है। भारतीय भूगोल-स्मृति में उत्तर हिमालय है — और हिमालय निधियों का शाब्दिक घर: स्वर्ण-रजत की खानें, रत्न-पथ, और वह "उत्तरापथ" व्यापार-मार्ग जिससे उपमहाद्वीप का वैभव आता-जाता रहा; मेरु-कैलास-अलका की पुराण-भूगोल इसी स्मृति का मानचित्र है। दक्षिण में मृत्यु-लोक के अधिपति यम (D052), उत्तर में निधि-लोक के कुबेर — दोनों ध्रुव-सम्मुख: बही का एक पृष्ठ आय, एक व्यय। और यह देवता केवल हिंदू परंपरा की सीमा में नहीं रहा — बौद्ध लोकपाल-चतुष्टय में वैश्रवण (पालि "वेस्सवण") उत्तर के महाराज हैं, जैन यक्ष-परंपरा में सर्वानुभूति-यक्ष धाराएँ उसी कोष-देवता की भगिनी-स्मृतियाँ हैं; मध्य-एशिया से जापान (बिशामोन-तेन) तक वैश्रवण-प्रतिमाएँ यात्रा कर गईं। एक ही कोषाध्यक्ष की तीन धर्म-परंपराओं में नियुक्ति — भारतीय देव-विज्ञान का यह दुर्लभ निर्यात-अध्याय है, और स्तर-दृष्टि से तीनों धाराएँ अपनी-अपनी स्वतंत्र प्रामाणिकता रखती हैं।

गणेश-भोज और धन-दर्शन — जो तिजोरी से नहीं, भाव से भरता है

कुबेर-लोककथाओं का शिखर वह भोज-प्रसंग है जो गणेश-परंपरा (D004) से जुड़ा है (स्तर: लोक-कथा — ग्रेड C; पुराण-पाठ नहीं, पर धन-दर्शन की सर्वाधिक प्रचलित शिक्षा-कथा, इसलिए चिह्नित रूप में यहाँ)। अहंकार-भरे कुबेर ने शिव-परिवार को अपने वैभव के प्रदर्शन हेतु अलकापुरी में महाभोज पर आमंत्रित किया। शिव मुस्कुराए — "हम नहीं, हमारा बालक गणेश आएगा; उसे भर-पेट खिला देना।" बाल-गणेश आए — और खाना शुरू किया: पकवान समाप्त, भंडार समाप्त, अन्न-कोष समाप्त; नौ निधियाँ परोसी जाती रहीं और लंबोदर का उदर रीता रहा — अंत में क्षुधित गणेश ने कहा, अब तो तुम्हें ही खाऊँगा! भागे-भागे कुबेर कैलास पहुँचे; शिव ने एक मुट्ठी भुने चावल (धारा-भेद से दूर्वा) दिए — "श्रद्धा से दो"; और वही मुट्ठी-भर अन्न बालक को तृप्त कर गया। कथा का अर्थ-पाठ स्पष्ट है — भूख अहंकार से नहीं, भाव से शांत होती है; कोष से बड़ा दान का हाथ है। यही कुबेर-तत्त्व का समापन-दर्शन है: भारतीय परंपरा ने धन को कभी अपवित्र नहीं कहा — उसे दिक्पाल-पद दिया, वेदी दी, पर्व दिया (धनतेरस पर कुबेर-लक्ष्मी युग्म-पूजन); पर हर कथा में यह शर्त गूँथ दी कि धन धर्म की परिधि में ही देवत्व है — परिधि के बाहर वह रावण की लंका है, जो स्वर्ण होकर भी जलती है। अर्थ चाहिए, अर्थ का अहंकार नहीं — उत्तर दिशा के कोषाध्यक्ष की यही चिरंतन बही-पंक्ति है।

स्रोत टिप्पणी: वंश, तप, लंका-प्राप्ति, पुष्पक, रावण-हरण, अलका-गमन — वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड 3-15 (ग्रेड A); कुबेर-सभा — महाभारत सभा पर्व लोकपाल-सभाख्यान (ग्रेड A); नलकूबर-मणिग्रीव — भागवत 10.9-10 (ग्रेड A; कृष्ण-पक्ष D014); शिव-सखा पद एवं एकाक्षि-पिंगल — शिव-पुराण/स्कंद धाराएँ (ग्रेड B; पाठ-भेद चिह्नित); नव-निधि सूची — पुराण-कोश परंपरा, सूची-भेद सहित (ग्रेड B); गणेश-भोज — लोक-कथा (ग्रेड C — स्पष्ट चिह्नित; शिक्षा-मूल्य हेतु सम्मिलित); वैश्रवण के प्राक्-रूप — अथर्व-परिशिष्ट/शतपथ-धाराएँ (ग्रेड B — विकास-रेखा नोट); मेघदूत-अलका — कालिदास काव्य-परंपरा (साहित्य-स्तर)। कुबेर-मंत्र तंत्रसार/लोक-विधान परंपरा का प्रचलित पाठ है (ग्रेड B — वैदिक नहीं, चिह्नित)।

नाम एवं अर्थ

Names
कुबेर
व्युत्पत्ति-धाराएँ: "कु-वेर" (विकृत-काय) आदि — यक्ष-रूप की स्थूल-काय स्मृति।
वैश्रवण
विश्रवा-पुत्र — प्राचीनतम अभिलेख-नाम; बौद्ध-परंपरा में भी लोकपाल "वेस्सवण"।
धनद / धनाधिप
धन देने/अधिपति — कोष-पद के सीधे नाम।
यक्षराज / राजराज
यक्षों के राजा; "राजाओं का राजा" — वैभव-पद।
नरवाहन
नर (यक्ष-गण) जिसके वाहक हैं — विशिष्ट वाहन-पद।
एकाक्षि-पिंगल
पीत-वर्ण एक नेत्र वाला — पार्वती-प्रसंग की कथा-स्मृति।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ कुबेराय नमः ॥ · ॐ वैश्रवणाय नमः ॥

कुबेर-मंत्र (तंत्रसार/लोक-विधान परंपरा)

ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ॥

अर्थ: यक्ष कुबेर वैश्रवण को — धन-धान्य के अधिपति को — (प्रणाम); मुझे धन-धान्य की समृद्धि दीजिए, दिलाइए।

स्तर-नोट: यह मंत्र वैदिक संहिता का नहीं — तंत्रसार/पूजा-विधान परंपरा का प्रचलित पाठ है (ग्रेड B); धनतेरस-दीपावली पूजन में लक्ष्मी-मंत्रों (D007) के साथ प्रयुक्त।

कुबेर-अष्टोत्तर एवं कुबेर-कवच के पूर्ण-पाठ शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
धनतेरस (धनत्रयोदशी)
कुबेर-लक्ष्मी-धन्वंतरि युग्म-पूजन — कोष-पूजा का वार्षिक शिखर।
दीपावली लक्ष्मी-पूजन
लक्ष्मी (D007) के साथ कुबेर-आवाहन — बही-खाता (शारदा-पूजन) परंपरा।
अक्षय-तृतीया योग
अक्षय-कोष स्मृति — दान-क्रय का कुबेर-स्मरण दिवस (लोक-परंपरा)।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
बदरीनाथ-परिसर कुबेर-विग्रह
बदरी-धाम (D002-क्षेत्र) में कुबेर उत्सव-मूर्ति — हिमालयी उपस्थिति।
खंडोबा-क्षेत्र/दक्षिण धाराएँ
दक्षिण के अनेक शिव-क्षेत्रों में कुबेर-लिंग स्थापना-स्मृतियाँ (हरिकेश-वाराणसी धारा सहित)।
दिक्पाल-वेदी सर्वत्र
मंदिर-वास्तु में उत्तर-दिशा कुबेर-स्थान; गृह-वास्तु में उत्तर "कुबेर-कोण" लोक-विधि।
यक्ष-कला परंपरा
भरहुत-सांची-मथुरा की प्राचीन कुबेर/यक्ष प्रतिमाएँ — पुरातत्व-साक्ष्य।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: कुबेर देवताओं के ख़ज़ांची हैं — सारे ख़ज़ानों के रखवाले! वे पहले सोने की लंका के राजा थे, पर उनके भाई रावण ने वह छीन ली। कुबेर ने लड़ाई नहीं की — हिमालय में जाकर नई नगरी "अलकापुरी" बसाई और भगवान शिव के सबसे अच्छे दोस्त बन गए।

रोचक तथ्य:

  • उड़ने वाला पुष्पक विमान पहले कुबेर का ही था!
  • रावण कुबेर का सौतेला छोटा भाई था।
  • धनतेरस पर लक्ष्मी जी के साथ कुबेर जी की भी पूजा होती है।
  • एक कहानी में बाल-गणेश ने कुबेर का पूरा भंडार खा लिया — पर शिव जी की एक मुट्ठी चावल से उनका पेट भर गया!

सीख: धन का घमंड कभी मत करो — जो दिखावे के लिए है, वह छिन सकता है; जो श्रद्धा से बाँटा जाता है, वही असली ख़ज़ाना है।

मिनी क्विज़:

  1. कुबेर किन के राजा हैं?
  2. लंका कुबेर से किसने छीनी?
  3. कुबेर की नई नगरी का नाम क्या है?
  4. कुबेर किस दिशा के दिक्पाल हैं?