धर्मराज यम

Yama · वैवस्वत · पितृपति · दक्षिण-दिक्पाल · प्रथम मर्त्य

वह देवता जो मृत्यु का नहीं — मृत्यु के न्याय का स्वामी है। ऋग्वेद का "प्रथम मर्त्य" जिसने मरकर मार्ग खोजा और पितरों का पथ-दर्शक बना; कठोपनिषद का वह आचार्य जिसने मृत्यु के रहस्य की सर्वोच्च विद्या एक किशोर को सौंप दी। भय की नहीं — धर्म की मूर्ति।

श्रेणी: दिक्पाल-दक्षिण · पितृपति पिता: सूर्य · सहोदरा: यमुना वाहन: महिष · आयुध: दंड-पाश ग्रंथ-शिखर: कठोपनिषद
प्रमुख कथा पढ़ें
धर्मराजमृत्यु-पार के न्याय का अधिपति
प्रथम मर्त्यपहला मरने वाला — पथ-निर्माता (वैदिक)
ब्रह्मविद्या-गुरुनचिकेता को आत्म-विद्या के दाता
भगिनी-वत्सलयमुना-स्नेह — यम-द्वितीया का मूल

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

यम भारतीय देव-मंडल के सबसे प्राचीन और सबसे दार्शनिक देवताओं में हैं। लोक-चित्र में वे महिष पर बैठे, पाश-दंड लिए "यमराज" हैं जिनके नाम से भय खाया जाता है — पर संहिता से उपनिषद तक की यात्रा में यम का जो रूप मिलता है, वह भय का नहीं, धर्म और विद्या का है। ऋग्वेद (10.14) उन्हें कहता है — वह प्रथम मर्त्य, विवस्वान् (सूर्य D043) का पुत्र, जिसने सबसे पहले मृत्यु का मार्ग चलकर खोजा और उस पार पितरों का लोक बसा दिया; तब से हर प्राणी उसी खोजे हुए पथ से जाता है — यम मृत्यु के "कारण" नहीं, मृत्यु के पथ-प्रदर्शक हैं। पुराण-युग में यही यम दक्षिण दिशा के दिक्पाल, कर्म-लेखा के अधिपति (चित्रगुप्त-सह) और धर्मराज-पद के स्वामी हुए।

उनका परिवार सूर्य-कुल है — संज्ञा-पुत्र, यमुना (D057) के सहोदर, शनि (D049) के भ्रातृ-क्रम में; श्राद्ध-तर्पण की समूची पितृ-परंपरा का केंद्र-देवता भी वही हैं। और भाषा देखिए — योग-शास्त्र ने आत्म-अनुशासन के पहले चरण का नाम ही "यम" रखा: संयम। मृत्यु के देवता और संयम की साधना का एक नाम होना संयोग नहीं — दोनों का धर्म एक है: सीमा का पालन कराना। इस पृष्ठ का स्वर वही है जो शनि-पृष्ठ का था — यम से डरना अपने कर्मों से डरना है; उन्हें समझना मृत्यु-भय से मुक्त होने की पहली सीढ़ी।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पितासूर्य/विवस्वान् (D043) — इसी से "वैवस्वत"
  • मातासंज्ञा (त्वष्टृ-पुत्री) — छाया-प्रकरण की मूल-पत्नी
  • सहोदरायमुना/यमी (D057) — यम-द्वितीया की धुरी; ऋग्वेद 10.10 का यम-यमी संवाद (वैदिक स्तर)
  • भ्रातृ-क्रमशनि (D049 — छाया-पक्ष), वैवस्वत मनु, अश्विनीकुमार-धारा
  • सहायकचित्रगुप्त (कर्म-लेखक), यम-दूत, श्याम-शबल श्वान-युग्म (वैदिक)
  • दिक्-पददक्षिण-दिक्पाल; महिष-वाहन; दंड-पाश आयुध

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

मृत्यु ने जिसे विद्या दी — नचिकेता के तीन वर

क्रोध से निकला प्रश्न — "मुझे किसे दोगे?"

कथा का आरम्भ एक अधूरे यज्ञ से होता है। वाजश्रवा (औद्दालकि-धारा) ने "सर्वस्व-दान" का विश्वजित् यज्ञ ठाना — पर दान में जो गौएँ दी जा रही थीं, वे जर्जर थीं: दूध दे चुकीं, घास चबा चुकीं, जिनका दान पुण्य नहीं, दिखावा था। यज्ञ-मंडप में बैठा किशोर पुत्र नचिकेता यह देखता रहा — और उसके भीतर वह प्रश्न उठा जो उपनिषद के अनुसार श्रद्धा का प्रवेश था: ऐसे दान से पिता को कौन-से लोक मिलेंगे? बालक ने पिता से पूछा — "पिताजी, मैं भी तो आपकी संपत्ति हूँ; मुझे किसे दोगे?" एक बार, दो बार, तीसरी बार — और खीझे हुए पिता के मुख से निकल गया: "मृत्युवे त्वा ददामि — जा, तुझे मृत्यु को देता हूँ!" शब्द लौट नहीं सकता था। पर नचिकेता का उत्तर देखिए — न रोया, न क्षमा माँगी; उसने कहा: बहुतों में मैं प्रथम चलता हूँ, बहुतों में मध्यम — यम का ऐसा क्या काम है जो मुझसे सधेगा? पीढ़ियाँ जैसे बोईं, वैसे काटती हैं; मर्त्य पकता है और फिर जन्मता है — चलो, देख आऊँ। सत्य-वचन की रक्षा को पिता ने भेजा; किशोर यम-लोक पहुँचा — और द्वार पर तीन दिन-रात भूखा-प्यासा बैठा रहा, क्योंकि यम घर पर नहीं थे। लौटे तो परिजनों ने चेताया — ब्राह्मण अतिथि अग्नि-रूप होता है; तीन रात जो द्वार पर उपवासा बैठा रहा, उसका ऋण चुकाओ। धर्मराज ने — मृत्यु ने — किशोर से क्षमा माँगी, और तीन रातों के बदले तीन वर देने का वचन दिया। यह दृश्य ही कथा की पहली शिक्षा है: धर्म का अधिपति भी अतिथि-धर्म चूकने पर क्षमा माँगता है — नियम सबसे ऊपर है, नियामक से भी।

तीन वर — और वह प्रलोभन-परीक्षा जो हार गई

पहला वर नचिकेता ने पिता के लिए माँगा — मेरे पिता का क्रोध शांत हो; लौटूँ तो वे मुझे पहचानें, अपनाएँ, चैन से सोएँ। (जिस पिता ने मृत्यु को सौंप दिया, उसके लिए पहला वर — किशोर का हृदय देखिए।) दूसरे वर में उसने स्वर्ग-साधक अग्नि-विद्या पूछी — यम ने विस्तार से सिखाई, ईंट-संख्या और विधि-क्रम तक; और प्रसन्न होकर घोषित किया कि यह अग्नि अब "नाचिकेत-अग्नि" कहलाएगी — विद्यार्थी के नाम पर विद्या का नामकरण, गुरु-परंपरा का दुर्लभतम सम्मान। फिर तीसरा वर आया — और उपनिषद का इतिहास बदल गया। नचिकेता ने पूछा: "मनुष्य के मरने पर 'यह रहता है' — कुछ कहते हैं; 'नहीं रहता' — कुछ कहते हैं। सत्य क्या है? यह मुझे आप से — स्वयं मृत्यु से — जानना है।" यम ठिठक गए। बोले — यह प्रश्न देवताओं तक के लिए सूक्ष्म है; कुछ और माँग लो: सौ वर्ष के पुत्र-पौत्र, हाथी-घोड़े-स्वर्ण, पृथ्वी का राज्य, जितनी आयु चाहो, जो भोग मर्त्य-लोक में दुर्लभ हों — वे रमणियाँ, वे वाद्य, वे रथ — सब लो, पर मरण-रहस्य मत पूछो। और किशोर का उत्तर भारतीय वाङ्मय के शिखर-वाक्यों में है: ये सब कल तक की चीज़ें हैं (श्वोभावाः); इंद्रियों का तेज घिस जाता है, जीवन — छोटा हो या लंबा — बीत ही जाता है; रथ और गीत आपके पास ही रहें। जिस धन से तृप्ति कभी नहीं होती, वह लेकर क्या करूँगा — जब आपको देख ही लिया है? वर वही — जो पूछा है। यम की प्रलोभन-परीक्षा हार गई — और हारकर प्रसन्न हुई: ऐसा अधिकारी शिष्य मिले तो मृत्यु भी पढ़ाने बैठ जाती है।

श्रेय और प्रेय — मृत्यु का पाठ्यक्रम

अब कठोपनिषद का वह ज्ञान-खंड खुलता है जिसे भारतीय परंपरा ब्रह्मविद्या के प्रवेश-द्वारों में गिनती है। यम पहला भेद सिखाते हैं — श्रेय (कल्याणकर) और प्रेय (प्रियकर) मनुष्य के सामने साथ-साथ आते हैं; धीर उन्हें अलग-अलग परखकर श्रेय चुनता है, मंद योग-क्षेम के लोभ में प्रेय। नचिकेता ने प्रेय (भोग-वर) ठुकराकर श्रेय (विद्या) चुना — इसीलिए पात्र हुआ। फिर वह वाक्य आता है जो विवेकानंद के द्वारा युग-मंत्र बना — "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत": उठो, जागो, श्रेष्ठों के पास जाकर जानो; क्योंकि यह मार्ग छुरे की धार-सा तीखा और दुर्गम है। आत्मा का स्वरूप-उपदेश शिखर पर पहुँचता है — न जायते म्रियते वा विपश्चित्… — यह आत्मा न जन्मता है, न मरता; न यह मारता है, न मारा जाता (वही मंत्र-मेरुदंड जो गीता 2.19-20 में गूँजा); शरीर रथ है, बुद्धि सारथी, मन लगाम, इंद्रियाँ घोड़े — और रथी है आत्मा: रथ-रूपक की यह शिक्षा विश्व-दर्शन में भारत का अमर योगदान है। अणु से सूक्ष्म, महत् से महान वह आत्मा हृदय-गुहा में बैठा है — उसे जानकर धीर शोक के पार चला जाता है। मृत्यु से मृत्यु का रहस्य पूछा गया था; उत्तर मिला — जो तू है, वह मरता ही नहीं। नचिकेता विद्या पाकर लौटा — ब्रह्म-प्राप्त, मृत्यु-भय-मुक्त; और यम इस कथा में सदा के लिए वह बन गए जो लोक-चित्र कभी नहीं दिखाता: त्रिलोक का सबसे प्रामाणिक आचार्य — जिसकी कक्षा में प्रवेश की फ़ीस भोग का त्याग है।

सावित्री-प्रकरण और स्तर-रेखाएँ — धर्म से धर्मराज हारे

यम-चरित्र की दूसरी अमर कथा महाभारत (वन पर्व) का सावित्री-उपाख्यान है — यहाँ संक्षेप-रेखा में, क्योंकि उसका पूर्ण अधिकार भावी सावित्री-प्रविष्टि का है। सत्यवान का प्राण-हरण करके लौटते यम के पीछे-पीछे सावित्री चलती रही; धर्मराज ने लौटने कहा, उसने धर्म-चर्चा शुरू कर दी — सत्पुरुषों की संगति, धर्म की गति, अनुग्रह का स्वभाव। हर सुभाषित पर प्रसन्न यम वर देते गए — श्वशुर की दृष्टि, राज्य, पुत्र... और "सत्यवान के बिना पुत्र कैसे?" — वचन-बद्ध धर्मराज को प्राण लौटाने पड़े। ध्यान रहे — सावित्री ने बल से नहीं, छल से नहीं, धर्म-ज्ञान से मृत्यु को जीता; यम हारकर भी धर्मराज ही सिद्ध हुए, क्योंकि वे अपने वचन से बँधे। मार्कण्डेय-प्रसंग (शिव-हस्तक्षेप वाला — D003) और अजामिल-प्रसंग (नाम-महिमा वाला — भागवत-धारा) यम-सीमाओं की कथाएँ हैं — वहाँ यम शिव-विष्णु के आगे नतमस्तक हैं: पुराण-दृष्टि में मृत्यु भी परम-सत्ता के अधीन एक नियुक्ति है, निरंकुश शक्ति नहीं। स्तर-रेखा अंत में फिर खींच दें — ऋग्वैदिक यम (पथ-निर्माता प्रथम मर्त्य; यमी-संवाद 10.10 जिसमें यम धर्म-मर्यादा के लिए सहोदरा का प्रणय-प्रस्ताव अस्वीकारते हैं), औपनिषदिक यम (ब्रह्मविद्या-गुरु), और पौराणिक यमराज (दंड-पाश-चित्रगुप्त-न्यायालय) — तीन युगों के तीन चित्र हैं; तीनों प्रामाणिक, तीनों इस पृष्ठ पर अपने-अपने लेबल से खड़े हैं। इनका साझा सूत्र एक ही है, और वही इस कथा का समापन-वाक्य है: यम का दंड धर्म की सेवा में है — इसलिए मृत्यु से नहीं, अधर्म से डरना चाहिए।

स्रोत टिप्पणी: नचिकेता-कथा एवं समस्त उद्धृत वाक्य — कठोपनिषद अध्याय 1-2 (ग्रेड A; "उत्तिष्ठत जाग्रत" 1.3.14, रथ-रूपक 1.3.3-4, "न जायते" 1.2.18-19 ≈ गीता 2.19-20 समानांतर नोट); नाचिकेत-अग्नि का पूर्व-रूप — तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.11.8 (ग्रेड B — उपनिषद-कथा का ब्राह्मण-बीज); यम-सूक्त, श्वान-युग्म, प्रथम-मर्त्य पद — ऋग्वेद 10.14 (ग्रेड A — पृथक् वैदिक स्तर); यम-यमी संवाद — ऋग्वेद 10.10 (ग्रेड A — मर्यादा-पाठ; D057 पर पूरक-कोण); सावित्री-उपाख्यान — महाभारत वन पर्व (ग्रेड A — संक्षेप-रेखा, पूर्ण कथा भावी प्रविष्टि); मार्कण्डेय/अजामिल — शिव/भागवत धाराएँ (ग्रेड B — D003 पूरक); चित्रगुप्त-न्यायालय, महिष-वाहन, दिक्पाल-पद — पुराण-सामान्य (ग्रेड B)। मृत्यु-भय पर टिप्पणी संपादकीय नीति-स्वर है।

नाम एवं अर्थ

Names
यम
"यम्" (नियंत्रित करना) — संयमन करने वाला; योग का "यम" इसी धातु से।
धर्मराज
धर्म का राजा — न्याय-पद; युधिष्ठिर (धर्म-पुत्र) का भी पद-नाम।
वैवस्वत
विवस्वान् (सूर्य) का पुत्र — सूर्य-कुल की पहचान।
पितृपति
पितरों के अधिपति — श्राद्ध-तर्पण परंपरा के केंद्र।
दण्डधर / पाशी
दंड और पाश धारण करने वाला — न्याय-आयुधों के पद।
अन्तक / कृतान्त
अंत करने वाला — काल-पक्ष के नाम (मृत्यु-देव अर्थ में)।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ यमाय नमः ॥ · ॐ धर्मराजाय नमः ॥

कठोपनिषद — यम-वाणी (सत्यापित अंश)

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (1.3.14)

अर्थ: उठो, जागो, श्रेष्ठ (आचार्यों) को पाकर ज्ञान प्राप्त करो — क्योंकि ज्ञानी कहते हैं कि वह मार्ग छुरे की तीखी धार जैसा दुर्गम है।

यम-गायत्री, यम-तर्पण विधि-मंत्र एवं यमाष्टक (दीपदान-परंपरा) के पूर्ण-पाठ शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
यम-द्वितीया (भाई-दूज)
कार्तिक शुक्ल द्वितीया — यमुना-गृह भोजन की मूल-कथा; भगिनी-गृह भोजन परंपरा (मुख्य कथा D057 पर)।
धनत्रयोदशी यम-दीपदान
यम के निमित्त दक्षिण-मुख दीप — अपमृत्यु-परिहार की स्मृति-विधि।
पितृपक्ष
आश्विन कृष्णपक्ष — पितृपति यम की छत्रछाया में श्राद्ध-तर्पण पर्व।
नरक-चतुर्दशी
यम-स्मरण एवं अभ्यंग-स्नान — दीपावली-क्रम का यम-अंग।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
श्रीवांचियम् (तमिलनाडु)
दुर्लभ यम-प्रधान क्षेत्र — यहाँ यम "रोग-मृत्यु-भय-हर" उपास्य हैं।
यमुनोत्री (उत्तराखंड)
यमुना-धाम — यम-यमुना युग्म-स्मृति का हिमालयी तीर्थ।
विश्राम घाट, मथुरा
यम-द्वितीया स्नान का प्रधान घाट — भाई-बहन युग्म-स्नान परंपरा।
दिक्पाल-वेदी सर्वत्र
मंदिर-वास्तु में दक्षिण-दिशा यम-स्थान — बलि-विधान का अंग।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: यमराज से डरने की कहानियाँ तो तुमने सुनी होंगी — पर असली कहानी उल्टी है! नचिकेता नाम का एक बहादुर लड़का ख़ुद यमराज के घर पहुँच गया और उनसे दुनिया का सबसे बड़ा सवाल पूछ लिया — "मरने के बाद क्या होता है?" यमराज ने उसे हीरे-मोती, राज्य, लंबी उम्र — सब देने की कोशिश की, पर नचिकेता बोला: "नहीं, मुझे तो जवाब चाहिए!" और यमराज ने ख़ुश होकर उसे सबसे गहरा ज्ञान सिखा दिया।

रोचक तथ्य:

  • यमराज और यमुना नदी भाई-बहन हैं — भाई-दूज इसी से शुरू हुआ!
  • यम सूर्य देव के बेटे हैं और शनि देव के भाई।
  • "उठो, जागो — और सीखते रहो" — यह प्रसिद्ध वाक्य यमराज ने ही नचिकेता से कहा था।
  • योग में अच्छी आदतों के नियम को भी "यम" कहते हैं।

सीख: नचिकेता की तरह बनो — लालच में सस्ती चीज़ें मत चुनो, सही सवाल पूछो और सीखने से कभी मत डरो। सच्चा ज्ञान हर डर को ख़त्म कर देता है।

मिनी क्विज़:

  1. नचिकेता ने यमराज से कितने वर माँगे?
  2. यमराज के पिता कौन हैं?
  3. यमुना जी यम की क्या लगती हैं?
  4. "उत्तिष्ठत जाग्रत" किस ग्रंथ का वाक्य है?