कालिंदी यमुना

Yamuna · सूर्य-सुता · यम-भगिनी · कृष्ण-प्रिया धारा

श्याम जल की देवी — सूर्य की पुत्री, यम की सहोदरा, और कृष्ण-लीला की जल-रंगभूमि। जिसके एक भोजन-निमंत्रण से भाई-बहन का सबसे कोमल पर्व जन्मा; और जिसके तट की बाँसुरी विश्व-भक्ति का स्वर बन गई। गंगा मोक्ष देती हैं — यमुना प्रेम देती हैं: परंपरा का यही रस-भेद है।

श्रेणी: नदी-देवी · सूर्य-कुल पिता: सूर्य · भ्राता: यम, शनि पर्व-मूल: यम-द्वितीया (भाई-दूज) वाहन: कूर्म · क्षेत्र: व्रज-वृंदावन
प्रमुख कथा पढ़ें
सूर्य-सुताप्रकाश-कुल की श्याम धारा
भ्रातृ-वत्सलायम-द्वितीया — भाई-दूज की जननी
लीला-भूमि-धाराव्रज-वृंदावन की कृष्ण-सखी नदी
प्रेम-दायिनीपुष्टिमार्ग की "चतुर्थ पीठ" रस-धारा

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

यमुना भारतीय नदी-मंडल की दूसरी महाधारा हैं — और चरित्र में गंगा (D056) की पूरक-विलोम। गंगा शिव-सम्बद्ध हैं, यमुना कृष्ण-सम्बद्ध; गंगा का जल शुभ्र, यमुना का श्याम; गंगा मोक्ष की धारा हैं, यमुना प्रेम की। जन्म से वे सूर्य-कुल की हैं — विवस्वान् (D043) और संज्ञा की पुत्री, यम (D052) की सहोदरा, शनि (D049) की भगिनी; "यमुना" नाम ही यम-युग्म ("यम" = जुड़वाँ) की स्मृति रखता है — ऋग्वेद (10.10) का यम-यमी संवाद इस भाई-बहन युग्म का वैदिक-स्तर साक्ष्य है। कालिंद-गिरि से उतरने के कारण "कालिंदी" — और उनके श्याम-वर्ण की कथाएँ कृष्ण-तत्त्व से जुड़ती हैं: लोक कहता है, कृष्ण-प्रेम में डूबा जल श्याम हो गया।

मूर्ति-परंपरा में यमुना श्याम-वर्णा, कूर्म-वाहिनी देवी हैं — मंदिर-द्वारों पर मकर-वाहिनी गंगा के साथ उनकी जोड़ी गुप्त-काल से द्वार-शिल्प का मानक है (कालिदास-युग के मंदिरों से खजुराहो तक)। पुष्टिमार्ग (वल्लभ-सम्प्रदाय) में उनका पद असाधारण है — वे केवल नदी नहीं, "श्री यमुनाजी" हैं: ठाकुरजी की चतुर्थ-पीठ रस-शक्ति, जिनका यमुनाष्टक नित्य-पाठ है। प्रयाग-संगम पर वे गंगा से मिलकर त्रिवेणी रचती हैं — और भूगोल का सत्य यह है कि संगम पर जल-राशि में यमुना प्रायः बड़ी धारा होती हैं: तीर्थराज का आधा वैभव कालिंदी का है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पितासूर्य/विवस्वान् (D043) — संज्ञा-पक्ष की पुत्री
  • मातासंज्ञा (त्वष्टृ-पुत्री)
  • सहोदरयम (D052) — युग्म-भाव ("यम-यमी"); वैवस्वत मनु
  • भ्रातृ-क्रमशनि (D049) — छाया-पक्ष; अश्विनीकुमार-धारा
  • पति-पदकृष्ण (D014) — कालिंदी रूप में अष्टभार्या-क्रम (भागवत 10.58)
  • धारा-सखीगंगा (D056) — संगम-युग्म; द्वार-देवी जोड़ी

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

श्याम जल की सखी — भोजन का वचन और बाँसुरी का तट

प्रकाश के घर की श्याम बेटी

यमुना की जन्म-कथा वही संज्ञा-प्रकरण है जो सूर्य-पृष्ठ (D043) पर पूर्ण रूप में कहा गया — यहाँ उसका पुत्री-कोण। विवस्वान् का तेज संज्ञा के लिए असह्य हुआ, यह कथा का प्रसिद्ध मोड़ है; पर उससे पहले के वर्षों में संज्ञा-सूर्य के तीन संतानें जन्मी थीं — वैवस्वत मनु, यम, और यमी। यम-यमी युग्म थे — संस्कृत में "यम" शब्द का एक अर्थ ही जुड़वाँ है; भाई मृत्यु-लोक के अधिपति बने, बहन जल-धारा बनकर पृथ्वी पर बही — एक ही घर से मृत्यु और जीवन-रस, दोनों निकले। ऋग्वेद (10.10) का यम-यमी संवाद-सूक्त इस युग्म का वैदिक स्तर है — वहाँ यमी सृष्टि-विस्तार के तर्क से यम के आगे प्रणय-प्रस्ताव रखती हैं और यम मर्यादा-रेखा से अस्वीकारते हैं: "सहोदर का सम्बन्ध पाप है" — संहिता-युग का यह मर्यादा-पाठ पौराणिक भाई-बहन वात्सल्य की आधार-शिला बना; स्तर-भेद स्पष्ट रहे — वैदिक संवाद दार्शनिक-नैतिक काव्य है, पुराण-कथा पारिवारिक रस — दोनों की दिशा एक: भाई-बहन का सम्बन्ध काम से नहीं, धर्म-स्नेह से बँधा है। पृथ्वी पर उतरकर यमी "यमुना" हुईं — कालिंद-पर्वत (यमुनोत्री-क्षेत्र की बंदरपूँछ श्रेणी) से उतरने पर "कालिंदी"। श्याम-वर्ण की व्याख्याएँ परंपरा में कई हैं — कालिंद की छाया, शिव-विरह की तपन (एक धारा में यमुना ने शिव-वियोग-तप से देह श्याम की), और सबसे प्रिय व्रज-वाचन: कृष्ण-रंग में रँगा जल — नदी जो प्रेम में अपने प्रियतम का वर्ण ओढ़ ले।

यम-द्वितीया — वह भोजन जिससे पर्व जन्मा

अब वह कथा जो इस पृष्ठ की धुरी है — और जिसका अधिकार गंगा-मंडल में किसी और का नहीं: भाई-दूज का जन्म। पुराण-धाराएँ (स्कंद, पद्म, भविष्य) कहती हैं — यम और यमुना का स्नेह अटूट था, पर धर्मराज का कार्य-भार ऐसा कि बहन के बार-बार निमंत्रण पर भी भाई आ न पाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने विशेष आग्रह भेजा — और उस दिन मृत्यु के देवता ने अवकाश लिया। यम बहन के घर आए; यमुना ने स्वयं रसोई रची, तिलक किया, आरती उतारी, प्रेम से भोजन कराया। तृप्त यम ने वर माँगने कहा — और यमुना ने जो माँगा, वह भारतीय पर्व-इतिहास की सबसे सुंदर माँगों में है: अपने लिए कुछ नहीं; माँगा — "आज के दिन जो भाई अपनी बहन के घर भोजन करे, बहन के हाथ का तिलक ले — उसे अकाल-मृत्यु का भय न हो; और जो बहन-भाई इस दिन मेरे जल में साथ स्नान करें, उन पर आपकी दंड-दृष्टि कोमल रहे।" यम ने "तथास्तु" कहा — और उस दिन से कार्तिक शुक्ल द्वितीया "यम-द्वितीया" है: भाई-दूज, भाऊ-बीज, भाई-टीका — नाम अनेक, मूल एक। मथुरा का विश्राम घाट आज भी इस कथा का जीवित रंगमंच है — यम-द्वितीया पर वहाँ भाई-बहन हाथ पकड़कर यमुना-स्नान करते हैं। ध्यान दीजिए इस पर्व के शिल्प पर — रक्षाबंधन में बहन रक्षा माँगती है; भाई-दूज में बहन रक्षा देती है: तिलक, भोजन और वचन — तीनों बहन के हाथ में हैं, और स्वयं मृत्यु उसके आतिथ्य के आगे विनम्र है। नदी-देवी के घर मृत्यु-देव का भोजन — भारतीय कल्पना ने भाई-बहन के स्नेह को इससे ऊँचा आसन कहीं नहीं दिया।

व्रज की धमनी — बाँसुरी, कालिय और कालिंदी-विवाह

द्वापर में यमुना का दूसरा महाध्याय खुला — वे कृष्ण-लीला की जल-रंगभूमि बनीं। वसुदेव नवजात कृष्ण (D014) को लेकर जिस रात गोकुल चले, उफनती यमुना ने चरण-स्पर्श पाते ही मार्ग दिया — कृष्ण-कथा में यमुना का प्रवेश ही प्रणाम से होता है। फिर तो व्रज का समूचा रस उन्हीं के तट पर घटा — गो-चारण, माखन-टोलियाँ, वेणु-नाद जिसे सुनकर धारा ठिठक जाती (परंपरा-वचन), महारास की चाँदनी (D011 राधा-क्षेत्र), और वह कालिय-प्रकरण जिसका मुख्य-पाठ कृष्ण-पृष्ठ का है — यहाँ यमुना-कोण भर: विषधर कालिय ने जिस दह को गरल से मृत्यु-कुंड बना दिया था, वह यमुना की देह पर विष-घाव था; कृष्ण ने फणों पर नृत्य कर सर्प को रमणक भेजा और धारा को विष-मुक्त किया — भक्त-दृष्टि में यह प्रथम "नदी-शोधन" है: भगवान ने स्वयं अपनी प्रिया-धारा का प्रदूषण हरा (इस पृष्ठ के पर्यावरण-पाठ का पुराण-बीज)। और भागवत (10.58) कालिंदी को कृष्ण-जीवन में पत्नी-पद तक ले जाता है — इंद्रप्रस्थ-वास के दिनों यमुना-तट पर तपस्यारत सूर्य-कन्या कालिंदी ने अर्जुन के पूछने पर कहा: "पति रूप में विष्णु (कृष्ण) को पाने का व्रत है मेरा"; कृष्ण ने विधि-पूर्वक वरण किया — अष्टभार्या-मंडल में कालिंदी चतुर्थ-क्रम पर हैं। नदी जो सखी थी, पत्नी हुई — पुष्टिमार्ग ने इसी रस को शास्त्र दिया: वल्लभाचार्य का यमुनाष्टक ("नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा...") श्री यमुनाजी को ठाकुरजी की चतुर्थ पीठ-शक्ति कहता है — गंगा ज्ञान-मोक्ष की धारा हैं, यमुना भाव-प्रेम की; मोक्ष माँगने वाला गंगा जाए, कृष्ण माँगने वाला यमुना आए — सम्प्रदाय-वाणी का यह रस-भेद भारतीय भक्ति-भूगोल का सार-सूत्र है।

आध्यात्मिक अर्थ — बहन, सखी, माता

यमुना-तत्त्व तीन सम्बन्धों में खुलता है। पहला — बहन: यम-द्वितीया की देवी सिखाती है कि स्नेह का वचन मृत्यु-भय से बड़ा है; जिस संस्कृति में बहन का तिलक धर्मराज तक को कोमल कर दे, वहाँ भाई-बहन का सम्बन्ध सामाजिक नहीं — आधिदैविक संस्था है। दूसरा — सखी: व्रज-भक्ति ने भगवान से सम्बन्ध के जो भाव गिनाए (दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य), यमुना उनमें सख्य-माधुर्य की जल-मूर्ति हैं — वह धारा जो लीला की साक्षी भी है, सहभागिनी भी; भक्त जब यमुना-जल माथे लगाता है, वह तीर्थ नहीं छूता — कृष्ण की स्मृति छूता है। तीसरा — माता: व्रज आज भी "यमुना मैया" कहता है, छठ-व्रती उनके घाटों पर अर्घ्य देते हैं, और यही माता-पद इस पृष्ठ का अंतिम — सबसे चुभता — पाठ लाता है: दिल्ली-मथुरा की आधुनिक यमुना विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदी-धाराओं में गिनी जाती है; जिस जल को कृष्ण ने कालिय-विष से मुक्त किया था, उसे यह युग फिर विषाक्त कर रहा है। कथा ने मार्ग भी दिखा दिया है — विष हरना भक्ति का कर्म है, केवल सरकार का नहीं; यमुना-आरती उतारने वाले हाथ यमुना-शोधन के भी हों, तो ही आरती पूरी है। श्याम जल की सखी अपने हर उपासक से आज एक ही वर माँग रही हैं — वही जो उन्होंने यम से माँगा था: जीवन का वचन

स्रोत टिप्पणी: संज्ञा-संतति एवं यमी-जन्म — मार्कण्डेय/मत्स्य संज्ञा-प्रकरण (ग्रेड A/B; मुख्य-कथा D043); यम-यमी संवाद — ऋग्वेद 10.10 (ग्रेड A — पृथक् वैदिक स्तर; भावानुवाद-मात्र, शब्दशः नहीं); यम-द्वितीया मूल-कथा — स्कंद/पद्म/भविष्य पुराण धाराएँ (ग्रेड B; विवरण-भेद — वर-सूची पाठों में घटती-बढ़ती); वसुदेव-मार्ग, कालिय, वेणु-प्रसंग — भागवत 10.3, 10.16-17 (ग्रेड A; कालिय मुख्य-पाठ D014-क्षेत्र चिह्नित); कालिंदी-विवाह — भागवत 10.58 (ग्रेड A); यमुनाष्टक आरंभ-पंक्ति — वल्लभाचार्य-परंपरा (ग्रेड B; पूर्ण-पाठ भावी सत्यापन); श्याम-वर्ण व्याख्याएँ (शिव-विरह-तप धारा सहित) — पुराण-लोक मिश्र (ग्रेड B/C चिह्नित); संगम जल-राशि तथ्य — भूगोल-सामान्य (ग्रेड B)। पर्यावरण-अनुच्छेद संपादकीय नीति-स्वर है।

नाम एवं अर्थ

Names
यमुना
"यम" (युग्म) — यम की जुड़वाँ बहन; युग्म-जन्मा धारा।
कालिंदी
कालिंद-गिरि से उतरने वाली — कृष्ण-पत्नी रूप का भी नाम।
सूर्य-तनया / रवि-सुता
सूर्य-पुत्री — प्रकाश-कुल की पहचान।
श्यामा
श्याम-वर्णा — कृष्ण-रंग जल की रस-स्मृति।
त्रियामा
यमुना-पर्याय (कोश-परंपरा) — तीन याम/धारा-गति की ध्वनि।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ यमुनायै नमः ॥ · ॐ कालिन्द्यै नमः ॥

यमुनाष्टकम् — आरंभ-पंक्ति (वल्लभाचार्य-परंपरा)

नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा ।
मुरारिपदपंकजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम् ॥

अर्थ: समस्त सिद्धियों की हेतु यमुना को मैं प्रसन्नता-पूर्वक प्रणाम करता हूँ — जो मुरारि (कृष्ण) के चरण-कमलों की स्पर्शित, चमकती सघन रज से सुशोभित हैं।

सप्त-नदी आवाहन में यमुना-पद

गंगे च यमुने चैव... जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥

पूर्ण यमुनाष्टक (8 पद्य + फल-श्रुति) एवं सूरदास-परंपरा के यमुना-पद शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
यम-द्वितीया (भाई-दूज)
कार्तिक शुक्ल द्वितीया — इस पृष्ठ की मूल-कथा; विश्राम घाट युग्म-स्नान।
यमुना-जयंती / छठ
चैत्र शुक्ल षष्ठी जयंती-परंपरा; सूर्य-षष्ठी (छठ) का यमुना-घाट रूप — पितृ-कुल सूर्य को अर्घ्य।
कार्तिक स्नान — व्रज-परिक्रमा
वृंदावन-मथुरा की परिक्रमाएँ यमुना-वंदन सहित; देव-दीपावली तट-दीपोत्सव।
यमुना-छड़ी मेला (यमुनोत्री)
ग्रीष्म-द्वार खुलने का हिमालयी पर्व — चार-धाम यात्रा का प्रथम धाम।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
यमुनोत्री (उत्तराखंड)
चार-धाम का प्रथम धाम — कालिंद-क्षेत्र उद्गम; सूर्य-कुंड तप्त-स्रोत।
विश्राम घाट, मथुरा
यम-द्वितीया का मूल-घाट; कंस-वध-पश्चात कृष्ण-विश्राम स्मृति।
केशी घाट, वृंदावन
व्रज की संध्या यमुना-आरती का केंद्र-घाट।
प्रयागराज संगम
गंगा-यमुना त्रिवेणी — तीर्थराज का युग्म-जल।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: जानते हो भाई-दूज कैसे शुरू हुआ? यमुना जी ने अपने भाई यमराज को प्रेम से खाना खिलाया और तिलक किया — और वर माँगा कि जो भाई इस दिन बहन के घर खाना खाए, उसे लंबी उम्र मिले! यमुना सूर्य देव की बेटी हैं और श्रीकृष्ण की सबसे प्यारी नदी — सारी बाल-लीलाएँ उन्हीं के किनारे हुईं।

रोचक तथ्य:

  • यमुना का पानी श्याम (गहरा नीला) दिखता है — लोग कहते हैं, कृष्ण के रंग में रंग गया!
  • यमराज और यमुना जुड़वाँ भाई-बहन हैं — "यम" का मतलब ही जुड़वाँ है।
  • कृष्ण ने यमुना में से कालिय नाग को भगाकर पानी साफ़ किया था।
  • प्रयागराज में यमुना गंगा से मिलती हैं — उसे संगम कहते हैं।

सीख: भाई-बहन का प्यार सबसे बड़े डर से भी बड़ा होता है। और जैसे कृष्ण ने यमुना साफ़ की — हम भी अपनी नदियों को साफ़ रखें।

मिनी क्विज़:

  1. यमुना के पिता कौन हैं?
  2. भाई-दूज पर यमुना ने किसे भोजन कराया?
  3. यमुना के जल से किस नाग को भगाया गया?
  4. यमुना गंगा से कहाँ मिलती हैं?