स्वर्ग से पृथ्वी तक — भगीरथ की गंगा
भस्म हुए साठ हज़ार — कथा का ऋण-पक्ष
गंगावतरण की कथा वस्तुतः एक ऋण की कथा है — और वह ऋण अयोध्या के इक्ष्वाकु-वंश (D013-कुल) पर चढ़ा था। सम्राट सगर ने अश्वमेध ठाना; यज्ञ-अश्व इन्द्र (D039) ने माया से चुराकर पाताल में कपिल मुनि के आश्रम-द्वार पर बाँध दिया। अश्व खोजते सगर के साठ हज़ार पुत्रों ने पृथ्वी खोद डाली (सागर-खात की पुराण-व्युत्पत्ति यही खुदाई है) — और पाताल में ध्यानस्थ कपिल के पास अश्व देखकर उन्हें ही चोर कह बैठे: तप-भंग के अपराध पर मुनि के नेत्र खुले, और साठ हज़ार राजकुमार क्षण में भस्म-राशि हो गए। अंतिम संस्कार तक न हुआ — बिना तर्पण-जल के वे प्रेत-दशा में अटके रहे। समाधान एक ही बताया गया — स्वर्ग की धारा गंगा यदि उस भस्म पर बहे, तो तारण होगा। पर स्वर्ग-नदी पृथ्वी पर क्यों उतरे? सगर-पौत्र अंशुमान तप करते हुए गए — सफलता नहीं; उनके पुत्र दिलीप ने जीवन-भर तप किया — नहीं; और तब आए दिलीप-पुत्र भगीरथ — वह नाम जो हिंदी भाषा तक में "भगीरथ-प्रयत्न" मुहावरा बनकर अमर है। राज-काज मंत्रियों को सौंप वे गोकर्ण-क्षेत्र में खड़े हो गए — ऊर्ध्वबाहु, पंचाग्नि-मध्य, वायु-आहार; रामायण सहस्र वर्षों की संख्या देती है। ब्रह्मा (D001) प्रसन्न हुए — "गंगा उतरेंगी; पर राजन्, एक समस्या है जो वर से नहीं सुलझती: उनका वेग। स्वर्ग से गिरती धारा को पृथ्वी धारण नहीं कर सकती — धरती फट जाएगी, पाताल तक बह जाएगी धारा। उसे धारण कर सकने वाला त्रिलोक में एक ही है — महादेव।" और भगीरथ फिर तप में बैठ गए — अब शिव (D003) के लिए। तीन पीढ़ियों का तप, दो देव-प्रसाद — कथा यहाँ तक ही श्रम-गाथा है; अब वह दृश्य आता है जो भारतीय कल्पना के शिखर-चित्रों में है।
जटाओं में एक वर्ष — वेग का उत्तर धैर्य
शिव ने कैलास पर जटाएँ खोलकर आकाश की ओर मुख किया — और गंगा उतरीं। पुराण-धाराएँ कहती हैं कि उतरते समय देवी के मन में अहंकार का एक क्षण था — "मेरा वेग यह जटाधारी क्या रोकेगा? मैं इसे बहा ले जाऊँगी।" महादेव ने वह विचार पढ़ लिया — और जटाएँ कस दीं। हिमालय-सी धारा जटा-जाल में ऐसे खो गई जैसे महारण्य में बूँद; रामायण कहती है — एक वर्ष (धारा-भेद से युग-मान) तक गंगा जटाओं में भटकती रहीं, बाहर निकलने का पथ नहीं पा सकीं। भगीरथ ने फिर स्तुति की — तब शिव ने एक जटा-कोण खोलकर धारा को बिन्दुसर की ओर छोड़ा: सप्त-धाराएँ फूटीं (ह्लादिनी-पावनी-नलिनी पूर्व को, सुचक्षु-सीता-सिंधु पश्चिम को, और सातवीं — भागीरथी — भगीरथ के पीछे)। यह प्रसंग गंगा-मूर्तिशास्त्र की जन्म-कुंडली है — हर शिव-प्रतिमा के मस्तक पर बैठी लघु गंगा-मूर्ति इसी क्षण की स्मृति है, और "गंगाधर" शिव-नाम इसी का पद। दर्शन-पाठ स्पष्ट है — अनियंत्रित शक्ति वरदान होकर भी विनाश है; धारण-क्षम माध्यम ही उसे कल्याण बनाता है: गंगा वेग हैं, शिव धैर्य; ज्ञान की धारा भी गुरु-जटा से छनकर ही लोक के पीने योग्य होती है। आगे मार्ग में जह्नु ऋषि का प्रसंग आया — यज्ञ-भूमि बहा देने पर क्रुद्ध मुनि गंगा का पूरा प्रवाह पी गए; भगीरथ की प्रार्थना पर कर्ण-रंध्र (धारा-भेद से जंघा-भेद) से पुनः प्रवाहित किया — तभी से गंगा "जाह्नवी" हैं: जह्नु-पुत्री। और अंत में वह दृश्य जिसके लिए तीन पीढ़ियाँ जलीं — रथारूढ़ भगीरथ आगे-आगे, कल-कल करती गंगा पीछे-पीछे; पाताल के भस्म-टीलों पर धारा फिरी, और साठ हज़ार सगर-पुत्र तर गए। समुद्र से उनका मिलन-स्थल "गंगासागर" तीर्थ हुआ; ब्रह्मा ने घोषणा की — जब तक गंगा-जल पृथ्वी पर है, सगर-पुत्र स्वर्ग-स्थित रहेंगे, और यह धारा तीनों पथों में बहकर "त्रिपथगा" कहलाएगी।
वैदिक स्तर और शान्तनु-प्रसंग — दो और गंगा-चित्र
स्तर-चिह्न का नियम यहाँ भी लागू है। वैदिक गंगा अवतरण-कथा नहीं जानती — ऋग्वेद के नदी-सूक्त (10.75) में गंगा सप्त-सिंधु बहनों में एक हैं, जिन्हें ऋषि नाम लेकर पुकारता है: "इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि..." — यह भूगोल की स्तुति है, पुराण-नाटक नहीं; सरस्वती वहाँ महत्तम नदी है, गंगा पंक्ति की अग्र-सदस्या। पुराण-युग में यही क्रम पलटा — गंगा शिखर पर आईं; नदी-भूगोल का यह ऐतिहासिक स्थानांतरण (सरस्वती-लोप, गंगा-मैदान का सभ्यता-केंद्र बनना) वैदिक-से-पौराणिक संक्रमण का भौगोलिक दर्पण है — दोनों स्तर अपने-अपने सत्य में प्रामाणिक। महाभारत की गंगा एक और ही रस देती है — शान्तनु-प्रसंग: कुरु-सम्राट शान्तनु गंगा-तट पर देवी-रूपा गंगा पर मुग्ध हुए; विवाह की शर्त थी — "मैं जो करूँ, पूछोगे नहीं।" सात पुत्र जन्मे, सातों को माता ने धारा में प्रवाहित कर दिया; आठवें पर शान्तनु टूट गए — प्रश्न पूछ बैठे। गंगा ने भेद खोला — ये अष्टवसु थे, वसिष्ठ-शाप से मर्त्य-जन्म पाए; धारा में प्रवाह उनकी शाप-मुक्ति थी, क्रूरता नहीं। शर्त-भंग पर देवी चली गईं — आठवाँ पुत्र साथ ले गईं और यथासमय शस्त्र-शास्त्र में निष्णात कर लौटाया: वही देवव्रत — भीष्म — "गांगेय"। मृत्यु-सी दिखती धारा वस्तुतः मुक्ति थी — शान्तनु-प्रसंग गंगा-तत्त्व का वही पाठ दोहराता है जो तारण-कथा का है: गंगा में विसर्जन अंत नहीं, उत्तरण है। इसी से पितृ-विसर्जन, अस्थि-प्रवाह और काशी-मरण की समूची परंपरा अर्थ पाती है।
आध्यात्मिक अर्थ — बहता हुआ मोक्ष
गंगा-कथा के पाठ भारतीय जीवन के हर तल पर बहते हैं। पहला — भगीरथ-आदर्श: तीन पीढ़ियों की विफलता के बाद भी तप न छोड़ना; लोक ने ठीक ही "भगीरथ-प्रयत्न" को असंभव-साधक श्रम का पर्याय बनाया — हर वह व्यक्ति जो पुरखों का अधूरा काम पूरा करता है, भगीरथ-वंशी है। दूसरा — पतित-पावनी का अर्थशास्त्र: गंगा उतरीं ही पतितों (भस्म-शप्त राजकुमारों) के लिए — यह देवी शुद्धों की नहीं, अशुद्धों की माता है; भारतीय क्षमा-दर्शन का इससे बड़ा जल-रूप नहीं। तीसरा — धारण का गुरु-तत्त्व: शिव-जटा प्रसंग हर उस माध्यम की महिमा है जो महाशक्ति को लोक-योग्य बनाता है। और चौथा — वह पाठ जो इस युग का है: श्रद्धा का ऋण सेवा से चुकता है। जिस धारा को करोड़ों माता कहते हैं, उसका प्रदूषण केवल पर्यावरण-समस्या नहीं — श्रद्धा-विरोधाभास है; गंगा-स्नान पुण्य है तो गंगा-सेवा महापुण्य, और घाट पर दीप चढ़ाकर धारा में कचरा छोड़ना कथा का नहीं, केवल कर्मकांड का ज्ञान है। भगीरथ धारा को धरती पर लाए थे; इस पीढ़ी का भगीरथ-कर्म उसे जीवित रखना है — यही इस महाकथा का वर्तमान-अध्याय है, और यह अध्याय अभी लिखा जा रहा है।