गिरिराज का कन्यादान — और उपनिषद की हैमवती
मेना का घर — जब जगदम्बा बेटी बनकर आईं
यह कथा शिव-पार्वती महागाथा का वह कोण है जो प्रायः अनकहा रह जाता है — पिता की आँख से। दक्ष-यज्ञ में सती-दाह (D003-प्रकरण) के बाद जगत् की माता को पुनर्जन्म के लिए घर चाहिए था — और चुना गया घर हिमवान-मेना का था। पुराण कहते हैं, यह चयन आकस्मिक नहीं था: मेना ने पुत्री-रूप में देवी को पाने का दीर्घ तप किया था, और हिमवान का घर त्रिलोक में एकमात्र ऐसा था जो धारण कर सकता था — जो जटा में गंगा को सम्हालने वाले शिव (D003) के समधी होने योग्य हो, उसकी छाती हिम की और नींव पत्थर की चाहिए। कन्या जन्मी — पर्वत की बेटी: पार्वती; पिता के राज-नाम से गिरिजा, शैलजा, शैलपुत्री (D061 — नवदुर्गा-प्रथमा इसी पितृ-नाम पर); माता के नाम से मैनावती-सुता। बाल्यकाल की वह भविष्य-रेखा भी पिता के ही आँगन में खिंची — देवर्षि नारद आए, कन्या की हस्त-रेखा देखी और कहा: इसका वर वही होगा जो अजन्मा है, दिगम्बर है, वैरागी है — महादेव। मेना का मातृ-हृदय काँपा (श्मशानवासी दामाद?), पर हिमवान की प्रतिक्रिया पुराण-पाठकों को चौंकाती है — गिरिराज प्रसन्न हुए: पर्वत जानता था कि शिखर का विवाह आकाश से ही होता है। आगे की तप-गाथा — अपर्णा-व्रत, कामदहन, वृद्ध-ब्रह्मचारी परीक्षा — पार्वती-पृष्ठ (D006) की मुख्य-कथा है; यहाँ वह दृश्य हमारा है जो पिता का है: सप्तर्षियों का विवाह-प्रस्ताव लेकर आना, हिमवान-मेना का परामर्श, और वह क्षण जब गिरिराज ने हाँ कही — यह जानते हुए कि यह "हाँ" बेटी को वैभव नहीं, वैराग्य के घर भेज रही है। पिता-धर्म की कसौटी यही क्षण है — संतान का श्रेय (D052 यम-पाठ स्मरण करें) चुनना, अपना प्रेय नहीं।
बारात कैलास से — और कन्यादान का आदि-दृश्य
फिर वह प्रसंग आया जो भारतीय विवाह-लोक का चिर-प्रिय चित्र है — शिव की बारात। औघड़ दूल्हा वृषभ पर; बाराती — गण, भूत-प्रेत, नाग, सिद्ध, देव-दानव सब साथ; नंदी-शृंगी-भृंगी का उत्सव-नाद। मेना ने द्वार पर आरती की थाली से जो पहला दर्शन किया, उस पर मूर्च्छा की कथाएँ पुराण सरस विस्तार से कहते हैं — माता का मोह अंतिम परीक्षा था; देवी पार्वती के अनुरोध पर शिव ने वह रूप धरा जिसके आगे कोटि कामदेव फीके — और तब हिमालय-भवन में वह विवाह हुआ जिसके साक्षी ब्रह्मा (D001) आचार्य-पद पर और विष्णु (D002) वर-पक्ष के अभिभावक-पद पर थे। इस उत्सव के केंद्र में एक शांत क्षण है, और वही इस पृष्ठ का हृदय है — कन्यादान: गिरिराज हिमवान ने संकल्प-जल हाथ में लिया और त्रिलोक के ईश्वर को अपनी पुत्री का हाथ सौंपा। सोचिए इस दृश्य का दार्शनिक भार — दाता वह जो अचल है, दान वह जो शक्ति है, ग्रहीता वह जो शिव है: स्थिरता ने शक्ति को शिव के हाथ सौंपा — भारतीय विवाह-संस्था का समूचा दर्शन इस एक वाक्य में है। और लोक ने इस क्षण को अमर कर दिया — विवाह-गीतों की सुदीर्घ परंपरा में हर कन्या का पिता "गिरिराज" और हर कन्या "गौरा" है; उत्तराखंड-हिमाचल-नेपाल के मांगल-गीत आज भी शिव-विवाह के ही पद दोहराते हैं। कुमारसंभव ने इसी गाथा को महाकाव्य किया (काव्य-स्तर — कालिदास की कल्पना-सज्जा को पुराण-पाठ से मिलाकर नहीं पढ़ना चाहिए, यह स्तर-रेखा चिह्नित रहे); पर काव्य और पुराण दोनों का पिता-चित्र एक है: वह श्वशुर जिसने दामाद के भूत-गणों को भी बारात-सम्मान दिया — आतिथ्य जो अतिथि का वेश नहीं, हृदय देखता है।
उमा हैमवती — उपनिषद में पिता का पता
अब इस पृष्ठ का शिखर-खंड — वह प्रकरण जो हिमवान का नाम ब्रह्मविद्या के इतिहास में लिख गया। केन-उपनिषद (खंड 3-4) की प्रसिद्ध यक्ष-कथा: देवताओं ने असुरों पर विजय पाई और विजय का श्रेय अपनी शक्ति को देने लगे — "हमारी ही महिमा है यह।" तब ब्रह्म-तत्त्व उनके आगे यक्ष (पूज्य-रहस्यमय सत्ता) रूप में प्रकट हुआ — पहचान कोई न सका। अग्नि (D040) गर्व से गया — "मैं सब जला सकता हूँ"; यक्ष ने एक तिनका रखा — जला न सका। वायु (D041) गया — "मैं सब उड़ा सकता हूँ"; तिनका हिला न सका। इन्द्र (D039) स्वयं गए — यक्ष अंतर्धान हो गया; और उसी आकाश में इन्द्र के आगे प्रकट हुईं "बहु-शोभमाना स्त्री — उमा हैमवती", और उन्होंने ही रहस्य खोला: "वह ब्रह्म था; उसी की विजय में तुम महिमा पा रहे हो।" उपनिषद का यह क्षण देव-इतिहास की धुरी है — ब्रह्मविद्या की प्रथम आचार्या एक स्त्री है, और उसका परिचय उसके पिता से दिया गया है: हैमवती — हिमवान की पुत्री। शंकराचार्य की भाष्य-परंपरा इस उमा को विद्या-देवी/पार्वती-तत्त्व दोनों रूपों में पढ़ती है (व्याख्या-भेद चिह्नित); पर इस पृष्ठ के लिए मर्म यह है कि जब उपनिषद को ज्ञान की मूर्ति चाहिए थी, उसने उसे हिमालय के घर की बेटी कहा — पर्वत केवल पत्थर होता तो श्रुति उसका नाम-पता क्यों रखती? हिमवान वैदिक-वाङ्मय में भी उपस्थित हैं (अथर्व-संहिता पर्वतों में हिमवंत को श्रेष्ठ गिनाती है; "यस्य हिमवन्तो महित्वा" — जिसकी महिमा हिमालय कहते हैं — प्रजापति-सूक्त की ध्वनि): संहिता से उपनिषद से पुराण तक, यह पर्वत सदा देवता रहा है।
मैनाक-प्रसंग और स्थैर्य-दर्शन — पिता जो पीछे खड़ा रहता है
हिमवान-कुल की एक और मार्मिक रेखा पुत्र मैनाक की है। पूर्व-युग में पर्वतों के पंख होते थे — वे उड़ते थे, और उनके गिरने से लोक त्रस्त था; इन्द्र (D039) ने वज्र से पर्वतों के पंख काटे। मैनाक को समुद्र (सागर-देव) ने शरण दी — जल के भीतर छिपाकर पंख बचा लिए; यह ऋण मैनाक ने युगों बाद चुकाया — सुंदरकांड (D012) के आरम्भ में, जब हनुमान शत-योजन सागर लाँघ रहे थे, सागर के अनुरोध पर मैनाक स्वर्ण-शिखर लेकर जल से उठे: "पवनसुत, मेरे शिखर पर विश्राम कर लो — तुम्हारे पिता वायु (D041) ने मेरे पंख-काल में मेरी रक्षा की थी।" हनुमान ने स्पर्श-मात्र से सम्मान लेकर यात्रा जारी रखी — कार्य-काल में विश्राम नहीं। पिता अचल, पुत्र शरणागत-पालक — गिरि-कुल का चरित्र एक-रेखीय है: धारण करना। यही हिमवान-तत्त्व का समापन-दर्शन है। भारतीय परंपरा में पर्वत जड़ नहीं — धैर्य की देह है: नदियाँ उससे निकलती हैं (गंगा-यमुना दोनों उसी के हिम से), तप उसकी गुफाओं में सधता है, देवता उसके शिखरों पर बसते हैं (कैलास-बदरी-केदार सब उसी की देह पर), और वह स्वयं कुछ नहीं माँगता। "स्थिरता" आज के युग की सबसे दुर्लभ संपत्ति है — और उसका देवता वही है जो अपनी दोनों बेटियों को बहने (गंगा) और ब्याहने (पार्वती) देकर स्वयं वहीं खड़ा रहा: अचल, हिम-मुकुट पहने, पृथ्वी का मान-दंड। पिता ऐसा ही होता है — सबको दिशा देता है, स्वयं कहीं नहीं जाता।