गिरिराज हिमवान

Himavan · हिमालय · पर्वतराज · पार्वती-पिता · देवतात्मा

कालिदास ने जिन्हें "देवतात्मा" कहा — देवता जिसकी आत्मा है, वह पर्वत; पर्वत जिसकी देह है, वह देवता। पर्वतों के राजा, मेना के पति, गंगा और पार्वती के पिता — और वह श्वशुर जिसके घर स्वयं महादेव बारात लेकर आए। उपनिषद तक में उनकी पुत्री का पता है: "उमा हैमवती" — हिमवान की बेटी।

श्रेणी: पर्वत-देवता · गिरिराज पत्नी: मेना · पुत्र: मैनाक पुत्रियाँ: गंगा, पार्वती (धारा-क्रम) उपनिषद-सूत्र: उमा हैमवती (केन)
प्रमुख कथा पढ़ें
देवतात्मापर्वत-देह में देव-आत्मा (कालिदास-पद)
पर्वतराजसमस्त गिरि-कुल के अधिपति
आदर्श-पिताकन्यादान का शास्त्र-आदर्श श्वशुर-पद
स्थैर्य-मूर्तिअचल — स्थिरता का देव-रूप

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

हिमवान भारतीय देव-मंडल की उस श्रेणी के देवता हैं जिसमें प्रकृति स्वयं पूज्य है — नदी-देवियों (D056-D058) के पुरुष-समकक्ष: पर्वत-देवता। वे हिमालय हैं — पर केवल भूगोल नहीं: पुराण-दृष्टि में वे चेतन देव-पुरुष हैं, पर्वत-कुल के राजा, जिनकी सभा में समस्त गिरि (मेरु-वंश धाराएँ, विंध्य, मलय, मैनाक) आते हैं; कालिदास का कुमारसंभव उन्हीं के वंदन से खुलता है — "उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का नगाधिराज है, जो पूर्व-पश्चिम समुद्रों में डूबकर पृथ्वी के मान-दंड (मापदंड) सा खड़ा है।" एक पर्वत को "पृथ्वी का मापदंड" कहना — भारतीय काव्य-दृष्टि की यह पंक्ति हिमवान-तत्त्व का सार है: वे वह कसौटी हैं जिस पर स्थिरता नापी जाती है।

पर उनका देव-पद पिता-पद से आया है। पितरों की मानस-कन्या मेना से उनका विवाह हुआ; संतति में पुत्र मैनाक (पंख वाला पर्वत — D012-प्रसंग) और पुत्रियों में गंगा (D056) तथा — सती-पुनर्जन्म रूप में — स्वयं जगदम्बा पार्वती (D006): "पर्वत की बेटी" नाम ही पिता का यश है। जिस घर की एक बेटी त्रिपथगा हो और दूसरी जगन्माता, और दामाद स्वयं महादेव (D003) — उस गृहस्थ के आतिथ्य-भाग्य की उपमा त्रिलोक में नहीं है; और उपनिषद-स्तर पर तो उनकी पुत्री ब्रह्मविद्या की दूती बनकर खड़ी हैं — केन-उपनिषद की "उमा हैमवती", जिसका प्रकरण इस पृष्ठ की कथा का शिखर-खंड है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पत्नीमेना/मेनका — पितृ-गण की मानस-कन्या (शिव पुराण-धारा)
  • पुत्रियाँपार्वती (D006 — सती-पुनर्जन्म), गंगा (D056 — ज्येष्ठा-क्रम धारा); रागिनी/कुटिला अतिरिक्त-कन्या धाराएँ (पाठ-भेद)
  • पुत्रमैनाक — सपक्ष पर्वत; सागर-शरणागत (D012 सुंदरकांड-प्रसंग)
  • दामादशिव (D003) — गिरिजा-पति; "जामाता महादेव" पद
  • दौहित्रगणेश (D004), कार्तिकेय (D005) — नाना-पद
  • कुल-सम्बन्धमेरु-वंश धाराएँ; विंध्य आदि गिरि-सभा के अधिराज

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

गिरिराज का कन्यादान — और उपनिषद की हैमवती

मेना का घर — जब जगदम्बा बेटी बनकर आईं

यह कथा शिव-पार्वती महागाथा का वह कोण है जो प्रायः अनकहा रह जाता है — पिता की आँख से। दक्ष-यज्ञ में सती-दाह (D003-प्रकरण) के बाद जगत् की माता को पुनर्जन्म के लिए घर चाहिए था — और चुना गया घर हिमवान-मेना का था। पुराण कहते हैं, यह चयन आकस्मिक नहीं था: मेना ने पुत्री-रूप में देवी को पाने का दीर्घ तप किया था, और हिमवान का घर त्रिलोक में एकमात्र ऐसा था जो धारण कर सकता था — जो जटा में गंगा को सम्हालने वाले शिव (D003) के समधी होने योग्य हो, उसकी छाती हिम की और नींव पत्थर की चाहिए। कन्या जन्मी — पर्वत की बेटी: पार्वती; पिता के राज-नाम से गिरिजा, शैलजा, शैलपुत्री (D061 — नवदुर्गा-प्रथमा इसी पितृ-नाम पर); माता के नाम से मैनावती-सुता। बाल्यकाल की वह भविष्य-रेखा भी पिता के ही आँगन में खिंची — देवर्षि नारद आए, कन्या की हस्त-रेखा देखी और कहा: इसका वर वही होगा जो अजन्मा है, दिगम्बर है, वैरागी है — महादेव। मेना का मातृ-हृदय काँपा (श्मशानवासी दामाद?), पर हिमवान की प्रतिक्रिया पुराण-पाठकों को चौंकाती है — गिरिराज प्रसन्न हुए: पर्वत जानता था कि शिखर का विवाह आकाश से ही होता है। आगे की तप-गाथा — अपर्णा-व्रत, कामदहन, वृद्ध-ब्रह्मचारी परीक्षा — पार्वती-पृष्ठ (D006) की मुख्य-कथा है; यहाँ वह दृश्य हमारा है जो पिता का है: सप्तर्षियों का विवाह-प्रस्ताव लेकर आना, हिमवान-मेना का परामर्श, और वह क्षण जब गिरिराज ने हाँ कही — यह जानते हुए कि यह "हाँ" बेटी को वैभव नहीं, वैराग्य के घर भेज रही है। पिता-धर्म की कसौटी यही क्षण है — संतान का श्रेय (D052 यम-पाठ स्मरण करें) चुनना, अपना प्रेय नहीं।

बारात कैलास से — और कन्यादान का आदि-दृश्य

फिर वह प्रसंग आया जो भारतीय विवाह-लोक का चिर-प्रिय चित्र है — शिव की बारात। औघड़ दूल्हा वृषभ पर; बाराती — गण, भूत-प्रेत, नाग, सिद्ध, देव-दानव सब साथ; नंदी-श‍ृंगी-भृंगी का उत्सव-नाद। मेना ने द्वार पर आरती की थाली से जो पहला दर्शन किया, उस पर मूर्च्छा की कथाएँ पुराण सरस विस्तार से कहते हैं — माता का मोह अंतिम परीक्षा था; देवी पार्वती के अनुरोध पर शिव ने वह रूप धरा जिसके आगे कोटि कामदेव फीके — और तब हिमालय-भवन में वह विवाह हुआ जिसके साक्षी ब्रह्मा (D001) आचार्य-पद पर और विष्णु (D002) वर-पक्ष के अभिभावक-पद पर थे। इस उत्सव के केंद्र में एक शांत क्षण है, और वही इस पृष्ठ का हृदय है — कन्यादान: गिरिराज हिमवान ने संकल्प-जल हाथ में लिया और त्रिलोक के ईश्वर को अपनी पुत्री का हाथ सौंपा। सोचिए इस दृश्य का दार्शनिक भार — दाता वह जो अचल है, दान वह जो शक्ति है, ग्रहीता वह जो शिव है: स्थिरता ने शक्ति को शिव के हाथ सौंपा — भारतीय विवाह-संस्था का समूचा दर्शन इस एक वाक्य में है। और लोक ने इस क्षण को अमर कर दिया — विवाह-गीतों की सुदीर्घ परंपरा में हर कन्या का पिता "गिरिराज" और हर कन्या "गौरा" है; उत्तराखंड-हिमाचल-नेपाल के मांगल-गीत आज भी शिव-विवाह के ही पद दोहराते हैं। कुमारसंभव ने इसी गाथा को महाकाव्य किया (काव्य-स्तर — कालिदास की कल्पना-सज्जा को पुराण-पाठ से मिलाकर नहीं पढ़ना चाहिए, यह स्तर-रेखा चिह्नित रहे); पर काव्य और पुराण दोनों का पिता-चित्र एक है: वह श्वशुर जिसने दामाद के भूत-गणों को भी बारात-सम्मान दिया — आतिथ्य जो अतिथि का वेश नहीं, हृदय देखता है।

उमा हैमवती — उपनिषद में पिता का पता

अब इस पृष्ठ का शिखर-खंड — वह प्रकरण जो हिमवान का नाम ब्रह्मविद्या के इतिहास में लिख गया। केन-उपनिषद (खंड 3-4) की प्रसिद्ध यक्ष-कथा: देवताओं ने असुरों पर विजय पाई और विजय का श्रेय अपनी शक्ति को देने लगे — "हमारी ही महिमा है यह।" तब ब्रह्म-तत्त्व उनके आगे यक्ष (पूज्य-रहस्यमय सत्ता) रूप में प्रकट हुआ — पहचान कोई न सका। अग्नि (D040) गर्व से गया — "मैं सब जला सकता हूँ"; यक्ष ने एक तिनका रखा — जला न सका। वायु (D041) गया — "मैं सब उड़ा सकता हूँ"; तिनका हिला न सका। इन्द्र (D039) स्वयं गए — यक्ष अंतर्धान हो गया; और उसी आकाश में इन्द्र के आगे प्रकट हुईं "बहु-शोभमाना स्त्री — उमा हैमवती", और उन्होंने ही रहस्य खोला: "वह ब्रह्म था; उसी की विजय में तुम महिमा पा रहे हो।" उपनिषद का यह क्षण देव-इतिहास की धुरी है — ब्रह्मविद्या की प्रथम आचार्या एक स्त्री है, और उसका परिचय उसके पिता से दिया गया है: हैमवती — हिमवान की पुत्री। शंकराचार्य की भाष्य-परंपरा इस उमा को विद्या-देवी/पार्वती-तत्त्व दोनों रूपों में पढ़ती है (व्याख्या-भेद चिह्नित); पर इस पृष्ठ के लिए मर्म यह है कि जब उपनिषद को ज्ञान की मूर्ति चाहिए थी, उसने उसे हिमालय के घर की बेटी कहा — पर्वत केवल पत्थर होता तो श्रुति उसका नाम-पता क्यों रखती? हिमवान वैदिक-वाङ्मय में भी उपस्थित हैं (अथर्व-संहिता पर्वतों में हिमवंत को श्रेष्ठ गिनाती है; "यस्य हिमवन्तो महित्वा" — जिसकी महिमा हिमालय कहते हैं — प्रजापति-सूक्त की ध्वनि): संहिता से उपनिषद से पुराण तक, यह पर्वत सदा देवता रहा है।

मैनाक-प्रसंग और स्थैर्य-दर्शन — पिता जो पीछे खड़ा रहता है

हिमवान-कुल की एक और मार्मिक रेखा पुत्र मैनाक की है। पूर्व-युग में पर्वतों के पंख होते थे — वे उड़ते थे, और उनके गिरने से लोक त्रस्त था; इन्द्र (D039) ने वज्र से पर्वतों के पंख काटे। मैनाक को समुद्र (सागर-देव) ने शरण दी — जल के भीतर छिपाकर पंख बचा लिए; यह ऋण मैनाक ने युगों बाद चुकाया — सुंदरकांड (D012) के आरम्भ में, जब हनुमान शत-योजन सागर लाँघ रहे थे, सागर के अनुरोध पर मैनाक स्वर्ण-शिखर लेकर जल से उठे: "पवनसुत, मेरे शिखर पर विश्राम कर लो — तुम्हारे पिता वायु (D041) ने मेरे पंख-काल में मेरी रक्षा की थी।" हनुमान ने स्पर्श-मात्र से सम्मान लेकर यात्रा जारी रखी — कार्य-काल में विश्राम नहीं। पिता अचल, पुत्र शरणागत-पालक — गिरि-कुल का चरित्र एक-रेखीय है: धारण करना। यही हिमवान-तत्त्व का समापन-दर्शन है। भारतीय परंपरा में पर्वत जड़ नहीं — धैर्य की देह है: नदियाँ उससे निकलती हैं (गंगा-यमुना दोनों उसी के हिम से), तप उसकी गुफाओं में सधता है, देवता उसके शिखरों पर बसते हैं (कैलास-बदरी-केदार सब उसी की देह पर), और वह स्वयं कुछ नहीं माँगता। "स्थिरता" आज के युग की सबसे दुर्लभ संपत्ति है — और उसका देवता वही है जो अपनी दोनों बेटियों को बहने (गंगा) और ब्याहने (पार्वती) देकर स्वयं वहीं खड़ा रहा: अचल, हिम-मुकुट पहने, पृथ्वी का मान-दंड। पिता ऐसा ही होता है — सबको दिशा देता है, स्वयं कहीं नहीं जाता।

स्रोत टिप्पणी: मेना-विवाह, पार्वती-जन्म, नारद-भविष्य, सप्तर्षि-प्रस्ताव, बारात-कन्यादान — शिव पुराण रुद्र-संहिता पार्वती-खंड (ग्रेड A — यहाँ पिता-कोण; तप-विवाह मुख्य-धारा D006, सती-प्रकरण D003 पर चिह्नित); उमा हैमवती — केन उपनिषद 3.12-4.1 (ग्रेड A — वैदिक स्तर; "ब्रह्म-विद्या-रूपा बनाम पार्वती" भाष्य-भेद शांकर-परंपरा में चिह्नित); मैनाक — वाल्मीकि रामायण सुंदरकांड 1 (ग्रेड A; पक्ष-छेदन पूर्व-कथा पुराण-सामान्य ग्रेड B); हिमवंत-श्रेष्ठता — अथर्व-संहिता एवं "यस्य हिमवन्तो" ऋग् 10.121-धारा (ग्रेड A — ध्वनि-सूत्र, शब्दशः उद्धरण-दावा नहीं); "देवतात्मा" — कुमारसंभव 1.1 (काव्य-स्तर स्पष्ट चिह्नित); गंगा-पुत्री क्रम — पुराण-धारा (ग्रेड B; D056-सह संगत); मांगल-गीत परंपरा — लोक-स्तर (ग्रेड C)। रागिनी/कुटिला कन्या-धाराएँ पाठ-भेद रूप में परिवार-सूची में चिह्नित।

नाम एवं अर्थ

Names
हिमवान / हिमवंत
हिम वाला — बर्फ़ का स्वामी; वैदिक-प्राचीन रूप।
हिमालय
हिम + आलय — बर्फ़ का घर; भूगोल-प्रसिद्ध नाम।
गिरिराज / नगाधिराज
पर्वतों का राजा — गिरि-कुल का अधिपतित्व।
देवतात्मा
देव-आत्मा वाला — कालिदास का अमर पद (काव्य-स्तर)।
पार्वती-पिता / शैल
जिनके नाम से पुत्री गिरिजा-शैलजा-पार्वती कहलाईं।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम-स्मरण

ॐ हिमवते नमः ॥ · ॐ गिरिराजाय नमः ॥

प्रयोग-नोट: हिमवान का स्वतंत्र मंत्र-शास्त्र अल्प है — वे मुख्यतः पार्वती-विवाह विधानों (गौरी-पूजन में "गिरिराज-कन्या" पद), तीर्थ-संकल्पों एवं पर्वत-वंदन परंपरा में स्मृत होते हैं।

केन-उपनिषद सूत्र-पद (वैदिक स्तर)

…बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्… (केन 3.12)

भाव: (इन्द्र ने उसी आकाश में) अत्यंत शोभायमान स्त्री — हिमवान-पुत्री उमा — को (देखा)। ब्रह्मविद्या-प्रसंग का सूत्र-पद।

कुमारसंभव के हिमालय-वर्णन खंड (1.1-17) एवं मांगल-गीत परंपरा के गिरिराज-पद भावी साहित्य-खंड विस्तार में — काव्य/लोक-स्तर पृथक् रहेगा।

पर्व एवं व्रत

Festivals
शिव-विवाह पर्व (शिवरात्रि-फाल्गुन)
बारात-कन्यादान स्मृति — हिमाचल-उत्तराखंड-नेपाल के मांगल-गीत जाल।
हरतालिका-गौरी व्रतों में गिरिराज-पद
गौरी-पूजन विधानों में "गिरिराज-कन्या" आवाहन — पिता-नाम की विधि-उपस्थिति।
हिमालय-यात्रा ऋतु-पर्व
चार-धाम कपाट-उद्घाटन (अक्षय-तृतीया क्रम) — गिरि-देह पर तीर्थ-चक्र का वार्षिक आरम्भ।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
सम्पूर्ण हिमालय-तीर्थ जाल
कैलास-मानसरोवर, चार-धाम, अमरनाथ, पंच-कैलास — गिरिराज की देह ही तीर्थ-माला है।
हिमवत् केदार धाराएँ
केदार-खंड (स्कंद पुराण) का समूचा भूगोल — हिमवान-क्षेत्र माहात्म्य।
गौरी-शंकर विवाह-स्थल परंपराएँ
त्रियुगीनारायण (उत्तराखंड) — शिव-पार्वती विवाह-वेदी की जीवित स्थल-मान्यता; अखंड-धूनी।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत हिमालय सिर्फ़ पहाड़ नहीं — देवता भी है! उसका नाम है हिमवान: पर्वतों का राजा। पार्वती जी उनकी बेटी हैं — "पार्वती" का मतलब ही है "पर्वत की बेटी"! जब शिव जी से उनका विवाह हुआ, तो हिमवान ने अपने महल में पूरी बारात का स्वागत किया — भूत-प्रेत बारातियों का भी!

रोचक तथ्य:

  • गंगा नदी भी हिमवान की बेटी मानी जाती हैं — यानी पार्वती की बहन!
  • गणेश और कार्तिकेय हिमवान के नाती हैं।
  • पहले पर्वतों के पंख होते थे! हिमवान के बेटे मैनाक ने समुद्र में छिपकर अपने पंख बचाए — और बाद में हनुमान जी को समुद्र के ऊपर आराम करने के लिए अपना शिखर दिया।
  • माउंट एवरेस्ट समेत दुनिया की सबसे ऊँची चोटियाँ हिमवान की ही "देह" पर हैं।

सीख: पहाड़ जैसे बनो — अपनी जगह पर मज़बूती से खड़े रहो, और दूसरों को सहारा दो। जो ख़ुद स्थिर होता है, वही दूसरों को ऊँचा उठा पाता है।

मिनी क्विज़:

  1. हिमवान की प्रसिद्ध बेटी कौन हैं?
  2. "पार्वती" नाम का अर्थ क्या है?
  3. हिमवान के पंख वाले बेटे का नाम क्या है?
  4. हिमवान के दामाद कौन हैं?