भगवान सूर्य

Surya · आदित्य · सविता · ग्रहराज · जगच्चक्षु

एकमात्र देवता जिनके दर्शन के लिए मंदिर नहीं जाना पड़ता — प्रातः द्वार खोलिए, दर्शन उपस्थित हैं। जगत् के चक्षु, कालचक्र के धुरीधार, गायत्री जिनकी स्तुति है और नवग्रह-मंडल जिनका दरबार।

श्रेणी: नवग्रह-राज · आदित्य · प्रत्यक्ष-देव रथ: सप्ताश्व · सारथी अरुण वार: रविवार पर्व: छठ · मकर संक्रांति · रथ सप्तमी
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प्रत्यक्ष-देवनित्य-दर्शन देने वाले एकमात्र
जगच्चक्षुविश्व के नेत्र — कर्म-साक्षी
काल-कर्तादिन-ऋतु-वर्ष के विधाता
आरोग्य-दाता"आरोग्यं भास्करादिच्छेत्"

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

सूर्य भारतीय उपासना के "प्रत्यक्ष-देवता" हैं — श्रद्धा जिनके लिए कल्पना नहीं माँगती: वे प्रतिदिन उदित होकर स्वयं प्रमाण देते हैं। वैदिक स्तर पर वे कई नामों में स्तुत हैं — सूर्य (प्रकाशमान बिंब), सविता (प्रेरक-उदयकर्ता — गायत्री इसी रूप की प्रार्थना है), पूषा (पोषक), मित्र (D042-युग्म), विवस्वान्; आदित्यों (अदिति-पुत्रों) में वे प्रधान हुए और अग्नि-त्रिस्थान (D040) के द्युलोक-रूप भी वही हैं। पुराण-ज्योतिष युग ने उन्हें ग्रहराज किया — नवग्रह-मंडल के केंद्र में स्थित पिता-सम्राट, जिनके दरबार से यह ज्ञानकोश अब नवग्रह-शृंखला (D043-D048...) आरंभ कर रहा है।

स्वरूप-चित्र शिल्प-शास्त्र का प्रिय विषय है: सात अश्वों का रथ (सप्ताश्व — गायत्री आदि सात छंदों की, या सप्तवार-सप्तरश्मि की प्रतीक-परंपरा), एक ही चक्र (संवत्सर-चक्र), सारथी अरुण (गरुड़-अग्रज — उदय से पूर्व की लालिमा वही हैं), दोनों करों में विकसित कमल, कमर में उत्तरीय-बद्ध "उदीच्य-वेश" और चरण-पर्यंत... शिल्प-नियम कहता है कि सूर्य-प्रतिमा के चरण प्रायः अनावृत नहीं गढ़े जाते (तेज-मर्यादा की परंपरा)। परिवार-कथा (संज्ञा-छाया) ने उन्हें धर्म-मंडल के आधे दरबार का पिता बना दिया — यम, यमुना, शनि, मनु, अश्विनौ; और मानव-इतिहास में सूर्यवंश (D013 राम!) उन्हीं की संतति-रेखा है। "आरोग्यं भास्करादिच्छेत्" — आरोग्य सूर्य से माँगो: यह सूत्र उनकी उपासना का चिरस्थायी प्रयोजन-पत्र है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • माता-पिताअदिति एवं कश्यप — आदित्य-मंडल
  • पत्नियाँसंज्ञा (त्वष्टा/विश्वकर्मा-पुत्री) एवं छाया (संज्ञा-प्रतिरूपा) — कथा में
  • संज्ञा-संततिवैवस्वत मनु, यम (D050-क्षेत्र), यमुना; अश्व-रूप काल की अश्विनीकुमार-जोड़ी
  • छाया-संततिशनि (D049), तपती; सावर्णि मनु
  • प्रसिद्ध पुत्र-धाराएँसुग्रीव (रामायण-अंश धारा), कर्ण (महाभारत — कुंती-कवच-कुंडल प्रसंग)
  • सारथी-द्वारपालअरुण (सारथी); प्रताप-मंडल में उषा-प्रत्यूषा धाराएँ

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

संज्ञा और छाया — जिस तेज को पत्नी न सह सकी, जगत् कैसे सहे

पृष्ठभूमि — विश्वकर्मा की बेटी का विवाह

देव-शिल्पी विश्वकर्मा (त्वष्टा-धारा) की पुत्री संज्ञा का विवाह साक्षात् सूर्य से हुआ — त्रिलोक की दृष्टि में इससे उज्ज्वल संबंध क्या होता। पर पुराणकार यहाँ वह प्रश्न उठाते हैं जो किसी और देव-दांपत्य में नहीं उठा: तेज की सहनीयता। सूर्य का प्रताप अपार था — समीप जाना तो दूर, आँख भरकर देखना कठिन; संज्ञा पतिव्रता थीं, पर नेत्र हर भेंट में झुक जाते, मुख फिर जाता। वर्षों यह दाह सहते हुए तीन संतानें हुईं — वैवस्वत मनु, यम और यमुना — पर अंततः संज्ञा ने वह निर्णय लिया जो कथा की धुरी है: तप के लिए जाना होगा — इस तेज के योग्य क्षमता अर्जित करने। जाने से पहले उन्होंने अपने ही संकल्प से अपनी प्रतिकृति रची — छाया: रूप वही, स्वभाव वही; आदेश दिया कि मेरी अनुपस्थिति प्रकट न होने पाए, संतानों को माता-वत् पालना। और संज्ञा पिता-गृह होते हुए उत्तर-कुरु के वनों में बडवा (घोड़ी) रूप धरकर तप में लीन हो गईं।

छाया का पक्षपात — शनि का जन्म, यम का शाप

छाया ने पत्नी-धर्म निभाया; उनसे भी संतानें हुईं — सावर्णि मनु, कन्या तपती, और वह पुत्र जिसके जन्म-क्षण से ज्योतिष काँपता है — शनि (D049-क्षेत्र: छाया-सुत, जिनकी दृष्टि-कथाएँ अपने पृष्ठ पर आएँगी)। पर प्रतिकृति आखिर प्रतिकृति थी — अपनी कोख की संतानों पर छाया का पक्ष ढलने लगा। एक दिन किशोर यम से भेद फूट पड़ा: माता की डाँट पर आवेश में उन्होंने चरण उठाया — छाया ने शाप दे डाला: "यह पाँव गिर जाए / कृमि-ग्रस्त हो!" यम स्तब्ध पिता के पास दौड़े — "माता संतान को ऐसा शाप दे ही कैसे सकती है? यह माता नहीं हो सकती!" सूर्य की तेज-दृष्टि ने सत्य निकाल लिया (शाप का परिहार भी पिता ने किया — कृमि पाद-रज लेकर संतुष्ट होंगे, चरण बचेगा: दंड रहा, विनाश नहीं)। छाया से सत्य उगलवाया गया — और तब सूर्य को पता चला कि जिसे वे वर्षों पत्नी समझते रहे, वह पत्नी की परछाईं थी; संज्ञा तो तप में है — उनके ही ताप से भागी हुई। क्रोध से अधिक जो भाव पुराणकार सूर्य में दिखाते हैं, वह विषाद है: प्रिय को मेरा प्रकाश ही असह्य था, और मुझे भान तक न हुआ।

विश्वकर्मा की खराद — तेज का संस्कार

सूर्य ससुर-गृह पहुँचे। विश्वकर्मा ने वह प्रस्ताव रखा जो इस कथा को विश्व-कथा-कोश में अद्वितीय बनाता है — "तेज कम कीजिए, जामाता। संबंध सहनीयता माँगते हैं।" और सूर्य मान गए — देवता ने अपनी चमक घटवाना स्वीकार किया! विश्वकर्मा ने उन्हें अपनी खराद (भ्रमि-यंत्र) पर चढ़ाया और प्रताप का अष्टमांश छाँट दिया। छीलन व्यर्थ नहीं गई — उसी छटे हुए तेज से देव-आयुधों का वह शस्त्रागार गढ़ा गया जिस पर पिछले पृष्ठ टिके हैं: विष्णु का सुदर्शन चक्र (D002), शिव का त्रिशूल (D003), कुबेर की गदा-पालकी धाराएँ, कार्तिकेय की शक्ति (D005) — अर्थात् जगत् की रक्षा-शक्तियाँ सूर्य के त्यागे हुए ताप से बनीं। फिर वे बडवा-रूपा संज्ञा के पास पहुँचे — स्वयं अश्व-रूप धरकर; उस पुनर्मिलन से जुड़वाँ अश्विनीकुमार जन्मे (देव-वैद्य — नासत्य-दस्र), और रेवंत भी। दंपती लौटे — अब वह दाह नहीं, दीप्ति थी: जिसे देखा जा सके, जिया जा सके। कथा का व्याकरण देखिए — समस्या पत्नी का पलायन नहीं कही गई, तेज की अ-संस्कारित अति कही गई; और समाधान तप (संज्ञा का) + संस्कार (सूर्य का) — दोनों पक्षों का श्रम। दांपत्य-दर्शन पर पुराणों का इससे परिपक्व वाक्य दुर्लभ है: प्रेम में समर्थ को अपनी धार घिसवानी पड़ती है, और सहने वाले को अपनी क्षमता तपानी — तब कहीं परछाइयों की जगह असली लोग लौटते हैं।

गायत्री से आदित्यहृदय तक — उपासना की दो धुरियाँ

सूर्य-उपासना की पहली धुरी वैदिक है — गायत्री (ऋग्वेद 3.62.10): "उस सविता देव के वरणीय भर्ग (तेज) का हम ध्यान करें, जो हमारी धियों (बुद्धियों) को प्रेरित करे।" ध्यान दें — माँग प्रकाश की नहीं, प्रेरणा की है: बाहर का सूर्य भीतर की धी जगाए, यही इस महामंत्र की प्रार्थना-दिशा है; संध्योपासना का त्रिकाल-अर्घ्य इसी का विधि-शरीर है। दूसरी धुरी महाकाव्यों की है — युद्धभूमि में थके राम को अगस्त्य ऋषि ने जो स्तोत्र दिया (वाल्मीकि युद्धकांड — रावण-वध पूर्व), वह आदित्यहृदय आज भी संकट-पाठ का प्रथम नाम है: "जो सब देवताओं का समष्टि-रूप है, उस जगत् के हृदय आदित्य को नमन कर — विजय निश्चित है" (पूर्ण-पाठ मंत्र-सूचकांक विस्तार में — D013-नीति)। इसी दरबार के दो शिष्य-पुत्र पूर्व-पृष्ठों से परिचित हैं — उलटे उड़कर व्याकरण पढ़ने वाले शिष्य हनुमान (D012), और कवच-कुंडल दान कर देने वाला पुत्र कर्ण (जिसे पिता ने इन्द्र-छल की पूर्व-सूचना भी दी थी — पुत्र-मोह और दान-धर्म का वह द्वंद्व महाभारत की विभूति है); सुग्रीव-अंश धारा रामायण-पक्ष की है। और मानव-वंशावली में वैवस्वत मनु से चला सूर्यवंश — इक्ष्वाकु, हरिश्चंद्र (D042-कथा!), भगीरथ, रघु, राम — भारतीय राज-आदर्श की मुख्य रेखा इसी पिता के नाम चलती है।

पत्थर के रथ, नदियों के अर्घ्य — जीवित सूर्य-भूगोल

सूर्य-उपासना का स्थापत्य-गौरव विश्व-धरोहर है — कोणार्क (ओडिशा, 13वीं शती): पूरा मंदिर ही सप्ताश्व-रथ है — बारह जोड़ी उत्कीर्ण चक्र (मास/पक्ष), जिनकी छायाएँ धूप-घड़ी तक का काम देती हैं; मोढेरा (गुजरात, सोलंकी-काल) का सूर्यकुंड-सभामंडप विषुव-सूर्य को गर्भगृह तक उतारता था; कश्मीर का मार्तंड ध्वंसावशेष में भी सम्राट है; और बिहार-झारखंड-पूर्वांचल का देव-औंगारी जैसा सूर्य-मंदिर जाल छठ-संस्कृति की रीढ़। पर्व-पंचांग में वे सबसे व्यापक देवता हैं — मकर संक्रांति/पोंगल (उत्तरायण-आरंभ: पूरे देश के नाम अलग, अर्घ्य एक), रथ सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी — सूर्य-जयंती: रथ मुड़ने का पर्व), रविवार-व्रत, और महापर्व छठ — जिसकी विलक्षणता यह कि अर्घ्य पहले अस्ताचल सूर्य को जाता है: थके, डूबते, "पदच्युत" होते देवता की पूजा — विश्व की उपासना-परंपराओं में अकेली; लोक ने उसमें वही संज्ञा-कथा वाली करुणा पढ़ी है — तेज का नहीं, तेजस्वी का संबंध निभाया जाता है, उदय में भी, अस्त में भी। योग-परंपरा का सूर्य नमस्कार (द्वादश आसन-द्वादश नाम) इस उपासना का देह-संस्करण है — और आधुनिक विश्व-योग दिवस तक उसकी किरण पहुँची है।

आध्यात्मिक अर्थ — भीतर का सविता

सूर्य-तत्त्व के पाठ प्रातः जितने नियमित हैं। पहला — नियमितता ही दिव्यता है: इस देवता ने सृष्टि से आज तक एक भी अनुपस्थिति नहीं ली; साधक के लिए सूर्योदय नित्य-उपदेश है कि महानता कोई विस्फोट नहीं, अखंड आवृत्ति है। दूसरा — तेज-संस्कार: संज्ञा-कथा हर प्रतिभाशाली का दर्पण है — क्षमता यदि संबंधों को झुलसाए तो वह वरदान नहीं रही; विश्वकर्मा की खराद स्वीकारना (प्रतिपुष्टि, विनम्रता, मर्यादा) तेजस्वी का धर्म है — और छँटा हुआ तेज व्यर्थ नहीं जाता, सुदर्शन बनता है: संयम ही शक्ति का सर्वोत्तम पुनर्नियोजन है। तीसरा — छाया-विवेक: जो अति-ताप से भागता है, वह अपनी जगह परछाईं छोड़ जाता है — घर हों या संस्थाएँ, जहाँ वास्तविक उपस्थिति असह्य वातावरण से पलायन कर जाए, वहाँ छायाएँ पलती हैं और पक्षपात जन्मता है; समाधान वही पुराण-सूत्र — वातावरण सहनीय बनाओ, असली लोग लौट आएँगे। और चौथा — गायत्री-दिशा: सूर्य से माँगना हो तो धूप मत माँगो, धी माँगो — "धियो यो नः प्रचोदयात्"; बाहर का प्रकाश तो अनुदान है, भीतर की प्रेरणा उपलब्धि: जिस दिन भीतर का सविता उगता है, उस दिन साधक स्वयं किसी का प्रभात बन जाता है।

स्रोत टिप्पणी: संज्ञा-छाया-यमशाप-खराद-अश्विनौ कथा मार्कण्डेय पुराण 77-78 (विवस्वान-माहात्म्य) — मत्स्य/विष्णु/भविष्य/हरिवंश समांतर-पाठ (ग्रेड A — विवरण-भेद यथा-स्थान); गायत्री ऋग्वेद 3.62.10 (ग्रेड A); आदित्यहृदय वाल्मीकि युद्धकांड 105 (ग्रेड A; पूर्ण-पाठ D013-नीति से स्थगित); हनुमान-शिष्यत्व D012, कर्ण-कवच महाभारत आरण्य-कर्ण पर्व धाराएँ (ग्रेड A); कोणार्क-मोढेरा-मार्तंड स्थापत्य-इतिहास (ग्रेड B — स्मारक-प्रत्यक्ष); छठ-संक्रांति-रथसप्तमी जीवित पर्व-परंपराएँ (ग्रेड A/B — लोक-प्रत्यक्ष); "आरोग्यं भास्करात्" सूक्ति-परंपरा (ग्रेड B)।

नाम एवं अर्थ

Names
सूर्य
"सृ" गति / "सू" प्रेरणा — सतत गतिमान प्रेरक बिंब।
आदित्य / विवस्वान्
अदिति-पुत्र; प्रकाश-वस्त्र वाले — वैवस्वत मनु के पिता।
सविता
उत्पादक-प्रेरक — गायत्री के अधिष्ठातृ-रूप।
भास्कर / दिवाकर / प्रभाकर
प्रकाश-कर्ता — आरोग्य-धारा के प्रिय नाम।
मार्तण्ड
मृत-अंड से जीवित निकले — अदिति-गर्भ की विलक्षण वैदिक धारा।
ग्रहराज / जगच्चक्षु
नवग्रहों के अधिपति; जगत् के नेत्र (पुरुषसूक्त-धारा: "चक्षोः सूर्यो अजायत")।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ सूर्याय नमः ॥ · ॐ घृणिः सूर्याय नमः ॥ (सौर-परंपरा)

गायत्री महामंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अर्थ: उस सविता देव के वरणीय तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को (सत्-पथ पर) प्रेरित करे। — ऋग्वेद 3.62.10; व्याहृति-सहित संध्या-पाठ रूप।

नवग्रह-स्तोत्र — सूर्य-श्लोक (व्यास-परंपरा)

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

संपूर्ण आदित्यहृदय (31 श्लोक) एवं सूर्याष्टक शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
छठ महापर्व
कार्तिक शुक्ल षष्ठी-सप्तमी — अस्ताचल व उदयाचल दोनों अर्घ्य; बिहार-पूर्वांचल से विश्व तक की महाव्रत-परंपरा।
मकर संक्रांति / पोंगल / उत्तरायण
सौर-पंचांग का अखिल-भारतीय पर्व — तिल-गुड़, पतंग, गंगासागर-स्नान।
रथ सप्तमी
माघ शुक्ल सप्तमी — सूर्य-जयंती; अरुणोदय-स्नान व रथ-आराधना।
रविवार-व्रत / संध्या-अर्घ्य
साप्ताहिक व नित्य विधियाँ — सूर्य-नमस्कार की योग-धारा सहित।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
कोणार्क, ओडिशा
विश्व-धरोहर सूर्य-रथ मंदिर (13वीं शती) — बारह चक्र, सात अश्व, पाषाण में जड़ा पंचांग।
मोढेरा, गुजरात
सोलंकी-कालीन सूर्यकुंड-सभामंडप — विषुव-किरण गर्भगृह-विधान।
मार्तंड, कश्मीर
ललितादित्य-निर्मित (8वीं शती) — ध्वंस में भी भव्य हिमालयी सूर्य-पीठ।
देव (औरंगाबाद, बिहार) आदि छठ-पीठ
देवार्क-लोलार्क-उलार्क सूर्य-मंदिर जाल — छठ-संस्कृति के जीवित केंद्र।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: सूर्यदेव अकेले देवता हैं जो हमें रोज़ दिखाई देते हैं! वे सात घोड़ों के रथ पर चलते हैं, उनके सारथी हैं अरुण। यम, यमुना और शनिदेव उनके बच्चे हैं, और श्रीराम का वंश भी "सूर्यवंश" कहलाता है।

रोचक तथ्य:

  • गायत्री मंत्र सूर्य (सविता) की ही प्रार्थना है।
  • कोणार्क का पूरा मंदिर पत्थर का विशाल रथ है — पहियों से समय भी देखा जा सकता है!
  • छठ पूजा में डूबते सूरज को भी अर्घ्य देते हैं — दुनिया में ऐसा और कहीं नहीं।
  • हनुमान जी ने पढ़ाई सूर्यदेव से ही की थी — उल्टा उड़ते हुए!

सीख: सूरज की तरह बनो — रोज़ समय पर अपना काम, बिना छुट्टी, बिना घमंड; और अपनी चमक से किसी को जलाओ नहीं, उजाला दो।

मिनी क्विज़:

  1. सूर्य के रथ में कितने घोड़े हैं?
  2. उनके सारथी कौन हैं?
  3. शनिदेव की माता कौन हैं?
  4. गायत्री मंत्र किस देवता की स्तुति है?