संज्ञा और छाया — जिस तेज को पत्नी न सह सकी, जगत् कैसे सहे
पृष्ठभूमि — विश्वकर्मा की बेटी का विवाह
देव-शिल्पी विश्वकर्मा (त्वष्टा-धारा) की पुत्री संज्ञा का विवाह साक्षात् सूर्य से हुआ — त्रिलोक की दृष्टि में इससे उज्ज्वल संबंध क्या होता। पर पुराणकार यहाँ वह प्रश्न उठाते हैं जो किसी और देव-दांपत्य में नहीं उठा: तेज की सहनीयता। सूर्य का प्रताप अपार था — समीप जाना तो दूर, आँख भरकर देखना कठिन; संज्ञा पतिव्रता थीं, पर नेत्र हर भेंट में झुक जाते, मुख फिर जाता। वर्षों यह दाह सहते हुए तीन संतानें हुईं — वैवस्वत मनु, यम और यमुना — पर अंततः संज्ञा ने वह निर्णय लिया जो कथा की धुरी है: तप के लिए जाना होगा — इस तेज के योग्य क्षमता अर्जित करने। जाने से पहले उन्होंने अपने ही संकल्प से अपनी प्रतिकृति रची — छाया: रूप वही, स्वभाव वही; आदेश दिया कि मेरी अनुपस्थिति प्रकट न होने पाए, संतानों को माता-वत् पालना। और संज्ञा पिता-गृह होते हुए उत्तर-कुरु के वनों में बडवा (घोड़ी) रूप धरकर तप में लीन हो गईं।
छाया का पक्षपात — शनि का जन्म, यम का शाप
छाया ने पत्नी-धर्म निभाया; उनसे भी संतानें हुईं — सावर्णि मनु, कन्या तपती, और वह पुत्र जिसके जन्म-क्षण से ज्योतिष काँपता है — शनि (D049-क्षेत्र: छाया-सुत, जिनकी दृष्टि-कथाएँ अपने पृष्ठ पर आएँगी)। पर प्रतिकृति आखिर प्रतिकृति थी — अपनी कोख की संतानों पर छाया का पक्ष ढलने लगा। एक दिन किशोर यम से भेद फूट पड़ा: माता की डाँट पर आवेश में उन्होंने चरण उठाया — छाया ने शाप दे डाला: "यह पाँव गिर जाए / कृमि-ग्रस्त हो!" यम स्तब्ध पिता के पास दौड़े — "माता संतान को ऐसा शाप दे ही कैसे सकती है? यह माता नहीं हो सकती!" सूर्य की तेज-दृष्टि ने सत्य निकाल लिया (शाप का परिहार भी पिता ने किया — कृमि पाद-रज लेकर संतुष्ट होंगे, चरण बचेगा: दंड रहा, विनाश नहीं)। छाया से सत्य उगलवाया गया — और तब सूर्य को पता चला कि जिसे वे वर्षों पत्नी समझते रहे, वह पत्नी की परछाईं थी; संज्ञा तो तप में है — उनके ही ताप से भागी हुई। क्रोध से अधिक जो भाव पुराणकार सूर्य में दिखाते हैं, वह विषाद है: प्रिय को मेरा प्रकाश ही असह्य था, और मुझे भान तक न हुआ।
विश्वकर्मा की खराद — तेज का संस्कार
सूर्य ससुर-गृह पहुँचे। विश्वकर्मा ने वह प्रस्ताव रखा जो इस कथा को विश्व-कथा-कोश में अद्वितीय बनाता है — "तेज कम कीजिए, जामाता। संबंध सहनीयता माँगते हैं।" और सूर्य मान गए — देवता ने अपनी चमक घटवाना स्वीकार किया! विश्वकर्मा ने उन्हें अपनी खराद (भ्रमि-यंत्र) पर चढ़ाया और प्रताप का अष्टमांश छाँट दिया। छीलन व्यर्थ नहीं गई — उसी छटे हुए तेज से देव-आयुधों का वह शस्त्रागार गढ़ा गया जिस पर पिछले पृष्ठ टिके हैं: विष्णु का सुदर्शन चक्र (D002), शिव का त्रिशूल (D003), कुबेर की गदा-पालकी धाराएँ, कार्तिकेय की शक्ति (D005) — अर्थात् जगत् की रक्षा-शक्तियाँ सूर्य के त्यागे हुए ताप से बनीं। फिर वे बडवा-रूपा संज्ञा के पास पहुँचे — स्वयं अश्व-रूप धरकर; उस पुनर्मिलन से जुड़वाँ अश्विनीकुमार जन्मे (देव-वैद्य — नासत्य-दस्र), और रेवंत भी। दंपती लौटे — अब वह दाह नहीं, दीप्ति थी: जिसे देखा जा सके, जिया जा सके। कथा का व्याकरण देखिए — समस्या पत्नी का पलायन नहीं कही गई, तेज की अ-संस्कारित अति कही गई; और समाधान तप (संज्ञा का) + संस्कार (सूर्य का) — दोनों पक्षों का श्रम। दांपत्य-दर्शन पर पुराणों का इससे परिपक्व वाक्य दुर्लभ है: प्रेम में समर्थ को अपनी धार घिसवानी पड़ती है, और सहने वाले को अपनी क्षमता तपानी — तब कहीं परछाइयों की जगह असली लोग लौटते हैं।
गायत्री से आदित्यहृदय तक — उपासना की दो धुरियाँ
सूर्य-उपासना की पहली धुरी वैदिक है — गायत्री (ऋग्वेद 3.62.10): "उस सविता देव के वरणीय भर्ग (तेज) का हम ध्यान करें, जो हमारी धियों (बुद्धियों) को प्रेरित करे।" ध्यान दें — माँग प्रकाश की नहीं, प्रेरणा की है: बाहर का सूर्य भीतर की धी जगाए, यही इस महामंत्र की प्रार्थना-दिशा है; संध्योपासना का त्रिकाल-अर्घ्य इसी का विधि-शरीर है। दूसरी धुरी महाकाव्यों की है — युद्धभूमि में थके राम को अगस्त्य ऋषि ने जो स्तोत्र दिया (वाल्मीकि युद्धकांड — रावण-वध पूर्व), वह आदित्यहृदय आज भी संकट-पाठ का प्रथम नाम है: "जो सब देवताओं का समष्टि-रूप है, उस जगत् के हृदय आदित्य को नमन कर — विजय निश्चित है" (पूर्ण-पाठ मंत्र-सूचकांक विस्तार में — D013-नीति)। इसी दरबार के दो शिष्य-पुत्र पूर्व-पृष्ठों से परिचित हैं — उलटे उड़कर व्याकरण पढ़ने वाले शिष्य हनुमान (D012), और कवच-कुंडल दान कर देने वाला पुत्र कर्ण (जिसे पिता ने इन्द्र-छल की पूर्व-सूचना भी दी थी — पुत्र-मोह और दान-धर्म का वह द्वंद्व महाभारत की विभूति है); सुग्रीव-अंश धारा रामायण-पक्ष की है। और मानव-वंशावली में वैवस्वत मनु से चला सूर्यवंश — इक्ष्वाकु, हरिश्चंद्र (D042-कथा!), भगीरथ, रघु, राम — भारतीय राज-आदर्श की मुख्य रेखा इसी पिता के नाम चलती है।
पत्थर के रथ, नदियों के अर्घ्य — जीवित सूर्य-भूगोल
सूर्य-उपासना का स्थापत्य-गौरव विश्व-धरोहर है — कोणार्क (ओडिशा, 13वीं शती): पूरा मंदिर ही सप्ताश्व-रथ है — बारह जोड़ी उत्कीर्ण चक्र (मास/पक्ष), जिनकी छायाएँ धूप-घड़ी तक का काम देती हैं; मोढेरा (गुजरात, सोलंकी-काल) का सूर्यकुंड-सभामंडप विषुव-सूर्य को गर्भगृह तक उतारता था; कश्मीर का मार्तंड ध्वंसावशेष में भी सम्राट है; और बिहार-झारखंड-पूर्वांचल का देव-औंगारी जैसा सूर्य-मंदिर जाल छठ-संस्कृति की रीढ़। पर्व-पंचांग में वे सबसे व्यापक देवता हैं — मकर संक्रांति/पोंगल (उत्तरायण-आरंभ: पूरे देश के नाम अलग, अर्घ्य एक), रथ सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी — सूर्य-जयंती: रथ मुड़ने का पर्व), रविवार-व्रत, और महापर्व छठ — जिसकी विलक्षणता यह कि अर्घ्य पहले अस्ताचल सूर्य को जाता है: थके, डूबते, "पदच्युत" होते देवता की पूजा — विश्व की उपासना-परंपराओं में अकेली; लोक ने उसमें वही संज्ञा-कथा वाली करुणा पढ़ी है — तेज का नहीं, तेजस्वी का संबंध निभाया जाता है, उदय में भी, अस्त में भी। योग-परंपरा का सूर्य नमस्कार (द्वादश आसन-द्वादश नाम) इस उपासना का देह-संस्करण है — और आधुनिक विश्व-योग दिवस तक उसकी किरण पहुँची है।
आध्यात्मिक अर्थ — भीतर का सविता
सूर्य-तत्त्व के पाठ प्रातः जितने नियमित हैं। पहला — नियमितता ही दिव्यता है: इस देवता ने सृष्टि से आज तक एक भी अनुपस्थिति नहीं ली; साधक के लिए सूर्योदय नित्य-उपदेश है कि महानता कोई विस्फोट नहीं, अखंड आवृत्ति है। दूसरा — तेज-संस्कार: संज्ञा-कथा हर प्रतिभाशाली का दर्पण है — क्षमता यदि संबंधों को झुलसाए तो वह वरदान नहीं रही; विश्वकर्मा की खराद स्वीकारना (प्रतिपुष्टि, विनम्रता, मर्यादा) तेजस्वी का धर्म है — और छँटा हुआ तेज व्यर्थ नहीं जाता, सुदर्शन बनता है: संयम ही शक्ति का सर्वोत्तम पुनर्नियोजन है। तीसरा — छाया-विवेक: जो अति-ताप से भागता है, वह अपनी जगह परछाईं छोड़ जाता है — घर हों या संस्थाएँ, जहाँ वास्तविक उपस्थिति असह्य वातावरण से पलायन कर जाए, वहाँ छायाएँ पलती हैं और पक्षपात जन्मता है; समाधान वही पुराण-सूत्र — वातावरण सहनीय बनाओ, असली लोग लौट आएँगे। और चौथा — गायत्री-दिशा: सूर्य से माँगना हो तो धूप मत माँगो, धी माँगो — "धियो यो नः प्रचोदयात्"; बाहर का प्रकाश तो अनुदान है, भीतर की प्रेरणा उपलब्धि: जिस दिन भीतर का सविता उगता है, उस दिन साधक स्वयं किसी का प्रभात बन जाता है।