सत्ताईस में एक — दक्ष-शाप, क्षय और सोमनाथ का पुनरुदय
पृष्ठभूमि — सत्ताईस विवाह, एक अनुराग
प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ — अश्विनी से रेवती तक, आकाश के सत्ताईस नक्षत्र — एक ही वर को ब्याहीं: चन्द्र। विधान सुंदर था — देवता प्रत्येक रात्रि एक पत्नी के भवन में रहेंगे; सत्ताईस रातों का यह परिक्रमा-पथ ही चांद्र-मास बना, और आज भी पंचांग कहता है "चंद्रमा आज रोहिणी में हैं, कल मृगशिरा में..." — ज्योतिष की भाषा में वह प्राचीन गृहस्थ-व्यवस्था जीवित है। पर विधान और हृदय में वही पुराना अंतर निकला — रोहिणी के रूप-गुण में रमे चन्द्र वहीं-वहीं लौटने लगे; शेष छब्बीस भवनों में प्रतीक्षा दीर्घ होती गई। व्यथित बहनें पिता के पास गईं। दक्ष ने पहले समझाया — जामाता ने वचन दिए; फिर वही क्रम, वही शिकायत, दूसरी चेतावनी... और तीसरी बार प्रजापति का धैर्य टूट गया: शाप फूटा — "क्षयी हो जा!" जिस अमृत-बिंब से जगत् रस पाता था, वह राजयक्ष्मा-ग्रस्त सा दिन-प्रतिदिन घटने लगा।
क्षय — जब चाँद डूबने लगा तो धरती सूखने लगी
शाप का परिणाम अकेले शापित तक नहीं रुका — यही इस कथा की पारिस्थितिक दृष्टि है। चन्द्र घटे तो ओषधियाँ रस खोने लगीं, वनस्पति म्लान, यज्ञ-सोम अनुपलब्ध, ज्वार शिथिल, प्राणियों के मन अवसन्न — देवताओं तक का अमृत-भाग संकट में। त्रिलोक ने अनुभव किया कि यह "एक पति की सजा" नहीं, विश्व-रस-तंत्र का अवरोध है। देव-ऋषि दक्ष के पास लौटे — शाप-मोचन का अनुरोध; प्रजापति ने असमर्थता कही (क्रोध-वाणी लौटती नहीं) पर मार्ग खोला: पूर्ण नाश नहीं होगा — और मुक्ति-उपाय शिव-शरण में है। तब क्षीण-कला चन्द्र प्रभास-क्षेत्र (सौराष्ट्र-तट) पहुँचे और सरस्वती-सागर संगम पर महामृत्युंजय-अनुष्ठान में बैठे — धाराओं में दस करोड़ जप की तप-गणना है। महादेव प्रकट हुए, और समाधान वह निकला जो भारतीय संतुलन-बुद्धि का हस्ताक्षर है: शाप मिटेगा नहीं — लय बनेगा: पक्ष-भर क्षय, पक्ष-भर वृद्धि; अमावस्या तक उतरोगे, पूर्णिमा तक लौटोगे। और सुरक्षा ऐसी कि क्षय की पहुँच से परे — शिव ने घटती हुई द्वितीया-कला को अपने शीश पर धारण कर लिया: चंद्रशेखर (D003)! जो एक पत्नी-प्रसंग में डूबा था, वह महादेव के मस्तक पर अडूब हो गया। कृतज्ञ चन्द्र (सोम) ने वहीं अपने नाथ का ज्योतिर्लिंग स्थापित किया — सोमनाथ: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम, जिसका यजमान-नाम ही कथा है — "सोम के नाथ"। इतिहास ने इस मंदिर को बार-बार टूटते और हर बार फिर उठते देखा — भक्त-दृष्टि कहती है कि जिस पीठ की जन्म-कथा ही "घटकर फिर बढ़ने" की हो, उसे मिटाया कैसे जा सकता था: सोमनाथ स्वयं अपनी कथा का प्रमाण है।
गणेश-दृष्टि और तारा-प्रकरण — सौंदर्य के दो स्खलन
चन्द्र-चरित के दो और प्रसंग उनके स्वभाव-चाप को पूरा करते हैं। पहला D004 पर पूर्व-कथित है — गणेश-शाप: मूषक-वाहन से गिरे लंबोदर पर चाँदनी-हँसी हँसने का दंड — "जो तुझे देखेगा, कलंक पाएगा"; देव-प्रार्थना पर परिहार हुआ केवल भाद्रपद चतुर्थी के दर्शन-निषेध तक, और साथ में विधान कि उसी चतुर्थी को गणेश-दर्शन व स्यमंतक-कथा श्रवण कलंक धो देगा (स्यमंतक-सूत्र D014-द्वारका प्रकरण से जुड़ता है)। सौंदर्य जब दूसरों की देह पर हँसता है, तो अपने बिंब पर कलंक पाता है — शाप का यह व्याकरण सीधा है। दूसरा प्रकरण गुरु-गृह का है (भागवत 9.14 — विस्तार D046/D047 पर): देव-गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा चन्द्र-तेज पर मोहित होकर उनके भवन चली गईं; लौटाने से इनकार पर देव-दानव तक बँट गए (शुक्र-पक्ष चन्द्र के साथ — गुरु-प्रतिद्वंद्विता!), "तारकामय संग्राम" छिड़ा; ब्रह्मा ने विराम कराया, तारा लौटीं — पर गर्भवती। जन्मा तेजस्वी पुत्र, और ब्रह्मा के सम्मुख तारा के सत्य-वचन से पितृत्व चन्द्र का ठहरा — वही बुध (D046), जिनके पुत्र पुरूरवा से चंद्रवंश चला। पुराणकार यहाँ भी दुहरी लेखनी चलाते हैं — प्रकरण की निंदा दर्ज है (चन्द्र का गुरु-तल्प दोष), पर परिणाम-वंश की गरिमा भी: नीति और नियति की यह उलझी बुनावट महाकाव्य-सत्य है, आदर्श-पत्रक नहीं; इस ज्ञानकोश की रीति में दोनों धागे खुले रखे गए हैं।
कला-दर्शन — घटना भी विधान है
शाप-कथा का शिव-समाधान भारतीय काल-दर्शन की कुंजी बन गया। सोलह कलाओं का चक्र — पूर्णिमा की षोडश-कला पूर्णता से अमावस्या के बिंदु-शेष तक, और वापस — तिथि-गणना का आधार है: प्रतिपदा से चतुर्दशी तक हर तिथि एक कला का चढ़ना-उतरना है; व्रत-पर्वों का समूचा पंचांग (एकादशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या...) इसी देवता की साँस पर चलता है। उपनिषद्-धारा (बृहदारण्यक-छांदोग्य की चंद्र-यान श्रुतियाँ) पितृ-यान मार्ग को चंद्र-लोक से जोड़ती है — जीव-रस का लौटना-बरसना भी सोम-चक्र है; आयुर्वेद औषधि-संग्रह में चंद्र-कला देखता आया, कृषि-लोक बुवाई में, और सागर-तट का हर मछुआरा ज्वार-गणना में। "सोम" शब्द की द्वि-अर्थता यहाँ फिर स्मरणीय है — वैदिक सोम-लता (यज्ञ-रस) और चंद्र-सोम का एकीकरण पाठ-इतिहास की परत है (ग्रेड-A स्तर-टिप्पणी): पर दोनों का मर्म एक — रस; चन्द्र वही देवता हैं जो सृष्टि की रस-व्यवस्था चलाते हैं — वनस्पति में स्वाद, ओषधि में वीर्य, मन में भाव, काव्य में शृंगार। इसीलिए कवि-परंपरा ने मुख की उपमा से लेकर "चंद्रमुखी" तक उन्हीं का कोष लूटा, और माताएँ आज भी शिशु को "चंदा मामा" से बहलाती हैं — मामा! — क्योंकि लक्ष्मी (D007) मंथन-धारा में उनकी बहन हैं: देव-मंडल का यह इकलौता "मामा-पद" लोक ने कितनी सटीक वंशावली से दिया है।
आध्यात्मिक अर्थ — मन की कलाएँ
चन्द्र-कथा वस्तुतः मन-कथा है — पुरुषसूक्त ने समीकरण पहले ही दे दिया था। पहला पाठ — पक्षपात का क्षय: मन (चन्द्र) जब सत्ताईस कर्तव्य-भवनों में से केवल प्रिय-रुचि (रोहिणी) चुनता है, तो जीवन-संतुलन का दक्ष रुष्ट होता है — क्षय आरंभ; समता ही मन का स्वास्थ्य है। दूसरा — शिव-आश्रय: डूबते मन की चिकित्सा दमन नहीं, समर्पण है — जो मन महादेव के शीश (उच्च-चेतना) पर टिक जाए, वह घटता हुआ भी नष्ट नहीं होता; ध्यान-परंपरा में भ्रू-मध्य ऊपर की चंद्र-कला (सोम-चक्र) की कल्पना यही सूत्र है। तीसरा — लय-स्वीकार: शाप को विधान में बदलना — पूर्ण मिटान नहीं, आवर्तन — भारतीय मनोविज्ञान की गहरी देन है: मन के भी पक्ष होते हैं, उतार स्थायी नहीं; अमावस्या के साधक को पूर्णिमा का वचन मिला हुआ है — बस चढ़ाव का क्रम (प्रतिपदा-प्रतिपदा) धैर्य से चढ़ना है। और चौथा — रस-धर्म: चन्द्र होना अर्थात शीतल करना — जो व्यक्तित्व अपने संपर्क में आए मनों को चाँदनी-सा शीतलता दे, वही चंद्र-बल का सच्चा धनी है; ज्योतिष के उपाय (सोमवार-व्रत, श्वेत-दान, मोती) बाहरी विधियाँ हैं — भीतरी विधि एक ही है: वाणी-व्यवहार में कौमुदी। घटो तो प्रभास-तट याद रखना, बढ़ो तो गणेश-प्रसंग — यही चन्द्रमा की दोनों कलाओं का उपदेश है।