देव चन्द्र

Chandra · सोम · नक्षत्रेश · औषधीश · मनो-देवता

मन जिनसे जन्मा ("चन्द्रमा मनसो जातः"), औषधियाँ जिनसे रस पाती हैं, और ज्वार जिनके इशारे पर उठते हैं। घटने-बढ़ने के शाप को जिन्होंने शिव-शरण से जीवन-लय बना लिया — वह घटता-बढ़ता अमर देवता।

श्रेणी: नवग्रह-द्वितीय · सोम-देव पत्नियाँ: 27 नक्षत्र (दक्ष-कन्याएँ) वार: सोमवार · वाहन: मृग-रथ पर्व: शरद-कोजागरी · करवा चौथ
प्रमुख कथा पढ़ें
मनो-देवपुरुषसूक्त-प्रमाणित मन-अधिष्ठाता
कला-निधिसोलह कलाओं का घट-बढ़ चक्र
औषधीशवनस्पति-रस के पोषक राजा
सोमनाथ-स्थापकप्रथम ज्योतिर्लिंग के आदि-यजमान

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

चन्द्र भारतीय देव-मंडल के सबसे कोमल — और सबसे "मानवीय" — देवता हैं: सुंदर, रसिक, भावुक, पक्षपाती, दंडित, क्षमा-प्राप्त और पुनः प्रतिष्ठित। वैदिक स्तर पर "सोम" मुख्यतः वह यज्ञ-रस (सोम-लता का अभिषुत पेय) है जिसे ऋग्वेद का पूरा नौवाँ मंडल गाता है; उत्तर-वैदिक काल में यह सोम-तत्व आकाश के अमृत-कलश — चंद्रमा — से एकीभूत हो गया (यह पाठ-यात्रा स्तर-भेद सहित यहाँ दर्ज है): देवता जिसका पान करते हैं, वह अमृत-पात्र शुक्ल-पक्ष में भरता और कृष्ण-पक्ष में पिया जाता है — कला-चक्र की यह वैदिक-कल्पना ही आगे शाप-कथा का बीज बनी। पुरुषसूक्त ने उन्हें वह पद दिया जो ज्योतिष का आधार-स्तंभ है — विराट पुरुष के मन से चन्द्रमा जन्मे: तभी से मन की हर बात "चंद्र" की भाषा में कही जाती है — मन की स्थिरता चंद्र-बल, मन की डाँवाडोली चंद्र-दोष।

स्वरूप: श्वेत-कांति, दस श्वेत अश्वों (या मृग-युग्म) का रथ, कर में कौमुदी-कलश/गदा-वरद, शीश पर... स्वयं शिव के शीश पर वे हैं (D003 — चंद्रशेखर!)। पद-सूची लंबी है — नक्षत्रों के पति (सत्ताईस दक्ष-कन्याएँ), औषधियों-वनस्पतियों के राजा (ओषधीश — रस-पोषण उन्हीं की किरणों से), ब्राह्मण... द्विज-राज, ज्वार-नियंता, सोमवार के स्वामी, और नवग्रह-मंडल में मन-माता के कारक। रोचक वंश-सूत्र: बुध (D046) उनके पुत्र हैं — और उस विवादित तारा-प्रकरण से चंद्रवंश चला, जिसकी संतति में कृष्ण-पांडव तक आते हैं; अर्थात भारतीय महाकाव्यों के दोनों महावंश सूर्य (D043) और चन्द्र — इन्हीं दो ग्रह-पिताओं की रेखाएँ हैं।

परिवार एवं संबंध

Family
  • जन्म-धाराएँअत्रि-अनसूया पुत्र (पौराणिक प्रधान); समुद्र-मंथन रत्न-धारा (D002/D017); विराट-मन से (पुरुषसूक्त)
  • पत्नियाँसत्ताईस नक्षत्र-कन्याएँ (दक्ष-पुत्रियाँ) — रोहिणी प्रिय-पट्टरानी
  • पुत्रबुध (D046) — तारा-प्रकरण से (कथा में); वर्चस्-धाराएँ
  • वंशचंद्रवंश — बुध→पुरूरवा से ययाति-कुरु-यदु तक (D014/D024 वंश-मूल)
  • शरण-गुरुशिव (D003) — शाप-मोचन व शीश-धारण; प्रकरण-गुरु बृहस्पति (D047) से तारा-विवाद
  • ग्रह-पदनवग्रह-द्वितीय; सोमवार-स्वामी; कर्क राशि के अधिपति

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

सत्ताईस में एक — दक्ष-शाप, क्षय और सोमनाथ का पुनरुदय

पृष्ठभूमि — सत्ताईस विवाह, एक अनुराग

प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ — अश्विनी से रेवती तक, आकाश के सत्ताईस नक्षत्र — एक ही वर को ब्याहीं: चन्द्र। विधान सुंदर था — देवता प्रत्येक रात्रि एक पत्नी के भवन में रहेंगे; सत्ताईस रातों का यह परिक्रमा-पथ ही चांद्र-मास बना, और आज भी पंचांग कहता है "चंद्रमा आज रोहिणी में हैं, कल मृगशिरा में..." — ज्योतिष की भाषा में वह प्राचीन गृहस्थ-व्यवस्था जीवित है। पर विधान और हृदय में वही पुराना अंतर निकला — रोहिणी के रूप-गुण में रमे चन्द्र वहीं-वहीं लौटने लगे; शेष छब्बीस भवनों में प्रतीक्षा दीर्घ होती गई। व्यथित बहनें पिता के पास गईं। दक्ष ने पहले समझाया — जामाता ने वचन दिए; फिर वही क्रम, वही शिकायत, दूसरी चेतावनी... और तीसरी बार प्रजापति का धैर्य टूट गया: शाप फूटा — "क्षयी हो जा!" जिस अमृत-बिंब से जगत् रस पाता था, वह राजयक्ष्मा-ग्रस्त सा दिन-प्रतिदिन घटने लगा।

क्षय — जब चाँद डूबने लगा तो धरती सूखने लगी

शाप का परिणाम अकेले शापित तक नहीं रुका — यही इस कथा की पारिस्थितिक दृष्टि है। चन्द्र घटे तो ओषधियाँ रस खोने लगीं, वनस्पति म्लान, यज्ञ-सोम अनुपलब्ध, ज्वार शिथिल, प्राणियों के मन अवसन्न — देवताओं तक का अमृत-भाग संकट में। त्रिलोक ने अनुभव किया कि यह "एक पति की सजा" नहीं, विश्व-रस-तंत्र का अवरोध है। देव-ऋषि दक्ष के पास लौटे — शाप-मोचन का अनुरोध; प्रजापति ने असमर्थता कही (क्रोध-वाणी लौटती नहीं) पर मार्ग खोला: पूर्ण नाश नहीं होगा — और मुक्ति-उपाय शिव-शरण में है। तब क्षीण-कला चन्द्र प्रभास-क्षेत्र (सौराष्ट्र-तट) पहुँचे और सरस्वती-सागर संगम पर महामृत्युंजय-अनुष्ठान में बैठे — धाराओं में दस करोड़ जप की तप-गणना है। महादेव प्रकट हुए, और समाधान वह निकला जो भारतीय संतुलन-बुद्धि का हस्ताक्षर है: शाप मिटेगा नहीं — लय बनेगा: पक्ष-भर क्षय, पक्ष-भर वृद्धि; अमावस्या तक उतरोगे, पूर्णिमा तक लौटोगे। और सुरक्षा ऐसी कि क्षय की पहुँच से परे — शिव ने घटती हुई द्वितीया-कला को अपने शीश पर धारण कर लिया: चंद्रशेखर (D003)! जो एक पत्नी-प्रसंग में डूबा था, वह महादेव के मस्तक पर अडूब हो गया। कृतज्ञ चन्द्र (सोम) ने वहीं अपने नाथ का ज्योतिर्लिंग स्थापित किया — सोमनाथ: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम, जिसका यजमान-नाम ही कथा है — "सोम के नाथ"। इतिहास ने इस मंदिर को बार-बार टूटते और हर बार फिर उठते देखा — भक्त-दृष्टि कहती है कि जिस पीठ की जन्म-कथा ही "घटकर फिर बढ़ने" की हो, उसे मिटाया कैसे जा सकता था: सोमनाथ स्वयं अपनी कथा का प्रमाण है।

गणेश-दृष्टि और तारा-प्रकरण — सौंदर्य के दो स्खलन

चन्द्र-चरित के दो और प्रसंग उनके स्वभाव-चाप को पूरा करते हैं। पहला D004 पर पूर्व-कथित है — गणेश-शाप: मूषक-वाहन से गिरे लंबोदर पर चाँदनी-हँसी हँसने का दंड — "जो तुझे देखेगा, कलंक पाएगा"; देव-प्रार्थना पर परिहार हुआ केवल भाद्रपद चतुर्थी के दर्शन-निषेध तक, और साथ में विधान कि उसी चतुर्थी को गणेश-दर्शन व स्यमंतक-कथा श्रवण कलंक धो देगा (स्यमंतक-सूत्र D014-द्वारका प्रकरण से जुड़ता है)। सौंदर्य जब दूसरों की देह पर हँसता है, तो अपने बिंब पर कलंक पाता है — शाप का यह व्याकरण सीधा है। दूसरा प्रकरण गुरु-गृह का है (भागवत 9.14 — विस्तार D046/D047 पर): देव-गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा चन्द्र-तेज पर मोहित होकर उनके भवन चली गईं; लौटाने से इनकार पर देव-दानव तक बँट गए (शुक्र-पक्ष चन्द्र के साथ — गुरु-प्रतिद्वंद्विता!), "तारकामय संग्राम" छिड़ा; ब्रह्मा ने विराम कराया, तारा लौटीं — पर गर्भवती। जन्मा तेजस्वी पुत्र, और ब्रह्मा के सम्मुख तारा के सत्य-वचन से पितृत्व चन्द्र का ठहरा — वही बुध (D046), जिनके पुत्र पुरूरवा से चंद्रवंश चला। पुराणकार यहाँ भी दुहरी लेखनी चलाते हैं — प्रकरण की निंदा दर्ज है (चन्द्र का गुरु-तल्प दोष), पर परिणाम-वंश की गरिमा भी: नीति और नियति की यह उलझी बुनावट महाकाव्य-सत्य है, आदर्श-पत्रक नहीं; इस ज्ञानकोश की रीति में दोनों धागे खुले रखे गए हैं।

कला-दर्शन — घटना भी विधान है

शाप-कथा का शिव-समाधान भारतीय काल-दर्शन की कुंजी बन गया। सोलह कलाओं का चक्र — पूर्णिमा की षोडश-कला पूर्णता से अमावस्या के बिंदु-शेष तक, और वापस — तिथि-गणना का आधार है: प्रतिपदा से चतुर्दशी तक हर तिथि एक कला का चढ़ना-उतरना है; व्रत-पर्वों का समूचा पंचांग (एकादशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या...) इसी देवता की साँस पर चलता है। उपनिषद्-धारा (बृहदारण्यक-छांदोग्य की चंद्र-यान श्रुतियाँ) पितृ-यान मार्ग को चंद्र-लोक से जोड़ती है — जीव-रस का लौटना-बरसना भी सोम-चक्र है; आयुर्वेद औषधि-संग्रह में चंद्र-कला देखता आया, कृषि-लोक बुवाई में, और सागर-तट का हर मछुआरा ज्वार-गणना में। "सोम" शब्द की द्वि-अर्थता यहाँ फिर स्मरणीय है — वैदिक सोम-लता (यज्ञ-रस) और चंद्र-सोम का एकीकरण पाठ-इतिहास की परत है (ग्रेड-A स्तर-टिप्पणी): पर दोनों का मर्म एक — रस; चन्द्र वही देवता हैं जो सृष्टि की रस-व्यवस्था चलाते हैं — वनस्पति में स्वाद, ओषधि में वीर्य, मन में भाव, काव्य में शृंगार। इसीलिए कवि-परंपरा ने मुख की उपमा से लेकर "चंद्रमुखी" तक उन्हीं का कोष लूटा, और माताएँ आज भी शिशु को "चंदा मामा" से बहलाती हैं — मामा! — क्योंकि लक्ष्मी (D007) मंथन-धारा में उनकी बहन हैं: देव-मंडल का यह इकलौता "मामा-पद" लोक ने कितनी सटीक वंशावली से दिया है।

आध्यात्मिक अर्थ — मन की कलाएँ

चन्द्र-कथा वस्तुतः मन-कथा है — पुरुषसूक्त ने समीकरण पहले ही दे दिया था। पहला पाठ — पक्षपात का क्षय: मन (चन्द्र) जब सत्ताईस कर्तव्य-भवनों में से केवल प्रिय-रुचि (रोहिणी) चुनता है, तो जीवन-संतुलन का दक्ष रुष्ट होता है — क्षय आरंभ; समता ही मन का स्वास्थ्य है। दूसरा — शिव-आश्रय: डूबते मन की चिकित्सा दमन नहीं, समर्पण है — जो मन महादेव के शीश (उच्च-चेतना) पर टिक जाए, वह घटता हुआ भी नष्ट नहीं होता; ध्यान-परंपरा में भ्रू-मध्य ऊपर की चंद्र-कला (सोम-चक्र) की कल्पना यही सूत्र है। तीसरा — लय-स्वीकार: शाप को विधान में बदलना — पूर्ण मिटान नहीं, आवर्तन — भारतीय मनोविज्ञान की गहरी देन है: मन के भी पक्ष होते हैं, उतार स्थायी नहीं; अमावस्या के साधक को पूर्णिमा का वचन मिला हुआ है — बस चढ़ाव का क्रम (प्रतिपदा-प्रतिपदा) धैर्य से चढ़ना है। और चौथा — रस-धर्म: चन्द्र होना अर्थात शीतल करना — जो व्यक्तित्व अपने संपर्क में आए मनों को चाँदनी-सा शीतलता दे, वही चंद्र-बल का सच्चा धनी है; ज्योतिष के उपाय (सोमवार-व्रत, श्वेत-दान, मोती) बाहरी विधियाँ हैं — भीतरी विधि एक ही है: वाणी-व्यवहार में कौमुदी। घटो तो प्रभास-तट याद रखना, बढ़ो तो गणेश-प्रसंग — यही चन्द्रमा की दोनों कलाओं का उपदेश है।

स्रोत टिप्पणी: सत्ताईस-विवाह व दक्ष-शाप महाभारत शल्य पर्व 35-धारा/पद्म-स्कंद पाठ (ग्रेड A — विवरण-भेद यथा-स्थान); सोमनाथ-स्थापना स्कंद पुराण प्रभास-खंड + जीवित ज्योतिर्लिंग-परंपरा (ग्रेड A/B); चंद्रशेखर-धारण D003-संगत; गणेश-शाप D004 पूर्व-दर्ज (स्यमंतक-सूत्र D014); तारा-बुध भागवत 9.14 (ग्रेड A — D046/D047 पूरक-विभाजन); पुरुषसूक्त 10.90.13, सोम-मंडल स्तर-टिप्पणी (ग्रेड A); कला-तिथि विधान ज्योतिष-सामान्य (ग्रेड A — जीवित पंचांग); चंद्र-यान श्रुति बृहदारण्यक 6.2/छांदोग्य 5.10 (ग्रेड A)।

नाम एवं अर्थ

Names
चन्द्र
"चदि" आह्लाद — आह्लादित करने वाला बिंब।
सोम
रस/अमृत-तत्व — वैदिक सोम-धारा से एकीभूत नाम।
नक्षत्रेश / उडुपति
नक्षत्रों-तारों के पति-स्वामी।
ओषधीश
औषधि-वनस्पतियों के राजा — रस-पोषक।
शशांक / मृगांक
शश (खरगोश) चिह्न वाले — बिंब-कलंक की काव्य-दृष्टि।
द्विजराज / निशाकर
द्विजों (ब्राह्मण-वर्ग/पक्षियों) के राजा; रात्रि-कर्ता।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ चन्द्राय नमः ॥ · ॐ सोमाय नमः ॥

पुरुषसूक्त-प्रमाण

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥

अर्थ: (विराट पुरुष के) मन से चन्द्रमा जन्मे, चक्षु से सूर्य; मुख से इन्द्र और अग्नि, प्राण से वायु। — ऋग्वेद 10.90.13।

नवग्रह-स्तोत्र — चन्द्र-श्लोक (व्यास-परंपरा)

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥

अर्थ: दही-शंख-हिम सी आभा वाले, क्षीरसागर से उद्भूत, शिव-मुकुट के भूषण शशि सोम को मैं प्रणाम करता हूँ।

पर्व एवं व्रत

Festivals
शरद पूर्णिमा / कोजागरी
आश्विन पूर्णिमा — षोडश-कला पूर्ण चन्द्र; अमृत-खीर की रात्रि (D007-संग पूर्व-दर्ज)।
करवा चौथ / संकष्टी-चंद्रोदय
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का सुहाग-व्रत — चंद्र-अर्घ्य से पारण; मासिक संकष्टी भी चंद्रोदय-बद्ध (D004)।
सोमवार / सोमवती अमावस्या
चंद्र-वार की शिव-चंद्र युग्म उपासना; सोमवारी अमावस्या का विशेष स्नान-दान।
ईद-पूर्णिमा पंचांग-टिप्पणी
तिथि-व्रतों का समूचा हिंदू पंचांग चांद्र-गणना पर — हर तिथि-पर्व परोक्षतः चन्द्र-पर्व है।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
सोमनाथ, प्रभास (गुजरात)
प्रथम ज्योतिर्लिंग — चन्द्र-स्थापित; बार-बार ध्वंस, हर बार पुनरुदय: कथा का जीवित प्रमाण।
तिंगलूर (तमिलनाडु)
नवग्रह-स्थलों में चन्द्र-क्षेत्र (कैलासनाथर्) — चंद्र-दोष शांति पीठ।
नवग्रह-मंडप सर्वत्र
हर नवग्रह-वेदी में सूर्य के आग्नेय... पूर्व-मंडल में चन्द्र-स्थान — दैनिक दर्शन-जाल।
चंद्रशेखर-रूप D003
हर शिव-विग्रह का शीश-चंद्र चन्द्रदेव का स्थायी "मंदिर" है — शरणागति की मूर्त स्मृति।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: चंदा मामा सिर्फ कविता नहीं — चन्द्रदेव मन के देवता हैं! उन्हें एक शाप से घटने की बीमारी लगी, पर शिवजी ने उन्हें अपने सिर पर सजा लिया — तब से चाँद पंद्रह दिन घटता है, पंद्रह दिन बढ़ता है, पर कभी खत्म नहीं होता।

रोचक तथ्य:

  • चन्द्रदेव की 27 पत्नियाँ आकाश के 27 नक्षत्र हैं।
  • गुजरात का सोमनाथ मंदिर चन्द्रदेव ने ही बनवाया था — पहला ज्योतिर्लिंग!
  • चाँद "मामा" इसलिए — समुद्र-मंथन में लक्ष्मी जी उनकी बहन हुईं।
  • करवा चौथ का व्रत चाँद देखकर ही खुलता है।

सीख: बुरा समय चाँद के घटने जैसा है — रुकता नहीं, लौटता है; और सबसे बराबर प्यार करो, पक्षपात से चमक घटती है।

मिनी क्विज़:

  1. चन्द्रदेव को शाप किसने दिया?
  2. उन्हें किसने बचाया और कैसे?
  3. उन्होंने कौन-सा प्रसिद्ध मंदिर स्थापित किया?
  4. चन्द्र किसके अधिष्ठाता (मालिक) हैं — शरीर का कौन-सा हिस्सा?