पहले शब्द का देवता — वेदी से खांडव-वन तक
पृष्ठभूमि — डाकिये के बिना देवलोक गूँगा है
वैदिक विश्व-चित्र में मनुष्य और देवता दो किनारे हैं — और उनके बीच संदेश-सेतु एक ही: अग्नि। हवि मनुष्य चढ़ाता है, भोग देवता पाते हैं — बीच का परिवहन अग्नि-जिह्वा करती है; इसीलिए ऋग्वेद का पहला सूक्त उन्हें "पुरोहित, यज्ञ के देव, ऋत्विज, होता और रत्नधातम (श्रेष्ठ रत्न-दाता)" कहकर वंदन करता है। "जातवेदस्" उनकी गहरी उपाधि है — जो हर जन्मे हुए (जात) को जानता है: घर-घर के चूल्हे में बैठा वह देवता हर परिवार की तीन पीढ़ियों का साक्षी है, इसीलिए वैदिक कवि उसे "अतिथि" और "गृहपति" — दोनों कहते हैं। दार्शनिक सौंदर्य यह कि यह देवता नित्य-जन्मा है — दो अरणियों (मंथन-काष्ठ) की सृष्टि: माता-पिता की गोद में छिपा शिशु, जो मंथन-श्रम से ही प्रकट होता है; श्रौत-परंपरा आज भी अग्न्याधान में यही जन्म दोहराती है। एक ही तत्व सूर्य बनकर आकाश में, विद्युत बनकर मेघ में और अग्नि बनकर वेदी में — त्रि-स्थान का यह सिद्धांत वैदिक भौतिकी का सबसे परिपक्व सूत्र माना जाता है।
अग्नि का पलायन — देवताओं ने दूत को कैसे मनाया
ऋग्वेद (10.51-53 संवाद-सूक्त) अग्नि-चरित्र की सबसे मानवीय कथा सँजोए है — अग्नि का हड़ताल-प्रसंग। हव्य-वहन के अनवरत श्रम और (धारा-भेद से) पूर्ववर्ती अग्नि-भाइयों की क्षय-गति से खिन्न होकर अग्नि जलों और वनस्पतियों में जा छिपे — यज्ञ ठप, देवलोक भूखा। वरुण-यम-देवगण खोजते आए; जलों ने ही (मत्स्य-धारा में मछली ने — जिसे इस चुगली का शाप भी मिला) पता बताया। देवताओं ने मनुहार की; अग्नि ने अपनी व्यथा कही — इस सेवा में मेरा क्षय होता है, मेरे पूर्वज खप गए; और तब वह "सेवा-अनुबंध" हुआ जो यज्ञ-विधान का आधार बना: आहुति-भाग में अग्नि का स्थायी अंश, हविर्भागों में अग्रता ("अग्र-भुक्" होने से भी अग्नि-निरुक्ति जुड़ती है), आयु-अक्षय्यता का वर। दूत लौटा — शर्तों समेत। यह सूक्त-कथा श्रम-गरिमा का वैदिक घोषणापत्र है: देवताओं तक को अपने कर्मचारी-देव से संधि-वार्ता करनी पड़ी; कोई सेवा — दिव्य ही क्यों न हो — अनुबंध और सम्मान के बिना स्थायी नहीं।
स्वाहा, स्कंद-वहन और सप्त-जिह्वा
पुराण-स्तर स्वाहा-संबंध की मधुर कथा देता है — दक्ष-कन्या स्वाहा अग्नि पर अनुरक्त थीं; देवताओं ने विधान किया कि प्रत्येक आहुति उनके नाम के उच्चार से ही अग्नि-मुख तक पहुँचेगी: "स्वाहा" कहते ही अर्पण पूर्ण — पत्नी का नाम ही डाक-टिकट बना, और दांपत्य यज्ञ-विधि में अमर हो गया (स्कंद-प्रसंग में सप्तर्षि-पत्नियों का रूप धरने वाली स्वाहा की कथा D005 पर स्पर्शित है)। स्कंद-जन्म (D005) में अग्नि की भूमिका वाहक की है — शिव-तेज को धारण करने का असंभव भार जिन्होंने उठाया और गंगा-शरवण तक पहुँचाया: कार्तिकेय-कथा का "अग्नि-गर्भ" अध्याय इसी देवता का मातृ-सम पक्ष है; इसी वहन-दाह से मेष-वाहन और अग्नि की चिर-क्षुधा की धाराएँ भी जुड़ती हैं। मुण्डकोपनिषद् (1.2.4) उनकी सात जिह्वाओं के नाम गिनाता है — काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी, विश्वरुचि — सात लपटें जो हवि चखती हैं; उपनिषद् वहीं चेताता भी है कि केवल इष्टापूर्त (कर्मकांड) को श्रेय मानने वाले "जीर्ण नौकाओं" पर हैं — अग्नि-मुख साधन है, साध्य नहीं: वेदी का धुआँ भी अंततः उसी परम की ओर इंगित है।
खांडव-दहन — अजीर्ण देवता का महाभोज
महाभारत (आदि पर्व) अग्नि-चरित का सबसे नाटकीय अध्याय है। राजा श्वेतकि के अति-दीर्घ यज्ञों में घी की अविराम धाराएँ पीते-पीते अग्नि को अजीर्ण हो गया — तेज मंद, वर्ण पीला; ब्रह्मा ने औषधि बताई: खांडव-वन का "विषम आहार" — औषधि-वनस्पति-मेद से भरा वह वन, जिसे इन्द्र (D039) अपने सखा तक्षक नाग के निवास-हेतु बार-बार बचा लेते थे: अग्नि सात बार जलाने गए, सात बार इन्द्र-वर्षा ने बुझा दिया। तब अग्नि ने ब्राह्मण-वेश में उन दो वीरों से भिक्षा माँगी जो खांडव-तट पर विहार कर रहे थे — कृष्ण-अर्जुन (D014): "भोजन चाहिए — पर ऐसा, जिसे करते समय इन्द्र रोक न सकें।" प्रतिज्ञा-पालन हेतु शस्त्र चाहिए थे; अग्नि ने वरुण (D042) से दिव्य-सामग्री दिलवाई — अर्जुन को गांडीव धनुष, अक्षय तूणीर और कपि-ध्वज रथ; कृष्ण को चक्र-गदा। फिर पंद्रह दिन वह महादाह चला — अर्जुन के शर-चंदोवे ने इन्द्र-वर्षा को वन तक पहुँचने ही नहीं दिया; देवराज अपने ही पुत्र से हारकर मुस्कुराए। अग्नि तृप्त, वर्ण लौटा; मय दानव (जिसे कृष्णार्जुन ने अभय दिया) ने कृतज्ञता में वह मयसभा रची जो आगे महाभारत की चिंगारी बनी। कथा की परतें गिनिए — गांडीव तक अग्नि-प्रसाद है: कुरुक्षेत्र का समूचा शस्त्र-तंत्र एक "भूखे देवता के भोजन" से निकला; और यह भी कि अग्नि की क्षुधा प्रकृति का विधान है — वन-दहन तक उसकी पाचन-क्रिया: वैदिक मन ने दावानल जैसी विभीषिका को भी देव-जैविकी में पढ़कर उससे संवाद का मार्ग रखा। (वन-विनाश के इस प्रसंग पर आधुनिक पर्यावरण-दृष्टि के प्रश्न स्वाभाविक हैं — महाभारत स्वयं तक्षक-परिवार और शरणार्थी जीवों के पक्ष दर्ज कर उन प्रश्नों की जगह छोड़ता है; ग्रेड-A पाठ की यह आत्म-जटिलता ईमानदारी से यहाँ अंकित है।)
अग्निहोत्र से अग्नि-परीक्षा तक — जीवित उपस्थिति
अग्नि एकमात्र वैदिक देवता हैं जिनकी उपासना-विधि अखंड जीवित है। श्रौत-गृह्य परंपरा का अग्निहोत्र — सूर्योदय-सूर्यास्त की गो-दुग्ध आहुतियाँ — आज भी सहस्रों घरों में चलता है (नंबूदिरि-आदि श्रौत-कुलों का अखंड त्रेताग्नि-रक्षण भारतीय संस्कृति का जीवित संग्रहालय है); विवाह की सप्तपदी अग्नि-साक्षी है ("अग्नि-साक्षी वचन" मुहावरा वहीं से), हर हवन-मंगल उन्हीं का आवाहन, और अंतिम यात्रा भी उन्हीं की गोद — "अग्नये स्वाहा" से "अग्नि-संस्कार" तक जीवन का पूरा वृत्त एक ही देवता की परिक्रमा है। सीता की अग्नि-परीक्षा (D015) में वे सत्य के न्यायाधीश बने — अछूती लौटाकर उन्होंने दिखाया कि यह तेज जलाता नहीं, जाँचता है; होलिका-प्रसंग (D019) में यही न्याय-अग्नि वर के दुरुपयोग पर उलट गई। पंचभूत-स्थलों में तिरुवण्णामलै (अरुणाचलेश्वर) अग्नि-क्षेत्र है — शिव वहाँ तेजोलिंग हैं, और कार्तिक-पूर्णिमा का कार्त्तिगै महादीपम् — पर्वत-शिखर पर घृत-ज्वाल का महादीप — लाखों नेत्रों को वही ऋग्वैदिक दर्शन कराता है: पर्वत जितना ऊँचा दीपक, और उसके आगे करबद्ध मनुष्य। पहला शब्द अब भी बुझा नहीं है।
आध्यात्मिक अर्थ — भीतर की वेदी
अग्नि-तत्त्व के पाठ दैनिक जीवन जितने निकट हैं। पहला — माध्यम की महिमा: अग्नि स्वयं भोक्ता नहीं, वाहक हैं — फिर भी प्रथम-पूज्य; जो व्यवस्थाएँ संदेश ढोती हैं (शिक्षक, सेतु, संचार), उनका सम्मान सभ्यता की पहली ऋचा है। दूसरा — पलायन-सूक्त का श्रम-पाठ: निरंतर जलने वाले को भी अवकाश, अंश और आदर चाहिए — देवता तक अनुबंध माँगता है, मनुष्य क्यों न माँगे; और व्यवस्था वही टिकाऊ जो अपने अग्नि-जनों की सुनती है। तीसरा — जठराग्नि-विवेक: खांडव-कथा अति-आहार (श्वेतकि-यज्ञ) से रोगी हुए अग्नि की है — भीतर की अग्नि भी वही विधान मानती है: अति उसका अजीर्ण है, संतुलित समिधा उसका स्वास्थ्य; "वैश्वानर" की सेवा भोजन-मर्यादा से होती है। और चौथा — साक्षी-भाव: जातवेदस् हर घर में बैठा वह द्रष्टा है जिससे कुछ छिपता नहीं — अग्नि-साक्षी वचन इसीलिए भारी है; साधक के लिए संकेत कि भीतर भी एक जातवेदा जल रहा है — चैतन्य-अग्नि, जो हर संकल्प की आहुति देखता है: उसकी वेदी बुझने न पाए, यही नित्य-अग्निहोत्र है।