तिल्लै का आनंद-तांडव — जिस मूर्ति में ब्रह्मांड नाचता है
पृष्ठभूमि — दारुक-वन का गर्व
नटराज-कथा की एक प्रचलित पूर्वपीठिका दारुक-वन (देवदार-वन) की है। वहाँ के ऋषि कर्मकांड-सिद्धि के ऐसे अभिमान में थे कि ईश्वर को अनावश्यक मानने लगे — मंत्र हमारे, यज्ञ हमारे, फल हमारा। परीक्षा लेने शिव भिक्षाटन-रूप में आए (मोहिनी-विष्णु संग की धाराएँ भी — D029)। क्षुब्ध ऋषियों ने अभिचार-यज्ञ से एक-एक कर संहारक भेजे — और प्रभु ने हर शस्त्र को आभूषण बना लिया: भयंकर व्याघ्र आया तो उसका चर्म कटि-वस्त्र बना; महासर्प आया तो कंठहार; और अंत में उन्मत्त अपस्मार (मुयलक) — विस्मृति और अज्ञान का बौना मूर्त-रूप — दौड़ा तो प्रभु ने उसे पीठ के बल दबाकर उसी पर नृत्य आरंभ कर दिया। यह वह क्षण है जहाँ से नटराज-प्रतिमा जन्मती है: शत्रुओं के चढ़ाए शस्त्र जिसके अलंकार हों और अज्ञान जिसका मंच — वह नर्तक फिर रुका नहीं। ऋषियों का गर्व उसी ताल में गल गया; उन्होंने पहली बार देखा कि जिसे वे "अनावश्यक" कह रहे थे, समस्त क्रियाओं की गति वही है।
व्याघ्रपाद-पतंजलि — तिल्लै की प्रतीक्षा
चिदंबरम की स्थल-कथा (कोयिल पुराणम् धारा — ग्रेड B) इस नृत्य को तिल्लै-वन में स्थायी करती है। व्याघ्रपाद ऋषि वहाँ शिवार्चन करते थे — प्रातः के अनछुए पुष्प पाने को उन्होंने व्याघ्र-चरण (वृक्षों पर चढ़ने योग्य बाघ-पंजे) का वर पाया, इसी से नाम पड़ा। दूसरी ओर क्षीरसागर में शेषनाग (आदिशेष) को विष्णु के देह-भार में एक दिन अपूर्व स्पंदन मिला — प्रभु ने बताया कि वे शिव के आनंद-तांडव का स्मरण-सुख अनुभव कर रहे थे; शेष के हृदय में उस नृत्य के प्रत्यक्ष-दर्शन की ऐसी उत्कंठा जगी कि वे तप करके अंजलि-मुद्रा में पृथ्वी पर अवतरे — आधे नर, आधे सर्प: यही पतंजलि ("पत्" गिरना + "अंजलि") हुए — वही जिन्हें परंपरा योगसूत्र-महाभाष्य की त्रयी-देन (योग-व्याकरण-वैद्यक) से जोड़ती है। दोनों साधक तिल्लै-वन में मिले; दोनों की एक ही प्रार्थना थी — वह नृत्य यहीं, हमारे नेत्रों के सम्मुख हो। और थै (माघ) मास की पूष्य... आरुद्रा (आर्द्रा) नक्षत्र-वेला में कनक-सभा पर वह हुआ जिसकी स्मृति में चिदंबरम आज तक जगमगाता है — शिवकामी-साक्षी में प्रभु का आनंद-तांडव: व्याघ्रपाद-पतंजलि की युगल-प्रतिमाएँ चिदंबरम-विग्रह के दोनों ओर आज भी वही क्षण जी रही हैं। इसी परिसर की एक और धारा (तमिल-परंपरा) काली से नृत्य-स्पर्धा की है — तिल्लै की अधिकार-स्वामिनी काली से प्रतियोगिता में शिव ने ऊर्ध्व-तांडव मुद्रा (कान तक उठा चरण) रची, जिसे मर्यादा-वश देवी ने नहीं दोहराया; विजयी शिव सभा-पति हुए, देवी नगर-सीमा की तिल्लै-काली पीठ पर विराजीं — यह धारा D010 की काली-गरिमा के विपरीत नहीं, स्थल-आख्यानों की अपनी नाट्य-भाषा है (ग्रेड B/D — क्षेत्रीय, चिह्नित)।
प्रतिमा-पाठ — एक मुद्रा में पाँच कर्म
अब वह पाठ जो नटराज को विश्व-प्रतिमा बनाता है — विग्रह का अंग-अंग शास्त्र है। ऊपरी दायें हाथ का डमरू सृष्टि है — नाद-बिंदु से समय और शब्द का जन्म (व्याकरण-परंपरा कहती है कि पाणिनि को माहेश्वर-सूत्र इसी डमरू के चौदह ताल से मिले — ग्रेड B); ऊपरी बाएँ की अग्नि संहार; नीचे का दायाँ अभय-हस्त स्थिति-रक्षा ("डरो मत"); वक्ष के आगे तिर्यक् बायाँ गज-हस्त उठे हुए चरण की ओर संकेत करता है — मुक्ति-मार्ग यह रहा; भू-स्पर्शी दायाँ चरण तिरोभाव (जीव को माया में बाँधना) और उठा हुआ वाम-चरण अनुग्रह — जिसकी शरण वही मोक्ष। चरण-तल का अपस्मार स्मृति-भ्रंश/अज्ञान है — ध्यान रहे, वह मारा नहीं गया, दबाया गया है: अज्ञान की सत्ता मिटती नहीं, नियंत्रित होती है, और वही मंच भी बनता है। चारों ओर का प्रभामंडल (तिरुवासि) अग्नि-जिह्वाओं का ब्रह्मांड-चक्र है — संसृति की परिधि, जिसे प्रभु की जटाएँ नृत्य-वेग में छूती हैं; उड़ती जटाओं में गंगा (D003) और अर्धचंद्र यथावत। स्थिर मुख — यही सबसे गूढ़ अंग है: चक्र घूम रहा है, देह थिरक रही है, पर मुख पर महासमाधि की स्मित-शांति — केंद्र सदा निश्चल है। आनंद कुमारस्वामी के प्रसिद्ध निबंध (The Dance of Śiva, 1918) के बाद यह पाठ विश्व-कला-विमर्श की साझी संपत्ति बना; और आधुनिक विज्ञान-संस्कृति ने भी इसे अपनाया — जिनेवा की CERN प्रयोगशाला के प्रांगण में भारत-भेंट नटराज-प्रतिमा खड़ी है: कणों के सृजन-विलय के "ब्रह्मांडीय नृत्य" के रूपक रूप में (आधुनिक-संदर्भ, ग्रेड C — दस्तावेजित तथ्य)।
चिदंबर-रहस्य और चोल-कांस्य — शून्य और शिल्प
चिदंबरम मंदिर पंचभूत-स्थलों में आकाश-क्षेत्र है (पृथ्वी-कांचीपुरम्... जल-तिरुवानैका... आदि शैव-भूगोल में)। गर्भ-सभा में नटराज-विग्रह के पार्श्व में एक रिक्त स्थान है — यवनिका (परदे) के पीछे केवल स्वर्ण-बिल्व मालाएँ: यही चिदंबर-रहस्य है — आकाश-लिंग का दर्शन, अर्थात यह घोषणा कि परम-तत्व का श्रेष्ठतम विग्रह निराकार शून्य-चैतन्य है; आरती के क्षण परदा हटता है और भक्त "कुछ नहीं" के दर्शन करता है — मूर्ति-पूजा के महासागर के बीचोबीच निर्गुण का यह द्वीप भारतीय उपासना की आत्म-संतुलन प्रतिभा है। नाट्य-परंपरा से मंदिर का दूसरा नाता — पूर्व-गोपुर की भित्तियों पर भरत-नाट्यशास्त्र की 108 करण-मुद्राएँ उत्कीर्ण हैं: नर्तक आज भी उन्हें पाठ्यपुस्तक-सा पढ़ते हैं, और भरतनाट्यम् की हर अर्पण-सभा नटराज-वंदना से खुलती है। शिल्प-पक्ष में चोल-युग (9वीं-13वीं शती) ने मधूच्छिष्ट-विधि (lost-wax) से वे कांस्य ढाले जो उत्सव-विग्रह रूप में नगर-परिक्रमा करते थे — नटराज-कांस्य उनका मुकुट-रत्न: गति का ऐसा संतुलन कि स्थिर धातु घूमती दिखे। यह पृष्ठ जिस LACMA-कांस्य को शीर्ष पर धारण करता है, वह उसी परंपरा का स्वर है — और यह भी स्मरणीय है कि ऐसे अनेक कांस्य औपनिवेशिक-परवर्ती काल में देश से बाहर गए; उनकी घर-वापसी का विमर्श भारतीय पुरा-नीति का जीवित अध्याय है (ग्रेड C — समकालीन संदर्भ)।
आध्यात्मिक अर्थ — केंद्र में स्थिरता, परिधि पर नृत्य
नटराज-दर्शन साधक को चार सूत्र देता है। पहला — परिवर्तन ही स्थायित्व है: जो जगत् को जड़-स्थिर मानकर पकड़ता है, वह दुखी होता है; नटराज कहते हैं कि सृष्टि की मूल-भाषा लय है — ग्रह से परमाणु तक सब नाच रहा है, और भय का अंत उस नृत्य में सम्मिलित होने से होता है, उससे लड़ने से नहीं। दूसरा — अपस्मार-विवेक: अज्ञान का वध नहीं होता (वह तो अनादि-आवरण है), उसका दमन होता है — साधना अज्ञान को मिटाने की उतावली नहीं, उसे चरण-तले रखने का सतत संतुलन है; जिस दिन पाँव उठा, वह फिर उछलेगा। तीसरा — गज-हस्त का संकेत: संसार-चक्र (प्रभामंडल) के भीतर ही मुक्ति-द्वार (उठा चरण) है — बाहर भागना नहीं, भीतर देखना है; हाथ स्वयं कह रहा है कि देखो कहाँ। और चौथा — चिदंबर-रहस्य: नृत्य के सारे रूप-रंग के पार, परदे के पीछे, शून्य-आकाश ही सत्य है — "चित् + अम्बरम्" अर्थात चैतन्य का आकाश; तमिल-शैव संतों ने इसीलिए गाया कि असली चिदंबरम् हृदय-गुहा है — जहाँ श्वास का डमरू बजता है और प्राण नित्य-तांडव करते हैं। मूर्ति के आगे दीप जलाना उपासना का आरंभ है; अपने भीतर उस नर्तक को पहचान लेना उसकी पूर्ति।