श्री नटराज

Nataraja · नृत्यराज · आनंद-तांडव मूर्ति · सभापति

शिव का वह स्वरूप जिसमें ब्रह्मांड-चक्र स्वयं मुद्रा बन गया — डमरू में सृष्टि, अग्नि में संहार, उठा चरण मुक्ति, और पैरों तले अज्ञान। चिदंबरम के "आकाश-मंच" पर थिरकता यह नृत्य भारतीय कला-दर्शन का शिखर-बिंब है।

श्रेणी: शिव-स्वरूप (D003 का नृत्य-रूप) परंपरा: शैव — विशेषतः तमिल-चोल पीठ: चिदंबरम (तिल्लै) पर्व: आरुद्रा-दर्शन · नटांजलि
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नटराज — चोल-कालीन कांस्य प्रतिमा (लॉस एंजेलेस काउंटी म्यूज़ियम) चोल कांस्य (~11वीं शती) · LACMA · Public Domain · Wikimedia Commons
नृत्यराजनर्तकों-कलाकारों के परमेश्वर
पंचकृत्य-नाथसृष्टि-स्थिति-संहार-तिरोभाव-अनुग्रह
चित्-सभेशचेतना-सभा (चिदंबरम) के स्वामी
अपस्मार-मर्दनअज्ञान पर स्थिर चरण

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

नटराज शिव (D003) का नृत्य-स्वरूप है — "नटों (नर्तकों) के राजा"। शिव-तत्व के जिस पक्ष को महादेव-पृष्ठ योगी-संहारक रूप में कहता है, उसी को यह स्वरूप कलाकार रूप में कहता है: ब्रह्मांड का चलना ही जिसका नृत्य है। शैव सिद्धांत इस नृत्य में पंचकृत्य पढ़ता है — सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (आवरण) और अनुग्रह — पाँचों ईश्वर-कर्म एक ही देह-मुद्रा में; इसीलिए नटराज-विग्रह मूर्ति नहीं, चल-दर्शनशास्त्र कहा गया है। इस स्वरूप की आत्मा तमिल भूमि में बसती है — चिदंबरम (तिल्लै) का "कनक-सभा" मंच, जहाँ परंपरा के अनुसार प्रभु ने आनंद-तांडव प्रकट किया और आज भी करते हैं; और उसका शरीर चोल-युग के उन कांस्यों में ढला जो विश्व-संग्रहालयों तक भारतीय प्रतिभा के राजदूत हैं (इस पृष्ठ का शीर्ष-चित्र ऐसा ही ~11वीं शती का चोल कांस्य है)।

तांडव के भेद भी परंपरा गिनती है — प्रलय-वेला का उग्र रुद्र-तांडव, संध्या-तांडव (प्रदोष-स्तोत्र परंपरा में देव-मंडली की संगत के साथ), उमा सहित लास्य-संवाद, और चिदंबरम का आनंद-तांडव — जिसमें संहार भी आनंद-मुद्रा है। यह पृष्ठ D003 से पूरक-विभाजित है: शिव-चरित की मुख्य कथाएँ वहाँ हैं; यहाँ केवल नृत्य-रूप का स्थल, प्रतीक, कला और दर्शन।

स्वरूप एवं संबंध

Form & Relations
  • मूल-स्वरूपभगवान शिव (D003) का नृत्य-रूप — पंचकृत्य-मूर्ति
  • सह-विग्रहशिवकामी (पार्वती D006 का चिदंबरम-नाम) — नृत्य की साक्षिणी-शक्ति
  • चरण-तलअपस्मार (मुयलक) — अज्ञान-पुरुष; वध्य नहीं, दमित — अज्ञान मिटता नहीं, दबता है
  • साक्षी-ऋषिव्याघ्रपाद एवं पतंजलि — तिल्लै-दर्शन के आदि-द्रष्टा (कथा में)
  • नृत्य-प्रतिस्पर्धाकाली से नृत्य-द्वंद्व की तिल्लै/ऊर्ध्व-तांडव धारा (D010 — परंपरा-सापेक्ष, कथा में चिह्नित)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

तिल्लै का आनंद-तांडव — जिस मूर्ति में ब्रह्मांड नाचता है

पृष्ठभूमि — दारुक-वन का गर्व

नटराज-कथा की एक प्रचलित पूर्वपीठिका दारुक-वन (देवदार-वन) की है। वहाँ के ऋषि कर्मकांड-सिद्धि के ऐसे अभिमान में थे कि ईश्वर को अनावश्यक मानने लगे — मंत्र हमारे, यज्ञ हमारे, फल हमारा। परीक्षा लेने शिव भिक्षाटन-रूप में आए (मोहिनी-विष्णु संग की धाराएँ भी — D029)। क्षुब्ध ऋषियों ने अभिचार-यज्ञ से एक-एक कर संहारक भेजे — और प्रभु ने हर शस्त्र को आभूषण बना लिया: भयंकर व्याघ्र आया तो उसका चर्म कटि-वस्त्र बना; महासर्प आया तो कंठहार; और अंत में उन्मत्त अपस्मार (मुयलक) — विस्मृति और अज्ञान का बौना मूर्त-रूप — दौड़ा तो प्रभु ने उसे पीठ के बल दबाकर उसी पर नृत्य आरंभ कर दिया। यह वह क्षण है जहाँ से नटराज-प्रतिमा जन्मती है: शत्रुओं के चढ़ाए शस्त्र जिसके अलंकार हों और अज्ञान जिसका मंच — वह नर्तक फिर रुका नहीं। ऋषियों का गर्व उसी ताल में गल गया; उन्होंने पहली बार देखा कि जिसे वे "अनावश्यक" कह रहे थे, समस्त क्रियाओं की गति वही है।

व्याघ्रपाद-पतंजलि — तिल्लै की प्रतीक्षा

चिदंबरम की स्थल-कथा (कोयिल पुराणम् धारा — ग्रेड B) इस नृत्य को तिल्लै-वन में स्थायी करती है। व्याघ्रपाद ऋषि वहाँ शिवार्चन करते थे — प्रातः के अनछुए पुष्प पाने को उन्होंने व्याघ्र-चरण (वृक्षों पर चढ़ने योग्य बाघ-पंजे) का वर पाया, इसी से नाम पड़ा। दूसरी ओर क्षीरसागर में शेषनाग (आदिशेष) को विष्णु के देह-भार में एक दिन अपूर्व स्पंदन मिला — प्रभु ने बताया कि वे शिव के आनंद-तांडव का स्मरण-सुख अनुभव कर रहे थे; शेष के हृदय में उस नृत्य के प्रत्यक्ष-दर्शन की ऐसी उत्कंठा जगी कि वे तप करके अंजलि-मुद्रा में पृथ्वी पर अवतरे — आधे नर, आधे सर्प: यही पतंजलि ("पत्" गिरना + "अंजलि") हुए — वही जिन्हें परंपरा योगसूत्र-महाभाष्य की त्रयी-देन (योग-व्याकरण-वैद्यक) से जोड़ती है। दोनों साधक तिल्लै-वन में मिले; दोनों की एक ही प्रार्थना थी — वह नृत्य यहीं, हमारे नेत्रों के सम्मुख हो। और थै (माघ) मास की पूष्य... आरुद्रा (आर्द्रा) नक्षत्र-वेला में कनक-सभा पर वह हुआ जिसकी स्मृति में चिदंबरम आज तक जगमगाता है — शिवकामी-साक्षी में प्रभु का आनंद-तांडव: व्याघ्रपाद-पतंजलि की युगल-प्रतिमाएँ चिदंबरम-विग्रह के दोनों ओर आज भी वही क्षण जी रही हैं। इसी परिसर की एक और धारा (तमिल-परंपरा) काली से नृत्य-स्पर्धा की है — तिल्लै की अधिकार-स्वामिनी काली से प्रतियोगिता में शिव ने ऊर्ध्व-तांडव मुद्रा (कान तक उठा चरण) रची, जिसे मर्यादा-वश देवी ने नहीं दोहराया; विजयी शिव सभा-पति हुए, देवी नगर-सीमा की तिल्लै-काली पीठ पर विराजीं — यह धारा D010 की काली-गरिमा के विपरीत नहीं, स्थल-आख्यानों की अपनी नाट्य-भाषा है (ग्रेड B/D — क्षेत्रीय, चिह्नित)।

प्रतिमा-पाठ — एक मुद्रा में पाँच कर्म

अब वह पाठ जो नटराज को विश्व-प्रतिमा बनाता है — विग्रह का अंग-अंग शास्त्र है। ऊपरी दायें हाथ का डमरू सृष्टि है — नाद-बिंदु से समय और शब्द का जन्म (व्याकरण-परंपरा कहती है कि पाणिनि को माहेश्वर-सूत्र इसी डमरू के चौदह ताल से मिले — ग्रेड B); ऊपरी बाएँ की अग्नि संहार; नीचे का दायाँ अभय-हस्त स्थिति-रक्षा ("डरो मत"); वक्ष के आगे तिर्यक् बायाँ गज-हस्त उठे हुए चरण की ओर संकेत करता है — मुक्ति-मार्ग यह रहा; भू-स्पर्शी दायाँ चरण तिरोभाव (जीव को माया में बाँधना) और उठा हुआ वाम-चरण अनुग्रह — जिसकी शरण वही मोक्ष। चरण-तल का अपस्मार स्मृति-भ्रंश/अज्ञान है — ध्यान रहे, वह मारा नहीं गया, दबाया गया है: अज्ञान की सत्ता मिटती नहीं, नियंत्रित होती है, और वही मंच भी बनता है। चारों ओर का प्रभामंडल (तिरुवासि) अग्नि-जिह्वाओं का ब्रह्मांड-चक्र है — संसृति की परिधि, जिसे प्रभु की जटाएँ नृत्य-वेग में छूती हैं; उड़ती जटाओं में गंगा (D003) और अर्धचंद्र यथावत। स्थिर मुख — यही सबसे गूढ़ अंग है: चक्र घूम रहा है, देह थिरक रही है, पर मुख पर महासमाधि की स्मित-शांति — केंद्र सदा निश्चल है। आनंद कुमारस्वामी के प्रसिद्ध निबंध (The Dance of Śiva, 1918) के बाद यह पाठ विश्व-कला-विमर्श की साझी संपत्ति बना; और आधुनिक विज्ञान-संस्कृति ने भी इसे अपनाया — जिनेवा की CERN प्रयोगशाला के प्रांगण में भारत-भेंट नटराज-प्रतिमा खड़ी है: कणों के सृजन-विलय के "ब्रह्मांडीय नृत्य" के रूपक रूप में (आधुनिक-संदर्भ, ग्रेड C — दस्तावेजित तथ्य)।

चिदंबर-रहस्य और चोल-कांस्य — शून्य और शिल्प

चिदंबरम मंदिर पंचभूत-स्थलों में आकाश-क्षेत्र है (पृथ्वी-कांचीपुरम्... जल-तिरुवानैका... आदि शैव-भूगोल में)। गर्भ-सभा में नटराज-विग्रह के पार्श्व में एक रिक्त स्थान है — यवनिका (परदे) के पीछे केवल स्वर्ण-बिल्व मालाएँ: यही चिदंबर-रहस्य है — आकाश-लिंग का दर्शन, अर्थात यह घोषणा कि परम-तत्व का श्रेष्ठतम विग्रह निराकार शून्य-चैतन्य है; आरती के क्षण परदा हटता है और भक्त "कुछ नहीं" के दर्शन करता है — मूर्ति-पूजा के महासागर के बीचोबीच निर्गुण का यह द्वीप भारतीय उपासना की आत्म-संतुलन प्रतिभा है। नाट्य-परंपरा से मंदिर का दूसरा नाता — पूर्व-गोपुर की भित्तियों पर भरत-नाट्यशास्त्र की 108 करण-मुद्राएँ उत्कीर्ण हैं: नर्तक आज भी उन्हें पाठ्यपुस्तक-सा पढ़ते हैं, और भरतनाट्यम् की हर अर्पण-सभा नटराज-वंदना से खुलती है। शिल्प-पक्ष में चोल-युग (9वीं-13वीं शती) ने मधूच्छिष्ट-विधि (lost-wax) से वे कांस्य ढाले जो उत्सव-विग्रह रूप में नगर-परिक्रमा करते थे — नटराज-कांस्य उनका मुकुट-रत्न: गति का ऐसा संतुलन कि स्थिर धातु घूमती दिखे। यह पृष्ठ जिस LACMA-कांस्य को शीर्ष पर धारण करता है, वह उसी परंपरा का स्वर है — और यह भी स्मरणीय है कि ऐसे अनेक कांस्य औपनिवेशिक-परवर्ती काल में देश से बाहर गए; उनकी घर-वापसी का विमर्श भारतीय पुरा-नीति का जीवित अध्याय है (ग्रेड C — समकालीन संदर्भ)।

आध्यात्मिक अर्थ — केंद्र में स्थिरता, परिधि पर नृत्य

नटराज-दर्शन साधक को चार सूत्र देता है। पहला — परिवर्तन ही स्थायित्व है: जो जगत् को जड़-स्थिर मानकर पकड़ता है, वह दुखी होता है; नटराज कहते हैं कि सृष्टि की मूल-भाषा लय है — ग्रह से परमाणु तक सब नाच रहा है, और भय का अंत उस नृत्य में सम्मिलित होने से होता है, उससे लड़ने से नहीं। दूसरा — अपस्मार-विवेक: अज्ञान का वध नहीं होता (वह तो अनादि-आवरण है), उसका दमन होता है — साधना अज्ञान को मिटाने की उतावली नहीं, उसे चरण-तले रखने का सतत संतुलन है; जिस दिन पाँव उठा, वह फिर उछलेगा। तीसरा — गज-हस्त का संकेत: संसार-चक्र (प्रभामंडल) के भीतर ही मुक्ति-द्वार (उठा चरण) है — बाहर भागना नहीं, भीतर देखना है; हाथ स्वयं कह रहा है कि देखो कहाँ। और चौथा — चिदंबर-रहस्य: नृत्य के सारे रूप-रंग के पार, परदे के पीछे, शून्य-आकाश ही सत्य है — "चित् + अम्बरम्" अर्थात चैतन्य का आकाश; तमिल-शैव संतों ने इसीलिए गाया कि असली चिदंबरम् हृदय-गुहा है — जहाँ श्वास का डमरू बजता है और प्राण नित्य-तांडव करते हैं। मूर्ति के आगे दीप जलाना उपासना का आरंभ है; अपने भीतर उस नर्तक को पहचान लेना उसकी पूर्ति।

स्रोत टिप्पणी: दारुक-वन/अपस्मार प्रसंग पुराण-आगम धारा (ग्रेड A/B); व्याघ्रपाद-पतंजलि-आनंदतांडव एवं काली-स्पर्धा चिदंबरम स्थल-परंपरा — कोयिल पुराणम्/तमिल शैव (ग्रेड B; क्षेत्रीय-भेद चिह्नित); पंचकृत्य-प्रतीक शैव सिद्धांत (ग्रेड A — उण्मै विळक्कम् आदि परंपरा); माहेश्वर-सूत्र डमरू-धारा व्याकरण-परंपरा (ग्रेड B); 108 करण नाट्यशास्त्र-गोपुर (ग्रेड A — प्रत्यक्ष शिल्प); चोल-कांस्य/CERN/कुमारस्वामी आधुनिक कला-इतिहास तथ्य (ग्रेड B/C); चिदंबर-रहस्य जीवित मंदिर-विधि (ग्रेड A — प्रत्यक्ष परंपरा)।

नाम एवं अर्थ

Names
नटराज
नटों (नर्तक-अभिनेता) के राजा — कला-जगत के परमाचार्य।
सभापति / सभेश
चित्-सभा (कनक-सभा) के स्वामी — चिदंबरम का प्रधान नाम।
आनंद-तांडव मूर्ति
आनंद-नृत्य का विग्रह-रूप — संहार भी जिसमें उत्सव है।
अंबलवाणन् (तमिल)
"अंबलम्" (सभा-मंच) के वासी — तमिल भक्ति-वाणी का प्रिय नाम।
चिदम्बरेश
चित्-अंबर (चैतन्याकाश) के ईश — रहस्य-दर्शन का नाम।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

मूल मंत्र

ॐ नमः शिवाय ॥ (पंचाक्षर — नटराज-रूप में भी वही मूल; विस्तार D003 पर)

नाम-वंदना

ॐ नटराजाय नमः ॥ · ॐ सभापतये नमः ॥

चिदम्बरेश-ध्यान

कृपासमुद्रं सुमुखं त्रिनेत्रं जटाधरं पार्वतीवामभागम् ।
सदाशिवं रुद्रमनन्तरूपं चिदम्बरेशं हृदि भावयामि ॥

अर्थ: कृपा के समुद्र, सौम्य-मुख, त्रिनेत्र, जटाधारी, वाम-भाग में पार्वती वाले, अनंत-रूप सदाशिव रुद्र — उन चिदंबरेश का मैं हृदय में ध्यान करता हूँ।

प्रदोष-स्तोत्र (संध्या-तांडव वर्णन) एवं पतंजलि-कृत परंपरा के चरण-शृंग स्तोत्र शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
आरुद्रा (आर्द्रा) दर्शन
मार्गशीर्ष की आर्द्रा-नक्षत्र पूर्णिमा-वेला — चिदंबरम का महाभिषेक-रात्रि उत्सव; आनंद-तांडव स्मृति का शिखर-पर्व।
नटांजलि महोत्सव
महाशिवरात्रि-काल में चिदंबरम-प्रांगण का राष्ट्रीय नृत्य-अर्पण — देश-भर के नर्तक प्रभु के सम्मुख।
प्रदोष-व्रत
त्रयोदशी-संध्या का संध्या-तांडव स्मरण — नित्य-पक्ष का नटराज-पर्व (D003 भी देखें)।
मार्गझी तिरुवेम्बावै
मार्गशीर्ष-प्रभात की माणिक्कवाचकर-गान परंपरा — चिदंबरम की भक्ति-ऋतु।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
चिदंबरम (तिल्लै), तमिलनाडु
आकाश-भूत क्षेत्र; कनक-सभा, चिदंबर-रहस्य, 108-करण गोपुर — नटराज-पीठों का मुकुट।
पंचसभा-क्षेत्र
तमिल परंपरा के पाँच नृत्य-मंच: चिदंबरम (कनक/स्वर्ण), मदुरै (रजत), तिरुवालंगाडु (रत्न), तिरुनेल्वेली (ताम्र), कुट्रालम (चित्र) सभाएँ।
तिरुवालंगाडु
ऊर्ध्व-तांडव क्षेत्र — काली-स्पर्धा धारा की स्थली; विश्व-प्रसिद्ध चोल नटराज-कांस्य यहीं से।
संग्रहालय-कांस्य
चेन्नई-तंजावुर से LACMA-मेट तक चोल नटराज — कला-जगत में भारत के स्थायी राजदूत।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: नटराज शिवजी का नाचता हुआ रूप है। उनके एक हाथ के डमरू से दुनिया बनती है, दूसरे हाथ की आग से पुरानी चीज़ें मिटती हैं, और उनके पैर के नीचे दबा बौना "भूलने/आलस" का राक्षस है। उनका सबसे बड़ा मंदिर चिदंबरम (तमिलनाडु) में है।

रोचक तथ्य:

  • नटराज का मतलब है — नाचने वालों के राजा।
  • भरतनाट्यम् के नर्तक हर कार्यक्रम की शुरुआत नटराज-प्रणाम से करते हैं।
  • चिदंबरम मंदिर की दीवारों पर नृत्य की 108 मुद्राएँ खुदी हैं।
  • स्विट्ज़रलैंड की मशहूर विज्ञान-प्रयोगशाला CERN के बाहर भी नटराज की मूर्ति है!

सीख: बदलाव से डरो मत — दुनिया का चलना ही उसका नाच है; और आलस को हमेशा पैर के नीचे (काबू में) रखो।

मिनी क्विज़:

  1. नटराज किस देवता का रूप हैं?
  2. डमरू किस चीज़ का प्रतीक है?
  3. पैर के नीचे दबा बौना क्या दर्शाता है?
  4. नटराज का सबसे प्रसिद्ध मंदिर कहाँ है?