अपर्णा — व्रत की सीढ़ियाँ, जो पत्तों से भी ऊपर गईं
संकल्प — जब राजकुमारी ने वन चुना
कथा की भूमिका शैलपुत्री-पृष्ठ (D061) से चली आती है — हिमालय-गृह में जन्मी कन्या के विषय में नारद की भविष्य-वाणी हो चुकी है: वर होगा वैरागी महादेव। पर भविष्य-वाणी और उपलब्धि के बीच वह दूरी थी जिसे कोई वरदान नहीं पाट सकता — शिव समाधि में थे: सती-शोक (D003) में डूबे, जगत् से विरत, हिम-गुफा में नेत्र मूँदे। सेवा से देवी ने निकटता पाई — पिता के आँगन में आए योगिराज की पूजा-परिचर्या का अवसर; पर कामदेव-प्रसंग (D006-कथा) ने दिखा दिया कि इस समाधि का द्वार सौंदर्य से नहीं खुलता — काम भस्म हुआ, शिव अंतर्धान हुए, और पार्वती के सामने दो मार्ग बचे: नियति मानकर बैठ जाना, या वह करना जो साध्य के स्वभाव के अनुरूप हो। यहीं इस पृष्ठ की देवी जन्मती है। पार्वती ने माता मेना से तप की आज्ञा माँगी; माता का हृदय काँपा — "उ (अरी)! मा (नहीं)!" — पुराण-निरुक्त कहता है कि इसी ममता-भरे निषेध से देवी का प्रिय नाम "उमा" जन्मा। पर आज्ञा मिली — पिता-पर्वत जानता था कि शिखर की बेटी शिखर-साधना ही करेगी। राज-वस्त्र उतरे, वल्कल पहने; आभूषण उतरे, रुद्राक्ष चढ़े; और गौरी-शिखर (कुमारसंभव का "गौरी-शिखर" — आज भी हिमालय-परंपरा में तप-स्थल स्मृतियाँ) पर वह साधना आरम्भ हुई जिसके आगे पुराणकार स्वयं स्तब्ध भाव से लिखते हैं — ऐसा तप न पहले किसी ने किया, न आगे कोई कर सकेगा।
व्रत की सीढ़ियाँ — फल, पत्ते, और फिर कुछ भी नहीं
शिव पुराण उस तप का जो क्रम देता है, वह त्याग की एक घटती हुई सीढ़ी है — और यही क्रम ब्रह्मचारिणी-स्वरूप की आत्मा है। पहले वर्षों में देवी ने फल-मूल का आहार रखा — ग्रीष्म में पंचाग्नि के बीच (चार दिशाओं में अग्नि, पाँचवाँ ऊपर सूर्य), वर्षा में खुले आकाश-तले शिला पर, शीत में हिम-जल में खड़ी होकर जप करती रहीं। फिर फल भी त्यागे — केवल वृक्षों से स्वयं झरे पत्तों का आहार रह गया: वह भी माँगा हुआ नहीं, गिरा हुआ। और अंतिम सीढ़ी वह आई जिसने देवी को नया नाम दिया — पत्ते भी त्याग दिए: पर्ण तक नहीं — इसीलिए त्रिलोक ने काँपते सम्मान से उन्हें पुकारा "अपर्णा" — बिना पर्ण वाली। निराहार, वायु-मात्र पर टिकी, जप में लीन — कुमारसंभव (सर्ग 5) इस दृश्य को काव्य का शिखर देता है और वहीं वह अमर पंक्ति है जिसका भाव है: तप ही जिसका धन है, उस देह से बढ़कर पवित्र क्या। सहस्र वर्षों की संख्याएँ धाराओं में घटती-बढ़ती हैं (तीन सहस्र वर्ष तक की गणनाएँ — पाठ-भेद चिह्नित), पर संख्या मर्म नहीं है; मर्म वह क्रम है — त्याग बाहर से भीतर की ओर चला: पहले सुख गए, फिर आवश्यकताएँ गईं, फिर आवश्यकता का विचार भी गया। वन के ऋषि उस तपस्विनी के दर्शन को आने लगे; लोक में उसका तप-यश ऐसा फैला कि देवता इन्द्रासन तक चिंतित हुए। और अंत में वह परीक्षा हुई जो D006-कथा का प्रसिद्ध दृश्य है — वटु-वेशधारी (ब्रह्मचारी-रूप) शिव स्वयं आए और शिव की ही निंदा करने लगे; अपर्णा ने उत्तर में जो शिव-तत्त्व-निष्ठा दिखाई, उसने छद्म गिरा दिया: तप पूर्ण हुआ, वरदान सामने खड़ा था। विवाह-गाथा आगे पार्वती-पृष्ठ और हिमवान-पृष्ठ (D059) की है; ब्रह्मचारिणी-रूप की कथा यहीं पूर्ण होती है — स्वीकृति के क्षण पर नहीं, पात्रता के क्षण पर: नवदुर्गा-क्रम की दूसरी देवी वह है जिसने माँगा नहीं — स्वयं को उस योग्य बनाया।
ब्रह्मचर्य का अर्थ-विस्तार — माला और कमंडलु का शास्त्र
अब स्वरूप-चिह्नों का पाठ। ब्रह्मचारिणी के दो ही उपकरण हैं, और दोनों मिलकर साधना का पूर्ण व्याकरण रचते हैं। अक्षमाला — जप की माला: निरंतरता का यंत्र; एक-एक मनका एक-एक पुनरावृत्ति — तप कोई विस्फोट नहीं, दोहराव है: वही नाम, वही आसन, वही घड़ी — सहस्र वर्ष। आधुनिक भाषा जिसे consistency कहती है, नवदुर्गा-मंडल उसे अक्षमाला कहता है। कमंडलु — जल-पात्र: संन्यासी की समस्त संपत्ति; इतना जल जितना आवश्यक — संचय नहीं, संग्रह नहीं: आवश्यकता की न्यूनतम रेखा पर जीवन। माला "करते रहो" कहती है, कमंडलु "कम में रहो" — दोनों मिलकर ब्रह्मचर्य की व्यावहारिक परिभाषा हैं: ऊर्जा का अपव्यय रोककर उसे एक लक्ष्य में लगाना। इसीलिए "ब्रह्मचर्य" शब्द को केवल इन्द्रिय-निग्रह तक सीमित पढ़ना इस देवी को छोटा करना है — वैदिक परंपरा में ब्रह्मचारी वह विद्यार्थी है जो ब्रह्म (वेद/ज्ञान) में चरता है: उसकी चर्या ही उसका ब्रह्म है। पार्वती का तप शिव के लिए था — पर विधि पूर्ण विद्यार्थी-धर्म की थी: गुरु-वाक्य (नारद) पर श्रद्धा, दीर्घ-काल अभ्यास, आहार-विजय, ऋतु-सहिष्णुता, और परीक्षा में निष्ठा-प्रमाण। यही कारण है कि परंपरा ब्रह्मचारिणी को विद्यार्थियों-प्रतियोगियों-शोधार्थियों की विशेष देवी कहती है — हर लंबी तैयारी (परीक्षा की, कला की, तपस्या की) उनके क्षेत्र की यात्रा है; और द्वितीया-नैवेद्य की लोक-विधि (शक्कर/मिश्री — सादगी का मीठा) व्रती को स्मरण कराती है कि तप कठोर हो, कटु नहीं।
आध्यात्मिक अर्थ — प्रेम की तपोमय परिभाषा
ब्रह्मचारिणी-तत्त्व का शिखर-पाठ उसके विरोधाभास में है — यह प्रेम-कथा है जिसकी विधि वैराग्य है। पार्वती को शिव चाहिए थे; उन्होंने शिव को पाने के लिए वह सब त्यागा जो "चाहना" कहलाता है — सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं, सामीप्य का आग्रह नहीं, वरदान की याचना नहीं: केवल स्वयं को साध्य के स्वभाव में ढालती चली गईं — वैरागी को पाने के लिए वैराग्य, योगी को पाने के लिए योग। प्रेम की इससे परिपक्व परिभाषा दुर्लभ है: जिसे चाहते हो, उसके योग्य बनो — यही चाहने का शुद्धतम रूप है। दूसरा पाठ — अपर्णा-रेखा: त्याग की सीढ़ी में एक बिंदु आता है जहाँ अंतिम आवश्यक भी छूटता है; हर गहरी साधना में वह "पत्तों वाला क्षण" आता है — जब लगता है कि इतना तो रखा ही जा सकता है, और साधक वह भी रख नहीं रखता। वहीं नाम बदलता है — पार्वती वहाँ अपर्णा हुईं; साधारण साधक वहाँ असाधारण होता है। तीसरा — तप बनाम भाग्य: भविष्य-वाणी (नारद) पहले से थी, फिर तप क्यों? क्योंकि भारतीय दर्शन में भाग्य बीज है, तप खेती — बिना साधना का वरदान भी अंकुरित नहीं होता; ब्रह्मचारिणी उस हर व्यक्ति का उत्तर हैं जो "होना होगा तो हो जाएगा" कहकर बैठा है। नवरात्रि की दूसरी रात का दीप यही कहता जलता है — पहली रात संकल्प था; आज से अभ्यास। ॥ द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ॥