महाविद्या तारा

Tara Mahavidya · तारिणी · नील-सरस्वती · उग्रतारा-एकजटा

"तारयति इति तारा" — जो पार लगा दे, वह तारा। द्वितीया महाविद्या डूबते हुओं की देवी हैं: संकट-सागर में, वाणी-अवरोध में, ज्ञान-अंधकार में। वे नील-सरस्वती भी हैं — विद्या का वह नीला, उग्र, विद्युत-वेग रूप जो शांत श्वेत सरस्वती (D008) का तांत्रिक प्रतिपक्ष है।

पद: दशमहाविद्या-2 (कालीकुल) तत्त्व: तारक-शक्ति · परा-वाक् महापीठ: तारापीठ (बीरभूम, बंगाल) विशेष: बृहस्पति-पत्नी तारा से भिन्न
प्रमुख कथा पढ़ें
तारिणीडूबते को पार लगाने वाली — नाम ही कार्य
नील-सरस्वतीविद्या का उग्र-नील तांत्रिक मुख
विद्युत्-कृपातत्क्षण तारने वाली — विलम्ब-रहित करुणा
श्मशान-वत्सलातारापीठ की माँ — जहाँ कोई अस्वीकृत नहीं

परिचय — और एक ज़रूरी भेद

Introduction

पहले वह भेद, जो इस कोश में अनिवार्य है: यह पृष्ठ महाविद्या तारा का है — बृहस्पति-पत्नी तारा (जिनका तारा-प्रकरण D044/D046/D047 पर तीन-कोण में प्रकाशित है) से यह सर्वथा भिन्न देवी हैं; नाम-साम्य मात्र है। महाविद्या तारा दशमहाविद्या-मंडल की द्वितीया हैं — कालीकुल की देवी, काली (D070) की निकटतम सहोदरा-विद्या: ध्यान-रूप में भी दोनों निकट हैं (श्याम/नील वर्ण, मुक्त-केश, शव-आरूढ़, खड्ग-धारिणी), और परंपरा कहती है कि जो भेद है वह कार्य का है — काली काल की विद्या हैं, तारा तारने की।

"तारयति इति तारा" — जो पार लगा दे। संकट का सागर, भव का सागर, अज्ञान का सागर — तारा नाविका हैं। उनका दूसरा प्रधान नाम इस विद्या का दूसरा मुख खोलता है: नील-सरस्वती — वाणी और विद्या की वह उग्र धारा जो श्वेत सरस्वती (D008) की तांत्रिक जुड़वाँ है; परंपरा वाक्-सिद्धि, कवित्व-शक्ति और शास्त्रार्थ-विजय इसी नील मुख से माँगती आई है। रूप-भेद तीन प्रचलित हैं — उग्रतारा, एकजटा, नील-सरस्वती (तंत्र-निबंध परंपरा — ग्रेड B)। और उनका महापीठ है बंगाल का तारापीठ — भारत का सबसे जीवित श्मशान-साधना क्षेत्र, जिसकी कथा नीचे है।

मंडल एवं संबंध

Mandala
  • मंडल-क्रमकाली (D070) → तारा → त्रिपुरसुन्दरी (D072) — कालीकुल-द्वितीया
  • तत्त्व-मूलमहाशक्ति (D006/D009) का तारक-वाक् पद
  • विद्या-युग्मसरस्वती (D008) — श्वेत-नील वाक्-धाराएँ; पूरक, प्रतिस्पर्धी नहीं
  • नाम-भेदबृहस्पति-पत्नी तारा (D047-प्रकरण) — भिन्न देवी; केवल नाम-साम्य
  • पार-परंपराबौद्ध तारा (वज्रयान) — साझा-धारा तुलनात्मक अध्ययन, कथा-खंड में चिह्नित

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तंत्र-स्थल-पुराण

वशिष्ठ की हार-जीत और तारापीठ — तारने वाली की कथा

वशिष्ठ — जब विधि हार गई

तारा-परंपरा की केंद्र-कथा एक ऋषि की पराजय से खुलती है — और पराजित कोई साधारण साधक नहीं: वशिष्ठ, ब्रह्मर्षि, रामकथा के कुल-गुरु। तंत्र-धारा कहती है (तारा-तंत्र/ब्रह्मयामल परंपरा — ग्रेड B): वशिष्ठ ने तारा-साधना का संकल्प लिया और वैदिक विधि-विधान से — यम-नियम, शुद्धि-पवित्रता, हवन-जप — सहस्रों वर्ष तप किया। फल? शून्य। देवी का कोई उत्तर नहीं। क्रुद्ध ऋषि शाप देने को उद्यत हुए — तब आकाशवाणी हुई (धाराओं में स्वयं देवी या ब्रह्मा का निर्देश): "वशिष्ठ! जिस विद्या को तुम साध रहे हो, उसकी रीति तुम्हारे पास नहीं। यह विद्या 'चीन-आचार' से सधती है — जाओ, महाचीन के क्षेत्र में उस बुद्ध-रूपी जनार्दन से सीखो जो इस विद्या के आचार्य हैं।" वशिष्ठ गए — और वहाँ जो देखा उससे वैदिक ऋषि का सिर घूम गया: विधि-निषेधों के पार का उन्मुक्त साधना-लोक। पहले उन्होंने घृणा की; फिर — कथा का निर्णायक क्षण — झुके: आचार्य से दीक्षा ली, अहंकार (मैं ब्रह्मर्षि हूँ, मेरी विधि ही विधि है) का बलिदान किया — और तारा तत्क्षण प्रसन्न हुईं। कथा का दार्शनिक भार तौलिए: यह वैदिक-बनाम-तांत्रिक विवाद का तंत्र-पक्षीय आत्म-कथन है (स्तर स्पष्ट: यह तंत्र-परंपरा की अपनी कथा है, वैदिक संहिताओं की नहीं) — पर इसका सार्वभौम पाठ विवाद से ऊपर है: विद्या पात्रता माँगती है, पद्धति-अभिमान नहीं; जो साधक "मेरी ही रीति सही" पर अड़ा है, वह सहस्र वर्ष तपे तो भी द्वार बंद है — और जो झुककर सीखने को तैयार है, उसके लिए देवी एक क्षण दूर हैं। तारने वाली की पहली शर्त यही है: डूबता हुआ अपनी अकड़ छोड़े, तभी हाथ पकड़ा जा सकता है।

नील-कंठ की सहचरी — नील वर्ण का रहस्य

तारा का नील वर्ण एक और कथा-धारा से जुड़ता है, जो उन्हें समुद्र-मंथन के महाचक्र (D002/D017) में पिरोती है (शाक्त-लोक धारा — ग्रेड B/C, चिह्नित): जब शिव ने हलाहल पिया और विष कंठ में धारण किया (नीलकंठ-प्रसंग, D003), तब विष की दाह से मूर्च्छित शिव को जिस शक्ति ने माता-रूप धरकर सँभाला, वह तारा थीं — धारा कहती है कि उन्होंने शिशु-रूपी शिव को स्तन्य-पान कराया, जिसकी शीतलता ने विष-ताप शांत किया; तारापीठ की मूल प्रतिमा-भावना यही है — शिव को गोद में लिए तारा। नील वर्ण उसी विष-प्रसंग की छाया है — जो देवता के कंठ में नीलिमा बनकर ठहरा, वही करुणा देवी के अंग में नील हो गई। प्रतीक-पाठ गहरा है: तारने वाली वह है जो विष के क्षण में उपस्थित हो — अमृत बँटते समय तो सब साथ थे (D029-मोहिनी प्रसंग); हलाहल के समय जो गोद बनी, वह तारा। इसीलिए परंपरा तारा को "तत्काल-कृपा" की देवी कहती है — उनकी करुणा विद्युत-वेग है, विधि-प्रतीक्षा नहीं करती; डूबते के लिए कल की नाव किस काम की?

तारापीठ — श्मशान जहाँ माँ रहती है

बंगाल के बीरभूम में द्वारका नदी के तट पर तारा का महापीठ है — तारापीठ: शक्तिपीठ-परंपरा में सती के नेत्र-तारा (आँख की पुतली) के पतन की स्थल-मान्यता (पीठ-सूचियों में स्थान-भेद — चिह्नित), और व्यवहार में भारत का सबसे जीवित तंत्र-क्षेत्र। यहीं वशिष्ठ-साधना की स्थल-स्मृति है, और यहीं का महाश्मशान वह विरल स्थान है जहाँ श्मशान-वैराग्य और मातृ-भक्ति एक हो गए हैं। इस पीठ का आधुनिक इतिहास एक नाम से आलोकित है — बामाखेपा (1837-1911; "खेपा" = पागल — माँ का पागल): वह अवधूत जो मंदिर-मर्यादाओं के पार माँ से बालक की तरह लड़ता, रूठता, भोग स्वयं चखकर माँ को खिलाता था; लोक-स्मृति कहती है कि रानी के स्वप्न में देवी ने स्वयं कहा — "पहले मेरे बामा को खिलाओ, तब मैं खाऊँगी" (परंपरा-अभिलेख — ग्रेड B)। बामाखेपा का पाठ तारा-तत्त्व की कुंजी है: तारने वाली को शुद्धता के प्रमाणपत्र नहीं चाहिए — पुकार चाहिए; श्मशान का अवधूत और घर की गृहिणी उसकी दृष्टि में एक हैं, क्योंकि नाविका यह नहीं पूछती कि डूबने वाला किस घाट से गिरा। आज भी तारापीठ में गृहस्थ-यात्री और कापालिक-साधक एक ही पंक्ति में खड़े मिलते हैं — भारतीय धर्म की समावेश-क्षमता का जीवित चित्र।

नील-सरस्वती — वाणी जो बिजली बनकर उतरती है

तारा का नील-सरस्वती मुख अलग टिप्पणी माँगता है, क्योंकि वह भारतीय विद्या-दर्शन का एक सूक्ष्म भेद खोलता है। श्वेत सरस्वती (D008) क्रम की विद्या हैं — अभ्यास, रियाज़, वर्ष-दर-वर्ष सधता स्वर; नील-सरस्वती कौंध की विद्या हैं — वह क्षण जब अटकी वाणी अकस्मात् खुल जाए, जब कवि पर पंक्ति उतर आए, जब शास्त्रार्थ में उत्तर बिजली-सा सूझे। बंगाल-मिथिला-असम की शाक्त कवि-परंपरा इसीलिए तारा-उपासक रही — लोक-स्मृति रामप्रसाद और कमलाकांत जैसे श्यामा-संगीत कवियों की प्रतिभा को देवी-कृपा की कौंध ही कहती है; और परंपरा में हकलाहट, वाक्-भय या सभा-संकोच से पीड़ितों के लिए तारा-स्मरण की विशेष धारा मिलती है — तारने वाली उन्हें भी तारती है जो अपने ही कण्ठ में डूबे हों। साधना-दृष्टि से दोनों सरस्वतियाँ पूरक हैं: नील की कौंध बिना श्वेत के अभ्यास-पात्र के टिकती नहीं — बिजली गिरने के लिए भी खड़ा वृक्ष चाहिए।

दो परंपराओं की एक देवी — बौद्ध-तारा का ईमानदार नोट

तारा-अध्ययन एक तुलनात्मक तथ्य के बिना अधूरा है, और यह कोश उसे छिपाने की जगह दर्ज करता है: तारा बौद्ध वज्रयान परंपरा की भी महादेवी हैं — तिब्बत-नेपाल-मंगोलिया के करोड़ों बौद्धों की करुणा-माता (हरित-तारा, श्वेत-तारा आदि इक्कीस रूप), अवलोकितेश्वर के करुणा-अश्रु से जन्मी मानी जातीं। धर्म-इतिहासकार मानते हैं कि हिंदू-तांत्रिक तारा और बौद्ध तारा की धाराएँ मध्यकालीन पूर्वी भारत (बंगाल-बिहार के पाल-युग) में गहरे संपर्क में विकसित हुईं — "महाचीन-आचार" की वशिष्ठ-कथा स्वयं इस संपर्क की पुराण-स्मृति मानी जाती है (तुलनात्मक धर्म-इतिहास — ग्रेड B; दोनों परंपराएँ अपनी-अपनी दृष्टि में स्वतंत्र और पूर्ण हैं — यह कोश किसी को किसी का "स्रोत" घोषित नहीं करता)। साधक के लिए इसका अर्थ विवाद नहीं, विस्मय होना चाहिए: एक ही तारक-करुणा दो महाधर्मों में बही और दोनों ने उसे माँ कहा — एशिया के आधे भूभाग में, हिमालय के दोनों ओर, संकट में पुकारा जाने वाला नाम एक ही है: तारा। मंडल-यात्रा में उनका स्थान अब स्पष्ट है: काली ने काल का भय काटा (D070) — पर भय कटने के बाद भी भव-सागर तैरना शेष रहता है; तारा वह नौका हैं। अगला द्वार सौंदर्य का है — त्रिपुरसुन्दरी (D072)। ॥ तारा तारयतु सदा ॥

स्रोत टिप्पणी: वशिष्ठ-चीनाचार कथा — तारा-तंत्र/ब्रह्मयामल/रुद्रयामल धाराएँ (ग्रेड B — तंत्र-निबंध परंपरा; पाठ-भेद बहुल; वैदिक संहिताओं में अनुपस्थित — स्तर स्पष्ट चिह्नित); शिव-स्तन्यपान नील-प्रसंग — शाक्त-लोक धारा (ग्रेड B/C — चिह्नित; मंथन मुख्य-रेखा D002/D017, नीलकंठ D003); तारापीठ नेत्र-पतन मान्यता (पीठ-सूची भेद चिह्नित) एवं बामाखेपा 1837-1911 — स्थल-परंपरा/अभिलेखित इतिहास (ग्रेड A/B); बौद्ध-तारा इक्कीस-रूप परंपरा एवं पाल-युग संपर्क — तुलनात्मक धर्म-इतिहास (ग्रेड B; तटस्थ-अभिलेख नीति)। उग्रतारा/एकजटा/नील-सरस्वती रूप-त्रय — तंत्रसार-धारा (ग्रेड B)। बीज-मंत्र/साधना-विधि गुरु-गम्य — अप्रकाशित (D070-घोषित मंडल-नीति)। दर्शन-अंश व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
तारा / तारिणी
"तारयति इति" — पार लगाने वाली; भव-सागर की नाविका।
नील-सरस्वती
वाक्-विद्या का नील-उग्र मुख — कवित्व और वाक्-सिद्धि की धारा।
उग्रतारा
उग्र संकट में उग्र-वेग कृपा — आपद्-तारिणी रूप।
एकजटा
एक जटा वाली — एकाग्र-शक्ति का रूप-नाम।
तारा (नाम-भेद नोट)
बृहस्पति-पत्नी तारा (D047-प्रकरण) भिन्न व्यक्तित्व — भ्रम-निवारण अनिवार्य।

मंत्र एवं नीति

Mantras

नाम-स्मरण

ॐ श्री तारायै नमः ॥  ·  जय तारा, जय माँ तारा ॥

टिप्पणी: बंगाल की श्यामा-संगीत परंपरा में तारा-नाम के भक्ति-गीतों (बामाखेपा-धारा) का समृद्ध कोश है — रचनाकार-श्रेय सहित चयन भावी मंत्र-सूचकांक में।

तारा बीज-मंत्र, कवच एवं साधना-विधियाँ दीक्षा-गम्य — मंडल-नीति (D070) अनुसार अप्रकाशित। तारा-शतनाम/अष्टोत्तर के सत्यापित पाठ भावी विस्तार में।

पर्व एवं उपासना-काल

Festivals
तारा-रात्रि (चतुर्दशी-धारा)
शुक्ल चतुर्दशी — तारापीठ की विशेष रात्रियाँ; कौशिकी-अमावस्या महासमागम।
कौशिकी अमावस्या
भाद्र-अमावस्या — तारापीठ का सबसे बड़ा वार्षिक समागम (बामाखेपा-सिद्धि तिथि परंपरा)।
गुप्त-नवरात्र
महाविद्या-मंडल का साझा उपासना-काल (D070-सूत्र)।
बसंत-पंचमी सेतु
श्वेत-सरस्वती के पर्व पर नील-सरस्वती स्मरण की परंपरा-धारा (D008)।

मंदिर एवं पीठ

Temples
तारापीठ, बीरभूम (बंगाल)
महापीठ — द्वारका-तट मंदिर + महाश्मशान; बामाखेपा-समाधि।
उग्रतारा, गुवाहाटी
कामाख्या-क्षेत्र की तारा — असम-धारा (महाविद्या-भूगोल D070)।
तारा-तारिणी, ओडिशा
गंजाम का पहाड़ी युग्म-पीठ — स्तन-पीठ मान्यता; आदि-शक्ति क्षेत्र।
महाचीन-स्मृति क्षेत्र
वशिष्ठ-कथा की उत्तर-पूर्व स्थल-परंपराएँ (हाजो आदि) — हिंदू-बौद्ध साझा तीर्थ।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: तारा माँ दूसरी महाविद्या हैं। उनका नाम "तारना" से बना है — यानी मुश्किल से पार लगाना! जैसे नाव डूबते को किनारे ले जाती है, वैसे तारा माँ संकट में पड़े लोगों की मदद करती हैं। उन्हें नील-सरस्वती भी कहते हैं — पढ़ाई-लिखाई और बोलने की शक्ति देने वाली।

रोचक तथ्य:

  • बंगाल का तारापीठ मंदिर इनका सबसे बड़ा धाम है।
  • तिब्बत और नेपाल के बौद्ध भी तारा देवी को माँ की तरह पूजते हैं!
  • बृहस्पति ग्रह की कथा वाली तारा अलग हैं — बस नाम एक जैसा है।
  • बामाखेपा नाम के भक्त माँ से बच्चे की तरह बातें करते थे!

सीख: वशिष्ठ ऋषि की कथा सिखाती है — सीखने के लिए झुकना पड़ता है। जो कहता है "मुझे सब आता है", उसका सीखना वहीं रुक जाता है।

मिनी क्विज़:

  1. तारा नाम का क्या अर्थ है?
  2. इनका सबसे बड़ा मंदिर कहाँ है?
  3. इन्हें कौन-सी सरस्वती कहते हैं?
  4. तारा किस क्रम की महाविद्या हैं?