भंडासुर-वध — काम की राख से जन्मे का अंत
पूर्व-पीठिका — जली हुई वासना का पुनर्जन्म
यह कथा वहीं से उठती है जहाँ शिव-कथा का एक प्रसिद्ध अध्याय समाप्त होता है — काम-दहन (D003/D006-मंडल): तप-भंग करने आए कामदेव को शिव के तृतीय नेत्र ने भस्म कर दिया। ललितोपाख्यान पूछता है — उस राख का क्या हुआ? उत्तर भयावह है: शिव-गण चित्रकर्मा ने खेल-खेल में उस भस्म से एक पुतला रचा — और उसमें प्राण आ गए; रुद्र-अंश के स्पर्श से जन्मा वह पुरुष घोर तप कर ब्रह्मा से साठ हज़ार वर्ष का अजेय राज्य-वर ले बैठा। ब्रह्मा के मुख से निकला था — "भण्ड! भण्ड!" (धिक्! धिक्!) — वही नाम चिपक गया: भंडासुर। प्रतीक-कोश यहीं खुल जाता है: भंडासुर दमित-दग्ध काम का विकृत पुनर्जन्म है — वासना जो मारी तो गई पर रूपांतरित नहीं हुई; राख से उठी कुंठा, जो अब सृष्टि-भर से बदला लेगी। उसने शुक्राचार्य (D048) को गुरु-पद दिया, शोणितपुर से त्रिलोक पर शासन तानां — और उसका शासन-सूत्र ध्यान देने योग्य है: उसने संसार से रस सोख लिया — ललितोपाख्यान कहता है कि उसके राज्य में यज्ञ रुके, उत्सव मुरझाए, प्रेम सूखा; जगत् चलता रहा, पर स्वाद-हीन। दमित काम की कुंठा का यही समाजशास्त्र है — वह आनंद को नष्ट नहीं करती, आनंद की क्षमता को करती है।
चिता से सिंहासन तक — ललिता का प्राकट्य
त्रस्त देवों ने नारद-परामर्श से महायज्ञ रचा — महा-कामेश्वर याग; और उस यज्ञ-कुंड के चिदग्नि (चैतन्य-अग्नि) से श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी प्रकट हुईं — उदय-अरुण वर्ण, करुणा-तरंगित नेत्र, चतुर्भुज आयुध। यहाँ ललितोपाख्यान का सौंदर्य-शास्त्र देखिए: काली धधकती चिता से जुड़ी हैं, ललिता यज्ञ-अग्नि से — दोनों अग्नि-जा हैं, पर एक संहार-मुखी, एक संस्कार-मुखी। देवताओं ने तत्क्षण उनका राज्याभिषेक किया — वे राजराजेश्वरी हुईं (राजाओं के राजा की भी ईश्वरी); कामेश्वर-रूपधारी शिव से उनका विवाह हुआ — कामेश्वरी-कामेश्वर युग्म: दग्ध काम का शुद्ध पुनर्जन्म देवी के ही विवाह में हुआ — जो वासना भंडासुर बनी थी, वही प्रेम बनकर सिंहासन पर बैठी। फिर श्रीनगर (श्रीपुर) महानगरी बसी, और युद्ध-यात्रा सजी — ऐसी सेना जो विश्व-साहित्य में अद्वितीय है: पूर्णतः स्त्री-सेना — शक्ति-सेनाएँ, मंत्रिणी श्यामला (मंत्र-शक्ति; मातंगी-धारा D078), दंडनाथा वाराही (दंड-शक्ति), अश्वारूढ़ा, सम्पत्करी — और स्वयं महारानी चक्रराज-रथ पर। ललितोपाख्यान युद्ध-वर्णन में एक-एक शक्ति के पराक्रम गिनाता है — भारतीय ग्रंथ-परंपरा का सबसे विस्तृत नारी-सैन्य महाकाव्य।
युद्ध — जहाँ हर अस्त्र का उत्तर सौंदर्य था
भंडासुर-युद्ध का शिल्प साधारण देवासुर-संग्राम नहीं — प्रतीक-द्वंद्व है। भंडासुर ने जो-जो अस्त्र छोड़े, वे कुंठा के अस्त्र थे; ललिता-पक्ष ने हर एक का उत्तर उसी तत्त्व के स्वस्थ रूप से दिया। असुर ने विघ्न-यंत्र (जय-विघ्न) फेंका — सेना ठिठकी; देवी की कटाक्ष-मुस्कान से महागणेश प्रकट हुए (D004-सूत्र) और यंत्र चूर किया — विघ्न का उत्तर मंगलमूर्ति। असुर-पुत्रों के विरुद्ध बाला (देवी की नौ-वर्षीया कन्या-रूपा) उतरीं — कुटिलता का उत्तर निष्कपट बाल-तेज। भंडासुर ने अंतिम दाँव में महामोहास्त्र/भयासुर-सृष्टियाँ छोड़ीं — हिरण्याक्ष से रावण तक के असुर-प्रेत पुनः उठा दिए; देवी ने उत्तर में अपने कर-नखों से दश-अवतार प्रकट किए (मत्स्य से कल्कि — D016-D023 मंडल!) — हर पुराने अंधकार का उत्तर उसका पुराना विजेता। और अंत में कामेश्वरास्त्र — जिसने भंडासुर को शोणितपुर समेत भस्म किया: जो राख से जन्मा था, राख हो गया। पर कथा यहाँ नहीं रुकती — विजय के बाद देवताओं ने प्रार्थना की कि कामदेव को पुनर्जीवन मिले: देवी की कृपा-दृष्टि से रति-सहित काम पुनः जीवित हुए (D006-मंडल के काम-पुनर्जीवन सूत्र से संगत)। यही इस महाकाव्य का घोष है: श्रीविद्या काम-नाशक नहीं — काम-शोधक है; वासना को जलाना समाधान नहीं था (राख से भंडासुर उठा), उसे सुंदर करना समाधान है — कुंठा मरे, काम जिए।
श्रीविद्या-परंपरा — तंत्र जो वेदांत से गले मिला
ललिता की उपासना-धारा — श्रीविद्या — भारतीय तंत्र-इतिहास की सबसे विलक्षण परिघटना है: वह तंत्र जो वेद-विरोधी छवि से सर्वथा मुक्त होकर शंकराचार्य-पीठों का उपासना-तंत्र बन गया। परंपरा सौन्दर्यलहरी और प्रपंचसार जैसे ग्रंथ आदि शंकराचार्य से जोड़ती है (रचयिता-प्रश्न शोध-विमर्शित — ग्रेड B, चिह्नित); कांची और शृंगेरी की पीठ-परंपराओं में श्रीचक्र-अर्चना आज तक अखंड है — अद्वैत-वेदांत के आचार्य जिस एक देवी-यंत्र की नित्य पूजा करते आए, वह श्रीचक्र है। इस संगम का दार्शनिक कारण भी स्पष्ट है: श्रीविद्या का केंद्र-सिद्धांत — शिव-शक्ति अभेद, जगत् देवी का ही स्फुरण — अद्वैत की "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" घोषणा की ही शाक्त-भाषा है; बिंदु से त्रिकोण, त्रिकोण से नव-आवरण, आवरण से जगत् — श्रीचक्र वही सृष्टि-क्रम रेखांकित करता है जो उपनिषद् शब्दों में कहते हैं। दक्षिण की गृह-परंपरा में यह दर्शन कुंकुम-अर्चना जैसी सरल विधि बनकर उतरा — सहस्रनाम के हर नाम पर एक चुटकी कुंकुम: दर्शन जितना ऊँचा, विधि उतनी घरेलू — यही श्रीविद्या की पहचान है। एक और परंपरा-रत्न यहीं दर्ज हो: ललिता-चक्र की षोडश नित्याएँ — चंद्रमा की सोलह कलाओं से जुड़ी सोलह नित्या-देवियाँ (कामेश्वरी से चित्रा तक), जिनमें प्रतिपदा से पूर्णिमा तक हर तिथि की अपनी देवी है और पूर्णिमा स्वयं महात्रिपुरसुन्दरी — समय का चंद्र-चक्र ही देवी का विग्रह हो गया (तंत्रराज-तंत्र धारा — ग्रेड B; विवरण दीक्षा-क्षेत्र)। चंद्र-कला और देवी-कला का यह मेल बताता है कि श्रीविद्या ने ज्योतिष (D044-चन्द्र) तक को उपासना-भाषा में पढ़ लिया।
श्रीचक्र और सहस्रनाम — विजय का स्थायी रूप
ललितोपाख्यान-चक्र की परिणति दो महा-उपहारों में हुई, जो आज भी श्रीविद्या के दो स्तंभ हैं। पहला — श्रीचक्र: नौ आवरणों (नव-आवरण) का वह यंत्रराज जिसके केंद्र-बिंदु में देवी और चारों ओर शिव-शक्ति त्रिकोणों का 43-त्रिकोणीय ब्रह्मांड-मानचित्र है — परंपरा इसे देवी का यंत्र-देह कहती है; बहिर्मुख पूजा मूर्ति की, अंतर्मुख श्रीचक्र की (नव-आवरण विधि दीक्षा-गम्य — यहाँ केवल दर्शन-परिचय)। दूसरा — ललिता-सहस्रनाम: ब्रह्मांड पुराण-अंतर्गत वह सहस्र-नाम स्तोत्र जिसे वाग्देवियों (वशिन्यादि आठ वाक्-देवियों) ने देवी की आज्ञा से रचा — स्तोत्र-साहित्य में सम्भवतः सर्वाधिक व्यवस्थित: एक भी नाम पुनरुक्त नहीं, और नामों का क्रम स्वयं दर्शन-यात्रा है ("श्रीमाता" से आरम्भ — पहले माँ, फिर महारानी "श्रीमहाराज्ञी")। दक्षिण भारत के घरों में शुक्रवार-सहस्रनाम पाठ आज भी जीवित सामूहिक-परंपरा है (पूर्ण पाठ भावी मंत्र-सूचकांक — यहाँ नीति-अनुसार परिचय-मात्र)। मंडल-यात्रा में ललिता का पाठ अब स्पष्ट है: काली ने काल-भय काटा (D070), तारा ने भव-सागर पार कराया (D071) — ललिता सिखाती हैं कि पार उतरा हुआ जीवन रस-हीन वैराग्य नहीं: सत्य सुंदर भी है; शिवम् के साथ सुन्दरम् भी उतना ही परम है। ॥ श्रीमात्रे नमः ॥