महाविद्या भुवनेश्वरी

Bhuvaneshvari · जगत्-धात्री · आकाशेश्वरी · महामाया

भुवन — लोक; ईश्वरी — स्वामिनी: चौदह भुवनों की महारानी। चतुर्थी महाविद्या वह देवी हैं जिनकी देह स्वयं अवकाश है — वह आकाश जो सबको जगह देता है और स्वयं किसी में नहीं समाता। जहाँ काली काल हैं, वहाँ भुवनेश्वरी देश (space) — समय और स्थान, दोनों देवी हुए।

पद: दशमहाविद्या-4 (श्रीकुल-धारा) तत्त्व: आकाश — जगत् का धारण-अवकाश स्वरूप: उदयारुण, स्मित-मुखी, वर-अंकुश-पाश क्षेत्र-धारा: भुवनेश्वर-गौहाटी-दक्षिण पीठ
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भुवन-धात्रीचौदह लोकों को धारण करने वाली
आकाश-तत्त्वजो सबको जगह दे — स्वयं अदृश्य रहकर
स्मित-मुखीमंडल की सबसे सौम्य — सदा मुस्काती माँ
महामायाजगत् जिसका विस्तार, माया जिसकी क्रीड़ा

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

महाविद्या-मंडल की चौथी देवी का नाम ही उनका सिंहासन है: भुवनेश्वरी — भुवनों की ईश्वरी। भारतीय ब्रह्मांड-विद्या चौदह भुवन गिनाती है — सात ऊर्ध्व (भूः से सत्यम् तक), सात अधः (अतल से पाताल) — और भुवनेश्वरी वह सत्ता हैं जिनमें ये चौदहों समाए हैं: जगत् उनकी देह है, वे जगत् की आत्मा। तत्त्व-भाषा में वे आकाश हैं — पंच-महाभूतों का प्रथम और सूक्ष्मतम: वह अवकाश जो हर वस्तु को होने की जगह देता है। काली यदि काल (समय) की विद्या हैं (D070), तो भुवनेश्वरी देश (स्थान) की — मंडल ने भौतिकी के दोनों निर्देशांक देवी कर दिए।

स्वरूप-ध्यान मंडल का सौम्यतम है: उदय-सूर्य की अरुणिमा, मस्तक पर चन्द्र-मुकुट, सदा-स्मित मुख, चतुर्भुजा — वर-अभय मुद्राएँ और पाश-अंकुश। त्रिपुरसुन्दरी (D072) से घनिष्ठ रूप-साम्य है — दोनों श्री-धारा की देवियाँ हैं; भेद सूक्ष्म है: सुन्दरी रस की परा हैं, भुवनेश्वरी अवकाश की — एक अनुभव का माधुर्य, दूसरी अनुभव का आधार। उनका एकाक्षर तत्त्व-बीज परंपरा में "ह्रीं" कहा जाता है — जिसे तंत्र "शाक्त-प्रणव" कहता है: जैसे ॐ परब्रह्म का वाचक, वैसे ह्रीं भुवनेश्वरी-तत्त्व का (बीज-प्रयोग दीक्षा-गम्य — यहाँ तत्त्व-परिचय मात्र, मंडल-नीति)

मंडल एवं संबंध

Mandala
  • मंडल-क्रमत्रिपुरसुन्दरी (D072) → भुवनेश्वरी → छिन्नमस्ता (D074)
  • तत्त्व-मूलमहाशक्ति (D006/D009) का विश्व-धारण पद; महामाया-नाम देवी-भागवत धारा
  • तत्त्व-युग्मकाली (D070) — काल-देश युग्म: समय-स्थान की दो विद्याएँ
  • धारा-सम्बन्धशाकम्भरी-दुर्गा (D009-मंडल) — जगत्-पोषण मुख; भूदेवी (D060) — स्थूल-पक्ष
  • विरल-धाराअद्भुत रामायण की सीता-शक्ति (D015-सूत्र) — कथा-खंड में चिह्नित

प्रमुख कथा

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प्रमुख कथा / तत्त्व-कथा

जगह देने वाली — आकाश जो माँ हो गया

पहला प्रश्न — सबको जगह कौन देता है?

हर दर्शन-परंपरा का अपना आदि-प्रश्न होता है। भुवनेश्वरी-विद्या का प्रश्न बच्चों जैसा सरल और भौतिकी जैसा गहरा है: हर चीज़ कहीं-न-कहीं है — पर वह "कहीं" कहाँ है? पृथ्वी अंतरिक्ष में है, अंतरिक्ष ब्रह्मांड में — और ब्रह्मांड? जिस अवकाश में सब समाया है, वह किसमें समाया है? उपनिषद्-सांख्य परंपरा पंच-महाभूतों में आकाश को प्रथम रखती है — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु सब उसके भीतर घटते हैं; वह सबका अवकाश-दाता है और स्वयं किसी में नहीं समाता। तैत्तिरीय की सृष्टि-शृंखला "आत्मन आकाशः सम्भूतः" (आत्मा से आकाश हुआ — 2.1) उसे चेतना का पहला स्पंदन कहती है। शाक्त-दर्शन ने इस तत्त्व-चिंतन को एक ही छलांग में उपासना बना दिया: वह परम-अवकाश कोई है — भुवनेश्वरी; जगत् उनमें ऐसे है जैसे गर्भ में शिशु — घेरा हुआ भी, पाला हुआ भी, फिर भी स्वतंत्र स्पंदन करता। देवी-भागवत का मणिद्वीप-वर्णन इसी दर्शन का काव्य-चित्र है (12वें स्कंध की धारा — ग्रेड A/B): सर्वोच्च लोक — सुधा-सागर के मध्य रत्न-द्वीप — जहाँ देवी भुवनेश्वरी-रूप में विराजती हैं और जिसके आगे कोई "ऊपर" नहीं; ब्रह्मांड-भूगोल की अंतिम परिधि एक माँ का घर है। यह चित्र जितना अलंकारिक है, उतना ही दार्शनिक: अस्तित्व की अंतिम सीमा पर भय नहीं — आतिथ्य है।

माया और मुस्कान — महामाया का सौम्य मुख

भुवनेश्वरी का दूसरा महानाम महामाया है — और यहाँ मंडल-दर्शन की एक सूक्ष्मता खुलती है। "माया" शब्द भारतीय चिंतन में प्रायः भ्रम-अर्थ में बदनाम है; पर शाक्त-धारा में माया देवी की सृजन-कला है — वह सामर्थ्य जिससे एक अखंड सत्ता स्वयं को अनेक रूपों में खेलती है। भुवनेश्वरी का सदा-स्मित मुख इसी का संकेत है: जगत् उनके लिए बोझ नहीं — लीला है; चौदह भुवनों का भार उठाने वाली के चेहरे पर थकान नहीं, कौतुक है — जैसे माँ आँगन में खेलते बच्चों को देखकर मुस्काए। उनके आयुध भी करुणा-व्याकरण में लिखे हैं: पाश — जो भटके को खींच ले (बंधन नहीं, आलिंगन की डोर), अंकुश — जो बहके को दिशा दे (दंड नहीं, महावत का स्नेह-निर्देश), और शेष दो कर वर-अभय में खुले — देना और निर्भय करना। तंत्र-परंपरा इसीलिए भुवनेश्वरी को मंडल का सौम्य-द्वार कहती है: काली-छिन्नमस्ता की उग्रता जिस साधक को अभी असह्य हो, उसे आचार्य भुवनेश्वरी-द्वार से प्रवेश कराते हैं — वही सत्य, कोमल भाषा में। शाकम्भरी-धारा (D009-मंडल) से भी उनका भाव-सम्बन्ध जुड़ता है — जो देवी अकाल में अपनी देह से शाक उपजाकर जगत् पालती हैं, वह भुवन-धारण का ही अन्न-मुख है: जगह देना और भोजन देना, दोनों धारण-करुणा के दो हाथ हैं।

सीता का विराट् — अद्भुत रामायण की विरल धारा

भुवनेश्वरी-साहित्य की सबसे चौंकाने वाली कथा-धारा रामकथा के एक उप-ग्रंथ से आती है — अद्भुत रामायण (उप-रामायण/शाक्त-रामायण वर्ग; ग्रेड B/C — मुख्य वाल्मीकि-परंपरा से भिन्न, स्तर स्पष्ट चिह्नित)। कथा: रावण-वध के बाद सभा में राम-प्रशस्ति चल रही थी; सीता (D015) मुस्काईं — बोलीं, यह दशकंठ तो छोटा युद्ध था; इसका ज्येष्ठ-बंधु सहस्रमुख रावण (सहस्र सिरों वाला — पुष्कर-द्वीपवासी) अजेय है। राम ससैन्य उस पर चढ़े — और उप-ग्रंथ निर्भीक लिखता है: राम-लक्ष्मण समेत पूरी सेना संकट में पड़ गई; तब सीता ने वह रूप धरा जिसे ग्रंथ महाकाली-भुवनेश्वरी शक्ति-रूप कहता है — विराट्, प्रलयंकर — और सहस्रमुख क्षण में समाप्त हुआ; ब्रह्मांड काँपा, और देवताओं ने उस रूप की स्तुति भुवनेश्वरी-नामों से की; राम ने भी हाथ जोड़कर स्वीकारा कि जिसे वे पत्नी-रूप में जानते थे, वह जगत्-धात्री है। इस धारा का प्रयोजन पारदर्शी है — यह शाक्त-दृष्टि की रामकथा है: हर देवी में भुवनेश्वरी सोई है — धैर्य-मूर्ति सीता में भी वह विराट् है जो आवश्यकता पर चौदह भुवन हिला दे। मुख्य-परंपरा (D013/D015) से इसका सम्बन्ध प्रतिस्पर्धा का नहीं, कोण का है — जैसे इस कोश में हर कथा का स्तर-चिह्न कहता आया है: परंपराएँ परतें हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं।

देश-काल की देवियाँ — विज्ञान-प्रिय मन के लिए एक खिड़की

मंडल-रचना की एक विलक्षणता यहाँ ठहरकर देखने योग्य है। आधुनिक भौतिकी ब्रह्मांड को जिन दो आधार-निर्देशांकों में पढ़ती है — समय और स्थान (space-time) — शाक्त-मंडल ने उन्हीं दोनों को अपनी पहली और चौथी विद्या बनाया: काली काल हैं, भुवनेश्वरी देश। यह कोई खींची हुई तुलना नहीं — नाम स्वयं यही कहते हैं: "काली" काल से, "भुवनेश्वरी" भुवन (लोक-अवकाश) से; और तंत्र-ग्रंथ दोनों को युग्म-विद्या की तरह साधने की परंपरा भी जानते हैं (तंत्र-निबंध धारा — ग्रेड B)। सावधानी भी उतनी ही ज़रूरी: यह कोश विज्ञान-दावा नहीं कर रहा — सापेक्षता-सिद्धांत पुराणों में "लिखा" नहीं है; कहा केवल यह जा रहा है कि जिस प्रश्न तक भौतिकी माप से पहुँची, वहाँ तक दर्शन ध्यान से पहुँचा था — और उसने उत्तर को समीकरण नहीं, माँ कहा। विज्ञान-प्रिय पाठक के लिए भुवनेश्वरी सबसे सहज द्वार हैं: अवकाश को देवी की तरह देखना अंधविश्वास नहीं — कृतज्ञता की दृष्टि है उस "होने की जगह" के प्रति, जिसे कोई समीकरण उत्पन्न नहीं करता, केवल मान कर चलता है।

जीवन-पाठ — जगह देने की साधना

भुवनेश्वरी-विद्या का व्यावहारिक पाठ उसके तत्त्व से सीधा उतरता है — जगह देना। आकाश की महिमा क्या है? वह किसी से स्पर्धा नहीं करता, किसी को रोकता नहीं, हर वस्तु को होने देता है — और इसी "होने देने" में सर्वव्यापी है। मनुष्य के लिए यही साधना है: जिस घर में हर सदस्य को होने की जगह मिले — बच्चे को प्रश्न की, वृद्ध को धीमेपन की, स्त्री को स्वप्न की — वह घर भुवनेश्वरी का मंदिर है; जो मन दूसरे के मत को बिना काटे बैठने की जगह दे दे, वह मन आकाश-दीक्षित है। ध्यान-परंपरा में भुवनेश्वरी-उपासना का प्रवेश-अभ्यास भी यही है — अवकाश-भावना: नेत्र मूँदकर भीतर के आकाश को देखना, विचारों को बादलों-सा आने-जाने देना, स्वयं को घटनाएँ नहीं — घटनाओं का आकाश जानना; आधुनिक साक्षी-ध्यान (witness meditation) की समस्त पद्धतियाँ इसी तत्त्व की परिक्रमा हैं। और अंतिम सूत्र मंडल-क्रम से: सुन्दरी ने सिखाया कि सत्य सुंदर है (D072) — भुवनेश्वरी जोड़ती हैं कि सौंदर्य को भी प्रकट होने के लिए अवकाश चाहिए: रंगमंच के बिना नृत्य कहाँ? अगला द्वार मंडल का सबसे तीक्ष्ण है — छिन्नमस्ता (D074): जो अवकाश देना सीख गया, अब वही आत्म-दान की विद्युत झेल सकता है। ॥ ह्रीं-मयी भुवनेश्वरी की जय ॥

स्रोत टिप्पणी: चौदह-भुवन ब्रह्मांड-क्रम — पुराण-सामान्य (ग्रेड A/B); "आत्मन आकाशः सम्भूतः" — तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1 (ग्रेड A — शब्दशः); मणिद्वीप-वर्णन — देवी-भागवत 12-स्कंध धारा (ग्रेड A/B); ह्रीं "शाक्त-प्रणव" पद — तंत्र-निबंध परंपरा (ग्रेड B; बीज-प्रयोग दीक्षा-गम्य, अप्रकाशित — मंडल-नीति D070); सहस्रमुख-रावण/सीता-विराट् — अद्भुत रामायण (उप-रामायण वर्ग; ग्रेड B/C — वाल्मीकि-मुख्यधारा से भिन्न स्पष्ट चिह्नित; D015-गरिमा रेखा से संगत कोण); शाकम्भरी-सम्बन्ध — भाव-सूत्र (व्याख्या-स्तर); पाश-अंकुश करुणा-व्याख्या एवं जीवन-पाठ खंड व्याख्या-स्तर। सौम्य-द्वार आचार्य-रीति — परंपरा-कथन (ग्रेड B/C)।

नाम एवं अर्थ

Names
भुवनेश्वरी
चौदह भुवनों की ईश्वरी — विश्व-साम्राज्ञी पद।
जगत्-धात्री
जगत् को धारण करने वाली — आधार-करुणा का नाम।
महामाया
सृजन-कला की स्वामिनी — माया यहाँ भ्रम नहीं, लीला।
आकाशेश्वरी
आकाश-तत्त्व की देवी — देश (स्थान) की विद्या।
ह्रीं-मयी
शाक्त-प्रणव की मूर्ति — तत्त्व-बीज नाम (दीक्षा-क्षेत्र चिह्नित)।

मंत्र एवं नीति

Mantras

नाम-स्मरण

ॐ श्री भुवनेश्वर्यै नमः ॥

तत्त्व-सूत्र (तैत्तिरीय 2.1)

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ॥

अर्थ: उस आत्मा से (सर्वप्रथम) आकाश उत्पन्न हुआ। — आकाश-तत्त्व की श्रुति-आधारशिला।

ह्रीं-बीज साधना-विधि एवं भुवनेश्वरी कवच-स्तोत्र दीक्षा/सत्यापन-गम्य — मंडल-नीति अनुसार अप्रकाशित; सत्यापित स्तुति-चयन भावी विस्तार में।

पर्व एवं उपासना

Festivals
गुप्त-नवरात्र
महाविद्या-मंडल का साझा उपासना-काल (D070-सूत्र) — चतुर्थ-दिवस धारा।
जगद्धात्री-पूजा सेतु
बंगाल की कार्तिक-शुक्ल जगद्धात्री उपासना — धारण-तत्त्व की सहोदर-परंपरा (भाव-सम्बन्ध)।
पूर्णिमा-धारा
विश्व-पूर्णता की तिथि — भुवनेश्वरी-स्मरण की परंपरा-रुचि।
शाकम्भरी-नवरात्रि सेतु
पौष-शुक्ल शाकम्भरी-पर्व — पोषण-मुख का उत्सव (D009-मंडल)।

मंदिर एवं पीठ

Temples
भुवनेश्वरी मंदिर, कामाख्या-परिसर
नीलाचल के महाविद्या-मंडल की चतुर्थी — पहाड़ी-शिखर धारा।
भुवनेश्वरी पीठ, गोंडल (गुजरात)
सौराष्ट्र की जीवित भुवनेश्वरी-परंपरा — औषध-आश्रम धारा।
भुवनेश्वर-नगरी सेतु (ओडिशा)
"त्रिभुवनेश्वर" शिव-नगरी — नाम-तत्त्व का शैव-पक्ष (लिंगराज-क्षेत्र)।
दक्षिण पीठ-धारा (पुदुक्कोट्टई आदि)
श्रीविद्या-परिवार में भुवनेश्वरी-अर्चना — कुंकुम-परंपरा।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: भुवनेश्वरी माँ चौथी महाविद्या हैं — "भुवन" यानी दुनिया, "ईश्वरी" यानी मालकिन: पूरी दुनिया की माँ! वे आकाश जैसी हैं — आकाश सबको रहने की जगह देता है न? वैसे ही ये देवी सबको अपने आँचल में जगह देती हैं। इनका चेहरा हमेशा मुस्कुराता रहता है।

रोचक तथ्य:

  • पुराणों में चौदह लोक (भुवन) गिनाए गए हैं — सात ऊपर, सात नीचे!
  • ये दस महाविद्याओं में सबसे कोमल-सौम्य देवी मानी जाती हैं।
  • एक कथा में सीता माता ने भुवनेश्वरी-रूप धरकर हज़ार सिर वाले रावण को हराया था!
  • ओडिशा की राजधानी "भुवनेश्वर" का नाम भी भुवन+ईश्वर से बना है।

सीख: आकाश बनो — सबको जगह दो! जो दूसरों को बोलने, खेलने, बढ़ने की जगह देता है, वही सबसे बड़ा बनता है।

मिनी क्विज़:

  1. भुवनेश्वरी किस क्रम की महाविद्या हैं?
  2. "भुवन" का क्या अर्थ है?
  3. कुल कितने भुवन गिनाए जाते हैं?
  4. ये किस तत्त्व की देवी हैं?