जगह देने वाली — आकाश जो माँ हो गया
पहला प्रश्न — सबको जगह कौन देता है?
हर दर्शन-परंपरा का अपना आदि-प्रश्न होता है। भुवनेश्वरी-विद्या का प्रश्न बच्चों जैसा सरल और भौतिकी जैसा गहरा है: हर चीज़ कहीं-न-कहीं है — पर वह "कहीं" कहाँ है? पृथ्वी अंतरिक्ष में है, अंतरिक्ष ब्रह्मांड में — और ब्रह्मांड? जिस अवकाश में सब समाया है, वह किसमें समाया है? उपनिषद्-सांख्य परंपरा पंच-महाभूतों में आकाश को प्रथम रखती है — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु सब उसके भीतर घटते हैं; वह सबका अवकाश-दाता है और स्वयं किसी में नहीं समाता। तैत्तिरीय की सृष्टि-शृंखला "आत्मन आकाशः सम्भूतः" (आत्मा से आकाश हुआ — 2.1) उसे चेतना का पहला स्पंदन कहती है। शाक्त-दर्शन ने इस तत्त्व-चिंतन को एक ही छलांग में उपासना बना दिया: वह परम-अवकाश कोई है — भुवनेश्वरी; जगत् उनमें ऐसे है जैसे गर्भ में शिशु — घेरा हुआ भी, पाला हुआ भी, फिर भी स्वतंत्र स्पंदन करता। देवी-भागवत का मणिद्वीप-वर्णन इसी दर्शन का काव्य-चित्र है (12वें स्कंध की धारा — ग्रेड A/B): सर्वोच्च लोक — सुधा-सागर के मध्य रत्न-द्वीप — जहाँ देवी भुवनेश्वरी-रूप में विराजती हैं और जिसके आगे कोई "ऊपर" नहीं; ब्रह्मांड-भूगोल की अंतिम परिधि एक माँ का घर है। यह चित्र जितना अलंकारिक है, उतना ही दार्शनिक: अस्तित्व की अंतिम सीमा पर भय नहीं — आतिथ्य है।
माया और मुस्कान — महामाया का सौम्य मुख
भुवनेश्वरी का दूसरा महानाम महामाया है — और यहाँ मंडल-दर्शन की एक सूक्ष्मता खुलती है। "माया" शब्द भारतीय चिंतन में प्रायः भ्रम-अर्थ में बदनाम है; पर शाक्त-धारा में माया देवी की सृजन-कला है — वह सामर्थ्य जिससे एक अखंड सत्ता स्वयं को अनेक रूपों में खेलती है। भुवनेश्वरी का सदा-स्मित मुख इसी का संकेत है: जगत् उनके लिए बोझ नहीं — लीला है; चौदह भुवनों का भार उठाने वाली के चेहरे पर थकान नहीं, कौतुक है — जैसे माँ आँगन में खेलते बच्चों को देखकर मुस्काए। उनके आयुध भी करुणा-व्याकरण में लिखे हैं: पाश — जो भटके को खींच ले (बंधन नहीं, आलिंगन की डोर), अंकुश — जो बहके को दिशा दे (दंड नहीं, महावत का स्नेह-निर्देश), और शेष दो कर वर-अभय में खुले — देना और निर्भय करना। तंत्र-परंपरा इसीलिए भुवनेश्वरी को मंडल का सौम्य-द्वार कहती है: काली-छिन्नमस्ता की उग्रता जिस साधक को अभी असह्य हो, उसे आचार्य भुवनेश्वरी-द्वार से प्रवेश कराते हैं — वही सत्य, कोमल भाषा में। शाकम्भरी-धारा (D009-मंडल) से भी उनका भाव-सम्बन्ध जुड़ता है — जो देवी अकाल में अपनी देह से शाक उपजाकर जगत् पालती हैं, वह भुवन-धारण का ही अन्न-मुख है: जगह देना और भोजन देना, दोनों धारण-करुणा के दो हाथ हैं।
सीता का विराट् — अद्भुत रामायण की विरल धारा
भुवनेश्वरी-साहित्य की सबसे चौंकाने वाली कथा-धारा रामकथा के एक उप-ग्रंथ से आती है — अद्भुत रामायण (उप-रामायण/शाक्त-रामायण वर्ग; ग्रेड B/C — मुख्य वाल्मीकि-परंपरा से भिन्न, स्तर स्पष्ट चिह्नित)। कथा: रावण-वध के बाद सभा में राम-प्रशस्ति चल रही थी; सीता (D015) मुस्काईं — बोलीं, यह दशकंठ तो छोटा युद्ध था; इसका ज्येष्ठ-बंधु सहस्रमुख रावण (सहस्र सिरों वाला — पुष्कर-द्वीपवासी) अजेय है। राम ससैन्य उस पर चढ़े — और उप-ग्रंथ निर्भीक लिखता है: राम-लक्ष्मण समेत पूरी सेना संकट में पड़ गई; तब सीता ने वह रूप धरा जिसे ग्रंथ महाकाली-भुवनेश्वरी शक्ति-रूप कहता है — विराट्, प्रलयंकर — और सहस्रमुख क्षण में समाप्त हुआ; ब्रह्मांड काँपा, और देवताओं ने उस रूप की स्तुति भुवनेश्वरी-नामों से की; राम ने भी हाथ जोड़कर स्वीकारा कि जिसे वे पत्नी-रूप में जानते थे, वह जगत्-धात्री है। इस धारा का प्रयोजन पारदर्शी है — यह शाक्त-दृष्टि की रामकथा है: हर देवी में भुवनेश्वरी सोई है — धैर्य-मूर्ति सीता में भी वह विराट् है जो आवश्यकता पर चौदह भुवन हिला दे। मुख्य-परंपरा (D013/D015) से इसका सम्बन्ध प्रतिस्पर्धा का नहीं, कोण का है — जैसे इस कोश में हर कथा का स्तर-चिह्न कहता आया है: परंपराएँ परतें हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
देश-काल की देवियाँ — विज्ञान-प्रिय मन के लिए एक खिड़की
मंडल-रचना की एक विलक्षणता यहाँ ठहरकर देखने योग्य है। आधुनिक भौतिकी ब्रह्मांड को जिन दो आधार-निर्देशांकों में पढ़ती है — समय और स्थान (space-time) — शाक्त-मंडल ने उन्हीं दोनों को अपनी पहली और चौथी विद्या बनाया: काली काल हैं, भुवनेश्वरी देश। यह कोई खींची हुई तुलना नहीं — नाम स्वयं यही कहते हैं: "काली" काल से, "भुवनेश्वरी" भुवन (लोक-अवकाश) से; और तंत्र-ग्रंथ दोनों को युग्म-विद्या की तरह साधने की परंपरा भी जानते हैं (तंत्र-निबंध धारा — ग्रेड B)। सावधानी भी उतनी ही ज़रूरी: यह कोश विज्ञान-दावा नहीं कर रहा — सापेक्षता-सिद्धांत पुराणों में "लिखा" नहीं है; कहा केवल यह जा रहा है कि जिस प्रश्न तक भौतिकी माप से पहुँची, वहाँ तक दर्शन ध्यान से पहुँचा था — और उसने उत्तर को समीकरण नहीं, माँ कहा। विज्ञान-प्रिय पाठक के लिए भुवनेश्वरी सबसे सहज द्वार हैं: अवकाश को देवी की तरह देखना अंधविश्वास नहीं — कृतज्ञता की दृष्टि है उस "होने की जगह" के प्रति, जिसे कोई समीकरण उत्पन्न नहीं करता, केवल मान कर चलता है।
जीवन-पाठ — जगह देने की साधना
भुवनेश्वरी-विद्या का व्यावहारिक पाठ उसके तत्त्व से सीधा उतरता है — जगह देना। आकाश की महिमा क्या है? वह किसी से स्पर्धा नहीं करता, किसी को रोकता नहीं, हर वस्तु को होने देता है — और इसी "होने देने" में सर्वव्यापी है। मनुष्य के लिए यही साधना है: जिस घर में हर सदस्य को होने की जगह मिले — बच्चे को प्रश्न की, वृद्ध को धीमेपन की, स्त्री को स्वप्न की — वह घर भुवनेश्वरी का मंदिर है; जो मन दूसरे के मत को बिना काटे बैठने की जगह दे दे, वह मन आकाश-दीक्षित है। ध्यान-परंपरा में भुवनेश्वरी-उपासना का प्रवेश-अभ्यास भी यही है — अवकाश-भावना: नेत्र मूँदकर भीतर के आकाश को देखना, विचारों को बादलों-सा आने-जाने देना, स्वयं को घटनाएँ नहीं — घटनाओं का आकाश जानना; आधुनिक साक्षी-ध्यान (witness meditation) की समस्त पद्धतियाँ इसी तत्त्व की परिक्रमा हैं। और अंतिम सूत्र मंडल-क्रम से: सुन्दरी ने सिखाया कि सत्य सुंदर है (D072) — भुवनेश्वरी जोड़ती हैं कि सौंदर्य को भी प्रकट होने के लिए अवकाश चाहिए: रंगमंच के बिना नृत्य कहाँ? अगला द्वार मंडल का सबसे तीक्ष्ण है — छिन्नमस्ता (D074): जो अवकाश देना सीख गया, अब वही आत्म-दान की विद्युत झेल सकता है। ॥ ह्रीं-मयी भुवनेश्वरी की जय ॥