माता भूदेवी

Prithvi · भूमि · धरित्री · वसुंधरा · सर्वंसहा

सबसे पुरानी माता — जिसकी गोद में हर देवता का मंदिर और हर प्राणी का घर है। अथर्ववेद का भूमि-सूक्त जिसे संबोधित है: "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" — भूमि मेरी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ; मनुष्य और धरती के सम्बन्ध की इससे बड़ी घोषणा किसी सभ्यता ने नहीं की।

श्रेणी: भू-देवी · आदि-माता वैदिक शिखर: अथर्व भूमि-सूक्त 12.1 पति-पद: वराह-विष्णु (भूदेवी रूप) संतति-धारा: मंगल, सीता (भूमिजा)
प्रमुख कथा पढ़ें
सर्वंसहासब कुछ सह लेने वाली — क्षमा-मूर्ति
अन्न-दात्रीपृथु-दोहन — समस्त पोषण की गो-रूपा
वसुंधरावसु (रत्न-निधि) धारण करने वाली
आदि-माताहर प्राणी की प्रथम और अंतिम गोद

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

पृथ्वी समस्त देवी-मंडल की आदि-माता हैं — वह देवी जिसकी पूजा के लिए मंदिर नहीं जाना पड़ता, क्योंकि उपासक सदा उसकी गोद में ही खड़ा है। वैदिक युग से उनके दो युग्म-रूप चले — ऋग्वेद में "द्यावा-पृथिवी" (आकाश-पिता और भूमि-माता) का प्राचीनतम माता-पिता युग्म; और अथर्ववेद का वह अद्वितीय भूमि-सूक्त (12.1 — त्रेसठ ऋचाओं का पृथ्वी-स्तवन) जो मानव-इतिहास के प्रथम "पर्यावरण-घोषणापत्रों" में गिना जाता है: उसमें भूमि के पर्वत-नदी-वन, उसकी गंध, उसका धैर्य, उस पर चलने वाले सब वर्णों-मतों के मनुष्य — सबको एक परिवार कहा गया है, और शिखर-वाक्य वही है जो इस पृष्ठ के शीर्ष पर है — "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः"।

पौराणिक युग में यह तत्त्व-देवी दो महारूपों में ढली — पृथ्वी (पृथु-प्रकरण की गो-रूपा, जिनके दोहन से अन्न-व्यवस्था जन्मी) और भूदेवी (वैष्णव परंपरा में विष्णु D002 की द्वितीय पत्नी — श्रीदेवी लक्ष्मी D007 के साथ; वराह D018 द्वारा उद्धृता)। उनकी संतति-धाराएँ भी दोनों लोकों में हैं — ग्रह-मंडल में मंगल "भौम" (D045 — भूमि-पुत्र), और इतिहास में सीता "भूमिजा" (D015 — हल-रेखा से मिली, अंत में भूमि-गोद में लौटीं)। मूर्ति-शिल्प में भूदेवी वराह-भुजा पर विराजित कोमल देवी हैं (महाबलिपुरम्-उदयगिरि के अमर शिल्प-पट), और लोक में वे हर सुबह उस प्रार्थना में हैं जो बिस्तर से उतरते हुए पढ़ी जाती है — "पादस्पर्शं क्षमस्व मे": माँ, तुझ पर पाँव रखता हूँ — क्षमा करना।

परिवार एवं संबंध

Family
  • वैदिक युग्मद्यौष्पिता (आकाश-पिता) — "द्यावा-पृथिवी" आदि माता-पिता जोड़ी
  • पति-पदविष्णु (D002) — भूदेवी रूप में द्वितीय पत्नी; वराह (D018) उद्धारकर्ता-वर
  • सह-पत्नीश्रीदेवी/लक्ष्मी (D007) — श्री-भू युग्म (वैष्णव आगम)
  • पुत्रमंगल/भौम (D045) — भूमि-पुत्र ग्रह; नरकासुर (भौम-असुर — कृष्ण-प्रकरण धारा)
  • पुत्री-भावसीता (D015) — भूमिजा: हल-रेखा से प्राप्त, भूमि-प्रवेश से विदा
  • नाम-पितापृथु — जिनके दोहन-प्रसंग से "पृथिवी" नाम (कथा-खंड)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

धरती जो दुही गई — पृथु का दोहन और माता का सौदा

वेन का अंधकार — जब धरती ने अन्न रोक लिया

पृथ्वी को "पृथिवी" नाम देने वाली कथा भागवत (चतुर्थ स्कंध) के पृथु-चरित्र में है — और वह कथा राजनीति, अर्थशास्त्र और पारिस्थितिकी की जैसी त्रिवेणी है, वैसी पुराण-साहित्य में दुर्लभ है। ध्रुव-वंश में राजा वेन हुआ — प्रजापीड़क, यज्ञ-विध्वंसक, घोषणा करने वाला कि "पूजा केवल राजा की हो।" ऋषियों ने पहले समझाया, फिर वह किया जो भारतीय राजधर्म-चिंतन का सबसे साहसी वाक्य है — अत्याचारी राजा को मंत्र-पूत हुंकार से पद-च्युत (धाराओं में: प्राण-च्युत) कर दिया: राजा धर्म से बड़ा नहीं। पर अराजकता अत्याचार से भी बुरी निकली — बिना दंड-धारक के चोर-लुटेरे उठ खड़े हुए। तब ऋषियों ने वेन की देह का मंथन किया — पापांश से निषाद-धारा पृथक् हुई, और शुभांश से प्रकट हुए पृथु — जिन्हें परंपरा विष्णु-कला (आदि-सम्राट, प्रथम "राजा" जिसका राज्याभिषेक विधि-पूर्वक हुआ) मानती है। पर नए राजा को राज्य नहीं, अकाल मिला — प्रजा भूखी थी, क्योंकि पृथ्वी ने अन्न अपने भीतर समेट लिया था: बीज बोए जाते, उगते नहीं। पृथु ने धनुष उठाया; धरती गो-रूप धरकर भागी — त्रिलोक में कहीं शरण न मिली (जो सबको धारण करती है, उसे कौन धारण करे?); अंत में रुककर उसने वह उत्तर दिया जो इस कथा की धुरी है: "राजन्, मैंने अन्न इसलिए रोका कि दुष्ट उसे लूट रहे थे और पात्र भूखे थे — व्यवस्था के बिना दान चोरी को पालता है। मुझे दंड नहीं — दोहन चाहिए: बछड़ा लाओ, दोग्धा लाओ, पात्र लाओ — मैं सब दूँगी।"

महा-दोहन — अर्थव्यवस्था का जन्म-श्लोक

और तब वह अद्भुत दृश्य घटा जिसे भागवत विस्तार से गाता है — सृष्टि का महा-दोहन। पृथु ने स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाकर स्वयं दोहन किया — अन्न-औषधि दुहे; ऋषियों ने बृहस्पति (D047) को वत्स बनाकर वेद-वाणी दुही; देवताओं ने इन्द्र (D039) को वत्स बना अमृत-ओज दुहा; पितरों ने स्वधा, नागों ने विष, यक्षों ने अंतर्धान-विद्या, गंधर्वों ने संगीत, पर्वतों ने धातु-रत्न — हर वर्ग ने अपना वत्स और अपना पात्र लाकर अपनी वृत्ति दुही। यह पुराण-रूपक जितना सुंदर है उतना ही गहरा — पृथ्वी सबको सब कुछ देती है, पर हर लेने वाले को अपना "बछड़ा" चाहिए: वह स्नेह-सम्बन्ध जो गो को दूध उतारने देता है; बिना सम्बन्ध का दोहन लूट है, सम्बन्ध-सहित दोहन ही अर्थ-व्यवस्था। प्रसन्न धरती ने पृथु को पुत्री-भाव से वरा — तभी से वह "पृथिवी" है: पृथु की बेटी; पिता वह राजा जिसने भूमि को समतल किया (भागवत कहता है पृथु ने ही पर्वत-उबड़खाबड़ हटाकर कृषि-ग्राम-नगर योग्य भूमि रची — नगर-सभ्यता का पुराण-क्षण), और बेटी वह धरती जिसने वचन दिया कि धर्म-युक्त दोहन कभी निष्फल नहीं जाएगा। ध्यान रहे — इस पूरे प्रकरण में पृथ्वी न शत्रु है, न दासी: वह अनुबंध-कर्ता है — देने की शर्तें तय करने वाली माता। आधुनिक भाषा में यह "सतत विकास" (sustainable use) का आदि-पाठ है: धरती से लो, पर व्यवस्था से; दुहो, चीरो मत।

वराह-गोद और स्तर-रेखाएँ — डूबी हुई माँ के तीन चित्र

भूदेवी-चरित्र का दूसरा महाध्याय वराह-प्रकरण है — मुख्य-कथा अवतार-पृष्ठ (D018) पर है; यहाँ देवी का कोण। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डुबो दिया — पुराण-चित्र में माता जल-गर्भ में असहाय; विष्णु (D002) यज्ञ-वराह रूप में उतरे, दंष्ट्रा पर धरा को उठाया — और उदयगिरि-महाबलिपुरम् के शिल्पियों ने उस क्षण को पत्थर में अमर किया: विराट वराह की बाँह पर कोमल-कृतज्ञ भूदेवी। वैष्णव आगम-परंपरा ने इस उद्धार को विवाह-पद दिया — भूदेवी विष्णु की द्वितीय महिषी हुईं: दक्षिण के मंदिरों में "श्रीदेवी-भूदेवी" युग्म पेरुमाल के दोनों ओर खड़ा मिलता है — श्री (लक्ष्मी D007) संपदा हैं, भू धारण-क्षमा; ऐश्वर्य और धैर्य — नारायण के दो हाथ। संतति-धाराएँ भी यहीं से — भौम मंगल (D045: वराह-भू संसर्ग धारा से ग्रह-पुत्र) और भौमासुर नरक (कृष्ण-प्रकरण: जिसके वध पर स्वयं माता भूदेवी ने कृष्ण D014 से पौत्र भगदत्त के लिए अभय माँगा — पुत्र दुष्ट हो तो माता न्याय चुनती है, यह मार्मिक धारा भागवत 10.59 की है)। और तीसरा चित्र इतिहास-काव्य का है — सीता (D015): जनक के हल की रेखा (सीता = हल-रेखा) से मिली भूमिजा, जो अग्नि-परीक्षाओं से थकी संध्या में माँ को पुकारती है और धरती फटकर सिंहासन-सहित बेटी को गोद में ले लेती है। तीन चित्र — दुही गई माता (पृथु), डूबी-उबारी गई पत्नी (वराह), और लौटा ली गई बेटी (सीता): तीनों में पृथ्वी की एक ही मुद्रा है — अंत तक सहना, और निर्णायक क्षण में अपनी गरिमा से खड़ा हो जाना। "सर्वंसहा" उसका नाम है — पर सहना उसकी दुर्बलता नहीं, उसका व्रत है।

भूमि-सूक्त और आध्यात्मिक अर्थ — पहला पर्यावरण-घोषणापत्र

अंत में वह स्तर जो इस पृष्ठ का वैदिक शिखर है — अथर्ववेद का भूमि-सूक्त (12.1)। त्रेसठ ऋचाओं का यह स्तवन विश्व-वाङ्मय में अकेला है: उसमें भूमि की प्रशस्ति केवल उर्वरता की नहीं — उसके सम्पूर्ण परिस्थिति-तंत्र की है: सत्य-ऋत-दीक्षा-तप जिसे धारण करते हैं; जिसके पर्वत, हिम-शिखर, वन कल्याणकारी हों; जिस पर अनेक भाषाओं, अनेक धर्मों (नाना-धर्माणं) के मनुष्य ऐसे बसें जैसे एक घर के निवासी; जिसकी गंध (वह वर्षा-मिट्टी की गंध जिस पर सूक्त की पूरी ऋचा है) पवित्र करे; और जिससे ऋषि याचना करता है — "जो कुछ तुझसे खोदूँ माँ, वह शीघ्र भर जाए; तेरे मर्म पर आघात न करूँ" — यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु का यह भाव मानव-इतिहास की प्रथम खनन-नैतिकता है। इसीलिए विद्वान इस सूक्त को प्रथम पर्यावरण-घोषणापत्र कहते हैं — और इसीलिए इस पृष्ठ का समापन-पाठ अनिवार्य है: भूमि-पूजन (गृह-निर्माण से खेत-बुवाई तक), प्रातः पाद-स्पर्श क्षमा-श्लोक, अन्न को "ब्रह्म" कहने वाली परंपरा — ये सब उसी सूक्त की जीवित संततियाँ हैं; पर मिट्टी-क्षरण, विष-रसायन और अंधाधुंध खनन के युग में इन विधियों का अर्थ तभी है जब पृथु-अनुबंध याद रहे — दोहन धर्म है, दोहन-से-आगे लूट। गीता-परंपरा का "क्षमया धरित्री" (क्षमा में धरती-सी) हर साधक का आदर्श है — पर स्वयं धरित्री की क्षमा को असीम मान लेना इस युग की सबसे महँगी भूल होगी; माता है, इसीलिए तो — माँ से लिया सब लौटाना नहीं पड़ता, पर माँ को तोड़ना भी नहीं चाहिए। ॥ माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥

स्रोत टिप्पणी: वेन-पृथु-दोहन-चरित्र — भागवत 4.13-19 (ग्रेड A — मुख्य-पाठ; मनु-वत्स आदि दोहन-सूची 4.18); "पृथिवी" व्युत्पत्ति — पृथु-पुत्री पुराण-निरुक्त (ग्रेड A/B); वराह-उद्धार — भागवत 3.13 (ग्रेड A — मुख्य D018; उदयगिरि-महाबलिपुरम् शिल्प पुरातत्व-स्तर); श्री-भू युग्म — पांचरात्र/वैखानस आगम परंपरा (ग्रेड B); भौम-मंगल — D045-सह संगत पुराण-धारा (ग्रेड B); नरकासुर-भगदत्त — भागवत 10.59 (ग्रेड A); सीता-भूमिजा — वाल्मीकि रामायण (ग्रेड A — D015 मुख्य); भूमि-सूक्त — अथर्ववेद 12.1 (ग्रेड A — "माता भूमिः" 12.1.12 शब्दशः; "यत् ते भूमे..." 12.1.35 भाव-सह; शेष ऋचाएँ भावानुवाद-स्तर); द्यावा-पृथिवी — ऋग्वेद-सामान्य (ग्रेड A); प्रातः क्षमा-श्लोक ("समुद्रवसने देवि...") — लोक-नित्यपाठ परंपरा (ग्रेड B — पूर्ण-पाठ भावी सत्यापन)। पर्यावरण-अनुच्छेद संपादकीय नीति-स्वर है।

नाम एवं अर्थ

Names
पृथ्वी / पृथिवी
विस्तीर्णा ("प्रथ्" — फैलना); पुराण-निरुक्त में पृथु-पुत्री।
भूमि / भूदेवी
"भू" (होना) — अस्तित्व की आधार-देवी; वैष्णव पत्नी-पद।
वसुंधरा / वसुधा
वसु (निधि-रत्न) धारण करने वाली — "वसुधैव कुटुम्बकम्" की वसुधा।
धरित्री / धरा
धारण करने वाली — "क्षमया धरित्री" उपमा-पद।
सर्वंसहा
सब सह लेने वाली — क्षमा-व्रत का नाम।
अचला / अनन्ता
स्थिर एवं असीम — विष्णु-सहस्रनाम-परिवार की ध्वनियाँ।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ भूम्यै नमः ॥ · ॐ पृथिव्यै नमः ॥

भूमि-सूक्त — शिखर-वाक्य (अथर्ववेद 12.1.12)

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥

अर्थ: भूमि (मेरी) माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

प्रातः भूमि-वंदन (लोक-नित्यपाठ परंपरा)

बिस्तर से भूमि पर पहला पग रखने से पूर्व "समुद्रवसने देवि..." से आरम्भ होकर "पादस्पर्शं क्षमस्व मे" पर पूर्ण होने वाला क्षमा-श्लोक — भारतीय घरों की जीवित प्रभात-विधि। पूर्ण श्लोक-पाठ शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
भूमि-पूजन
गृह-निर्माण, नींव, बुवाई-आरम्भ की सार्वदेशिक विधि — पृथु-अनुबंध की स्मृति।
अक्षय-तृतीया / हल-मुहूर्त
कृषि-आरम्भ पर्व — अन्न-दात्री का वार्षिक वंदन (क्षेत्र-भेद से बैसाखी-रोहिणी विधियाँ)।
गोवर्धन-अन्नकूट योग
भूमि-गो-अन्न त्रयी का पर्व (D014-सूत्र) — धरा-पोषण का उत्सव-रूप।
वसुंधरा-दिवस (आधुनिक)
Earth Day आदि आधुनिक विधियाँ — भूमि-सूक्त परंपरा की समकालीन प्रतिध्वनि (लोक-स्तर)।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
श्रीदेवी-भूदेवी सह पेरुमाल
दक्षिण के विष्णु-मंदिरों (श्रीरंगम्-तिरुपति परिवार) में भूदेवी की नित्य युग्म-उपस्थिति।
उदयगिरि गुहा-5 (म.प्र.)
गुप्त-कालीन विराट वराह-भूदेवी शिल्प — उद्धार-क्षण का महानतम पाषाण-चित्र।
महाबलिपुरम् वराह-मंडप
पल्लव-शिल्प का भू-वराह पट — देवी-कोण का दक्षिण-रूप।
हर खेत, हर आँगन
भूदेवी का वास्तविक मंदिर — जहाँ-जहाँ अन्न उगता और नींव पड़ती है।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: धरती माता सबकी माँ हैं — हम सब उनकी गोद में रहते हैं! एक बार राजा पृथु के समय धरती ने अनाज देना बंद कर दिया, क्योंकि लोग उसे लूट रहे थे। फिर धरती ने कहा: "प्यार से माँगो, व्यवस्था से लो — मैं सब दूँगी।" राजा पृथु ने वैसा ही किया, और तभी से धरती का नाम "पृथिवी" पड़ा — पृथु की बेटी!

रोचक तथ्य:

  • हज़ारों साल पुराने अथर्ववेद में लिखा है — "भूमि मेरी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।"
  • मंगल ग्रह को "भौम" कहते हैं — धरती का बेटा!
  • सीता जी धरती से मिली थीं और अंत में धरती की गोद में ही लौट गईं।
  • बहुत से लोग सुबह बिस्तर से उतरते समय धरती से क्षमा माँगते हैं — "माँ, तुझ पर पाँव रखता हूँ!"

सीख: धरती से जितना लो, उतना लौटाओ — पेड़ लगाओ, पानी बचाओ, कचरा मत फैलाओ। माँ सब देती है, पर माँ का ख़याल रखना बच्चों का काम है।

मिनी क्विज़:

  1. "पृथिवी" नाम किस राजा से पड़ा?
  2. पृथ्वी को रसातल से किसने उठाया?
  3. भूमि-सूक्त किस वेद में है?
  4. धरती के "बेटे" ग्रह का नाम क्या है?