महाविद्या कमला

Kamala · कमलात्मिका · तांत्रिक-श्री · मंडल-पूर्ति

दशमी — अंतिम — महाविद्या: कमल-वासिनी कमला, जिनमें साधक श्री-तत्त्व (D007-लक्ष्मी) का तांत्रिक मुख पाता है। मंडल का समापन-वाक्य सुनिए: यात्रा श्मशान की काली से चली थी — और पूर्ण हुई खिले कमल पर; तंत्र का अंतिम रहस्य वैराग्य नहीं — पूर्ण-जीवन निकला।

पद: दशमहाविद्या-10 · श्रीकुल-पूर्ति रूप: गज-अभिषिक्ता कमल-वासिनी तत्त्व: श्री — पुष्टि-समृद्धि-सौभाग्य विशेष: मंडल-यात्रा की समीक्षा-देवी
प्रमुख कथा पढ़ें
श्री-विद्या-पूर्तिवैभव का महाविद्या-पद
कमल-वासिनीकीचड़ से ऊपर खिला आसन
गज-अभिषिक्तागज-युगल का कलश-अभिषेक — गजलक्ष्मी छवि
पूर्ण-वृत्तकाली से कमला — दस द्वारों की परिक्रमा पूर्ण

परिचय — लक्ष्मी और कमला का भेद

Introduction

पहला प्रश्न स्वाभाविक है: लक्ष्मी (D007) का सम्पूर्ण पृष्ठ इस कोश में है — तो कमला कौन हैं? उत्तर वही है जो काली (D010) बनाम काली-महाविद्या (D070) का था: एक ही देवी, दो उपासना-पद। लक्ष्मी वैष्णव-गृहस्थ धारा की महारानी हैं — विष्णु-वक्ष की श्री, दीपावली की गृह-देवी; कमला वही तत्त्व महाविद्या-पद पर हैं — शाक्त-तंत्र की दृष्टि से साधित श्री: यहाँ वे किसी की संगिनी-रूप में नहीं, स्वतंत्र परा-शक्ति रूप में उपास्य हैं — श्रीकुल की पूर्ति-विद्या, दशमी महाविद्या। तंत्र-वचन का भाव: विष्णु-पत्नी रूप में वे वरदान देती हैं; महाविद्या-रूप में वे विद्या देती हैं — वैभव का रहस्य-ज्ञान।

ध्यान-रूप वही चिर-परिचित महाछवि है जिसे भारतीय कला गजलक्ष्मी कहती है: खिले कमल पर विराजित स्वर्ण-वर्णा देवी, कर-युगल में कमल, वर-अभय मुद्राएँ — और दोनों ओर गज-युगल, सूँड़ों में उठाए कलशों से देवी का अभिषेक करते हुए। श्रीसूक्त की ऋचाएँ इसी चित्र की वाणी हैं (हस्ति-नाद से प्रबोधित श्री की ध्वनि-परंपरा), और पुरातत्त्व साक्षी है कि यह भारत के प्राचीनतम देवी-रूपांकनों में है — सांची-भरहुत के स्तूप-तोरणों (ई.पू. 2री-1ली शती) पर गजलक्ष्मी उत्कीर्ण है: बौद्ध स्मारकों तक ने इस मंगल-छवि को द्वार पर रखा (कला-इतिहास — ग्रेड A)। मंडल-पूर्ति की देवी का इतना पुराना, इतना सर्व-स्वीकृत होना स्वयं संकेत है — श्री सबकी साझी प्यास है।

मंडल एवं संबंध

Mandala
  • मंडल-क्रममातंगी (D078) → कमला — दशमी: मंडल-पूर्ति
  • तत्त्व-अभिन्नतालक्ष्मी (D007) — एक तत्त्व, दो उपासना-पद; लक्ष्मी-नारायण युगल (D084)
  • कुल-स्थानश्रीकुल-पूर्ति — त्रिपुरसुन्दरी (D072) धारा की परिणति
  • विपरीत-युग्मधूमावती (D076) — ज्येष्ठा-कनिष्ठा: अ-श्री और श्री बहनें
  • कला-धारागजलक्ष्मी रूपांकन — सांची-भरहुत से घर के द्वार-तोरण तक

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तत्त्व-कथा + मंडल-समीक्षा

कीचड़, कमल और अभिषेक — मंडल की पूर्णाहुति

कमल का शास्त्र — कीचड़ से असंग

कमला का नाम ही उनकी कथा है — कमल: भारतीय प्रतीक-कोश का सबसे बहु-अर्थ चिह्न, और इस देवी में उसके सारे अर्थ एक साथ खिलते हैं। पहला अर्थ उद्भव का है: कमल कीचड़ में जन्मता है — पंक में, जहाँ कोई सुंदरता की आशा नहीं करता; श्री का पहला रहस्य यही है कि समृद्धि "शुद्ध" प्रयोगशालाओं में नहीं — जीवन के पंक में जन्मती है: श्रम के पसीने, बाज़ार की धूल, खेत की मिट्टी में। दूसरा अर्थ असंगता का: कमल-पत्र जल में रहकर जल से नहीं भीगता — "पद्मपत्रमिवाम्भसा" (गीता 5.10 की उपमा): वैसे ही ज्ञानी संसार में रहकर लिप्त नहीं होता; कमला-विद्या का केंद्र-पाठ यही है — वैभव में रहना, वैभव का हो नहीं जाना: लक्ष्मी जिसके पास हो पर जिसके भीतर न घुसी हो, वही श्री-सिद्ध है। तीसरा अर्थ विकास-क्रम का: कमल सूर्य के साथ खुलता है, संध्या को मुँदता है — वैभव का भी यही ऋतु-धर्म है: वह आता-जाता है (मंथन-कथा D007 में वैकुंठ-त्याग और पुनरागमन की पूरी लय है); जो इस लय को जानता है, वह न उदय में उन्मत्त होता है, न अस्त में नष्ट। चौथा — योग-अर्थ: सहस्रार कमल ही है — चेतना का शिखर-प्रतीक; कमला उस अंतिम खिलने की देवी हैं। एक फूल में चार शास्त्र — और देवी उस फूल पर विराजती हैं: आसन ही उपदेश है।

गज-अभिषेक — वैभव का सबसे प्राचीन चित्र

अब उस छवि को पढ़िए जो सम्भवतः भारत की सबसे पुरानी अखंड-लोकप्रिय देवी-छवि है। गजलक्ष्मी: कमलासना देवी, दो (कहीं चार) गज, उठे हुए कलश, अभिषेक-जलधाराएँ। पुरातत्त्व इसे ई.पू. दूसरी शती से लगातार पाता है — भरहुत-सांची के तोरण, प्राचीन मुद्राएँ-सिक्के, गुफा-मंदिर, और आज भी दक्षिण के घरों के द्वार-पट्ट और विवाह-मंडप (ग्रेड A — कला-इतिहास)। दो सहस्राब्दी से अधिक समय तक बिना टूटे चली यह छवि क्या कहती है? गज भारतीय प्रतीक-भाषा में मेघ के भाई हैं (वर्षा-वाहक — ऐरावत-सूत्र D039), राज-ऐश्वर्य के चिह्न भी और धैर्य-गाम्भीर्य के भी; उनका कलश-अभिषेक वर्षा का, राज्याभिषेक का और श्रम-सिंचन का त्रिवेणी-संकेत है: श्री वहीं अभिषिक्त होती है जहाँ मेघ बरसें (प्रकृति), राज-मर्यादा हो (व्यवस्था) और गज-धैर्य हो (स्वभाव)। ध्यान दीजिए — देवी गज पर सवार नहीं हैं: गज उनकी सेवा में हैं; शक्ति-वैभव जब सेवक हों, स्वामी नहीं — वही श्री-राज्य है। श्रीसूक्त की वह ऋचा जो "हस्तिनाद-प्रबोधिनी" श्री का आवाहन करती है (गज-घोष से जागने वाली — ऋग्वेद-खिल धारा), इसी चित्र की वेद-वाणी है: समृद्धि उस घर जागती है जहाँ परिश्रम का गज-घोष सुनाई देता हो — सोए हुए के द्वार गज नहीं आते।

महाविद्या-पद — वैभव जो विद्या बन गया

पर मंडल ने श्री को दसवाँ — अंतिम — स्थान क्यों दिया? यह क्रम-निर्णय तंत्र का गहनतम कथन है। संसार की स्वाभाविक गति उलटी है — मनुष्य पहले लक्ष्मी चाहता है, शेष सब बाद में; मंडल कहता है: श्री पूर्णता का फल है, प्रारम्भ की माँग नहीं। देखिए यात्रा-क्रम: पहले काल-भय का अंत (काली D070), फिर पार लगना (तारा D071), सौंदर्य-दीक्षा (सुन्दरी D072), अवकाश-धारण (भुवनेश्वरी D073), आत्म-दान (छिन्नमस्ता D074), तप (भैरवी D075), रिक्तता का साक्षात्कार (धूमावती D076), संयम (बगला D077), समग्र-स्वीकार वाणी (मातंगी D078) — तब कमला। अर्थ पारदर्शी है: जो नौ द्वारों से गुज़रा है, उसी के हाथ में वैभव सुरक्षित है — उसे धन उन्मत्त नहीं करेगा (उसने रिक्तता देखी है), भ्रष्ट नहीं करेगा (उसने संयम साधा है), अहंकारी नहीं बनाएगा (उसने अपना शीश दान किया है)। और उलटा भी उतना ही सत्य: नौ साधनाओं के बिना पकड़ा धन नौ ही विकार बनता है — भय (काली-हीनता), डूबना (तारा-हीनता), कुरूपता, संकीर्णता, लोभ, विलास, आसक्ति, वाचालता, बहिष्कार। धूमावती-कमला की जोड़ी इस पाठ की धुरी है — ज्येष्ठा और कनिष्ठा (D076-कथा): मंथन से पहले अ-श्री निकली, फिर श्री; मंडल में भी रिक्तता-दर्शन (सप्तमी) वैभव-दर्शन (दशमी) से पहले है — जो खोना सीख चुका, पाना उसी को शोभा देता है

घर की भाषा में कमला — चिह्न जो आज भी बोलते हैं

कमला-तत्त्व की सबसे बड़ी सिद्धि यह है कि वह शास्त्र से उतरकर गृह-लिपि बन गया — भारतीय घर आज भी कमला-चिह्नों में लिखा है, भले लिखने वाले को स्रोत याद न हो। द्वार पर कलश (आम्र-पल्लव, नारियल) — श्रीसूक्त का पूर्ण-कुंभ: जल-धान्य से भरा पात्र ही श्री का आसन है; दहलीज़ पर कमल-रंगोली/अल्पना और दीपावली की वे नन्ही लक्ष्मी-पगलियाँ (द्वार से भीतर आते चरण-चिह्न) — देवी के स्वागत का चित्र-मंत्र; तिजोरी-बही पर स्वस्तिक-कुंकुम; विवाह-मंडप का गज-तोरण। हर चिह्न वही एक वाक्य दोहराता है जो गजलक्ष्मी-छवि दो सहस्राब्दी से कह रही है — श्री आमंत्रित की जाती है, पकड़ी नहीं जाती: घर स्वच्छ हो, पात्र भरा हो, द्वार खुला हो — लक्ष्मी के चरण भीतर की ओर मुड़ते हैं। और इन चिह्नों का समाज-पाठ भी दर्ज हो: ये सारी लिपि परंपरा में प्रायः स्त्री-हस्त की है — अल्पना-रंगोली-कलश गृहिणी रचती आई है; कमला-संस्कृति ने घर की स्त्री को ही श्री की पुरोहिता माना — "गृहलक्ष्मी" सम्बोधन उसी दर्शन का शेष-चिह्न है।

मंडल-पूर्ति — दस द्वार, एक देवी

और अब वह समीक्षा, जिसके लिए यह अंतिम पृष्ठ बना है। दशमहाविद्या-मंडल (D070-D079) की परिक्रमा पूर्ण हुई — दस पृष्ठ, दस विद्याएँ; पर प्राकट्य-कथा (D070) का मूल-वाक्य अंत में फिर सुनिए: शिव के पूछने पर सती ने कहा था — "ये सब मैं हूँ।" काली और कमला विरोधी नहीं — एक ही सत्ता के दो छोर हैं: श्मशान की दिगम्बरा और कमल की स्वर्ण-वर्णा के बीच जो यात्रा है, वह देवी की नहीं — देखने वाले की यात्रा है; देवी तो दसों में एक साथ, पूरी-की-पूरी उपस्थित है। यही महाविद्या-दर्शन का अंतिम दान है: जीवन के जिस भी द्वार पर खड़े हो — हानि (धूमावती) या लाभ (कमला), विराम (बगला) या वाणी (मातंगी), ज्वाला (भैरवी) या अवकाश (भुवनेश्वरी) — द्वार बदलते हैं, माँ वही है; कोई अवस्था ईश्वर-शून्य नहीं। साधक के लिए मंडल का व्यावहारिक सूत्र: अपनी वर्तमान जीवन-अवस्था पहचानो — उसी की महाविद्या तुम्हारा वर्तमान द्वार है; और गुरु-मर्यादा की वह रेखा अंतिम बार दोहराकर मंडल बंद हो: दर्शन सबका है, साधना दीक्षितों की। कामाख्या की पहाड़ी पर दसों मंदिरों की परिक्रमा जहाँ समाप्त होती है, वहाँ यात्री मुड़कर देखता है — दस द्वार, एक ही पहाड़ी: यही दशमहाविद्या है। ॥ कमलात्मिका-सहित दशमहाविद्या-मंडल की जय ॥

स्रोत टिप्पणी: लक्ष्मी-कमला पद-भेद — तंत्र-परंपरा (ग्रेड B; तत्त्व-अभिन्नता स्पष्ट — D007 मुख्य-रेखा से अनुपूरक-विभाजन: मंथन-प्राकट्य/वैकुंठ-त्याग/दीपावली सब D007 पर, यहाँ केवल सूत्र); "पद्मपत्रमिवाम्भसा" — गीता 5.10 (ग्रेड A); श्रीसूक्त पद्म-हस्ति पदावली — ऋग्वेद-खिल (ग्रेड A; "हस्तिनाद-प्रबोधिनी" ऋचा-भाव); गजलक्ष्मी — भरहुत-सांची तोरण ई.पू. 2री-1ली शती, मुद्रा-परंपरा (ग्रेड A — पुरातत्त्व-अभिलेख); गज=मेघ प्रतीक — ऐरावत-सूत्र D039 पूर्व-प्रकाशित; मंडल-क्रम समीक्षा एवं "ये सब मैं हूँ" पुनरावृत्ति — D070-कथा सूत्र + व्याख्या-स्तर; धूमावती-कमला ज्येष्ठा-कनिष्ठा युग्म — D076-कथा सूत्र। बीज-साधना अप्रकाशित — मंडल-नीति D070 (यहाँ मंडल-समापन घोषणा सहित)। दशमहाविद्या-शृंखला D070-D079 इस पृष्ठ से पूर्ण।

नाम एवं अर्थ

Names
कमला
कमल-मयी — कमल-वासिनी, कमल-हस्ता; श्री का तांत्रिक नाम।
कमलात्मिका
कमल जिसकी आत्मा है — महाविद्या-सूचियों का पद-नाम।
तांत्रिक-लक्ष्मी
श्री-तत्त्व का स्वतंत्र परा-शक्ति पद — साधित वैभव।
गजलक्ष्मी (छवि-नाम)
गज-अभिषिक्ता — भारत की प्राचीनतम देवी-छवियों में।
दशमी महाविद्या
मंडल-पूर्ति पद — काली से चली यात्रा की परिणति।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम-स्मरण

ॐ श्री कमलात्मिकायै नमः ॥

श्रीसूक्त — पद्म-ऋचा भाव (ऋग्वेद-खिल)

पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

अर्थ: कमल पर स्थित, कमल-वर्णा उस श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ। (श्रीसूक्त-परंपरा; पूर्ण 15-ऋचा विवरण D007)

कमला बीज-साधना दीक्षा-गम्य — अप्रकाशित (मंडल-नीति D070)। गृहस्थ-द्वार: श्रीसूक्त-पाठ एवं शुक्रवार दीप — D007-विधियाँ ही कमला-सम्मत सामान्य-मार्ग हैं।

पर्व एवं उपासना

Festivals
दीपावली-कोजागरी (D007-मुख्य)
श्री-तत्त्व के महापर्व — कमला-पद का स्मरण सहवर्ती।
गुप्त-नवरात्र पूर्ति
मंडल-साझा काल का दशम-दिवस — विद्या-चक्र समापन (D070-सूत्र)।
शुक्रवार-धारा
श्री-वार की गृह-परंपराएँ (D007/D048/D093-सूत्र)।
अक्षय-तृतीया
अक्षय-श्री की तिथि — दान-सहित वैभव का पर्व-पाठ।

मंदिर एवं धारा

Temples
कामाख्या-परिसर — दशमी
नीलाचल मंडल-परिक्रमा की पूर्ति-देवी (D070-भूगोल)।
महालक्ष्मी-क्षेत्र (D007-धारा)
कोल्हापुर आदि — श्री-तत्त्व के महापीठ: कमला-पद सहवर्ती।
गजलक्ष्मी-तोरण सर्वत्र
सांची-भरहुत से घर के द्वार-पट्ट तक — छवि ही चलता-फिरता मंदिर।
श्रीविद्या-पीठ धारा
श्रीकुल-क्रम में कमला-अर्चना — कांची-शृंगेरी परिवार (D072)।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: कमला माँ दसवीं — आख़िरी — महाविद्या हैं: कमल पर बैठी सुनहरी देवी, जिनका दोनों तरफ़ से हाथी कलश उठाकर अभिषेक करते हैं! ये लक्ष्मी जी का ही ख़ास ज्ञान-रूप हैं। इनके साथ दस महाविद्याओं की माला पूरी हो जाती है।

रोचक तथ्य:

  • हाथियों वाली यह "गजलक्ष्मी" छवि 2000 साल से भी पुरानी है — सांची के स्तूप पर बनी है!
  • कमल कीचड़ में खिलता है पर कीचड़ से गंदा नहीं होता — यही इनकी सीख है।
  • दस महाविद्याएँ काली माँ से शुरू होकर कमला माँ पर पूरी होती हैं।
  • गुवाहाटी की कामाख्या पहाड़ी पर दसों देवियों के मंदिरों की परिक्रमा होती है।

सीख: कमल जैसे बनो — चाहे आस-पास कीचड़ हो, ख़ुद साफ़ और खिले रहो। और धन-वैभव अच्छी चीज़ है, पर वह मेहनत और अच्छाई के बाद आता है — पहले नहीं!

मिनी क्विज़:

  1. कमला किस क्रम की महाविद्या हैं?
  2. इनका अभिषेक कौन करते हैं?
  3. यह छवि किस प्राचीन स्तूप पर मिलती है?
  4. कमल हमें क्या सिखाता है?