कीचड़, कमल और अभिषेक — मंडल की पूर्णाहुति
कमल का शास्त्र — कीचड़ से असंग
कमला का नाम ही उनकी कथा है — कमल: भारतीय प्रतीक-कोश का सबसे बहु-अर्थ चिह्न, और इस देवी में उसके सारे अर्थ एक साथ खिलते हैं। पहला अर्थ उद्भव का है: कमल कीचड़ में जन्मता है — पंक में, जहाँ कोई सुंदरता की आशा नहीं करता; श्री का पहला रहस्य यही है कि समृद्धि "शुद्ध" प्रयोगशालाओं में नहीं — जीवन के पंक में जन्मती है: श्रम के पसीने, बाज़ार की धूल, खेत की मिट्टी में। दूसरा अर्थ असंगता का: कमल-पत्र जल में रहकर जल से नहीं भीगता — "पद्मपत्रमिवाम्भसा" (गीता 5.10 की उपमा): वैसे ही ज्ञानी संसार में रहकर लिप्त नहीं होता; कमला-विद्या का केंद्र-पाठ यही है — वैभव में रहना, वैभव का हो नहीं जाना: लक्ष्मी जिसके पास हो पर जिसके भीतर न घुसी हो, वही श्री-सिद्ध है। तीसरा अर्थ विकास-क्रम का: कमल सूर्य के साथ खुलता है, संध्या को मुँदता है — वैभव का भी यही ऋतु-धर्म है: वह आता-जाता है (मंथन-कथा D007 में वैकुंठ-त्याग और पुनरागमन की पूरी लय है); जो इस लय को जानता है, वह न उदय में उन्मत्त होता है, न अस्त में नष्ट। चौथा — योग-अर्थ: सहस्रार कमल ही है — चेतना का शिखर-प्रतीक; कमला उस अंतिम खिलने की देवी हैं। एक फूल में चार शास्त्र — और देवी उस फूल पर विराजती हैं: आसन ही उपदेश है।
गज-अभिषेक — वैभव का सबसे प्राचीन चित्र
अब उस छवि को पढ़िए जो सम्भवतः भारत की सबसे पुरानी अखंड-लोकप्रिय देवी-छवि है। गजलक्ष्मी: कमलासना देवी, दो (कहीं चार) गज, उठे हुए कलश, अभिषेक-जलधाराएँ। पुरातत्त्व इसे ई.पू. दूसरी शती से लगातार पाता है — भरहुत-सांची के तोरण, प्राचीन मुद्राएँ-सिक्के, गुफा-मंदिर, और आज भी दक्षिण के घरों के द्वार-पट्ट और विवाह-मंडप (ग्रेड A — कला-इतिहास)। दो सहस्राब्दी से अधिक समय तक बिना टूटे चली यह छवि क्या कहती है? गज भारतीय प्रतीक-भाषा में मेघ के भाई हैं (वर्षा-वाहक — ऐरावत-सूत्र D039), राज-ऐश्वर्य के चिह्न भी और धैर्य-गाम्भीर्य के भी; उनका कलश-अभिषेक वर्षा का, राज्याभिषेक का और श्रम-सिंचन का त्रिवेणी-संकेत है: श्री वहीं अभिषिक्त होती है जहाँ मेघ बरसें (प्रकृति), राज-मर्यादा हो (व्यवस्था) और गज-धैर्य हो (स्वभाव)। ध्यान दीजिए — देवी गज पर सवार नहीं हैं: गज उनकी सेवा में हैं; शक्ति-वैभव जब सेवक हों, स्वामी नहीं — वही श्री-राज्य है। श्रीसूक्त की वह ऋचा जो "हस्तिनाद-प्रबोधिनी" श्री का आवाहन करती है (गज-घोष से जागने वाली — ऋग्वेद-खिल धारा), इसी चित्र की वेद-वाणी है: समृद्धि उस घर जागती है जहाँ परिश्रम का गज-घोष सुनाई देता हो — सोए हुए के द्वार गज नहीं आते।
महाविद्या-पद — वैभव जो विद्या बन गया
पर मंडल ने श्री को दसवाँ — अंतिम — स्थान क्यों दिया? यह क्रम-निर्णय तंत्र का गहनतम कथन है। संसार की स्वाभाविक गति उलटी है — मनुष्य पहले लक्ष्मी चाहता है, शेष सब बाद में; मंडल कहता है: श्री पूर्णता का फल है, प्रारम्भ की माँग नहीं। देखिए यात्रा-क्रम: पहले काल-भय का अंत (काली D070), फिर पार लगना (तारा D071), सौंदर्य-दीक्षा (सुन्दरी D072), अवकाश-धारण (भुवनेश्वरी D073), आत्म-दान (छिन्नमस्ता D074), तप (भैरवी D075), रिक्तता का साक्षात्कार (धूमावती D076), संयम (बगला D077), समग्र-स्वीकार वाणी (मातंगी D078) — तब कमला। अर्थ पारदर्शी है: जो नौ द्वारों से गुज़रा है, उसी के हाथ में वैभव सुरक्षित है — उसे धन उन्मत्त नहीं करेगा (उसने रिक्तता देखी है), भ्रष्ट नहीं करेगा (उसने संयम साधा है), अहंकारी नहीं बनाएगा (उसने अपना शीश दान किया है)। और उलटा भी उतना ही सत्य: नौ साधनाओं के बिना पकड़ा धन नौ ही विकार बनता है — भय (काली-हीनता), डूबना (तारा-हीनता), कुरूपता, संकीर्णता, लोभ, विलास, आसक्ति, वाचालता, बहिष्कार। धूमावती-कमला की जोड़ी इस पाठ की धुरी है — ज्येष्ठा और कनिष्ठा (D076-कथा): मंथन से पहले अ-श्री निकली, फिर श्री; मंडल में भी रिक्तता-दर्शन (सप्तमी) वैभव-दर्शन (दशमी) से पहले है — जो खोना सीख चुका, पाना उसी को शोभा देता है।
घर की भाषा में कमला — चिह्न जो आज भी बोलते हैं
कमला-तत्त्व की सबसे बड़ी सिद्धि यह है कि वह शास्त्र से उतरकर गृह-लिपि बन गया — भारतीय घर आज भी कमला-चिह्नों में लिखा है, भले लिखने वाले को स्रोत याद न हो। द्वार पर कलश (आम्र-पल्लव, नारियल) — श्रीसूक्त का पूर्ण-कुंभ: जल-धान्य से भरा पात्र ही श्री का आसन है; दहलीज़ पर कमल-रंगोली/अल्पना और दीपावली की वे नन्ही लक्ष्मी-पगलियाँ (द्वार से भीतर आते चरण-चिह्न) — देवी के स्वागत का चित्र-मंत्र; तिजोरी-बही पर स्वस्तिक-कुंकुम; विवाह-मंडप का गज-तोरण। हर चिह्न वही एक वाक्य दोहराता है जो गजलक्ष्मी-छवि दो सहस्राब्दी से कह रही है — श्री आमंत्रित की जाती है, पकड़ी नहीं जाती: घर स्वच्छ हो, पात्र भरा हो, द्वार खुला हो — लक्ष्मी के चरण भीतर की ओर मुड़ते हैं। और इन चिह्नों का समाज-पाठ भी दर्ज हो: ये सारी लिपि परंपरा में प्रायः स्त्री-हस्त की है — अल्पना-रंगोली-कलश गृहिणी रचती आई है; कमला-संस्कृति ने घर की स्त्री को ही श्री की पुरोहिता माना — "गृहलक्ष्मी" सम्बोधन उसी दर्शन का शेष-चिह्न है।
मंडल-पूर्ति — दस द्वार, एक देवी
और अब वह समीक्षा, जिसके लिए यह अंतिम पृष्ठ बना है। दशमहाविद्या-मंडल (D070-D079) की परिक्रमा पूर्ण हुई — दस पृष्ठ, दस विद्याएँ; पर प्राकट्य-कथा (D070) का मूल-वाक्य अंत में फिर सुनिए: शिव के पूछने पर सती ने कहा था — "ये सब मैं हूँ।" काली और कमला विरोधी नहीं — एक ही सत्ता के दो छोर हैं: श्मशान की दिगम्बरा और कमल की स्वर्ण-वर्णा के बीच जो यात्रा है, वह देवी की नहीं — देखने वाले की यात्रा है; देवी तो दसों में एक साथ, पूरी-की-पूरी उपस्थित है। यही महाविद्या-दर्शन का अंतिम दान है: जीवन के जिस भी द्वार पर खड़े हो — हानि (धूमावती) या लाभ (कमला), विराम (बगला) या वाणी (मातंगी), ज्वाला (भैरवी) या अवकाश (भुवनेश्वरी) — द्वार बदलते हैं, माँ वही है; कोई अवस्था ईश्वर-शून्य नहीं। साधक के लिए मंडल का व्यावहारिक सूत्र: अपनी वर्तमान जीवन-अवस्था पहचानो — उसी की महाविद्या तुम्हारा वर्तमान द्वार है; और गुरु-मर्यादा की वह रेखा अंतिम बार दोहराकर मंडल बंद हो: दर्शन सबका है, साधना दीक्षितों की। कामाख्या की पहाड़ी पर दसों मंदिरों की परिक्रमा जहाँ समाप्त होती है, वहाँ यात्री मुड़कर देखता है — दस द्वार, एक ही पहाड़ी: यही दशमहाविद्या है। ॥ कमलात्मिका-सहित दशमहाविद्या-मंडल की जय ॥