पांडुरंग विठोबा

Vithoba · विठ्ठल · पंढरीनाथ · वारकरी-माउली

संसार के देवालयों में भगवान सिंहासनों पर हैं — पंढरपुर में वे ईंट पर खड़े हैं: कमर पर हाथ धरे, प्रतीक्षा करते। जिस भक्त ने कहा था "रुको, पहले माता-पिता की सेवा पूरी कर लूँ" — उसकी फेंकी ईंट पर विठ्ठल अट्ठाईस युगों से खड़े हैं। यह प्रतीक्षा ही महाराष्ट्र की भक्ति-गंगा — वारकरी-परंपरा — का उद्गम है।

श्रेणी: मंदिर-विशिष्ट स्वरूप (Q) — कृष्ण/विष्णु धाम: पंढरपुर (चंद्रभागा-तट) महापर्व: आषाढ़ी एकादशी — वारी पदयात्रा संत-मंडल: ज्ञानेश्वर से तुकाराम तक
प्रमुख कथा पढ़ें
प्रतीक्षा-मूर्तिभक्त के लिए युगों से खड़ा भगवान
मातृ-पितृ-सेवा साक्षीपुंडलिक-कथा — सेवा भक्ति से बड़ी
वारी-नाथलाखों की पदयात्रा जिसके द्वार आती है
अभंग-देवसंत-कवियों की वाणी में बसा विठ्ठल

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

विठोबा — विठ्ठल, पांडुरंग, पंढरीनाथ — महाराष्ट्र (और कर्नाटक-सीमा क्षेत्र) के हृदय-देवता हैं: भीमा (चंद्रभागा) नदी के तट पर बसे पंढरपुर के स्वामी; तत्त्वतः कृष्ण/विष्णु-रूप (D014/D002), पर मुद्रा ऐसी जो किसी और विग्रह में नहीं — ईंट पर खड़े, दोनों हाथ कमर पर धरे (कटि-हस्त): न वरद-मुद्रा, न आयुध — बस खड़े हैं, जैसे कोई अपने घर के दरवाज़े पर अपनों की बाट जोहता खड़ा हो। नाम-कोश भी घरेलू है: "विठ्ठल" की लोक-व्युत्पत्ति मराठी परंपरा "विट" (ईंट) से जोड़ती है — ईंट पर खड़ा; "बा" पिता-सम्बोधन — विठो-बा: ईंट वाले बाबा (व्युत्पत्ति-धाराएँ बहुविध — चिह्नित); "पांडुरंग" — श्वेत-आभा वाला।

साथ में देवी रखुमाई (रुक्मिणी — D014-मंडल) का पृथक् गर्भगृह। और इस क्षेत्र की आत्मा है वारकरी-परंपरा — "वारी करने वाले": वह भक्ति-आंदोलन जिसने आठ सदियों से हर आषाढ़ में लाखों पैदल-यात्रियों की नदियाँ पंढरपुर की ओर बहाई हैं, और जिसके संत-कवियों — ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, जनाबाई, चोखामेळा, सावता माळी, गोरा कुम्हार — ने मराठी भाषा को ही भक्ति-गंगा बना दिया।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-मूलकृष्ण/विष्णु (D014/D002) — गोपाल-रूप की पंढरी-मूर्ति
  • देवी-पक्षरखुमाई (रुक्मिणी) — पृथक्-गर्भगृह परंपरा; D014-मंडल
  • कारण-भक्तपुंडलिक — जिसकी ईंट पर देव खड़े; चंद्रभागा-तट समाधि-मंदिर
  • संत-मंडलज्ञानेश्वर-नामदेव-एकनाथ-तुकाराम + जनाबाई-चोखामेळा धारा — वारकरी परिवार
  • समांतर-धाराकर्नाटक हरिदास-परंपरा (पुरंदरदास) — विठ्ठल-भक्ति का कन्नड़ मुख

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / स्थल-पुराण + भक्ति-इतिहास

पुंडलिक की ईंट — जब सेवा ने भगवान को खड़ा रखा

बदला हुआ बेटा — कथा की धुरी

पुंडलिक पहले वैसा पुत्र नहीं था जैसा कथाएँ पूजती हैं — माहात्म्य-धाराएँ ईमानदारी से उसका पहला रूप सुनाती हैं: विवाह के बाद पत्नी-मोह में वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा करने वाला बेटा; तीर्थ-यात्रा पर भी स्वयं घोड़े पर, वृद्ध माता-पिता पैदल। मार्ग में (काशी-यात्रा धारा) कुक्कुट-मुनि के आश्रम का वह प्रसंग घटा जिसने उसे तोड़कर गढ़ दिया: भोर में उसने देखा — मैली साड़ियों वाली स्त्रियाँ आश्रम बुहार रही हैं, और काम पूरा होते ही उनके वस्त्र निर्मल हो गए। पूछने पर उत्तर मिला: हम गंगा-यमुना-सरस्वती (D056/D057) हैं — जगत् के पाप धोते-धोते मैली होती हैं, और इस आश्रम में शुद्ध हो जाती हैं — क्योंकि यहाँ का स्वामी माता-पिता की सेवा करता है; और सुन, पुंडलिक — तुझ जैसे मातृ-पितृ-द्रोही के स्पर्श से तो हम और मैली होती हैं। वज्र गिरा। उसी क्षण पुंडलिक लौटा — घोड़े पर माता-पिता, स्वयं पैदल; और शेष जीवन की धुरी एक ही सूत्र: सेवा। कथा का पहला पाठ यहीं पूरा है: तीर्थ बाहर नहीं थे — घर में बैठे थे; नदियाँ जिस आँगन में स्नान करने आएँ, वह आँगन वही है जहाँ वृद्ध चरण धोए जाते हैं।

ईंट — भारतीय भक्ति का सबसे बड़ा उलट-दृश्य

फिर वह दिन आया जिसने पंढरपुर रच दिया। पुंडलिक माता-पिता के चरण दबा रहा था — और द्वार पर स्वयं श्रीकृष्ण आ खड़े हुए (धारा-प्रसंग: द्वारका से, रुक्मिणी-सहित/खोजते — पाठ-भेद): "पुंडलिक! तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ — दर्शन दे रहा हूँ।" और पुंडलिक ने वह किया जो भक्ति-साहित्य में कोई नहीं कर सका — मुड़कर भी नहीं देखा; सेवा-रत हाथों से पीछे एक ईंट सरका दी: "प्रभु, अभी माता-पिता की सेवा में हूँ — यह अधूरी छोड़ूँ तो भक्त कैसा? आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा करें।" ठहरिए इस वाक्य पर — एक मनुष्य ने साक्षात् भगवान से प्रतीक्षा करवाई, और कारण बताया: तुम्हारा ही सिखाया धर्म। और भगवान? — रुष्ट नहीं हुए: खड़े हो गए — कमर पर हाथ धरे, उस ईंट पर; और ऐसे रीझे कि बोले: पुंडलिक, अब मैं यहीं रहूँगा — इसी मुद्रा में, तेरी सेवा का साक्षी बनकर। परंपरा कहती है — वे आज तक वहीं खड़े हैं: अट्ठाईस युगों से ("युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा" — नामदेव-आरती की अमर पंक्ति)। विग्रह की कटि-हस्त मुद्रा का लोक-अर्थ भी सुन लीजिए: भक्त पूछता है — हाथ कमर पर क्यों? उत्तर: भव-सागर मेरे भक्तों के लिए बस कमर-भर गहरा है — इससे ऊपर नहीं चढ़ने दूँगा। यह कथा भक्ति-शास्त्र का कोपर्निकी क्षण है: केंद्र बदल गया — भगवान प्रतीक्षा में, मनुष्य कर्तव्य में; पूजा रुक सकती है, सेवा नहीं — क्योंकि (वारकरी-दर्शन का सार) सेवा ही पूजा का पूर्ण-रूप है

वारी — आठ सौ वर्षों की चलती नदी

पुंडलिक की ईंट से जो क्षेत्र जन्मा, उसने भारत की सबसे विलक्षण जीवित परंपरा रची — वारी: हर आषाढ़ (जून-जुलाई), महाराष्ट्र-भर से पैदल-यात्रियों की नदियाँ पंढरपुर की ओर — कंधे पर भगवा पताका, गले में तुलसी-माला, मुख में एक ही धुन: "ज्ञानोबा-माउली-तुकाराम!" प्रमुख पालखियाँ — आळंदी से ज्ञानेश्वर-महाराज की, देहू से तुकाराम-महाराज की — संतों की चरण-पादुकाएँ रजत-पालकियों में लेकर 250-किलोमीटर, 21-दिन की पदयात्रा करती हैं; लाखों वारकरी (स्त्री-पुरुष, किसान-व्यापारी, वृद्ध-बालक) साथ चलते हैं — रिंगण के घोड़-चक्र, भजन-मंडलियों के टाळ-मृदंग, गाँव-गाँव के अन्न-सत्कार; और आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी — D002-चक्र) को चंद्रभागा-स्नान कर विठ्ठल-दर्शन। यह आयोजन नहीं — परंपरा-जीव है: ज्ञानेश्वर-पूर्व से चली, आठ सदियों से अखंड। और उसका सामाजिक शास्त्र उसकी भक्ति जितना ऊँचा: वारी में जाति-पंक्ति नहीं — सब "माउली" (माँ) सम्बोधन से पुकारे जाते हैं; जिस संत-मंडल ने यह धारा रची, वह स्वयं भारतीय समाज का पूरा वृत्त था — ज्ञानेश्वर बहिष्कृत ब्राह्मण-पुत्र, नामदेव दर्ज़ी, गोरा कुम्हार, सावता माळी, सेना नाई, चोखामेळा महार (जिनकी समाधि आज मंदिर-द्वार पर है — दर्शन-पंक्ति उन्हीं को प्रणाम कर भीतर जाती है), जनाबाई दासी — और तुकाराम वाणी-व्यापारी: अभंग-साहित्य (टूट न सकने वाला छंद) इन्हीं हाथों ने रचा — करघे, मटके, खुरपी और चक्की के पास बैठकर; विठ्ठल-भक्ति ने मराठी को वह दे दिया जो संस्कृत-सभाएँ न दे सकीं: हर हाथ को कविता का अधिकार

काम में हाथ बँटाने वाला देव — संत-चरितों की गवाही

वारकरी संत-चरित साहित्य में विठ्ठल का एक और विलक्षण रूप बार-बार आता है — काम में हाथ बँटाने वाला भगवान। जनाबाई (नामदेव-घर की दासी, स्वयं महाकवयित्री) के अभंग गाते हैं कि गोबर पाथने और चक्की पीसने में विठ्ठल उनके संग बैठते थे — दासी का श्रम देव का सत्संग बन गया; सेना नाई की कथा में राजा की सेवा-घड़ी पर स्वयं विठ्ठल नाई-रूप धरकर पहुँच गए; गोरा कुम्हार के चाक और सावता माळी की क्यारियों के प्रसंग भी इसी परिवार के हैं — माळी का प्रसिद्ध अभंग-भाव: मेरी मूली-भाजी में ही मेरा विठ्ठल है, पंढरी जाने की भी क्या आवश्यकता (संत-चरित/अभंग परंपरा — ग्रेड A/B साहित्य, चमत्कार-अंश लोक-श्रद्धा स्तर चिह्नित)। इन कथाओं का धर्म-शास्त्र क्रांतिकारी है: भगवान दर्शनार्थी की पंक्ति में नहीं — श्रम की पंक्ति में मिलता है; चक्की, चाक, खुरपी, उस्तरा — हर औज़ार पूजा-पात्र है। पुंडलिक-सूत्र का ही यह विस्तार है: जिसने सेवा को पूजा कहा, उसका देव सेवा में सहकर्मी हो गया।

प्रतीक्षा का देवता — दर्शन जो छूने देता है

समापन-दर्शन उस मुद्रा से, जो आठ सौ वर्षों से नहीं बदली। पंढरपुर का दर्शन-विधान भी विरल है: यह उन गिने-चुने महाक्षेत्रों में है जहाँ सामान्य भक्त गर्भगृह में जाकर विग्रह के चरण छू सकता है — पद-स्पर्श दर्शन: जो देवता भक्त की ईंट पर खड़ा हो गया, वह भक्त के हाथ से दूर कैसे रहता? वारकरी-दर्शन में विठ्ठल "देव" कम, "माउली" — माँ — अधिक हैं; तुकाराम के अभंग उन्हें कभी माँ, कभी सखा, कभी उलाहनों का पात्र बनाते हैं — भक्ति यहाँ याचना नहीं, घर का रिश्ता है। और कथा-मूल का वह पाठ अंत में फिर से: इस पूरे महाक्षेत्र, इस लाखों की वारी, इस संत-गंगा का बीज क्या था? — एक बेटे का अपने वृद्ध माता-पिता के चरण दबाना। भारतीय परंपरा ने मातृ-पितृ-सेवा पर बहुत वचन कहे हैं (श्रवणकुमार-कथा से गणेश-परिक्रमा D004 तक) — पर पंढरपुर उन सबका जीवित शिखर है: यहाँ भगवान स्वयं उस सेवा के साक्षी-स्तम्भ हैं — युगों से खड़े, अपलक, कमर पर हाथ धरे; मानो हर दर्शनार्थी से पूछ रहे हों — घर के वृद्धों को प्रणाम करके आए हो? ॥ जय जय विठोबा रखुमाई ॥

स्रोत टिप्पणी: पुंडलिक-चरित (पूर्व-रूप, कुक्कुट-आश्रम त्रिवेणी-प्रसंग, ईंट-प्रसंग) — पांडुरंग-माहात्म्य धाराएँ स्कंद/पद्म-वर्ग (ग्रेड A/B — क्षेत्र-माहात्म्य; स्थल/क्रम पाठ-भेद चिह्नित); "युगे अठ्ठावीस..." — नामदेव-परंपरा आरती (ग्रेड A/B — जीवित पाठ); कटि-जल लोक-व्याख्या (ग्रेड B/C); वारी/पालखी (आळंदी-देहू), रिंगण, माउली-सम्बोधन, चोखामेळा-समाधि-स्थान, पद-स्पर्श दर्शन — जीवित परंपरा एवं अभिलेख (ग्रेड A); संत-मंडल वृत्ति-सूची — संत-चरित साहित्य (ग्रेड A — साहित्य-इतिहास); ज्ञानेश्वरी-अभंग गाथा सन्दर्भ (ग्रेड A); पुरंदरदास कन्नड़-धारा (ग्रेड A/B)। देवशयनी-सूत्र D002-चक्र; रुक्मिणी D014-मंडल। विठ्ठल-व्युत्पत्तियाँ बहुविध — शोध-स्तर चिह्नित। समापन-अंश व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
विठोबा / विठ्ठल
"विटेवरी उभा" — ईंट पर खड़ा; बा = पिता-सम्बोधन (लोक-व्युत्पत्ति, चिह्नित)।
पांडुरंग
श्वेत-आभ — अभंग-साहित्य का प्रिय नाम।
पंढरीनाथ
पंढरी (पंढरपुर) के स्वामी — क्षेत्र-नाम।
माउली
"माँ" — वारकरी हृदय का सम्बोधन: देव भी माउली, संत भी, सह-यात्री भी।
विठु-माउली / विठाई
मातृ-भाव नाम-रूप — जनाबाई-धारा की वाणी।

मंत्र एवं धुन

Mantras

नाम-धुन (वारकरी-कीर्तन)

विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठला । हरि ॐ विठ्ठला ॥  ·  जय जय विठोबा रखुमाई ॥

पालखी-घोष

ज्ञानोबा-माउली-तुकाराम ॥  ·  पुंडलिक वरदा हरि विठ्ठल ॥

टिप्पणी: वारकरी-परंपरा का प्राण मंत्र-विधि नहीं — नाम-संकीर्तन है: टाळ-मृदंग संग अखंड धुन; ज्ञानेश्वर का "नामयाचि सोपी युक्ति" (नाम की सरल युक्ति) दर्शन।

प्रमुख आरती "युगे अठ्ठावीस..." एवं चयनित अभंगों (तुकाराम/नामदेव/जनाबाई — रचयिता-श्रेय सहित) के पूर्ण पाठ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में।

पर्व एवं वारी-चक्र

Festivals
आषाढ़ी एकादशी — महावारी
देवशयनी — वर्ष की महायात्रा; लाखों वारकरी, चंद्रभागा-स्नान।
कार्तिकी एकादशी
देवउठनी (D084-सूत्र) — द्वितीय महावारी; प्रबोधन-पर्व।
पालखी-प्रस्थान
ज्येष्ठ में आळंदी-देहू से — 21-दिवसीय पद-प्रवाह; रिंगण-सोहळा।
माघी-चैत्री वारियाँ
चार वार्षिक वारियों का शेष-युग्म — अखंड यात्रा-चक्र।

मंदिर एवं क्षेत्र

Temples
विठ्ठल-रखुमाई मंदिर, पंढरपुर
चंद्रभागा-तट महाक्षेत्र — पद-स्पर्श दर्शन; नामदेव-पायरी एवं चोखामेळा-समाधि द्वार पर।
पुंडलिक-मंदिर
नदी-मध्य समाधि — दर्शन-क्रम में प्रथम-प्रणाम परंपरा।
आळंदी एवं देहू
ज्ञानेश्वर-समाधि व तुकाराम-जन्मभूमि — पालखी-उद्गम तीर्थ।
विठ्ठल-धारा दक्षिण
हम्पी विठ्ठल-मंदिर (विजयनगर शिल्प-शिखर) से कन्नड़ हरिदास-पीठ तक।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: विठोबा (विठ्ठल) महाराष्ट्र के पंढरपुर के भगवान हैं — कृष्ण जी का रूप। सबसे अनोखी बात: वे ईंट पर खड़े हैं! पुंडलिक नाम का भक्त अपने माता-पिता की सेवा कर रहा था; भगवान आए तो उसने कहा — "थोड़ा रुकिए, इस ईंट पर खड़े हो जाइए!" और भगवान को यह बात इतनी अच्छी लगी कि वे वहीं खड़े रह गए — हमेशा के लिए!

रोचक तथ्य:

  • हर साल लाखों लोग 21 दिन पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं — इसे "वारी" कहते हैं!
  • वारी में सब एक-दूसरे को "माउली" (माँ) कहकर बुलाते हैं।
  • पंढरपुर में भक्त भगवान के चरण छू सकते हैं — यह बहुत कम मंदिरों में होता है।
  • संत तुकाराम, नामदेव, जनाबाई — सबने विठ्ठल के गीत (अभंग) गाए हैं।

सीख: माता-पिता की सेवा सबसे बड़ी पूजा है — इतनी बड़ी कि भगवान भी उसके लिए प्रतीक्षा करते हैं!

मिनी क्विज़:

  1. विठोबा किस चीज़ पर खड़े हैं?
  2. वह ईंट किसने दी थी?
  3. पैदल-यात्रा का नाम क्या है?
  4. वारकरी एक-दूसरे को क्या कहते हैं?