पुंडलिक की ईंट — जब सेवा ने भगवान को खड़ा रखा
बदला हुआ बेटा — कथा की धुरी
पुंडलिक पहले वैसा पुत्र नहीं था जैसा कथाएँ पूजती हैं — माहात्म्य-धाराएँ ईमानदारी से उसका पहला रूप सुनाती हैं: विवाह के बाद पत्नी-मोह में वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा करने वाला बेटा; तीर्थ-यात्रा पर भी स्वयं घोड़े पर, वृद्ध माता-पिता पैदल। मार्ग में (काशी-यात्रा धारा) कुक्कुट-मुनि के आश्रम का वह प्रसंग घटा जिसने उसे तोड़कर गढ़ दिया: भोर में उसने देखा — मैली साड़ियों वाली स्त्रियाँ आश्रम बुहार रही हैं, और काम पूरा होते ही उनके वस्त्र निर्मल हो गए। पूछने पर उत्तर मिला: हम गंगा-यमुना-सरस्वती (D056/D057) हैं — जगत् के पाप धोते-धोते मैली होती हैं, और इस आश्रम में शुद्ध हो जाती हैं — क्योंकि यहाँ का स्वामी माता-पिता की सेवा करता है; और सुन, पुंडलिक — तुझ जैसे मातृ-पितृ-द्रोही के स्पर्श से तो हम और मैली होती हैं। वज्र गिरा। उसी क्षण पुंडलिक लौटा — घोड़े पर माता-पिता, स्वयं पैदल; और शेष जीवन की धुरी एक ही सूत्र: सेवा। कथा का पहला पाठ यहीं पूरा है: तीर्थ बाहर नहीं थे — घर में बैठे थे; नदियाँ जिस आँगन में स्नान करने आएँ, वह आँगन वही है जहाँ वृद्ध चरण धोए जाते हैं।
ईंट — भारतीय भक्ति का सबसे बड़ा उलट-दृश्य
फिर वह दिन आया जिसने पंढरपुर रच दिया। पुंडलिक माता-पिता के चरण दबा रहा था — और द्वार पर स्वयं श्रीकृष्ण आ खड़े हुए (धारा-प्रसंग: द्वारका से, रुक्मिणी-सहित/खोजते — पाठ-भेद): "पुंडलिक! तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ — दर्शन दे रहा हूँ।" और पुंडलिक ने वह किया जो भक्ति-साहित्य में कोई नहीं कर सका — मुड़कर भी नहीं देखा; सेवा-रत हाथों से पीछे एक ईंट सरका दी: "प्रभु, अभी माता-पिता की सेवा में हूँ — यह अधूरी छोड़ूँ तो भक्त कैसा? आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा करें।" ठहरिए इस वाक्य पर — एक मनुष्य ने साक्षात् भगवान से प्रतीक्षा करवाई, और कारण बताया: तुम्हारा ही सिखाया धर्म। और भगवान? — रुष्ट नहीं हुए: खड़े हो गए — कमर पर हाथ धरे, उस ईंट पर; और ऐसे रीझे कि बोले: पुंडलिक, अब मैं यहीं रहूँगा — इसी मुद्रा में, तेरी सेवा का साक्षी बनकर। परंपरा कहती है — वे आज तक वहीं खड़े हैं: अट्ठाईस युगों से ("युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा" — नामदेव-आरती की अमर पंक्ति)। विग्रह की कटि-हस्त मुद्रा का लोक-अर्थ भी सुन लीजिए: भक्त पूछता है — हाथ कमर पर क्यों? उत्तर: भव-सागर मेरे भक्तों के लिए बस कमर-भर गहरा है — इससे ऊपर नहीं चढ़ने दूँगा। यह कथा भक्ति-शास्त्र का कोपर्निकी क्षण है: केंद्र बदल गया — भगवान प्रतीक्षा में, मनुष्य कर्तव्य में; पूजा रुक सकती है, सेवा नहीं — क्योंकि (वारकरी-दर्शन का सार) सेवा ही पूजा का पूर्ण-रूप है।
वारी — आठ सौ वर्षों की चलती नदी
पुंडलिक की ईंट से जो क्षेत्र जन्मा, उसने भारत की सबसे विलक्षण जीवित परंपरा रची — वारी: हर आषाढ़ (जून-जुलाई), महाराष्ट्र-भर से पैदल-यात्रियों की नदियाँ पंढरपुर की ओर — कंधे पर भगवा पताका, गले में तुलसी-माला, मुख में एक ही धुन: "ज्ञानोबा-माउली-तुकाराम!" प्रमुख पालखियाँ — आळंदी से ज्ञानेश्वर-महाराज की, देहू से तुकाराम-महाराज की — संतों की चरण-पादुकाएँ रजत-पालकियों में लेकर 250-किलोमीटर, 21-दिन की पदयात्रा करती हैं; लाखों वारकरी (स्त्री-पुरुष, किसान-व्यापारी, वृद्ध-बालक) साथ चलते हैं — रिंगण के घोड़-चक्र, भजन-मंडलियों के टाळ-मृदंग, गाँव-गाँव के अन्न-सत्कार; और आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी — D002-चक्र) को चंद्रभागा-स्नान कर विठ्ठल-दर्शन। यह आयोजन नहीं — परंपरा-जीव है: ज्ञानेश्वर-पूर्व से चली, आठ सदियों से अखंड। और उसका सामाजिक शास्त्र उसकी भक्ति जितना ऊँचा: वारी में जाति-पंक्ति नहीं — सब "माउली" (माँ) सम्बोधन से पुकारे जाते हैं; जिस संत-मंडल ने यह धारा रची, वह स्वयं भारतीय समाज का पूरा वृत्त था — ज्ञानेश्वर बहिष्कृत ब्राह्मण-पुत्र, नामदेव दर्ज़ी, गोरा कुम्हार, सावता माळी, सेना नाई, चोखामेळा महार (जिनकी समाधि आज मंदिर-द्वार पर है — दर्शन-पंक्ति उन्हीं को प्रणाम कर भीतर जाती है), जनाबाई दासी — और तुकाराम वाणी-व्यापारी: अभंग-साहित्य (टूट न सकने वाला छंद) इन्हीं हाथों ने रचा — करघे, मटके, खुरपी और चक्की के पास बैठकर; विठ्ठल-भक्ति ने मराठी को वह दे दिया जो संस्कृत-सभाएँ न दे सकीं: हर हाथ को कविता का अधिकार।
काम में हाथ बँटाने वाला देव — संत-चरितों की गवाही
वारकरी संत-चरित साहित्य में विठ्ठल का एक और विलक्षण रूप बार-बार आता है — काम में हाथ बँटाने वाला भगवान। जनाबाई (नामदेव-घर की दासी, स्वयं महाकवयित्री) के अभंग गाते हैं कि गोबर पाथने और चक्की पीसने में विठ्ठल उनके संग बैठते थे — दासी का श्रम देव का सत्संग बन गया; सेना नाई की कथा में राजा की सेवा-घड़ी पर स्वयं विठ्ठल नाई-रूप धरकर पहुँच गए; गोरा कुम्हार के चाक और सावता माळी की क्यारियों के प्रसंग भी इसी परिवार के हैं — माळी का प्रसिद्ध अभंग-भाव: मेरी मूली-भाजी में ही मेरा विठ्ठल है, पंढरी जाने की भी क्या आवश्यकता (संत-चरित/अभंग परंपरा — ग्रेड A/B साहित्य, चमत्कार-अंश लोक-श्रद्धा स्तर चिह्नित)। इन कथाओं का धर्म-शास्त्र क्रांतिकारी है: भगवान दर्शनार्थी की पंक्ति में नहीं — श्रम की पंक्ति में मिलता है; चक्की, चाक, खुरपी, उस्तरा — हर औज़ार पूजा-पात्र है। पुंडलिक-सूत्र का ही यह विस्तार है: जिसने सेवा को पूजा कहा, उसका देव सेवा में सहकर्मी हो गया।
प्रतीक्षा का देवता — दर्शन जो छूने देता है
समापन-दर्शन उस मुद्रा से, जो आठ सौ वर्षों से नहीं बदली। पंढरपुर का दर्शन-विधान भी विरल है: यह उन गिने-चुने महाक्षेत्रों में है जहाँ सामान्य भक्त गर्भगृह में जाकर विग्रह के चरण छू सकता है — पद-स्पर्श दर्शन: जो देवता भक्त की ईंट पर खड़ा हो गया, वह भक्त के हाथ से दूर कैसे रहता? वारकरी-दर्शन में विठ्ठल "देव" कम, "माउली" — माँ — अधिक हैं; तुकाराम के अभंग उन्हें कभी माँ, कभी सखा, कभी उलाहनों का पात्र बनाते हैं — भक्ति यहाँ याचना नहीं, घर का रिश्ता है। और कथा-मूल का वह पाठ अंत में फिर से: इस पूरे महाक्षेत्र, इस लाखों की वारी, इस संत-गंगा का बीज क्या था? — एक बेटे का अपने वृद्ध माता-पिता के चरण दबाना। भारतीय परंपरा ने मातृ-पितृ-सेवा पर बहुत वचन कहे हैं (श्रवणकुमार-कथा से गणेश-परिक्रमा D004 तक) — पर पंढरपुर उन सबका जीवित शिखर है: यहाँ भगवान स्वयं उस सेवा के साक्षी-स्तम्भ हैं — युगों से खड़े, अपलक, कमर पर हाथ धरे; मानो हर दर्शनार्थी से पूछ रहे हों — घर के वृद्धों को प्रणाम करके आए हो? ॥ जय जय विठोबा रखुमाई ॥