माता संतोषी

Santoshi Mata · संतोष की देवी · शुक्रवार-व्रत की माँ

देव-इतिहास की सबसे युवा महादेवी — जिसकी उपासना बीसवीं सदी में जन्मी, पोस्टरों और व्रत-पुस्तिकाओं से चली, और 1975 की एक फ़िल्म के साथ घर-घर पहुँच गई। गुड़-चने जैसा सस्ता भोग, खटाई-भर का परहेज़, सोलह शुक्रवारों का सरल व्रत — और फल: संतोष, जिसे शास्त्र परम धन कहते आए हैं।

श्रेणी: लोक-देवी (तुलनात्मक आधुनिक परंपरा) व्रत: 16 शुक्रवार · भोग: गुड़-चना वर्जना: खटाई (व्रती एवं परिवार) लोक-वंश: गणेश-पुत्री (लोक-मान्यता)
प्रमुख कथा पढ़ें
संतोष-दात्रीतृप्ति — जिसके आगे हर धन छोटा
सुलभ-सेव्यागुड़-चना — सबसे सस्ता भोग, सबसे खुला द्वार
शुक्रवार-व्रतासोलह शुक्रवार — धैर्य की सरल साधना
गृहिणी-सखीघरेलू संघर्ष की सबसे अपनी देवी

परिचय — देव-मंडल की सबसे युवा देवी

Introduction

इस कोश की अधिकांश प्रविष्टियाँ सहस्राब्दियों पुरानी परंपराओं की हैं; यह पृष्ठ अलग है — और अपनी अलग-पन में ही ऐतिहासिक रूप से बहुमूल्य। संतोषी माता की उपासना बीसवीं सदी की देन है: उनका उल्लेख किसी प्राचीन पुराण-संहिता में नहीं मिलता; उनकी व्रत-पद्धति 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध-मध्य में उत्तर-भारत में व्रत-पुस्तिकाओं, पोस्टर-कला और स्त्री-लोक की मौखिक परंपरा से आकार लेती दिखती है, और 1975 की फ़िल्म जय संतोषी माँ ने उसे रातोंरात अखिल-भारतीय कर दिया। यह कोश इस आधुनिकता को छिपाता नहीं — दर्ज करता है: क्योंकि संतोषी माता इस बात का जीवित प्रमाण हैं कि हिंदू देवी-परंपरा कोई बंद संग्रहालय नहीं, बहती नदी है — देवता यहाँ आज भी जन्म ले सकते हैं, यदि लोक-हृदय को उनकी आवश्यकता हो।

और आवश्यकता क्या थी? नाम में उत्तर है — संतोष। स्वरूप सौम्य है: सिंहासनासीन चतुर्भुजा/द्विभुजा माता — त्रिशूल-खड्ग और अभय-मुद्रा; भोग में गुड़-चना — इतना सस्ता कि निर्धनतम गृहिणी भी हर शुक्रवार चढ़ा सके; वर्जना केवल खटाई की। लोक-वंशावली उन्हें गणेश-पुत्री कहती है (D004) — रिद्धि-सिद्धि की कन्या, शुभ-लाभ की बहन (लोक-मान्यता, ग्रेड C — चिह्नित): तोष-तुष्टि (संतोष) गणेश-परिवार की तीसरी पीढ़ी — प्रतीक-गणित सुंदर है: शुभ और लाभ के बाद घर को जो चाहिए, वह संतोष ही तो है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पिता (लोक-वंश)गणेश (D004) — रिद्धि-सिद्धि सहित; ग्रेड C लोक-मान्यता
  • भाई (लोक-वंश)शुभ-लाभ — गणेश-द्वार के मंगल-पुत्र
  • तत्त्व-कुलशक्ति-मंडल की सौम्य धारा — तुष्टि-पुष्टि देवियों की सजातीया
  • व्रत-सम्बन्धशुक्रवार — देवी-वार परंपरा (वैभव-लक्ष्मी व्रत की पड़ोसी-धारा, D007)
  • वर्ग-सहोदराशीतला (D092) — लोक-देवी वर्ग: चबूतरे से कैलेंडर-पोस्टर तक

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / व्रत-कथा + आधुनिक इतिहास

बहू की कथा और एक देवी का जन्म — व्रत से सिनेमा तक

व्रत-कथा — सताई हुई बहू और सोलह शुक्रवार

हर व्रत की आत्मा उसकी कथा है, और संतोषी-व्रत की कथा बीसवीं सदी के भारतीय घर के आँगन से उठी है — इसीलिए वह पुराणों की राजकुमारियों की नहीं, एक साधारण बहू की कथा है। प्रचलित पाठ का सार यों है (व्रत-पुस्तिका परंपरा — ग्रेड C; पाठ-भेद अनेक): एक बुढ़िया के सात बेटे थे; छह कमाते, सातवाँ — सबसे छोटा — निकम्मा कहलाता। माँ छहों को ताज़ा भोजन परोसती और छोटे को उनका झूठन। भोली पत्नी को जब यह भेद पता चला, तो पति से कहा; पति ने परदेस की राह ली — कमाकर लौटने की प्रतिज्ञा के साथ। पीछे रह गई बहू पर सास-जिठानियों का पहाड़ टूटा — घर-भर का काम, भूसी की रोटी, नारियल की खोपड़ी में पानी; और परदेस गया पति वहाँ धन-वैभव में पत्नी को भूल बैठा। एक दिन बहू ने मंदिर में स्त्रियों से संतोषी माता के शुक्रवार-व्रत की महिमा सुनी: सवा आने का गुड़-चना, कथा-श्रवण, खटाई का त्याग — और सोलह शुक्रवार का नियम। उसने व्रत उठाया। माता की कृपा-लीला दो स्तरों पर चली — परदेस में पति को स्वप्न-स्मरण और कारोबार में ऐसा उछाल कि वह धन लेकर लौट आया; घर में बहू के दिन फिरे — अलग चूल्हा, मान-सम्मान। पर कथा का असली काँटा उद्यापन में है: बहू ने व्रत-पूर्ति का भोज रखा, जिठानियों ने ईर्ष्या-वश अपने बच्चों को सिखाकर भेजा — उन्होंने भोजन के साथ खटाई माँगी-खाई; नियम भंग होते ही माता का कोप उतरा — पति पर राज-दंड का संकट आ गिरा। बहू ने दोष बाहर नहीं — विधि-भंग में खोजा, क्षमा माँगी, पुनः विधिवत् उद्यापन किया — तब कल्याण पूर्ण हुआ: पुत्र-जन्म, और स्वयं माता का गृह-आगमन। कथा का पाठ स्पष्ट है: व्रत की शक्ति श्रद्धा-सातत्य में है; और खटाई — खटास — केवल स्वाद नहीं, सम्बन्धों की कड़वाहट का रूपक है: संतोष की देवी के घर में खटास वर्जित है, थाली में भी, वाणी में भी।

1975 — जब देवी सिनेमा के परदे से घर-घर उतरी

अब कथा के दूसरे स्तर पर चलिए — वह स्तर जो इस देवी को धर्म-इतिहास की अद्वितीय केस-स्टडी बनाता है। 1975 में विजय शर्मा-निर्देशित, अल्प-बजट पौराणिक फ़िल्म जय संतोषी माँ (अनीता गुहा — संतोषी; कानन कौशल — सत्यवती-बहू; संगीत सी. अर्जुन, स्वर उषा मंगेशकर — "मैं तो आरती उतारूँ रे...") प्रदर्शित हुई — उसी वर्ष जब शोले और दीवार परदे पर थीं; और बॉक्स-ऑफ़िस इतिहास साक्षी है कि वह छोटी-सी पौराणिक उस वर्ष की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलताओं में जा खड़ी हुई (फ़िल्म-इतिहास — ग्रेड A)। पर जो हुआ वह व्यवसाय से बड़ा था — सिनेमाघर मंदिर बन गए: दर्शक (बहुसंख्य स्त्रियाँ) चप्पल बाहर उतारतीं, परदे पर आरती के समय हॉल में थालियाँ घूमतीं, सिक्के-फूल परदे पर चढ़ते; गाँव-कस्बों में फ़िल्म देखना ही व्रत-दर्शन गिना गया। समाज-वैज्ञानिकों ने बाद में इसे आधुनिक भक्ति-इतिहास का निर्णायक क्षण कहा — पहली बार कोई देवी जन-माध्यम से अखिल-भारतीय हुई: जो काम कभी शंकराचार्यों की पदयात्राएँ और मंगल-काव्य करते थे, वह 35-मिमी रील ने कर दिखाया। फ़िल्म के बाद देश-भर में संतोषी-मंदिर उठे, कलैंडर-पोस्टरों में उनका चित्र-व्याकरण जमा, और सोलह-शुक्रवार व्रत उत्तर से दक्षिण तक फैला। ध्यान देने योग्य ईमानदार तथ्य: फ़िल्म से पहले भी देवी उपस्थित थीं — 1960 के दशक की व्रत-पुस्तिकाएँ, पोस्टर और कहीं-कहीं मंदिर (जोधपुर की लाल सागर-परंपरा आदि) मिलते हैं — फ़िल्म ने देवी गढ़ी नहीं, राष्ट्रीय की; बीज लोक में था, सिनेमा वर्षा बना।

स्त्री-लोक की देवी — व्रत का समाजशास्त्र

संतोषी-परिघटना की एक परत और खोलनी चाहिए — यह देवी किसने गढ़ी? उत्तर: भारतीय घरों के स्त्री-लोक ने। व्रत-कथा को दुबारा पढ़िए — उसमें राजा-ऋषि-असुर कोई नहीं: सास है, जिठानियाँ हैं, परदेस गया पति है, झूठन की थाली है — यह बीसवीं सदी की संयुक्त-गृहस्थी में सबसे नीचे खड़ी बहू का अपना संसार है, और कथा उसी की आँख से लिखी गई है। संतोषी-व्रत की पूरी विधि स्त्री-अनुकूल है: न पुरोहित की आवश्यकता, न संस्कृत-पाठ, न व्यय — सवा आने का प्रसाद, सहेलियों के साथ कथा-मंडली, और फल भी वही जो उस जीवन की सच्ची पुकारें थीं: पति की सुध, घर में मान, कलह से मुक्ति। समाज-वैज्ञानिक इसे "व्रत-लोकतंत्र" कहते हैं — जिस उपासना-तंत्र में शास्त्र-अधिकार की सीढ़ियाँ स्त्रियों के लिए ऊँची थीं, वहाँ उन्होंने अपनी देवी, अपनी कथा, अपनी विधि स्वयं रच ली — मौखिक परंपरा से, पुस्तिका-छापेखानों से, और अंततः सिनेमा से। संतोषी माता इस अर्थ में केवल उपास्या नहीं — भारतीय स्त्री-लोक की सामूहिक रचनाशक्ति का स्मारक हैं।

संतोष-तत्त्व — नाम का शास्त्र

देवी युवा हैं, पर उनका तत्त्व उपनिषद्-युग जितना प्राचीन है। "संतोष" भारतीय साधना-शास्त्र में कोई भावुक शब्द नहीं — पारिभाषिक पद है: पातंजल योग-सूत्र के पाँच नियमों में दूसरा — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान; और सूत्रकार फल भी घोषित करता है: "संतोषादनुत्तमः सुखलाभः" (2.42) — संतोष से सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति। मनु-धारा का प्रसिद्ध सूत्र "संतोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्" और लोक-कण्ठ का "संतोषः परमं सुखम्" इसी की प्रतिध्वनियाँ हैं; गीता का "संतुष्टः सततं योगी" (12.14) संतोष को भक्त के लक्षणों में गिनाता है। अब देखिए बीसवीं सदी ने इस प्राचीन नियम को देवी क्यों बनाया: वह सदी भारतीय गृहस्थ के लिए अभाव और आकांक्षा के बीच पिसने की सदी थी — संयुक्त परिवारों के भीतर बहुओं का श्रम-संघर्ष (व्रत-कथा ठीक यही चित्र है), शहरों की ओर पलायन, विज्ञापन-युग की पहली किरणें। ऐसे समय लोक ने अपने सबसे ज़रूरी मूल्य — तृप्ति — को माँ का चेहरा दे दिया: जो देवी सवा आने के गुड़-चने से प्रसन्न हो जाए, वह स्वयं अपने विधान से उपदेश है — प्रसन्नता का मूल्य बाज़ार तय नहीं करता। खटाई-वर्जना उसी की दूसरी पंक्ति: घर की असली दरिद्रता धन की नहीं, कटुता की होती है। और सोलह शुक्रवारों का सातत्य तीसरी: संतोष एक क्षण का भाव नहीं — अभ्यास है, सप्ताह-दर-सप्ताह साधा जाने वाला। इस त्रिसूत्री को आज के उपभोग-युग के सामने रखिए — "और चाहिए" के विज्ञापन-मंत्र के विरुद्ध "जो है, वह पर्याप्त है" की देवी — तो समझ आता है कि देव-मंडल की सबसे युवा माता सबसे समकालीन भी क्यों है। ॥ जय संतोषी माता ॥

स्रोत टिप्पणी: व्रत-कथा — 20वीं सदी की प्रचलित व्रत-पुस्तिका परंपरा का सारांश (ग्रेड C — लोक-पाठ, अनेक पाठ-भेद; किसी पुराण-संहिता में नहीं — स्पष्ट चिह्नित); 'जय संतोषी माँ' 1975 — निर्देशक/कलाकार/संगीत/बॉक्स-ऑफ़िस व सिनेमाघर-आरती परिघटना: अभिलेखित फ़िल्म-सांस्कृतिक इतिहास (ग्रेड A); फ़िल्म-पूर्व 1960s उपस्थिति — शोध-साहित्य सम्मत (ग्रेड B); गणेश-पुत्री वंश — लोक-मान्यता (ग्रेड C; फ़िल्म-कथानक में भी प्रयुक्त); "संतोषादनुत्तमः सुखलाभः" योग-सूत्र 2.42, "संतुष्टः सततं योगी" गीता 12.14 — ग्रेड A शब्दशः; सुभाषित-श्लोक सुभाषित-धारा (ग्रेड B)। समाज-वैज्ञानिक विवेचन व्याख्या-स्तर। कोश-नीति: परंपरा की आधुनिकता का सम्मान-पूर्वक ईमानदार अभिलेखन — आयु देवत्व की कसौटी नहीं, लोक-हृदय की आवश्यकता है।

नाम एवं अर्थ

Names
संतोषी
संतोष की मूर्ति — तृप्ति-दात्री; नाम ही व्रत का फल-वाचक।
संतोषी माँ / माता
लोक का वात्सल्य-सम्बोधन — फ़िल्म-शीर्षक से घर-घर पहुँचा रूप।
शुक्रवार-व्रत की देवी
वार-नाम से पहचान — सोलह शुक्रवारों की स्वामिनी।
गणेश-दुलारी (लोक)
रिद्धि-सिद्धि की कन्या, शुभ-लाभ की बहन — मंगल-परिवार की तीसरी पीढ़ी।
तुष्टि-रूपा
शक्ति-मंडल की तुष्टि-देवी धारा से तत्त्व-नाता — शास्त्र-सेतु नाम।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम-मंत्र (व्रत-परंपरा)

ॐ श्री संतोषी महामाये नमः ॥  ·  जय संतोषी माता ॥

टिप्पणी: संतोषी-उपासना की रीढ़ मंत्र नहीं — कथा-श्रवण है: शुक्रवार-विधि में गुड़-चना हाथ में लेकर व्रत-कथा सुनना/पढ़ना ही मुख्य अनुष्ठान है; समापन पर आरती और "संतोषी माता की जय" का घोष।

तत्त्व-सूत्र (शास्त्र-आधार)

संतोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥ — योग-सूत्र 2.42

अर्थ: संतोष से सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति होती है।

प्रचलित संतोषी-चालीसा एवं आरती ("मैं तो आरती उतारूँ रे...") के पूर्ण पाठ 20वीं सदी की रचनाएँ हैं — शब्दशः पाठ रचनाकार-श्रेय सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में।

व्रत-विधि एवं पर्व

Vrat & Festivals
सोलह शुक्रवार व्रत
प्रातः स्नान-पूजन, गुड़-चना भोग, कथा-श्रवण, आरती; एक समय फलाहार/भोजन — सोलह सप्ताह।
खटाई-वर्जना
व्रत-दिन व्रती (एवं विधि-परंपरा में परिजन) खट्टा न खाएँ-छुएँ — कटुता-त्याग का रूपक।
उद्यापन
पूर्ति पर आठ बालकों को खीर-पूरी भोज (खटाई-रहित), दक्षिणा में फल — कथा-सम्मत विधि।
शुक्रवार देवी-वार
वैभव-लक्ष्मी आदि शुक्रवार-व्रतों का साझा वार — देवी-वार परंपरा (D007/D048 सूत्र)।

मंदिर

Temples
लाल सागर संतोषी मंदिर, जोधपुर
फ़िल्म-पूर्व परंपरा से जुड़ा प्रमुख धाम — शुक्रवार मेले।
हरिद्वार-दिल्ली-मुंबई नगर-मंदिर
1975 के बाद देश-भर में उठी मंदिर-लहर के प्रतिनिधि।
घर का पूजा-कोना
संतोषी-उपासना का असली धाम — कलैंडर-चित्र, गुड़-चना और कथा-पुस्तिका: बस इतना ही मंदिर।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: संतोषी माता "संतोष" यानी ख़ुश और तृप्त रहने की देवी हैं। लोक-कथा में वे गणेश जी की बेटी हैं — शुभ और लाभ की बहन! उनका व्रत सबसे आसान है: शुक्रवार को गुड़-चना चढ़ाओ, कथा सुनो — बस उस दिन खट्टी चीज़ें (इमली, अचार, नींबू) नहीं खाते।

रोचक तथ्य:

  • संतोषी माता सबसे "नई" देवी हैं — इनकी पूजा हमारे दादा-परदादा के ज़माने में शुरू हुई!
  • 1975 की फ़िल्म "जय संतोषी माँ" देखने लोग सिनेमा में चप्पल उतारकर जाते थे और परदे की आरती करते थे!
  • इनका भोग दुनिया का सबसे सस्ता प्रसाद है — गुड़ और भुने चने।
  • खटाई मना है — क्योंकि खटास रिश्तों में भी बुरी होती है!

सीख: जो मिला है उसमें ख़ुश रहना — यही संतोष है, और वही सबसे बड़ा ख़ज़ाना है। हमेशा "और चाहिए, और चाहिए" करने वाला कभी ख़ुश नहीं रह पाता।

मिनी क्विज़:

  1. संतोषी माता का व्रत किस दिन रखते हैं?
  2. उनका प्रिय भोग क्या है?
  3. व्रत में क्या खाना मना है?
  4. लोक-कथा में वे किसकी बेटी हैं?