माता शीतला

Shitala · शीतलता की देवी · रोग-हर माँ · बासौड़ा-देवी

जिस युग में ज्वर और चेचक गाँव-के-गाँव निगल जाते थे, उस युग में भारतीय लोक ने रोग के विरुद्ध जो देवी गढ़ी, उसका नाम ही औषधि है — शीतला: ठंडक। गधे पर सवार, हाथों में झाड़ू-सूप-नीम और शीतल जल का कलश — उसकी हर वस्तु स्वच्छता और सेवा का शास्त्र है।

श्रेणी: लोक-महादेवी (अखिल उत्तर-पूर्व भारत) वाहन: गर्दभ · करों में: झाड़ू, सूप, कलश, नीम पर्व: बासौड़ा — शीतला सप्तमी/अष्टमी विशेष: ठंडे (बासी) भोजन का एकमात्र पर्व
प्रमुख कथा पढ़ें
रोग-हरज्वर-विस्फोटक हरने वाली माँ
स्वच्छता-शास्त्रझाड़ू-सूप-नीम — हर आयुध एक उपदेश
शीतल-तत्त्वताप के विरुद्ध ठंडक का दर्शन
लोक-वत्सलाचौराहे-चबूतरे की सबसे घरेलू देवी

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

शीतला माता उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के गाँव-नगर की सबसे घरेलू महादेवी हैं — वह देवी जिसका मंदिर प्रायः चौराहे के चबूतरे, तालाब-किनारे या नीम तले मिलता है, और जिसके पास मुकुट-सिंहासन से अधिक माँ की थकी हुई ममता है। परंपरा उन्हें दुर्गा/पार्वती (D009/D006) का लोक-रूप मानती है — गौरी का वह अवतरण जो रोग-ताप हरने के लिए हुआ (लोक-पुराण स्तर, चिह्नित); बंगाल-परंपरा में वे ज्वरासुर (ज्वर-दैत्य) की विजेत्री और ओलाई-चंडी आदि रोग-देवियों के मंडल की प्रधान हैं।

उनका ध्यान-चित्र लोक-शास्त्र की खुली पुस्तक है: गर्दभ-वाहिनी — सबसे विनम्र, बोझ ढोने वाला पशु; करों में मार्जनी (झाड़ू), सूप (अनाज फटकने का शूर्प — जो सिर पर अलंकार-रूप है), शीतल जल का कलश और नीम-पल्लव। शीतलाष्टक-धारा का ध्यान-श्लोक इन्हीं को गिनाता है — "रासभस्थां... मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्।" हर प्रतीक का अर्थ इस पृष्ठ की कथा में खुलेगा — क्योंकि शीतला-दर्शन असल में ताप के विरुद्ध ठंडक, गंदगी के विरुद्ध झाड़ू और भय के विरुद्ध माँ का दर्शन है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-मूलगौरी/दुर्गा का रोग-हर लोक-रूप (D006/D009) — लोक-पुराण मान्यता
  • सहचर (बंगाल-मंडल)ज्वरासुर — पराजित ज्वर-दैत्य जो सेवक बना; रक्तावती आदि रोग-सखियाँ
  • पड़ोसी-देवियाँमनसा (सर्प-देवी), ओलाई-चंडी (हैजा) — लोक रोग-देवी वर्ग
  • प्रतीक-सम्बन्धकालरात्रि (D067) — गर्दभ-वाहन साम्य; नीम — देवी का वृक्ष-रूप
  • क्षेत्र-विस्तारदक्षिण की मारियम्मन-पोलेरम्मा — समान-धर्मा देवियाँ (स्वतंत्र परंपराएँ, चिह्नित)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / लोक-दर्शन

ठंडक की देवी — रोग के विरुद्ध लोक का उत्तर

जिस शत्रु का नाम नहीं लिया जाता था

इस देवी को समझने के लिए उस युग में उतरना होगा जब भारत का सबसे भयानक शत्रु किसी सीमा से नहीं आता था — वह घर के भीतर से फूटता था। चेचक (शीतला/बड़ी माता), खसरा (छोटी माता), और ग्रीष्म-ऋतु के विस्फोटक ज्वर — जिस घर में घुसते, दहलीज़ पर मातम बिठा जाते; न औषधि थी, न कारण का ज्ञान। ऐसे निरुपाय युग में लोक-मानस ने वह किया जो उसकी सबसे गहरी बुद्धिमत्ता थी: उसने रोग को राक्षस नहीं — माँ बना लिया। चेचक "निकलना" देवी का आगमन कहलाया — "माता निकली हैं"; रोगी का घर शत्रु-ग्रस्त नहीं, देवी का डेरा माना गया। इस उलट-दर्शन का मनोविज्ञान तौलिए: जिस घर में भय अपंग कर देता, वहाँ भक्ति ने विधि-विधान थमा दिया — रोगी को शीतल जल से पोंछना, नीम-पल्लव बिछाना, घर ठंडा-शांत-स्वच्छ रखना, तला-भुना बंद, आगंतुक सीमित। ध्यान दीजिए — ये "पूजा-नियम" ज्वर-रोगी की सुश्रूषा और संक्रमण-नियंत्रण के व्यावहारिक सूत्र ही हैं, जिन्हें देवी-भय ने उस युग में अनिवार्य बना दिया जब "कीटाणु" शब्द ही नहीं था। शीतला-उपासना लोक-महामारी-विज्ञान का देवी-रूप है — श्रद्धा की भाषा में लिखा गया सार्वजनिक-स्वास्थ्य शास्त्र।

ध्यान-मूर्ति का हर चिह्न एक उपदेश

अब देवी की मूर्ति को दुबारा देखिए — शीतलाष्टक की आँख से: "वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् । मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम् ॥" — गधे पर बैठी, मार्जनी और कलश धारण किए, सूप से अलंकृत-मस्तक देवी को मैं वंदन करता हूँ (स्कंद पुराण-धारा — ग्रेड B)मार्जनी (झाड़ू) — रोग का पहला शत्रु स्वच्छता है: देवी के हाथ में झाड़ू देकर लोक ने बुहारने को पूजा बना दिया; आज भी शीतला-पूजन से पहले घर की सफ़ाई विधि का अंग है। कलश — शीतल जल: ज्वर के ताप का उत्तर; चेचक-रोगी को ठंडे जल से स्पंज करने की सुश्रूषा-स्मृति। सूप — अनाज फटकने का शूर्प: जो फटककर भूसा (अशुद्धि) उड़ाता और अन्न (सार) बचाता है — देवी का सूप घर-घर से रोग फटक देने का प्रतीक; लोक-गीतों में "माता सूप से दुख फटक दो" की पुकार मिलती है। नीम — भारतीय आँगन की जीवित औषधि: ज्वर-त्वचा-रोगों की लोक-चिकित्सा का प्रथम नाम; शीतला-मंदिर प्रायः नीम तले ही हैं और रोगी को नीम-पल्लव पर लिटाने की रीति रही। और गर्दभ-वाहन — सबसे मार्मिक प्रतीक: देवी ने वाहन वही चुना जो सबसे तिरस्कृत, सबसे विनम्र, बोझ ढोने वाला जीव है — रोग-काल में सेवा का असली वाहक वही होता है जो अहंकार-शून्य होकर मैला ढोने से भी न हिचके; कालरात्रि (D067) का गर्दभ-साम्य स्मरणीय है — उग्रता और करुणा, दोनों की देवियाँ विनम्रतम वाहन पर चलती हैं।

बासौड़ा — जिस दिन चूल्हा नहीं जलता

शीतला-पूजा का महापर्व भारतीय पर्व-चक्र का सबसे विलक्षण दिन है — बासौड़ा (शीतला सप्तमी/अष्टमी — चैत्र कृष्ण, होली के लगभग एक सप्ताह बाद; कहीं-कहीं हर सोमवार/गुरुवार की स्थानीय विधियाँ भी): वह एकमात्र पर्व जिसमें ताज़ा भोजन बनाना वर्जित है। एक दिन पहले — षष्ठी की रात — रसोई पकती है: मीठे चावल (ओलिया), गुड़-राबड़ी, पूए, हलवा, कढ़ी; और सप्तमी को चूल्हा ठंडा रहता है — देवी को बासी (बसौड़ा) भोग लगता है, परिवार वही ठंडा प्रसाद खाता है। इस विधान की परतें खोलिए। पहली — नाम-तत्त्व: शीतला की पूजा शीतल से ही हो सकती है; जिस देवी का काम ताप हरना है, उसके दिन आग जलाना विरोधाभास है — चूल्हे की छुट्टी देवी का सम्मान है। दूसरी — ऋतु-विज्ञान: चैत्र में ग्रीष्म दहलीज़ पर है — यह पर्व अंतिम दिन है जब बासी भोजन निरापद है; लोक-विधान ने उत्सव के बहाने वह तिथि-रेखा खींच दी जिसके बाद बासी खाना बंद: यानी बासौड़ा असल में बासी भोजन का समापन-संस्कार है — अनुमति नहीं, विदाई। तीसरी — श्रम-दर्शन: वर्ष में एक दिन रसोई (और रसोई सँभालने वालों) को पूर्ण विश्राम — चूल्हे तक को अवकाश देने वाली संस्कृति की कोमलता। लोक-व्रतकथा भी यही गाती है (ग्रेड C — लोक): एक बुढ़िया ने बासौड़े का नियम निभाया, गाँव जल गया पर उसका घर बचा — क्योंकि उसका चूल्हा ठंडा था; कथा का गूढ़ार्थ पारदर्शी है — अग्नि-नियंत्रण और नियम-पालन ही रक्षा है। बंगाल-धारा इस मंडल में ज्वरासुर जोड़ती है — तीन-सिर वाला ज्वर-दैत्य, जिसे देवी ने पराजित कर सेवक बना लिया: रोग नष्ट नहीं होता, नियंत्रित होता है — यह लोक-चिकित्सा की यथार्थ-बुद्धि है।

चौरे की देवी — बिना शिखर का मंदिर

शीतला की एक और विलक्षणता उसका स्थापत्य है — या कहें, स्थापत्य का अभाव। महादेवों के शिखर-मंडप-गोपुरम् के विपरीत शीतला का ठिकाना प्रायः गाँव-सीमा का चबूतरा है — नीम तले, तालाब किनारे, कभी केवल सिंदूर-पुता पिंड या पत्थर-पंक्ति। यह दरिद्रता नहीं — दर्शन है: रोग-हर देवी वहीं बसती है जहाँ रोग से लड़ाई लड़ी जाती है — जल-स्रोत के पास (स्वच्छता), औषधि-वृक्ष के नीचे (नीम), बस्ती की देहरी पर (जहाँ से संक्रमण घुसता है)। उसकी पुजारिन भी प्रायः लोक ही है — कुम्हार, माली, नाइन परिवारों की सेवा-परंपराएँ; संस्कृत-विधान से अधिक लोकगीत, मनौती के धागे और जडूला (मुंडन) के बाल। महादेवियों के वैभव-मंदिरों और इस चबूतरे के बीच कोई ऊँच-नीच नहीं — लोक-धर्म का यही सौंदर्य है कि उसने अपनी सबसे ज़रूरी देवी को अपने सबसे पास रखा: दहलीज़ पर।

देवी और विज्ञान — एक ईमानदार समापन

इस प्रविष्टि को उसी ईमानदारी पर पूर्ण करना चाहिए जो इस कोश की नीति है। शीतला-परंपरा जिस रोग के विरुद्ध गढ़ी गई, वह — चेचक — 1980 में टीकाकरण से पृथ्वी से उन्मूलित घोषित हुआ: मानव-इतिहास की सबसे बड़ी सार्वजनिक-स्वास्थ्य विजय, और उसमें भारत के टीकाकरण-अभियान की केंद्रीय भूमिका रही। रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि टीके के पूर्वज — "वैरियोलेशन" (टीका/शीतला उतारने की देसी विधि) — का प्रचलन भारत में टीकाकर्मी ब्राह्मणों-नाइयों के हाथों सदियों पुराना था, और वे यह कार्य शीतला-स्तुति के साथ करते थे: देवी-परंपरा और रोग-निरोधक विधि साथ-साथ चले हैं, आमने-सामने नहीं (सांस्कृतिक-इतिहास — ग्रेड B)। इसलिए इस पृष्ठ का स्पष्ट नोट: शीतला-भक्ति श्रद्धा, स्वच्छता, सुश्रूषा और संयम की संस्कृति है — चिकित्सा और टीकाकरण की विकल्प नहीं; ज्वर-चेचक-खसरा में वैद्य/डॉक्टर और टीका ही मार्ग है — और परंपरा स्वयं यही कहती आई है, क्योंकि उसकी देवी के हाथ में झाड़ू, नीम और शीतल जल — यानी स्वास्थ्य-विधि ही — है। शीतला का स्थायी उपहार वह मनोवृत्ति है जो आपदा में भय की जगह व्यवस्था और घृणा की जगह ममता रखती है: रोगी "अछूत" नहीं — देवी का अतिथि; परिचर्या बोझ नहीं — पूजा। महामारियों से गुज़रे हर युग के लिए — हमारे अपने युग समेत — यही शीतला-पाठ है। ॥ शीतला माता की जय ॥

स्रोत टिप्पणी: शीतलाष्टक ध्यान-श्लोक "वन्देऽहं शीतलां देवीं..." — स्कंद पुराण-सम्बद्ध परंपरा-पाठ (ग्रेड B — पुराण-संहिता-स्थान विवादित, प्रचलित पूजा-पाठ प्रामाणिक रूप से इसी धारा में; शब्दशः केवल प्रथम श्लोक — पूर्ण अष्टक भावी सत्यापन-विस्तार में); बासौड़ा/ओलिया विधान, सूप-झाड़ू-नीम प्रतीक, बुढ़िया-व्रतकथा — लोक-परंपरा (ग्रेड B/C — चिह्नित); ज्वरासुर — बंगाल मंगल-लोक धारा (ग्रेड C); गौरी-रूप मान्यता — लोक-पुराण (ग्रेड B/C); वैरियोलेशन-इतिहास एवं 1980 उन्मूलन — अभिलेखित इतिहास (ग्रेड A); मारियम्मन-साम्य — तुलनात्मक नोट, परंपराएँ स्वतंत्र। चिकित्सा-नोट कोश की भय-मुक्त/विज्ञान-सम्मत नीति (D045 कुज-दोष नोट की सजातीय) के अंतर्गत संपादकीय। प्रतीक-व्याख्याएँ व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
शीतला
"शीतल करने वाली" — ताप-ज्वर हरने वाली; नाम ही औषधि-सूत्र।
बड़ी माता
चेचक का लोक-नाम — रोग को माँ कहने वाला उलट-दर्शन।
बासौड़ा-देवी
ठंडे भोग की देवी — जिसके दिन चूल्हा विश्राम पाता है।
रोग-हर माँ
ज्वर-विस्फोटक-नेत्ररोग हरने वाली — अष्टक की फल-श्रुति धारा।
ओलाई-मंडल प्रधाना (बंगाल)
रोग-देवी वर्ग की अधिष्ठात्री — ज्वरासुर-विजयिनी।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम-मंत्र

ॐ श्री शीतलायै नमः ॥

शीतलाष्टक — ध्यान-श्लोक (स्कंद पुराण-धारा, ग्रेड B)

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम् ॥

अर्थ: गर्दभ पर आसीन, दिगम्बरा, मार्जनी (झाड़ू) और कलश धारण किए, सूप से अलंकृत मस्तक वाली शीतला देवी की मैं वंदना करता हूँ।

पूर्ण शीतलाष्टक (शिव-प्रोक्त धारा) एवं क्षेत्रीय शीतला-गीतों के शब्दशः पाठ सत्यापन-सहित भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — नियमानुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ यहाँ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
बासौड़ा — शीतला सप्तमी/अष्टमी
चैत्र कृष्ण — ठंडे भोग का महापर्व; एक दिन पूर्व रसोई, पर्व-दिन चूल्हा-विश्राम।
ओलिया-भोग
मीठे चावल, गुड़-राबड़ी, पूए — षष्ठी-रात्रि का पक्व, सप्तमी का प्रसाद।
श्रावण सोमवार-मेले (क्षेत्रीय)
गुड़गाँव-मसानी आदि क्षेत्रों के शीतला-मेले; मुंडन-जडूला की मनौती-परंपरा।
नवरात्र-सम्बन्ध
गौरी-रूप मान्यता से देवी-पक्षों में शीतला-पूजन की स्थानीय विधियाँ।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
शीतला माता मंदिर, गुड़गाँव (मसानी)
उत्तर भारत का प्रसिद्ध धाम — गुरु द्रोण-पत्नी कृपी/माता मसानी स्थानीय परंपरा से जुड़ा; विवाह-मुंडन मनौतियों का केंद्र।
शीतला घाट-मंदिर, वाराणसी
दशाश्वमेध-संलग्न शीतला घाट — काशी की जीवित शीतला-पूजा।
शीतला चौकिया धाम, जौनपुर
पूर्वांचल का महाक्षेत्र — चौकिया देवी रूप।
ग्राम-चबूतरे सर्वत्र
नीम तले चौरा-परंपरा — बिना शिखर के भी देवी पूर्ण: लोक-देवी की पहचान।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: शीतला माता "ठंडक की देवी" हैं। उनके हाथों में झाड़ू, सूप और ठंडे पानी का कलश है, और पास में नीम — यानी सफ़ाई, ठंडक और दवा! पुराने ज़माने में जब बीमारियाँ फैलती थीं, लोग शीतला माता से रक्षा माँगते थे और घर साफ़ रखते थे। उनकी सवारी है — गधा, सबसे सीधा-सादा जानवर!

रोचक तथ्य:

  • बासौड़ा एकलौता त्योहार है जिसमें ताज़ा खाना नहीं बनता — एक दिन पहले का ठंडा खाना खाते हैं!
  • उस दिन चूल्हे को भी छुट्टी मिलती है।
  • देवी के हाथ की झाड़ू सिखाती है — सफ़ाई सबसे बड़ी सुरक्षा है।
  • चेचक नाम की बीमारी अब दुनिया से पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है — टीकों की वजह से!

सीख: साफ़-सफ़ाई रखो, बीमार का मज़ाक मत उड़ाओ — उसकी देखभाल करो; और बीमारी में डॉक्टर के पास ज़रूर जाओ। यही शीतला माता की असली पूजा है।

मिनी क्विज़:

  1. शीतला माता की सवारी कौन है?
  2. उनके हाथों में क्या-क्या होता है?
  3. बासौड़ा के दिन कैसा खाना खाते हैं?
  4. देवी की झाड़ू हमें क्या सिखाती है?