ऋषि की बेटी बनी देवी — आश्रम, रण और यमुना का व्रत
आश्रम की माँग — "देवी मेरी बेटी हों"
कथा का पहला अध्याय एक तपस्वी की विलक्षण माँग है। कत-गोत्र की परंपरा में महर्षि कात्यायन हुए — वेद-विद्या के आचार्य (कात्यायन-नाम व्याकरण-श्रौत परंपराओं में भी यशस्वी है — गोत्र-धारा की स्मृति)। पुराण-धाराएँ (वामन/स्कंद — ग्रेड B) कहती हैं कि उन्होंने जगदम्बा की घोर आराधना की — पर वर माँगा तो न मोक्ष, न सिद्धि, न स्वर्ग: माँगा — "देवी, मेरे घर पुत्री-रूप में आओ।" परमेश्वरी को बेटी बनाने की धृष्ट-मधुर माँग — और देवी ने स्वीकार ली। यही वह क्षण है जो इस नाम का जन्म-क्षण है: आगे जब महिषासुर-आतंक में देवताओं के क्रोध-तेज से महादेवी प्रकट हुईं (वह तेज-संगम प्रकरण — शिव-विष्णु-इन्द्र आदि के तेज का एक ज्योति-पुंज बनना — देवी-माहात्म्य अध्याय 2 का प्रसिद्ध दृश्य, पूर्ण-कथा D009 पर), तब पुराण-धाराएँ कहती हैं कि वह प्राकट्य कात्यायन-आश्रम में हुआ — ऋषि ने सर्वप्रथम पूजा की, पुत्री-भाव से आतिथ्य दिया (धारा-भेद में: आश्विन कृष्ण चतुर्दशी से शुक्ल नवमी तक ऋषि-पूजा, विजयादशमी पर महिष-वध); और त्रिलोक ने उस देवी को वही नाम दिया जो आश्रम का था — कात्यायनी: कात्यायन की बेटी। ध्यान दीजिए इस नाम-व्याकरण पर — देवताओं का तेज देह बना, पर पहचान एक भक्त की श्रद्धा बनी; शक्ति सबकी थी, नाम उसका हुआ जिसने उसे बेटी कहा। भारतीय भक्ति-दर्शन का यह गहनतम सूत्र है: भगवान बल से बड़ा भाव को मानते हैं — जो सेना माँगता है उसे सेना मिलती है, जो बेटी माँगता है उसे भगवती मिल जाती है।
रण-पक्ष — महिष के विरुद्ध, षष्ठी-सप्तमी-अष्टमी
कात्यायनी का दूसरा अध्याय रण है — पर इस कोश के विभाजन-नियम से उसका पूर्ण युद्ध-वर्णन (महिष-सेना, चंड-मुंड-पूर्व प्रकरण, दशम-अध्यायी गाथा) दुर्गा-पृष्ठ (D009) का है; यहाँ केवल वह रेखा जो कात्यायनी-नाम से बँधी है। नवरात्र-विधान की लोक-गणना में महिष-रण के निर्णायक दिवस षष्ठी से नवमी के हैं — और षष्ठी कात्यायनी की तिथि है: परंपरा-वाचन में यह वही संध्या है जब आश्रम-वासिनी देवी ने रण-रूप धारण किया — पुत्री उठी और महिषमर्दिनी होकर निकली। बंगाल की दुर्गा-पूजा इसी लय पर चलती है — षष्ठी को देवी का "बोधन" (आवाहन-जागरण), फिर सप्तमी-अष्टमी-नवमी के महारण-पूजन, दशमी को विजय — मानो पूरा पूर्वी भारत हर वर्ष कात्यायन-आश्रम बन जाता है: देवी घर की बेटी की तरह आती हैं (लोक कहता भी है — "उमा मायके आई हैं"), चार दिन रहती हैं, और विजय करके ससुराल लौट जाती हैं। कात्यायनी-तत्त्व की यह द्वि-रूपता — घर की बेटी और रण की महादेवी — भारतीय स्त्री-दर्शन का सबसे जीवित पाठ है: वही कन्या जो आँगन में तुलसी सींचती है, अन्याय के दिन दुर्गा है; बेटी को कोमल और केवल-कोमल समझने वाला समाज कात्यायनी-कथा से यह भूल सुधार सकता है। नाम-परंपरा का एक साक्ष्य और जोड़ लें — बौद्ध-जैन साहित्य तक में "कात्यायनी" स्त्री-नाम आदर-सूचक रहा, और पतंजलि-पूर्व व्याकरण-परंपरा के कात्यायन (वार्तिककार) उसी गोत्र-यश की विद्या-शाखा हैं: अर्थात् यह गोत्र भारतीय स्मृति में विद्या और देवी — दोनों का दाता है; एक ही आश्रम-नाम से सूत्र भी निकले और शक्ति भी।
यमुना का व्रत — भागवत की सबसे कोमल भोरें
और फिर वह अध्याय जो कात्यायनी को व्रज के हृदय में ले गया — भागवत का बाईसवाँ अध्याय (10.22): हेमंत की पहली ऋतु, मार्गशीर्ष मास; नंद-गाँव की कुमारियाँ भोर के अँधेरे में उठतीं, एक-दूसरे का नाम पुकारती हुई यमुना (D057) के घाट जातीं — बर्फ़-से जल में स्नान, तट की बालू से देवी-प्रतिमा, गंध-दीप-नैवेद्य से पूजा; और व्रत-मंत्र वह जो भागवत ने शब्दशः सुरक्षित रखा है — "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥" — हे कात्यायनी, महामाया, महायोगिनी, अधीश्वरी! नंदगोप-पुत्र को मेरा पति बनाओ — तुम्हें नमन। पूरा मास यह व्रत चला — हविष्यान्न (अ-लवण सादा भोजन), संयम, और वह एक प्रार्थना। कथा का उत्तर-भाग (चीर-हरण लीला और कृष्ण का वह गूढ़ वचन कि व्रत सफल होगा) कृष्ण-पृष्ठ (D014) के रस-क्षेत्र की सामग्री है; कात्यायनी-पृष्ठ के लिए मर्म यह है कि भागवत ने प्रेम की प्राप्ति के लिए जिस देवी का द्वार चुना, वह कात्यायनी हैं — वही आश्रम-कन्या, वही महिषमर्दिनी: गोपियों ने रण-देवी से वर माँगा, क्योंकि व्रज जानता था कि प्रेम भी एक युद्ध है — शीत से, लाज से, समाज से, प्रतीक्षा से; और उसकी विजय-दात्री वही हो सकती है जिसने महिष जीता हो। इसी प्रसंग से कात्यायनी विवाह-मंगल की देवी हुईं — आज भी अविवाहित कन्याओं के कात्यायनी-व्रत (विशेषतः षष्ठी-पूजा और मार्गशीर्ष-परंपराएँ; दक्षिण में भी कन्याकुमारी-धाराओं तक यह भाव-सूत्र) इसी भागवत-भोर की संततियाँ हैं। और स्तर-दृष्टि से यह पृष्ठ का दुर्लभ सौभाग्य है — नवदुर्गा-मंडल के अधिकांश ध्यान-श्लोक पूजा-परंपरा के हैं (ग्रेड B), पर कात्यायनी का व्रत-मंत्र मूल भागवत का शब्दशः पाठ है (ग्रेड A): नौ देवियों में इनका मंत्र-प्रमाण सबसे प्राचीन-प्रामाणिक है।
आध्यात्मिक अर्थ — श्रद्धा जो देवत्व को घर बुला ले
कात्यायनी-तत्त्व के तीन पाठ इस कथा-त्रयी से उठते हैं। पहला — कात्यायन-पाठ: भक्ति की पराकाष्ठा माँग का रूपांतरण है; ऋषि ने वह माँगा जो देने वाले को ही अपने घर ले आए — साधना का लक्ष्य वस्तु नहीं, सम्बन्ध हो, तो साध्य स्वयं परिवार बन जाता है। जो उपासक देवी को "माँ" या "बेटी" कह पाता है, उसकी पूजा विधि से ऊपर उठ जाती है — कात्यायनी-नाम इस सम्बन्ध-भक्ति का स्थायी स्मारक है। दूसरा — षष्ठी-पाठ: बेटी और दुर्गा एक ही देह के दो क्षण हैं; कन्या-सम्मान की संस्कृति (कन्या-पूजन जो अष्टमी-नवमी पर आएगा) की दार्शनिक नींव यहीं है — हर कन्या में कात्यायनी की संभावना है, इसीलिए वह पूज्या है। तीसरा — गोपी-पाठ: माँगना भी साधना है, यदि माँग एक-निष्ठ हो; गोपियों ने सुख नहीं माँगा, सूची नहीं दी — एक नाम माँगा, पूरा मास तप करके माँगा: मनोकामना-व्रतों की समूची परंपरा का शुद्धतम रूप यही है — व्रत माँग को तपाकर प्रार्थना बना देता है। छठी रात का उपासक इन तीनों को एक दीप में जलाता है — श्रद्धा ऐसी कि देवत्व घर आ जाए, शक्ति ऐसी कि अन्याय के दिन खड्ग उठे, और प्रेम ऐसा जो शीत-भोर के जल से न डरे। ॥ षष्ठं कात्यायनीति च ॥