गोद में सेनापति — छह माताओं के बाद माँ
वह जन्म जो गोद-गोद भटका
स्कन्द-जन्म की पूर्ण गाथा इस कोश में कार्तिकेय-पृष्ठ (D005) की है — तारकासुर का वर, शिव-तेज का असह्य दाह, छह मुख, देव-सेनापतित्व, तारक-वध; यहाँ वह कथा उस कोण से खुलती है जो प्रायः अनकहा रहता है — माता का कोण: उस माँ का, जिसे अपने ही पुत्र के जन्म से दूर रहना पड़ा। स्मरण कीजिए कथा की विषम परिस्थिति — तारकासुर को वरदान था कि वध केवल शिव-पुत्र से होगा; शिव-पार्वती विवाह हो चुका था (D059-प्रकरण), पर देव-प्रयोजन की व्यग्रता ने घटना-क्रम ऐसा मोड़ा कि शिव का तेज पार्वती के गर्भ में नहीं ठहरा — अग्नि (D040) ने वहन किया, अग्नि से गंगा (D056) ने, गंगा ने सरवन (शर-वन) के सरकंडों में उतारा — वहाँ छह मुखों वाला वह अद्भुत शिशु प्रकट हुआ, और आकाश की छह कृत्तिकाओं (कृत्तिका-नक्षत्र देवियाँ) ने उसे स्तन्य दिया, पाला — "कार्तिकेय" नाम उन्हीं छह धाय-माताओं की स्मृति है; "षाण्मातुर" (छह माताओं वाला) उसका शास्त्र-पद है। अब उस प्रासाद की ओर देखिए जहाँ यह समाचार पहुँचता है — पार्वती के पास। जिस पुत्र के लिए तप की सीढ़ियाँ (D062) चढ़ी गई थीं, वह जन्मा — पर किसी और की गोद में; पला — किसी और के दूध पर। पुराण-धाराएँ यहाँ माता के क्षोभ के मार्मिक प्रसंग रखती हैं (एक धारा में पार्वती का देवताओं को शाप तक — जिन्होंने माता-पुत्र वियोग रचा); पर कथा का हृदय क्षोभ नहीं — पुनर्मिलन है: कैलास लौटा हुआ बालक जब माता के सम्मुख आया, तो छह मुखों वाले शिशु को गोद में लेकर पार्वती ने वह पद पाया जो उनके सहस्र नामों में सबसे मधुर है — स्कन्दमाता। नवदुर्गा-मंडल ने ठीक इसी क्षण को पाँचवीं रात की मूर्ति बनाया — गोद में षडानन: वह गोद जो देर से मिली, इसीलिए संसार-भर की गोदों से गहरी है।
छह माताओं के बाद माँ — मातृत्व का शास्त्र
इस कथा में भारतीय मातृ-दर्शन की एक असाधारण परत है, और स्कन्दमाता-रूप उसका उत्सव है। गिनिए स्कन्द की "माताओं" को — गर्भ-धात्री बनने की अधिकारिणी पार्वती; तेज-वाहिनी अग्नि-शक्ति; धारा-धात्री गंगा; जन्म-भूमि शर-वन की वन-देवी; स्तन्य-दात्री छह कृत्तिकाएँ — परंपरा स्वयं "षाण्मातुर" कहकर बहु-मातृत्व स्वीकारती है। तो फिर "स्कन्दमाता" पद अकेली पार्वती को क्यों? उत्तर में ही मातृत्व की परिभाषा है — माँ वह नहीं जो केवल जन्म दे; माँ वह है जो अंततः अपना ले। कृत्तिकाओं का पालन-यश शाश्वत है (कार्तिकेय-नाम उन्हीं का स्मारक है — परंपरा ने उनका श्रेय कभी नहीं छीना); पर पुत्र की पहचान, दीक्षा, सेनापतित्व का अभिषेक और युद्ध-आशीर्वाद — यह मातृ-पद पार्वती का है: जिसने वियोग सहा और अधिकार नहीं छोड़ा। आधुनिक जीवन के लिए यह कथा जितनी प्राचीन है उतनी ही समकालीन — पालने वाली धाय, दूध देने वाली धात्री, गोद लेने वाली माता, जन्म देने वाली जननी: भारतीय परंपरा ने इन सबको "मातृ" पद दिया है (सोलह-मातृका पूजन इसी उदारता की विधि है), और स्कन्दमाता-रूप घोषणा करता है कि इन सब धाराओं के संगम पर जो खड़ी होती है — जो बालक को उसकी समग्र नियति तक पहुँचाती है — वह माता है। इसीलिए पाँचवीं रात संतान-कामना और संतान-मंगल की रात मानी गई; और इसीलिए विधान का वह अनोखा वचन है — स्कन्दमाता की पूजा में स्कन्द की पूजा स्वतः: माँ प्रसन्न, तो संतान का कल्याण स्वतः — कार्य-कारण नहीं, एक ही सत्य के दो चेहरे।
गोद और सिंह — वात्सल्य का बल-शास्त्र
स्कन्दमाता-मूर्ति का शिल्प-व्याकरण ध्यान से पढ़िए — यह कोमलता की नहीं, सशस्त्र कोमलता की मूर्ति है। आसन कमल है — जल में रहकर निर्लिप्त: मातृत्व संसार के बीच रहता है पर मोह-पंक में नहीं डूबता (मोह और वात्सल्य का भेद — शुक्राचार्य-पृष्ठ D048 का पुत्री-मोह प्रकरण स्मरण करें: वहाँ मोह शाप-यंत्र बना था; यहाँ वात्सल्य वर-यंत्र है — भेद यही कि वात्सल्य संतान के श्रेय को देखता है, मोह अपने सुख को)। वाहन सिंह है — वही रण-पशु जो चन्द्रघण्टा (D063) के नीचे था: गोद में दूध-मुँहा शिशु और आसन के नीचे गर्जता सिंह — संसार को संदेश स्पष्ट है: इस गोद तक पहुँचने से पहले इस सिंह से मिलना होगा; माँ की कोमलता उसकी रक्षा-शक्ति की छाया में ही फलती है, और संतान पर संकट आए तो वही पद्मासना क्षण में सिंह-वाहिनी है। और गोद का बालक स्वयं कौन है — देव-सेनापति: वह शिशु जो कल तारक-वध करेगा (D005)। स्कन्दमाता का वात्सल्य इसलिए निर्बल-लाड़ नहीं — सेनापति गढ़ने वाला पालन है: लोरी भी वहाँ वीर-गाथा है। भारतीय इतिहास-लोक ने इस आदर्श को बार-बार दोहराया — शिवाजी की जीजाबाई इस परंपरा का सबसे उज्ज्वल ऐतिहासिक वाचन हैं (लोक-स्तर स्मृति): गोद में रामायण-महाभारत सुनाती माता, और गोद से उठा हुआ राष्ट्र-सेनापति। पाँचवीं रात का दीप हर उस पालनकर्ता के नाम है — माता, पिता, गुरु, धाय — जो किसी बालक को उसकी नियति के योग्य गढ़ रहा है।
आध्यात्मिक अर्थ — पहचान जो सम्बन्ध बन गई
स्कन्दमाता-तत्त्व का शिखर-पाठ उनके नाम में लौटता है। नवदुर्गा-यात्रा के मध्य-बिंदु (पाँचवाँ पद — नौ का केंद्र) पर देवी अपने समस्त निज-चिह्न उतारकर केवल एक परिचय रखती हैं — मैं स्कन्द की माँ हूँ। अहंकार-शास्त्र की दृष्टि से यह पतन जैसा दिखेगा — अपनी पहचान दूसरे के नाम पर? पर भक्ति-शास्त्र इसे शिखर कहता है: प्रेम की पूर्णता वहाँ है जहाँ "मैं" का उत्तर "मेरा अपना" से मिले — और वह भी गर्व से, दैन्य से नहीं। मध्य-बिंदु पर ही यह रूप क्यों — यह भी क्रम-शास्त्र का संकेत है: चार रातें साधक अपने लिए साधता है (जन्म-तप-शक्ति-सृजन); पाँचवीं रात साधना का मुख दूसरे की ओर मुड़ता है — जो पाया है, वह अब किसी की गोद बनेगा; स्व-विकास की परिणति पर-पालन है, अन्यथा वह केवल स्व-अर्जन है। विशुद्ध-चक्र (कंठ) की लोक-योग योजना भी यही ध्वनि देती है — चार चक्र स्वयं के थे; कंठ वह द्वार है जहाँ से भीतर का बाहर के लिए बोलता है: आशीर्वाद, लोरी, शिक्षा — मातृ-वाणी। नवरात्र की पाँचवीं संध्या का दीप जलाते हुए उपासक वस्तुतः यह प्रश्न स्वयं से पूछता है — मेरी गोद में कौन है? किसके लिए मैं स्कन्दमाता हूँ? — जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए, पाँचवीं पूजा पूर्ण है। ॥ पंचमं स्कन्दमातेति ॥