पंचमी स्कन्दमाता

Skandamata · नवदुर्गा-5 · स्कन्द-जननी · पद्मासना

पाँचवीं रात की देवी की पहचान उनका नाम नहीं — उनकी गोद है: उसमें बैठा है षडानन बाल-स्कन्द, देवताओं का भावी सेनापति। नवदुर्गा-मंडल का यह एकमात्र रूप है जिसमें देवी अकेली नहीं — माता रूप में पूजित हैं; और परंपरा कहती है — स्कन्दमाता की पूजा में स्कन्द की पूजा स्वयं हो जाती है: माँ को नमन, तो पुत्र को नमन।

क्रम: नवदुर्गा-पंचमी गोद: षडानन बाल-स्कन्द (D005) आसन: पद्म · वाहन: सिंह भाव: वात्सल्य — मातृ-शक्ति
प्रमुख कथा पढ़ें
स्कन्द-जननीदेव-सेनापति की माता — पद ही परिचय
वात्सल्य-मूर्तिनवदुर्गा का एकमात्र सपुत्र-रूप
पद्मासनाकमल-आसन — विमल मातृ-गरिमा
द्वि-फल-दायिनीमाँ की पूजा में पुत्र की पूजा समाहित

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

नवदुर्गा-क्रम की पाँचवीं देवी स्कन्दमाता हैं — "पंचमं स्कन्दमातेति" (देवी कवच)। यह नवदुर्गा-मंडल का सबसे कोमल और सबसे गहरा रूप है — देवी यहाँ योद्धा नहीं, तपस्विनी नहीं, सृष्टि-कर्त्री नहीं: माँ हैं। चतुर्भुजा स्वरूप में दो हाथ कमल धारण किए, एक वर-मुद्रा में, और एक गोद के बालक को सम्हाले — गोद में षडानन (छह मुखों वाले) बाल-स्कन्द: कार्तिकेय (D005), देवताओं के भावी सेनापति। आसन कमल है (इसीलिए "पद्मासना"), वाहन सिंह — गोद में शिशु और सवारी सिंह: वात्सल्य और शौर्य एक ही मूर्ति में।

इस रूप की विलक्षणता उसका नाम-व्याकरण है — शेष आठ रूपों के नाम देवी के अपने गुण-चिह्न से बने हैं (शैल-पुत्री, चन्द्र-घण्टा...); केवल यही नाम सम्बन्ध से बना है: स्कन्द की माता। परंपरा इसे न्यूनता नहीं, महिमा कहती है — पाँचवीं रात देवी अपनी पहचान अपने पुत्र को सौंपकर पूजित होती हैं, और बदले में विधान यह वचन देता है कि स्कन्दमाता की पूजा में बाल-स्कन्द की पूजा स्वतः सम्मिलित है — एक दीप, दो देवता। लोक-योग परंपरा (ग्रेड C) इन्हें विशुद्ध-चक्र (कंठ) से जोड़ती है — वाणी का केंद्र: माँ की लोरी से लेकर मंत्र तक, कंठ का हर स्वर इसी रात की साधना है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-अभिन्नतापार्वती (D006) — मातृ-पद का नवदुर्गा-रूप
  • गोद-स्थितस्कन्द/कार्तिकेय (D005) — षडानन बाल-रूप
  • पतिशिव (D003) — स्कन्द-पिता
  • पालन-धाराएँकृत्तिकाएँ (षट्-मातृ पालन), गंगा (D056 — धारण-धारा), अग्नि (D040 — तेज-वहन): स्कन्द-जन्म की बहु-मातृ शृंखला
  • ज्येष्ठ-पुत्रगणेश (D004) — भ्रातृ-मंडल
  • पूर्व-क्रमकूष्माण्डा (D064); अग्र-क्रम: कात्यायनी (D066)

प्रमुख कथा

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प्रमुख कथा

गोद में सेनापति — छह माताओं के बाद माँ

वह जन्म जो गोद-गोद भटका

स्कन्द-जन्म की पूर्ण गाथा इस कोश में कार्तिकेय-पृष्ठ (D005) की है — तारकासुर का वर, शिव-तेज का असह्य दाह, छह मुख, देव-सेनापतित्व, तारक-वध; यहाँ वह कथा उस कोण से खुलती है जो प्रायः अनकहा रहता है — माता का कोण: उस माँ का, जिसे अपने ही पुत्र के जन्म से दूर रहना पड़ा। स्मरण कीजिए कथा की विषम परिस्थिति — तारकासुर को वरदान था कि वध केवल शिव-पुत्र से होगा; शिव-पार्वती विवाह हो चुका था (D059-प्रकरण), पर देव-प्रयोजन की व्यग्रता ने घटना-क्रम ऐसा मोड़ा कि शिव का तेज पार्वती के गर्भ में नहीं ठहरा — अग्नि (D040) ने वहन किया, अग्नि से गंगा (D056) ने, गंगा ने सरवन (शर-वन) के सरकंडों में उतारा — वहाँ छह मुखों वाला वह अद्भुत शिशु प्रकट हुआ, और आकाश की छह कृत्तिकाओं (कृत्तिका-नक्षत्र देवियाँ) ने उसे स्तन्य दिया, पाला — "कार्तिकेय" नाम उन्हीं छह धाय-माताओं की स्मृति है; "षाण्मातुर" (छह माताओं वाला) उसका शास्त्र-पद है। अब उस प्रासाद की ओर देखिए जहाँ यह समाचार पहुँचता है — पार्वती के पास। जिस पुत्र के लिए तप की सीढ़ियाँ (D062) चढ़ी गई थीं, वह जन्मा — पर किसी और की गोद में; पला — किसी और के दूध पर। पुराण-धाराएँ यहाँ माता के क्षोभ के मार्मिक प्रसंग रखती हैं (एक धारा में पार्वती का देवताओं को शाप तक — जिन्होंने माता-पुत्र वियोग रचा); पर कथा का हृदय क्षोभ नहीं — पुनर्मिलन है: कैलास लौटा हुआ बालक जब माता के सम्मुख आया, तो छह मुखों वाले शिशु को गोद में लेकर पार्वती ने वह पद पाया जो उनके सहस्र नामों में सबसे मधुर है — स्कन्दमाता। नवदुर्गा-मंडल ने ठीक इसी क्षण को पाँचवीं रात की मूर्ति बनाया — गोद में षडानन: वह गोद जो देर से मिली, इसीलिए संसार-भर की गोदों से गहरी है।

छह माताओं के बाद माँ — मातृत्व का शास्त्र

इस कथा में भारतीय मातृ-दर्शन की एक असाधारण परत है, और स्कन्दमाता-रूप उसका उत्सव है। गिनिए स्कन्द की "माताओं" को — गर्भ-धात्री बनने की अधिकारिणी पार्वती; तेज-वाहिनी अग्नि-शक्ति; धारा-धात्री गंगा; जन्म-भूमि शर-वन की वन-देवी; स्तन्य-दात्री छह कृत्तिकाएँ — परंपरा स्वयं "षाण्मातुर" कहकर बहु-मातृत्व स्वीकारती है। तो फिर "स्कन्दमाता" पद अकेली पार्वती को क्यों? उत्तर में ही मातृत्व की परिभाषा है — माँ वह नहीं जो केवल जन्म दे; माँ वह है जो अंततः अपना ले। कृत्तिकाओं का पालन-यश शाश्वत है (कार्तिकेय-नाम उन्हीं का स्मारक है — परंपरा ने उनका श्रेय कभी नहीं छीना); पर पुत्र की पहचान, दीक्षा, सेनापतित्व का अभिषेक और युद्ध-आशीर्वाद — यह मातृ-पद पार्वती का है: जिसने वियोग सहा और अधिकार नहीं छोड़ा। आधुनिक जीवन के लिए यह कथा जितनी प्राचीन है उतनी ही समकालीन — पालने वाली धाय, दूध देने वाली धात्री, गोद लेने वाली माता, जन्म देने वाली जननी: भारतीय परंपरा ने इन सबको "मातृ" पद दिया है (सोलह-मातृका पूजन इसी उदारता की विधि है), और स्कन्दमाता-रूप घोषणा करता है कि इन सब धाराओं के संगम पर जो खड़ी होती है — जो बालक को उसकी समग्र नियति तक पहुँचाती है — वह माता है। इसीलिए पाँचवीं रात संतान-कामना और संतान-मंगल की रात मानी गई; और इसीलिए विधान का वह अनोखा वचन है — स्कन्दमाता की पूजा में स्कन्द की पूजा स्वतः: माँ प्रसन्न, तो संतान का कल्याण स्वतः — कार्य-कारण नहीं, एक ही सत्य के दो चेहरे।

गोद और सिंह — वात्सल्य का बल-शास्त्र

स्कन्दमाता-मूर्ति का शिल्प-व्याकरण ध्यान से पढ़िए — यह कोमलता की नहीं, सशस्त्र कोमलता की मूर्ति है। आसन कमल है — जल में रहकर निर्लिप्त: मातृत्व संसार के बीच रहता है पर मोह-पंक में नहीं डूबता (मोह और वात्सल्य का भेद — शुक्राचार्य-पृष्ठ D048 का पुत्री-मोह प्रकरण स्मरण करें: वहाँ मोह शाप-यंत्र बना था; यहाँ वात्सल्य वर-यंत्र है — भेद यही कि वात्सल्य संतान के श्रेय को देखता है, मोह अपने सुख को)। वाहन सिंह है — वही रण-पशु जो चन्द्रघण्टा (D063) के नीचे था: गोद में दूध-मुँहा शिशु और आसन के नीचे गर्जता सिंह — संसार को संदेश स्पष्ट है: इस गोद तक पहुँचने से पहले इस सिंह से मिलना होगा; माँ की कोमलता उसकी रक्षा-शक्ति की छाया में ही फलती है, और संतान पर संकट आए तो वही पद्मासना क्षण में सिंह-वाहिनी है। और गोद का बालक स्वयं कौन है — देव-सेनापति: वह शिशु जो कल तारक-वध करेगा (D005)। स्कन्दमाता का वात्सल्य इसलिए निर्बल-लाड़ नहीं — सेनापति गढ़ने वाला पालन है: लोरी भी वहाँ वीर-गाथा है। भारतीय इतिहास-लोक ने इस आदर्श को बार-बार दोहराया — शिवाजी की जीजाबाई इस परंपरा का सबसे उज्ज्वल ऐतिहासिक वाचन हैं (लोक-स्तर स्मृति): गोद में रामायण-महाभारत सुनाती माता, और गोद से उठा हुआ राष्ट्र-सेनापति। पाँचवीं रात का दीप हर उस पालनकर्ता के नाम है — माता, पिता, गुरु, धाय — जो किसी बालक को उसकी नियति के योग्य गढ़ रहा है।

आध्यात्मिक अर्थ — पहचान जो सम्बन्ध बन गई

स्कन्दमाता-तत्त्व का शिखर-पाठ उनके नाम में लौटता है। नवदुर्गा-यात्रा के मध्य-बिंदु (पाँचवाँ पद — नौ का केंद्र) पर देवी अपने समस्त निज-चिह्न उतारकर केवल एक परिचय रखती हैं — मैं स्कन्द की माँ हूँ। अहंकार-शास्त्र की दृष्टि से यह पतन जैसा दिखेगा — अपनी पहचान दूसरे के नाम पर? पर भक्ति-शास्त्र इसे शिखर कहता है: प्रेम की पूर्णता वहाँ है जहाँ "मैं" का उत्तर "मेरा अपना" से मिले — और वह भी गर्व से, दैन्य से नहीं। मध्य-बिंदु पर ही यह रूप क्यों — यह भी क्रम-शास्त्र का संकेत है: चार रातें साधक अपने लिए साधता है (जन्म-तप-शक्ति-सृजन); पाँचवीं रात साधना का मुख दूसरे की ओर मुड़ता है — जो पाया है, वह अब किसी की गोद बनेगा; स्व-विकास की परिणति पर-पालन है, अन्यथा वह केवल स्व-अर्जन है। विशुद्ध-चक्र (कंठ) की लोक-योग योजना भी यही ध्वनि देती है — चार चक्र स्वयं के थे; कंठ वह द्वार है जहाँ से भीतर का बाहर के लिए बोलता है: आशीर्वाद, लोरी, शिक्षा — मातृ-वाणी। नवरात्र की पाँचवीं संध्या का दीप जलाते हुए उपासक वस्तुतः यह प्रश्न स्वयं से पूछता है — मेरी गोद में कौन है? किसके लिए मैं स्कन्दमाता हूँ? — जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए, पाँचवीं पूजा पूर्ण है। ॥ पंचमं स्कन्दमातेति ॥

स्रोत टिप्पणी: स्कन्द-जन्म शृंखला (तेज-अग्नि-गंगा-शरवन-कृत्तिका) — शिव पुराण रुद्र-संहिता कुमार-खंड / स्कंद पुराण धाराएँ (ग्रेड A — विवरण-भेद बहुल; मुख्य जन्म-सेनापतित्व-तारकवध कथा D005 पर — complementary-split); "कार्तिकेय"/"षाण्मातुर" नाम-स्मृतियाँ (ग्रेड A/B); पार्वती-क्षोभ/शाप धारा (ग्रेड B — चिह्नित); देवी कवच "पंचमं स्कन्दमातेति" (ग्रेड A/B); ध्यान-श्लोक "सिंहासनगता नित्यं..." — प्रचलित पूजा-पाठ (ग्रेड B — सप्तशती-मूल में नहीं); पूजा-वचन (स्कन्द-पूजा समाहित) — व्रत-परंपरा (ग्रेड B/C); विशुद्ध-योजना — लोक-योग (ग्रेड C); जीजाबाई-स्मृति — ऐतिहासिक-लोक स्तर (ग्रेड C — उपमा-मात्र)। सोलह-मातृका सन्दर्भ पूजा-विधान सामान्य (ग्रेड B)। अर्थ-अनुच्छेद व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
स्कन्दमाता
स्कन्द (कार्तिकेय) की माता — सम्बन्ध-निर्मित नाम।
पद्मासना
कमल-आसन पर विराजित — निर्लिप्त मातृ-गरिमा।
पंचम दुर्गा
नवदुर्गा-क्रम का मध्य-बिंदु — पाँचवीं रात्रि।
विद्यावाहिनी धारा
उपासना-फल में विद्या-चेतना की लोक-परंपरा।
यशस्विनी
ध्यान-श्लोक का पद — यशवती माता।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः ॥

ध्यान-श्लोक (नवदुर्गा पूजा-परंपरा — ग्रेड B)

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥

अर्थ: जो नित्य सिंहासन (सिंह-आसन) पर विराजित हैं, जिनके दो हाथ कमलों से सुशोभित हैं — वे यशस्विनी स्कन्दमाता देवी सदा शुभ (कल्याण) देने वाली हों।

पंचमी-अर्चन विधि-मंत्र एवं स्कन्द-षष्ठी पाठ-सूत्र शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
नवरात्रि पंचमी
पाँचवीं रात्रि — स्कन्दमाता-पूजन; संतान-मंगल कामना दिवस।
पंचमी-नैवेद्य
केला-अर्पण की लोक-विधि — आरोग्य-कामना (लोक-स्तर)।
स्कन्द-षष्ठी सूत्र
दक्षिण की कंद-षष्ठी (D005) से मातृ-पुत्र युग्म-पर्व सूत्र — अगले ही दिन षष्ठी-क्रम।
ललिता-पंचमी योग
कुछ अंचलों में पंचमी की देवी-विशेष विधियाँ (उपांग-ललिता) — क्षेत्र-भेद चिह्नित।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
स्कन्दमाता मंदिर, वाराणसी
जैतपुरा (बागेश्वरी देवी क्षेत्र) — काशी नवदुर्गा-यात्रा का पंचम-दिवस मंदिर।
षष्ठ-मुख स्कन्द क्षेत्रों में मातृ-विग्रह
दक्षिण के अरुपडैवीडु (छह स्कन्द-धाम — D005) में देवी-सेना सह मातृ-स्मृतियाँ।
नवदुर्गा-मंडप सर्वत्र
पंचमी-आराधना का पंडाल-जाल — गोद-मूर्ति का जीवित दर्शन।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: नवरात्रि के पाँचवें दिन की देवी हैं स्कन्दमाता — यानी "स्कन्द की माँ"! स्कन्द कौन? — कार्तिकेय जी: देवताओं के सेनापति, गणेश जी के भाई। देवी की गोद में छह मुखों वाले नन्हे कार्तिकेय बैठे हैं। सबसे प्यारी बात — स्कन्दमाता की पूजा करो, तो कार्तिकेय जी की पूजा अपने-आप हो जाती है!

रोचक तथ्य:

  • बाल-कार्तिकेय को छह कृत्तिका तारा-देवियों ने पाला था — इसीलिए नाम "कार्तिकेय"!
  • आकाश में दिखने वाला कृत्तिका नक्षत्र (Pleiades) वही छह "माताएँ" हैं।
  • देवी कमल पर बैठती हैं, पर सवारी शेर की है — गोद नरम, रक्षा ज़बरदस्त!
  • नौ दिनों में यह अकेला रूप है जिसमें देवी के साथ कोई बच्चा है।

सीख: माँ (और हर पालने वाला — पापा, दादी, गुरु) सबसे बड़ा ख़ज़ाना है; उनका आदर करो। और बड़े होकर तुम भी किसी के लिए वैसी ही "गोद" बनना — किसी को सहारा देना ही सबसे बड़ा बड़प्पन है।

मिनी क्विज़:

  1. स्कन्दमाता की गोद में कौन हैं?
  2. बाल-कार्तिकेय के कितने मुख हैं?
  3. "कार्तिकेय" नाम किनके नाम पर पड़ा?
  4. स्कन्दमाता का आसन क्या है?