भट्टी की देवी — तप जो जलाकर खरा करे
तपस् — भारतीय साधना का केंद्रीय शब्द
भैरवी को समझने की कुंजी एक संस्कृत धातु में है — तप्: तपना, जलना। भारतीय परंपरा ने साधना के लिए जो शब्द चुना — तपस् — वह प्रकाश का नहीं, ताप का शब्द है; ऋषियों ने जानते-बूझते कहा कि आत्म-निर्माण की प्रक्रिया गर्म होती है। श्रुति इस तत्त्व को सृष्टि के मूल तक ले जाती है — "स तपोऽतप्यत" (उसने तप तपा — तैत्तिरीय 2.6 की सृष्टि-भाषा): स्वयं ब्रह्म ने जगत् रचने से पहले तप किया; और मुण्डक का सूत्र साधक-पक्ष कहता है — सत्य, तप, सम्यक्-ज्ञान और ब्रह्मचर्य से ही वह आत्मा पाया जाता है (3.1.5)। इस कोश की कथाओं में तप बार-बार निर्णायक मोड़ रहा है — पार्वती का वह महातप जिसने पत्तों तक का आहार त्यागा और "अपर्णा" नाम कमाया (D006/D062 की मुख्य-रेखा); ब्रह्मचारिणी-रूप उसी का नवदुर्गा-पद है। भैरवी उस समस्त तप-अग्नि का महाविद्या-विग्रह हैं — देवी जो तपस्या नहीं करतीं: तपस्या हैं। उनके ध्यान में पुस्तक-माला और मुण्डमाला साथ क्यों हैं, अब खुलता है — विद्या (पुस्तक), अभ्यास (माला) और अहं-आहुति (मुण्ड): तीनों मिलें तभी तप पूरा; कोई एक छूटे तो या तो कोरा पांडित्य बचता है, या कोरा कर्मकांड, या कोरा आत्म-दमन।
अग्नि-परीक्षा नहीं — अग्नि-शोधन
भैरवी-दर्शन का सबसे उपयोगी भेद यह है: उनकी अग्नि परीक्षा की नहीं — शोधन की अग्नि है। परीक्षा की अग्नि बाहर से थोपी जाती है और उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण बाँटती है; शोधन की अग्नि स्वर्णकार की भट्टी है — वह सोने के विरुद्ध नहीं, सोने के पक्ष में जलती है: जो जलता है वह मिलावट है, सोना नहीं। परंपरा इसीलिए कहती है कि भैरवी साधक की शत्रु नहीं — स्वर्णकार हैं; जीवन की जिन आँचों को मनुष्य दंड समझता है — हानि, अपयश, वियोग, असफलता — भैरवी-दृष्टि उन्हें भट्टी की तरह पढ़ना सिखाती है: यह आँच क्या जला रही है? यदि अहंकार, आलस्य, मिथ्या-आश्रय जल रहे हैं, तो यह विनाश नहीं — निखार चल रहा है। दुर्गा-सप्तशती की देवी-स्तुति में जो पद रात्रि-रूपों और शक्ति-रूपों की गणना करते हैं, शाक्त-व्याख्या परंपरा उनमें भैरवी-तत्त्व की ध्वनि सुनती आई है (व्याख्या-स्तर — ग्रेड B/C, चिह्नित) — पर उससे भी ठोस प्रमाण जीवित परंपरा में है: साधना-दीक्षा के कठोरतम चरण — मौन-व्रत, निराहार, एकांत, शीत-ताप सहन — परंपरा में भैरवी-चरण कहलाते हैं; गुरु शिष्य को उस चरण में तभी उतारते हैं जब पात्र पक चुका हो — कच्चे घड़े को भट्टी फोड़ देती है, पके को अमर कर देती है।
भैरवी ब्राह्मणी — इतिहास में उतरी विद्या
भैरवी-तत्त्व का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक चित्र 19वीं सदी के बंगाल से मिलता है — और वह इस विद्या का स्त्री-आचार्या पक्ष भी खोलता है। दक्षिणेश्वर (D010-क्षेत्र) में युवा रामकृष्ण की आध्यात्मिक अवस्थाओं को जब लोग उन्माद कह रहे थे, तब 1861 के आस-पास एक संन्यासिनी वहाँ पहुँचीं — भैरवी ब्राह्मणी (योगेश्वरी): शास्त्र-पारंगता, तंत्र-सिद्धा, अकेली यात्रा करती स्त्री-आचार्या। उन्होंने रामकृष्ण की अवस्थाएँ परखीं और सभा बुलाकर शास्त्र-प्रमाणों से घोषित किया — यह रोग नहीं, महाभाव है; फिर वर्षों उन्हें चौंसठ तंत्र-साधनाओं की विधिवत् दीक्षा दी — इतिहास साक्षी है कि आधुनिक युग के सबसे प्रभावशाली संत के प्रथम दीक्षा-गुरु एक स्त्री थीं (रामकृष्ण-जीवनी साहित्य — ग्रेड A, अभिलेखित)। "भैरवी" यहाँ केवल देवी-नाम नहीं — पद है: तंत्र-परंपरा में सिद्ध स्त्री-साधिका भैरवी कहलाती है, और यह उन विरल भारतीय धारों में है जहाँ स्त्री का आचार्या-पद शास्त्र-सम्मत, नामांकित और जीवित रहा। देवी भैरवी का यह मानवी प्रतिबिम्ब उनके तत्त्व का ही विस्तार है: जो अग्नि से गुज़रा हो, वही अग्नि से गुज़रते हुए को पहचान सकता है — भैरवी ब्राह्मणी ने वही किया जो देवी भैरवी करती हैं: तपते हुए को उन्माद कहने वालों के बीच खड़े होकर कहा — यह जल नहीं रहा, निखर रहा है।
राग भैरवी — संगीत में उतरी देवी
भैरवी-नाम भारतीय कानों में एक और द्वार से बसा है — राग भैरवी: हिंदुस्तानी संगीत का वह राग जिसके नाम की व्युत्पत्ति परंपरा देवी भैरवी से ही जोड़ती है (जैसे राग भैरव — शिव के भैरव-रूप से; संगीत-शास्त्र की राग-रागिनी पद्धति में भैरवी भैरव की रागिनी कही गई)। कोमल स्वरों वाला यह राग करुणा-भक्ति का महाराग है — "बाबुल मोरा" से लेकर असंख्य भजन इसी में बँधे; और उसकी सांगीतिक मर्यादा ध्यान देने योग्य है: परिपाटी में महफ़िल का समापन भैरवी से होता है — रात-भर की रागदारी के बाद भोर की वेला में अंतिम प्रस्तुति भैरवी की, जिसके बाद उस सभा में कोई राग नहीं गाया जाता (संगीत-परंपरा — ग्रेड B)। संयोग देखिए या संकेत: देवी भैरवी साधना-यात्रा की तप-पूर्ति हैं, राग भैरवी संगीत-यात्रा की — दोनों अंत की आँच हैं जिसके बाद केवल मौन बचता है। जिस संस्कृति ने अपने विदा-राग को देवी का नाम दिया, उसने तप और करुणा का सम्बन्ध स्वरों में भी लिख दिया।
मर्यादा और मंडल-क्रम — आँच का विवेक
भैरवी-पृष्ठ अपनी चेतावनी के बिना अधूरा है — क्योंकि तप की महिमा का एक विकृत-रूप भी बाज़ार में बिकता है। पहली मर्यादा: शास्त्र का तप आत्म-हिंसा नहीं — गीता स्वयं "कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम्" (देह को पीड़ा देने वाले आसुरी तप — 17.5-6) की भर्त्सना करती है और सात्त्विक तप की त्रिविध परिभाषा देती है: शरीर-तप (शौच, अहिंसा, ब्रह्मचर्य), वाक्-तप (सत्य-प्रिय-हितकारी वचन), मनस्-तप (प्रसाद, मौन, आत्म-निग्रह) — 17.14-16; भैरवी की अग्नि यही त्रिविध सात्त्विक आँच है, देह-दंड नहीं (D074 का सुरक्षा-सूत्र यहाँ भी अक्षरशः लागू)। दूसरी मर्यादा: तथाकथित "भैरवी-चक्र" जैसे वाम-आचार प्रसंगों का नाम लेकर चलने वाला शोषण-बाज़ार — कोश की स्थायी चेतावनी: वाम-मार्ग की कोई भी वास्तविक धारा कठोरतम गुरु-मर्यादा के भीतर है; खुले विज्ञापन वाला हर "चक्र" शास्त्र नहीं, अपराध-क्षेत्र है। और मंडल-क्रम की दृष्टि से भैरवी का स्थान अब पढ़िए: छिन्नमस्ता (D074) ने आत्म-दान की विद्युत दिखाई — एक क्षण की कौंध; भैरवी वही सत्य धीमी आँच पर सिखाती हैं — दान एक क्षण का, तप जीवन-भर का; बिजली सबकी नहीं, भट्टी सबकी है। और आगे मंडल अपना सबसे विलक्षण मोड़ लेगा — धूमावती (D076): अग्नि जब सब जला चुके, तो जो बचता है वह धुआँ है; भैरवी की ज्वाला के ठीक बाद परंपरा ने राख और धुएँ की देवी रखी — यह क्रम स्वयं एक उपदेश है। ॥ शुभंकरी भैरवी की जय ॥