अग्नि-साक्षी हाथ — मैत्री, बालि-प्रश्न और चतुर्दिक् खोज
दो निर्वासितों की संधि — अग्नि की परिक्रमा
ऋष्यमूक की तलहटी में दो धनुर्धर देख सुग्रीव काँप उठे थे — बालि के भेजे वधिक होंगे! हनुमान भिक्षु-वेश में भेद लेने गए (D012-कथा का वह प्रसिद्ध प्रथम-मिलन) — और लौटे तो कंधों पर राम-लक्ष्मण को बिठाए। परिचय हुआ: दोनों पक्ष एक-से टूटे थे — इसका राज्य और पत्नी छिनी, उसकी पत्नी हरी गई; इसे भाई ने निकाला, उसे विमाता ने। हनुमान ने दोनों दुःखों को एक सूत्र में बाँधा, और अग्नि प्रज्वलित की गई: राम-सुग्रीव ने अग्नि की परिक्रमा कर मैत्री-व्रत लिया — वाल्मीकि का स्पष्ट विधान (किष्किंधाकांड 5): यह भावुक आलिंगन नहीं — संस्कार था, विवाह-तुल्य साक्षी-बद्ध वचन: तेरा शत्रु मेरा शत्रु, तेरा दुःख मेरा। भारतीय मैत्री-शास्त्र का यह आदि-अनुबंध है — कृष्ण-सुदामा से सदियों पहले का: मित्रता ढीला भाव नहीं, अग्नि-साक्षी धर्म है। दोनों ने वचन बाँटे — राम: बालि से मुक्ति और राज्य-रूमा की वापसी; सुग्रीव: सीता-खोज में सर्वस्व। पहला वचन पहले निभना था — और वहीं रामकथा का सबसे विवादित बाण प्रतीक्षा कर रहा था।
बालि-प्रकरण — वह प्रश्न जिससे रामायण स्वयं नहीं भागी
बालि महाबली था — वर ऐसा कि सम्मुख-शत्रु का आधा बल उसमें खिंच आए; इसीलिए युक्ति बनी: सुग्रीव ललकारें, राम ओट से बाण चलाएँ। प्रथम द्वंद्व में राम चला ही नहीं सके — दोनों भाई एक-से दिखे; माला पहनाकर दूसरा द्वंद्व हुआ, और वृक्ष-ओट से राम-बाण ने बालि का वक्ष भेदा। और अब वह दृश्य, जिसे वाल्मीकि ने काटा नहीं — बढ़ाया: मरणासन्न बालि ने राम को खरी-खरी सुनाई (किष्किंधाकांड 17 का दीर्घ आक्षेप-सर्ग): मैं तुझसे युद्ध में नहीं था; तूने मृगया-न्याय से भी नीचे गिरकर ओट से मारा; वीर-धर्म कहाँ है, राघव? — रामायण की महानता यह कि उसने अपने ही नायक पर अभियोग-पत्र दर्ज होने दिया। राम का उत्तर (सर्ग 18) भी उतना ही विस्तृत है: यह भूमि भरत-शासित धर्म-क्षेत्र है — तूने अनुज-वधू (सुग्रीव-पत्नी रूमा) का हरण किया: अनुज पुत्र-तुल्य, उसकी पत्नी वधू-तुल्य — यह महापाप दंडनीय था; दंड राजा का धर्म है, और शाखामृग-न्याय (वन-प्राणी आखेट-विधि) से ओट-प्रहार शास्त्र-वर्जित नहीं; मैं व्यक्तिगत वैर से नहीं — दंड-धर्म से चला हूँ। बालि ने उत्तर स्वीकारा — क्षमा माँगी, अंगद को राम-हाथों सौंपा, तारा को धैर्य कहा — और वीर-गति पाई। कोश-दृष्टि इस प्रकरण को वैसे ही रखती है जैसे परंपरा ने रखा: प्रश्न जीवित है, उत्तर भी — मानस-कार ने भक्ति-कोण से पढ़ा (राम-बाण मुक्ति-द्वार), नीति-आचार्यों ने दंड-शास्त्र से, आधुनिक पाठक न्याय-प्रक्रिया से पूछता है; तीनों पाठ वैध हैं — महाकाव्य वही है जो अपने नायक से भी जिरह होने दे। (तारा का विलाप-प्रकरण और उनकी राज-नीति — मंथरा-प्रतिपक्ष विदुषी-छवि — इस कोश की नारी-गरिमा रेखा में विशेष स्मरणीय है।)
विलम्ब और गर्जना — मित्रता की दूसरी परीक्षा
राज्याभिषिक्त सुग्रीव किष्किंधा के भोग-कक्षों में डूब गए — वर्षा-ऋतु बीती, शरद आया, वचन सोया रहा। उधर पर्वत-कंदरा में राम विरह में तपते रहे। अंततः लक्ष्मण धनुष लेकर किष्किंधा-द्वार पर गरजे — नगर काँपा; और यहाँ कथा के दो सुंदर मध्यस्थ उभरे: हनुमान ने स्वामी को धिक्कार-स्मरण कराया, और तारा ने कुपित लक्ष्मण को शास्त्र-युक्त वाणी से शांत किया (विदुषी की कूटनीति — किष्किंधाकांड 33-36)। सुग्रीव लज्जित हुए — और यही उनके चरित का मर्म है: वे गिरते हैं, पर गिरकर उठना जानते हैं; क्षमा माँगी और ऐसा उठे कि इतिहास का पहला महा-खोज-अभियान रच दिया। चतुर्दिक् प्रेषण (किष्किंधाकांड 40-43) प्रबंधन-शास्त्र का महाकाव्य-अध्याय है: चार दिशाओं में चार दल — हर दल को सुग्रीव ने स्मृति से उस दिशा का पूरा भूगोल बोलकर लिखाया (पर्वत, नदियाँ, द्वीप, निषिद्ध-क्षेत्र — वाल्मीकि के ये सर्ग प्राचीन भू-ज्ञान का कोश हैं); समय-सीमा एक मास; दक्षिण-दल में सर्वश्रेष्ठ — अंगद (नेतृत्व-प्रशिक्षण: कल का राजा), जाम्बवान् (अनुभव), हनुमान (सामर्थ्य) — और हनुमान को राम ने मुद्रिका दी: नियोजक जानता था कि पहुँचेगा कौन। सम्पाति-सूत्र (D098) से दिशा मिली, समुद्र-तट पर जाम्बवान् ने हनुमान को शक्ति-स्मरण कराया — और लंका-लंघन हुआ (D012-मुख्य)। सुग्रीव-प्रबंधन का पाठ: सही काम सही व्यक्ति को, स्पष्ट सूचना, स्पष्ट समय-सीमा — और चूक पर दंड-भय नहीं, लक्ष्य-प्रेम जगाना।
सेतु से अभिषेक तक — और सुग्रीव-पाठ
युद्ध-पर्व में सुग्रीव वचन के धनी निकले: वानर-भालु महासेना समुद्र-तट लाए, सेतु-निर्माण (नल-नील शिल्प) करवाया, रण में स्वयं भिड़े — कुम्भकर्ण से सीधा द्वंद्व लिया (कान-नाक विच्छेद प्रसंग), और लंका-विजय के प्रथम-पंक्ति नायकों में रहे; राम-राज्याभिषेक में किष्किंधा-नरेश अयोध्या के विशिष्टतम अतिथि थे, और परंपरा-स्मृति में राम-परिवार चित्रों के स्थायी परिकर। उनका चरित-पाठ तीन तलों पर बँधता है। व्यक्ति-तल: सुग्रीव "गिरे हुए के उठने" की कथा हैं — भय से मैत्री तक, भोग-विलम्ब से महाभियान तक: पूर्णता जन्म से नहीं मिली, सम्बन्धों ने गढ़ी — राम का विश्वास, हनुमान की टोक, तारा की सलाह; अच्छे लोग जिस व्यक्ति को घेर लें, वह औसत से महान हो जाता है — नेतृत्व-शास्त्र इसे आज "परिवेश-पूँजी" कहता है: अपने चारों ओर टोकने वाले हनुमान और सलाह देने वाली तारा रखो, चाटुकार नहीं — सुग्रीव की समूची उन्नति का आधा श्रेय निस्संदेह उनके विवेकपूर्ण मंत्रि-चयन को ही जाता है। मैत्री-तल: अग्नि-साक्षी वचन दोनों ओर से निभा — राम ने पहले निभाया (जोखिम-सहित), सुग्रीव ने विलम्ब से पर पूर्ण; मैत्री की सच्ची कसौटी वचन कहने की गति नहीं — अंत तक निभाई गई वचन-पूर्ति है: देर स्वीकार्य है, टूटना नहीं। और भूगोल-तल: किष्किंधा आज भी खड़ी है — हम्पी (कर्नाटक) के तुंगभद्रा-तट की वही शिला-भूमि परंपरा में किष्किंधा-क्षेत्र है: ऋष्यमूक और मतंग-पर्वत (D078-सेतु), अंजनाद्रि (हनुमान-जन्मस्थल धारा), सुग्रीव-गुहा — विजयनगर-वैभव (D088-हम्पी सेतु) से पहले यह वानर-राजधानी थी; रामायण-भक्त वहाँ आज भी उस अग्नि-स्थल को खोजते हैं जहाँ दो टूटे हुए मिले थे और इतिहास जुड़ गया था। एक अंतिम टिप्पणी विभीषण-मंत्रणा (D100) की भी रहे: शरणागति-सभा में सुग्रीव ही सबसे कठोर विरोधी थे — "शत्रु-भ्राता पर विश्वास कैसा?" — और राम-निर्णय के बाद उन्होंने ही सबसे पहले विभीषण को गले लगाया: मत-भेद रखना और निर्णय हो जाने पर पूर्ण-निष्ठा से साथ देना — संगठन-धर्म की यह अंतिम परिपक्वता भी सुग्रीव-पाठ्यक्रम का ही अध्याय है। ॥ वानरराज सुग्रीव की जय ॥