पंख बनाम रथ — और वह अंत्येष्टि जिसने पक्षी को पिता बनाया
आकाश का अकेला हस्तक्षेप
मारीच-छल और भिक्षु-वेश का चक्र (मुख्य-रेखा D013/D015 पर) पूरा हो चुका था — रावण के रथ में बंदिनी सीता की पुकार पंचवटी के आकाश को चीर रही थी: "हा राम! हा लक्ष्मण!" वाल्मीकि लिखते हैं — वन सुन रहा था: वृक्ष ठिठके, हिरण दौड़े, पर्वत गूँजे... और उस समस्त सुनते हुए संसार में से बीच में आया केवल एक प्राणी — तरु-शिखर पर ऊँघता एक वृद्ध गिद्ध। जटायु ने आँख खोली, दृश्य पहचाना — और यहाँ वाल्मीकि उन्हें जो पहला वाक्य देते हैं, वह नीति-शास्त्रों पर भारी है: पहले वचन से रोका — "रावण! मैं साठ हज़ार वर्ष का वृद्ध हूँ, तू युवा, रथी, धनुर्धर — फिर भी कहता हूँ: लौटा दे वधू को; राजा का धर्म पर-स्त्री रक्षा है, हरण नहीं; यह कर्म तुझ समेत तेरे कुल को भस्म करेगा" (अरण्यकांड 50 का दीर्घ धर्म-उपदेश — वृद्ध ने पहले समझाया, युद्ध अंतिम विकल्प था)। रावण नहीं माना — तब पंख तने। आयु-जर्जर देह, शस्त्र के नाम पर चोंच-नख-डैने; सामने त्रिलोक-विजयी दशग्रीव — खर-दूषण वध का साक्षी जटायु जानता था कि यह युद्ध जीता नहीं जा सकता। फिर भी लड़ा — यही एक वाक्य जटायु को अमर करता है: धर्म-युद्ध की कसौटी विजय-सम्भावना नहीं, कर्तव्य-अनिवार्यता है।
युद्ध — बूढ़े डैनों का चमत्कार
और वह युद्ध एकतरफ़ा नहीं रहा — वाल्मीकि का वर्णन पढ़कर रोमांच होता है कि वृद्ध गृध्र ने क्या कर दिखाया: वेग-प्रहारों से रावण के प्रसिद्ध धनुष तोड़े; रत्न-जटित कवच-छत्र छिन्न किए; रथ के पिशाच-मुख खच्चर मारे, सारथि गिराया, माया-रथ ही चूर कर दिया — क्षण-भर को दशग्रीव को सीता-सहित भूमि पर उतरना पड़ा! त्रिलोक जिससे काँपता था, उसे एक बूढ़े पक्षी ने पैदल कर दिया — रामायण-भर में रावण की ऐसी दुर्गति इससे पहले किसी ने नहीं की थी। पर आयु आयु है: प्रहार-दर-प्रहार डैने शिथिल पड़े; क्रुद्ध रावण ने चन्द्रहास खड्ग उठाया और जटायु के पंख-पाँव-पार्श्व काट डाले। रक्त-सिक्त गृध्रराज भूमि पर गिरे — और गिरते पक्षी को देख बंदिनी सीता रथ में भी उनकी ओर लपकीं — जैसे पुत्रवधू ससुर-तुल्य वृद्ध पर बिलखे (वाल्मीकि का करुण-चित्र); हरण-रथ उड़ चला। जटायु हारे — पर उनकी हार ने तीन काम कर दिए थे: रावण का नाम-पता अब ज्ञात था (साक्षी जीवित था), हरण की दिशा चिह्नित थी, और — सूक्ष्मतम — रावण की अजेयता का भ्रम पहली बार टूटा था: जो बूढ़े पंखों से घायल हो सकता है, वह वानरों से हार भी सकता है — आने वाले युद्ध का पहला शंख जटायु के टूटे डैनों ने फूँका।
महाप्रयाण — "मैं राम को बताए बिना नहीं मरूँगा"
अब कथा का करुण-शिखर। खोजते हुए राम-लक्ष्मण को रक्त-लथपथ गृध्र मिला; क्षण-भर राम ने उसे सीता का भक्षक समझा — धनुष उठ गया — तभी क्षीण स्वर आया: "वत्स... मैं तुम्हारे पिता का सखा हूँ..." और जटायु ने वह किया जिसके लिए वे प्राण रोके बैठे थे: पूरा वृत्तांत — रावण, दक्षिण-दिशा, सीता की दशा — साक्षी की अंतिम गवाही, शब्द-शब्द राम को सौंपकर ही उन्होंने देह छोड़ी; वाल्मीकि लिखते हैं कि "राम" कहते-कहते प्राण निकले। और तब रामकथा का वह दृश्य आता है जो भारतीय संस्कार-चेतना का शिखर है: राम ने — जिनके अपने पिता का अंतिम संस्कार वनवास ने छीन लिया था — कहा: लक्ष्मण, चिता सजाओ; यह मेरे पिता-तुल्य है। स्वयं जल-तर्पण किया, विधिवत् दाह — मानस का अमर वचन: राम ने जटायु का क्रिया-कर्म "ज्यों पितु होय" — जैसे पिता का हो — किया, और वर दिया कि गृध्रराज परम-गति पाएँ। तौलिए इस क्षण को: अयोध्या के चक्रवर्ती-कुमार के हाथों, वेद-मंत्रों से, एक गिद्ध की अंत्येष्टि — वह पक्षी जिसे समाज अशुभ-भक्षक गिनता है (धूमावती-काक D076 की सजातीय पंक्ति): रामायण ने घोषित कर दिया कि गौरव योनि से नहीं — कर्म से है; धर्म के लिए गिरा गिद्ध देवताओं से ऊपर है। दक्षिण-परंपरा के स्थल-दावे इस प्रसंग को भूगोल देते हैं — केरल का जटायु-पारा (चदयमंगलम — जहाँ विश्व की विशालतम पक्षी-शिला-मूर्ति आज उस स्मृति पर बनी है) और आंध्र-लेपाक्षी ("ले, पक्षी" — उठ, पक्षी — तेलुगु लोक-निरुक्त) (स्थल-परंपराएँ — ग्रेड B/C, चिह्नित)।
सम्पाति — जुड़वाँ त्याग की गाथा, और जटायु-पाठ
जटायु-चरित का पूरक-अध्याय उनके ज्येष्ठ-भ्राता में है — सम्पाति (किष्किंधाकांड): यौवन में दोनों भाई सूर्य-मंडल तक उड़ने की होड़ में चढ़े; सूर्य-ताप से अनुज के पंख झुलसने लगे — तब सम्पाति ने अपने डैने ऊपर फैलाकर जटायु को छाया दी: स्वयं जले, पंख-हीन होकर समुद्र-तट गिरे — भाई बच गया। दशकों बाद वही पंख-हीन वृद्ध सम्पाति समुद्र-तट पर बैठा था जब सीता-खोजी वानर-दल निराश पहुँचा; अनुज की वीर-मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पाति ने अपनी गृध्र-दृष्टि से शत-योजन पार लंका में बैठी सीता को देखकर खोज की दिशा दी — और यह सेवा करते ही उनके पंख पुनः उग आए (निषाद-ऋषि का पूर्व-वरदान): त्याग से जले पंख सेवा से लौटे। दोनों वृद्ध पक्षियों ने एक-एक बार उड़कर वह किया जो सेनाएँ न कर सकीं — एक ने हरण का साक्ष्य रचा, दूसरे ने खोज की दिशा; दोनों भाइयों की कथाएँ एक ही सूत्र की दो लड़ियाँ हैं — पंख दूसरों के लिए जलाने की वस्तु हैं: सम्पाति ने भाई के लिए जलाए, जटायु ने पराई वधू के लिए कटाए — और दोनों अमर हुए। जटायु-पाठ का समकालीन अनुवाद अंत में: हर युग की सड़क पर कोई सीता पुकारती है — और हर युग का समाज "सुनता हुआ वन" बन जाता है: ठिठके वृक्ष, दौड़ते हिरण — देखने वाले बहुत, बीच में आने वाला दुर्लभ। जटायु उस दुर्लभ का चिर-नाम हैं; और आधुनिक भारत ने उन्हें एक जीवित-सेवा भी सौंप दी है — गिद्ध-संरक्षण: जो पक्षी-कुल पर्यावरण का "सफ़ाई-सेवक" होकर भी विलुप्ति-कगार पर पहुँच गया (औषधि-विषाक्तता संकट), उसकी रक्षा-परियोजनाएँ आज "जटायु" नाम से चलती हैं — पौराणिक गृध्रराज अपनी असली संतति का ढाल-नाम बन गए हैं। उनकी कथा हर पीढ़ी से एक ही प्रश्न पूछती है — चीख़ तुम तक भी पहुँची थी; तुम क्या बने — वन, या जटायु? ॥ गृध्रराज जटायु की जय ॥