सभा से समुद्र तक — शरणागति और "घर के भेदी" का न्याय
सभा का अकेला "नहीं"
हनुमान लंका जला चुके थे (D012); युद्ध-मेघ घिर आए थे; रावण ने महासभा बुलाई। सभा वैसी थी जैसी हर अहंकारी सत्ता की होती है — स्तुति-गान: महोदर-प्रहस्त गरजे, कुम्भकर्ण ने भी (आपत्ति-सहित) भुजाएँ ठोंकी। और तब उठा एक शांत स्वर — विभीषण: "परनारी-हरण पाप है, भ्राता; सीता को लौटा दो — राम से वैर लंका की चिता बनेगा। मैं तुम्हारे हित की कहता हूँ, प्रिय की नहीं।" वाल्मीकि ने विभीषण के तर्क-सर्ग (युद्धकांड 9, 14-16) विस्तार से रखे हैं — वे नीति-प्रज्ञा के पाठ हैं: शत्रु-बल का यथार्थ-आकलन, दूत-अवध्यता की मर्यादा (हनुमान-वध प्रस्ताव का विरोध उन्होंने ही किया था — सुंदरकांड), और मंत्री का प्रथम-धर्म: अप्रिय सत्य। रावण का उत्तर इतिहास के हर दरबार का उत्तर था — अपमान: "धिक् तुझे! तू शत्रु-पक्षी है; कोई और होता तो अभी मार देता — मेरे सामने से दूर हो जा, कुल-कलंक!" सत्य कहने का अधिकार समाप्त घोषित हुआ। उस क्षण विभीषण के पास तीन मार्ग थे — चुप होकर पद भोगना (सभा-शेष की तरह), विद्रोह कर गृह-युद्ध छेड़ना, या तीसरा: जिस भवन में धर्म के लिए स्थान नहीं, उसे छोड़ देना। चार सहचरों समेत विभीषण आकाश-मार्ग से समुद्र पार कर गए — यह पलायन नहीं था: जाते-जाते उन्होंने सभा में घोषणा की थी — मैं जा रहा हूँ, तुम्हारा अहित किए बिना जीवित नहीं रह सकता था इसलिए (वाल्मीकि 16 का विदा-वचन): त्याग सार्वजनिक था, षड्यंत्र गुप्त होता है — यह भेद आगे की मीमांसा की कुंजी है।
शरणागति — "यह मेरा व्रत है"
समुद्र-पार वानर-शिविर के आकाश में रुके विभीषण ने पुकारा: मैं रावण-अनुज विभीषण — राघव की शरण चाहता हूँ। शिविर में मंत्रणा छिड़ी — रामकथा की सबसे मूल्यवान नीति-बहस (युद्धकांड 17-18): सुग्रीव (D099) ने दो-टूक विरोध किया — शत्रु का भाई, ठीक युद्ध-पूर्व आया है: गुप्तचर होगा — राजनीति का यथार्थ-पक्ष; अंगद-जाम्बवान् ने परीक्षा की मध्य-राह कही; और हनुमान (D012) ने मुख-लक्षण और तर्क से कहा — इसकी वाणी में कपट-चिह्न नहीं: विवेक-पक्ष। तब राम ने वह कहा जिसने भारतीय भक्ति-दर्शन की दिशा तय कर दी: मित्रो, मेरा व्रत सुनो — "सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥" (18.33) — जो एक बार भी "मैं तुम्हारा हूँ" कहकर शरण माँगे, उसे मैं समस्त प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है; और आगे वह वाक्य जो करुणा की सीमा ही मिटा देता है: स्वयं रावण भी आए, तो लौटाऊँगा नहीं। श्रीवैष्णव आचार्य-परंपरा ने इस प्रसंग को प्रपत्ति-शास्त्र (शरणागति-दर्शन) का मूल-प्रमाण बनाया — "विभीषण-शरणागति" रामायण के अठारह रहस्य-प्रसंगों में शिखर मानी गई: शरण की एक पुकार समस्त पूर्व-पक्ष धो देती है — जन्म (राक्षस-कुल), पक्ष (शत्रु-गृह), भूत (कुछ भी) — प्रपन्न का अतीत नहीं देखा जाता। राम ने उसी क्षण एक क़दम और बढ़ाया — समुद्र-जल मँगाकर विभीषण का लंकेश्वर-अभिषेक कर दिया: युद्ध अभी हुआ ही नहीं था! शरणागत को केवल अभय नहीं — भविष्य दिया गया: राम-नीति की यह पराकाष्ठा है — शरण देने वाला संदेह से नहीं, संकल्प से चलता है।
"घर का भेदी" — लोकोक्ति की ईमानदार अदालत
युद्ध में विभीषण-ज्ञान निर्णायक रहा — लंका के रक्षा-रहस्य, इन्द्रजित् के निकुंभिला-यज्ञ का भेद (लक्ष्मण-विजय का द्वार), और अंतिम क्षण में रावण-वध का मर्म-संकेत (नाभि-अमृत लोक-धारा/मानस)। इसी से जन्मी वह लोकोक्ति जो विभीषण-नाम की छाया बन गई: "घर का भेदी लंका ढाए।" कोश इस अदालत में दोनों पक्ष रखता है। अभियोग-पक्ष कहता है: सगे भाई के विरुद्ध शत्रु को भेद देना विश्वासघात है; कुल-निष्ठा आधार-मूल्य है — जो घर नहीं निभा सका, वह क्या निभाएगा; और व्यवहार-जगत् में यह चेतावनी अमूल्य है: भीतरी दरार बाहरी शत्रु से अधिक घातक होती है — लोकोक्ति संगठनों के लिए सत्य कहती है। बचाव-पक्ष उत्तर देता है: विभीषण ने भेद बेचा नहीं — पहले वर्षों सत्य कहा (सभा-साक्षी), सार्वजनिक विदा ली, और तब पक्ष बदला जब प्रश्न घर-बनाम-पड़ोसी नहीं — धर्म-बनाम-अधर्म हो चुका था: हरण की गई स्त्री की मुक्ति का पक्ष; क्या कुल-निष्ठा अपराध-निष्ठा का पर्याय है? गीता-दर्शन (D014) साक्षी है कि स्वयं अर्जुन का युद्ध कुल के विरुद्ध ही था — "कुल क्षय" रोने वाले अर्जुन को कृष्ण ने धर्म-पक्ष ही बताया। निर्णय-सूत्र परंपरा ने ही दे रखा है: निष्ठा की सीढ़ी — व्यक्ति से ऊपर परिवार, परिवार से समाज, समाज से धर्म (सत्य-न्याय); निचली सीढ़ी की निष्ठा ऊपरी को नहीं काट सकती। विभीषण "घर के भेदी" तब होते जब स्वार्थ के लिए भेद बेचते — सिंहासन-लोभ? तो स्मरण रहे: सिंहासन उन्हें शरणागति के पूर्व-वचन से नहीं मिला — राम ने स्वयं दिया, और युद्धोपरांत वे लंका लौटकर रावण का विधिवत् अंतिम संस्कार करने वाले भी वही थे (राम-आदेश: "मरणान्तानि वैराणि" — वैर मृत्यु तक ही — युद्धकांड-धारा): भेदी अंत्येष्टि नहीं करता — भाई करता है। लोकोक्ति संगठन-चेतावनी रूप में जिए; विभीषण-चरित न्याय-कसौटी रूप में — दोनों अपने-अपने सत्य हैं।
चिरंजीवी-पद — और प्रथम-शतक का समापन
परंपरा विभीषण को सप्त-चिरंजीवियों में गिनती है — "अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥" (चिरंजीवी-स्मरण श्लोक — ग्रेड B परंपरा-पाठ): हनुमान (D012), परशुराम (D021), बलि (D020-मंडल) के संग विभीषण भी युग-युग जीवित — क्यों? हर चिरंजीवी किसी मूल्य का जीवित-स्मारक है: विभीषण उस साक्षी के, कि कोई कुल, कोई जन्म, कोई पक्ष मनुष्य को धर्म-चुनाव से मुक्त नहीं करता — हर सभा में, हर युग में, वह "अकेला नहीं" कहने वाला स्वर सम्भव है। श्रीलंका-परंपरा में उन्हें कैलानिया (कोलंबो-क्षेत्र) की धारा में स्मरण किया जाता है (क्षेत्र-परंपरा — ग्रेड B/C), और रामेश्वरम्-धनुषकोडि तीर्थ-कथा में विभीषण-अनुरोध पर धनुष-कोटि से सेतु-भंजन की धारा है — भारत-लंका के बीच वे आज भी सेतु-स्मृति हैं। और इस पृष्ठ के साथ इस ज्ञानकोश की प्रथम-शतक यात्रा (D001-D100 क्रम) पूर्ण होती है — आरम्भ ब्रह्मा (D001) से हुआ था: सृष्टि के प्रश्न से; समापन विभीषण पर है: विवेक के उत्तर पर। बीच में देव, देवियाँ, ग्रह, नदियाँ, नाग, पक्षी, वानर — और मनुष्य की हर अवस्था के दर्पण। परिक्रमा का अंतिम वाक्य विभीषण-वर ही रहे: "मेरी बुद्धि धर्म में स्थिर रहे" — पाँच सौ प्रविष्टियों के इस महालक्ष्य का असली प्रयोजन-मंत्र यही एक पंक्ति है। ॥ धर्मात्मा विभीषण की जय — प्रथम शतक पूर्ण ॥