रुद्र-देह से निकली रेवा — हर पत्थर जिसका शिवलिंग
उद्गम — तप के पसीने से जन्मी धारा
नर्मदा की जन्म-कथाएँ पुराणों में कई धाराओं में मिलती हैं, और उन सबका केंद्र एक है — शिव। रेवाखंड (स्कंद पुराण का विशाल नर्मदा-माहात्म्य खंड — नदी-साहित्य का सबसे बड़ा एकल-कोश) की प्रधान धारा कहती है: विंध्य-मेकल क्षेत्र में महादेव घोर तप में लीन थे; उस तपाग्नि से देह पर स्वेद-बिंदु उभरे, और उन बिंदुओं से एक कन्या-धारा प्रकट हुई — इतनी रमणीय कि देवों के मुख से सहसा निकला: "नर्मदा!" — आनंद देने वाली। दूसरी धाराएँ उसे रुद्र-तेज से सीधे प्रकट "रुद्र-देहजा" कहती हैं; एक और सुंदर पाठ में शिव-शरीर से चंद्र-किरण-स्पर्श के क्षण जन्म है — विवरण-भेद जो भी हो, सार-सूत्र स्थिर है: गंगा शिव की जटा में उतरीं, नर्मदा शिव की देह से निकलीं — एक धारण की गई, दूसरी जन्मी हुई; इसीलिए परंपरा नर्मदा को शिव-कुल की "पुत्री" कहती है। जन्म पर देवी ने पिता से वर माँगे — और जो माँगे, वे इस नदी का संविधान बन गए: "प्रलय में भी मेरा नाश न हो; त्रिलोक में मैं एक ही (अद्वितीय-प्रवाह) रहूँ; और मेरा हर पाषाण आपके लिंग-रूप में पूज्य हो — बिना मंत्र, बिना प्रतिष्ठा।" महादेव ने "तथास्तु" कहा। यही तीसरा वर बाणलिंग-परंपरा है — नर्मदा-तल के जल-घिसे अंडाकार पाषाण (भूविज्ञान की भाषा में करोड़ों वर्ष के प्रवाह-घर्षण से बने बेसाल्ट-गोलक) भारत-भर के शिवालयों में स्वयंभू-पूज्य हैं; काशी से रामेश्वरम् तक असंख्य पूजा-गृहों में जो "नर्मदेश्वर" विराजते हैं, वे इसी वर की संततियाँ हैं। अमरकंटक की मेकल-श्रेणी उनका पालन-गृह हुई — इसीलिए "मेकल-सुता"; और वहीं से यह धारा उल्टी दिशा चली — पश्चिम को: मानो घोषणा करती हुई कि यह नदी किसी और के मार्ग पर नहीं चलेगी।
शोण-प्रकरण — विवाह जो नहीं हुआ, और व्रत जो हो गया
नर्मदा-लोक की सबसे प्रिय कथा उनके अ-विवाह की है (स्तर: रेवाखंड-छाया सहित लोक-पौराणिक — ग्रेड B/C; भूगोल-रूपक स्पष्ट, इसलिए चिह्नित रूप में प्रस्तुत)। युवा नर्मदा का सम्बन्ध शोणभद्र (शोण/सोन नद — मध्य-भारत का ही महानद, "नद" अर्थात् पुरुष-धारा) से ठहरा। विवाह-वेला निकट थी; नर्मदा ने अपनी सखी/दासी जुहिला को संदेश लेकर वर के पास भेजा। पर जुहिला वधू-वेश देखने की लालसा में स्वयं वधू-आभूषण पहनकर पहुँची — और शोण उसे ही नर्मदा समझ बैठे; स्वागत-भाव में जो व्यवहार हुआ, उसने संदेह की रेखा खींच दी। सच जानकर स्वाभिमानिनी नर्मदा का निर्णय क्षण में हुआ — जो प्रतीक्षा में भेद न कर सका, वह वरण के योग्य नहीं: विवाह-मंडप से मुख मोड़कर वे उल्टी दिशा — पश्चिम — चल पड़ीं, और आजीवन चिरकुमारी रहने का व्रत लिया। भूगोल इस कथा का मानचित्र है — अमरकंटक के एक ही क्षेत्र से निकलकर शोण पूर्व को बहता है (गंगा से मिलने), नर्मदा पश्चिम को (सागर से सीधे मिलने); जुहिला नदी शोण की सहायिका है — तीनों धाराओं की दिशा-कथा लोक ने प्रेम-कथा में बाँध दी। इस कथा का दर्शन-भार हल्का नहीं है: भारतीय नदी-मंडल में गंगा माता हैं, यमुना सखी-पत्नी — नर्मदा स्वावलंबिनी हैं: वह देवी जिसने अपमान पर आँसू नहीं, दिशा बदली; जिसका अकेलापन अभाव नहीं, व्रत है। पश्चिम-वाहिनी होने का पुराण-वाचन भी यही है — सब पूर्व को दौड़ें तो भी अपनी दिशा पर अडिग रहना नर्मदा-स्वभाव है; और परंपरा कहती है कि इसीलिए चिरकुमारी रेवा का जल कभी "जूठा" नहीं होता — उनकी पवित्रता किसी सम्बन्ध की नहीं, स्वयं की है।
परिक्रमा — नदी जो पूरी घूमी जाती है
नर्मदा का जीवित महाध्याय उनकी परिक्रमा है — विश्व की संभवतः एकमात्र नदी जिसकी सम्पूर्ण प्रदक्षिणा एक विधि-बद्ध, अखंड, आज भी चलती तीर्थ-परंपरा है। विधान सरल और कठोर है: अमरकंटक (या किसी भी तट-बिंदु) से आरम्भ कर नदी को सदा दाहिने रखते हुए चलना — एक तट से सागर-संगम (विमलेश्वर/मीठी तलाई) तक, नौका से मुख-पार, फिर दूसरे तट से उद्गम तक और उद्गम-शिखर की प्रदक्षिणा: लगभग 3,500 किलोमीटर की पद-यात्रा, परंपरा-मान से तीन वर्ष, तीन मास, तेरह दिन की अवधि (द्रुत-विधियाँ भी प्रचलित)। नियम व्रत-कठोर हैं — धारा कहीं भी पार नहीं करनी (सागर-मुख के अतिरिक्त), असत्य-संग्रह-हिंसा वर्जित, भिक्षा-अन्न, तट-वास; और अभिवादन एक ही — मिलने वाला हर परिक्रमावासी हर आगंतुक से कहता है: "नर्मदे हर!" — नर्मदा (के नाम से) हर (शिव) — दो शब्दों में नदी और उसके पिता दोनों की वंदना। रेवाखंड इस परिक्रमा का फल मोक्ष-तुल्य गिनाता है; पर उसका लौकिक फल आँखों से दिखता है — परिक्रमा-पथ ने सहस्राब्दियों से तट के गाँवों को अतिथि-धर्म सिखाया है ("परिक्रमावासी को भोजन" मध्य-भारत का जीवित संस्कार है), और नदी को वह मिला जो किसी क़ानून से नहीं मिलता: निरंतर साक्षी — हर मौसम में उसके पूरे तट पर कोई-न-कोई चलता रहता है। मार्कण्डेय-सम्बद्ध धारा (रेवाखंड-फ्रेम में परिक्रमा के आदि-कथाकार ऋषि मार्कण्डेय ही हैं — D003-सूत्र) से लेकर आज के परिक्रमा-साहित्य तक यह पथ भारतीय आध्यात्मिक भूगोल की जीवित धमनी है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (ॐ-आकार द्वीप), महेश्वर के घाट (अहिल्याबाई-पुण्य), भेड़ाघाट का संगमरमर-दर्रा, गरुड़ेश्वर-चांदोद — माला के मनके इसी सूत्र में गुँथे हैं।
आध्यात्मिक अर्थ — दर्शन की नदी
नर्मदा-तत्त्व के पाठ उनकी बहनों से भिन्न स्वाद के हैं। पहला — स्वयंभू-पूज्यता: बाणलिंग को प्रतिष्ठा-मंत्र नहीं चाहिए; नर्मदा का पाठ है कि जो सत्य जल की धार में घिसकर गोल हुआ है — जिसके कोण अनुभव ने घिस दिए — वह स्वतः पूज्य है; साधना का घर्षण ही प्रतिष्ठा है। दूसरा — दर्शन-फल: स्नान गंगा में, दर्शन नर्मदा का — यह फल-श्रुति संकेत है कि कुछ सत्ताओं का सान्निध्य-मात्र रूपांतरण है; नर्मदा-तट का शांत बल (जिसे परिक्रमावासी "रेवा का सत्संग" कहते हैं) डुबकी नहीं माँगता, उपस्थिति माँगता है। तीसरा — चिरकुमारी-आदर्श: अपने जल, अपनी दिशा, अपने व्रत की स्वामिनी — नर्मदा उन सबकी देवी हैं जो सम्बन्ध टूटने पर स्वयं नहीं टूटते। और चौथा, इस शृंखला का स्थायी समापन-स्वर — जीवित नदी ही देवी है: बाँधों-खननों के युग में मध्य-भारत की यह जीवन-रेखा भी संकट-चिह्न पढ़ रही है; "नर्मदे हर" कहने वाले हर कंठ का व्रत-अंश यह भी है कि रेवा बहती रहे — क्योंकि जिस दिन धारा रुकती है, उस दिन कंकर केवल कंकर रह जाते हैं। शंकर वे तभी तक हैं जब तक नर्मदा हैं। ॥ नर्मदे हर ॥