जिसकी मुस्कान से ब्रह्मांड — अंधकार के विरुद्ध स्मित का दर्शन
जब कुछ नहीं था — और हँसी हुई
हर परंपरा का अपना सृष्टि-आरम्भ है — और भारतीय वाङ्मय में उसके कई स्तर हैं: नासदीय-सूक्त का महाप्रश्न ("तब न सत् था, न असत्..."), ब्रह्मा (D001) की कमल-कथा, विष्णु (D002) का योग-निद्रा जल, और शाक्त-परंपरा का वह वाचन जो देवी-भागवत से लेकर सप्तशती के "या देवी सर्वभूतेषु" तक गूँजता है — सबसे पहले शक्ति थी। नवदुर्गा-परंपरा इस शाक्त-दर्शन को चौथी रात एक चित्र में बाँध देती है, और वह चित्र विश्व की सृष्टि-कथाओं में अनोखा है। कल्पना कीजिए वह "समय" जब समय नहीं था — न प्रकाश, न अंधकार का साक्षी, न दिशा, न शब्द; केवल निराकार महाशून्य। और उस शून्य में — परंपरा कहती है — आदि-शक्ति ने मंद-सा मुस्कुरा दिया: "ईषत् हास्य"। न संकल्प का घोष, न तप की ज्वाला, न युद्ध का नाद — एक हल्की-सी स्मित; और उस स्मित की ऊष्मा (कु-ऊष्मा) से एक अण्ड प्रकट हुआ — ब्रह्मांड-अण्ड: वह आदि-गोलक जिसके भीतर सारे लोक, सारे तेज, सारे बीज संचित थे। उसी अण्ड से आगे की सृष्टि-प्रक्रियाएँ चलीं — त्रिमूर्ति के अधिकार बँटे, लोक फूटे, प्रकाश जन्मा। ध्यान रहे स्तर-चिह्न का — यह "ईषत्-हास्य सृष्टि" वाचन नवदुर्गा-परंपरा का लोक-पौराणिक पाठ है (ग्रेड B; किसी एक संहिता का उद्धृत-अध्याय नहीं), पर उसका दर्शन-आधार शास्त्र-गंभीर है: ब्रह्मांड-अण्ड (हिरण्यगर्भ) की कल्पना ऋग्वेद (10.121) से पुराणों तक की केंद्र-धुरी है, और "शक्ति सृष्टि से पूर्व है" देवी-भागवत का घोषित सिद्धांत। नवदुर्गा-वाचन ने इन दोनों शास्त्र-सूत्रों को जोड़कर जो चित्र दिया, वह स्त्री-मुख की एक स्मित को विश्व का प्रथम-कारण कहता है — सृजन का मूल स्वर आनंद है, श्रम नहीं।
सूर्य-मंडल का घर — तेज में वास
कूष्माण्डा-परंपरा का दूसरा विलक्षण दावा उनका निवास है — वे सूर्य-मंडल के भीतर रहती हैं: एकमात्र देवी-रूप जिसका "पता" एक तारा है। पुराण-लोक कहता है कि सूर्य-लोक का वह तेज, जिसे देव-दानव कोई सीधे सह नहीं सकता, कूष्माण्डा का निज-गृह है — क्योंकि जो तेज की जननी है, तेज उसे क्या जलाएगा; उलटे उनकी देह-कांति ही सूर्य को दीप्ति देती है, और दसों दिशाएँ उनके प्रकाश से आलोकित हैं। इस चित्र को सूर्य-पृष्ठ (D043) की उस कथा के साथ रखिए जहाँ संज्ञा सूर्य-तेज न सह सकीं — देवी-दर्शन का व्यंग्य-मधुर उत्तर यहाँ है: जो तेज पत्नी के लिए असह्य था, वह माता के लिए आसन है — शक्ति-दृष्टि में हर पुरुष-तेज किसी मातृ-शक्ति की गोद में जलता है। दर्शन-भाषा में यह वाचन गूढ़ है — सूर्य समस्त दृश्य-ऊर्जा का स्रोत है; उसके "भीतर" बैठी देवी वह अदृश्य-शक्ति है जो ऊर्जा को ऊर्जा बनाती है: भौतिकी जिस प्राण-बिंदु तक नहीं पहुँचती, पुराण उसे स्त्री-रूप देकर कहता है — तेज भी किसी का पुत्र है। और यही कारण है कि परंपरा कूष्माण्डा-उपासना का फल आरोग्य-आयु-यश गिनाती है — जो सूर्य-शक्ति की स्वामिनी है, वही जीवनी-शक्ति (immunity, तेजस्विता) की दात्री है; चौथी रात का व्रत-विधान वस्तुतः जीवन-ऊर्जा का आवाहन है। नाम-सम्बन्ध की वह मधुर लोक-कड़ी भी यहीं जुड़ती है — "कूष्माण्ड" संस्कृत में कुम्हड़ा (पेठा) भी है: सूर्य-रस से पका, बीजों से भरा वह विशाल फल जो एक बेल से सैकड़ों जन्मा देता है — देवी को कूष्माण्ड-बलि/नैवेद्य की परंपरा (विशेषतः पूर्वी-दक्षिणी अंचलों में) इसी नाम-सूत्र की स्मृति है; कुछ निरुक्त-धाराएँ तो देवी-नाम को ही इस फल-प्रतीक से जोड़ती हैं — जिसके गर्भ में बीज-ही-बीज हैं, वह कूष्माण्डा (दोनों निरुक्त चिह्नित रूप में परंपरा-मान्य)।
चौथी रात का क्रम-स्थान — शक्ति के बाद सृजन
नवदुर्गा-क्रम में कूष्माण्डा का स्थान भी उतना ही अर्थ-गर्भित है जितना उनका नाम। यात्रा देखिए — जन्म (D061), तप (D062), शक्ति (D063)... और चौथा पद सृजन। यह क्रम मनुष्य-जीवन का ही मानचित्र है: पहले अस्तित्व सम्हालो, फिर स्वयं को साधो, फिर बल पाओ — और बल पाकर क्या करना है? परंपरा का उत्तर चौथी रात है: रचो। शक्ति की परिणति संहार नहीं, सृष्टि है — यह क्रम-संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है कि चन्द्रघण्टा (D063) के शस्त्रों के ठीक बाद यह स्मित-मुखी सृजन-देवी खड़ी हैं: शस्त्र रक्षा के लिए थे, लक्ष्य सदा निर्माण था। और सृजन की विधि भी ध्यान से — देवी ने ब्रह्मांड "बनाया" नहीं, मुस्कुरा दिया: भारतीय दर्शन की गहन ध्वनि यहाँ लीला-सिद्धांत की है — सृष्टि परमात्मा का परिश्रम नहीं, क्रीड़ा है; आनंद (आनंदमय-कोष) ही मूल-तत्त्व है, और जो कर्म आनंद से उठता है, वही सृजन कहलाने योग्य है। आधुनिक जीवन के लिए इससे सीधा पाठ क्या होगा — जिस काम में तुम्हारी स्मित नहीं, वह तुम्हारा सृजन नहीं; थके हुए संकल्पों से संसार नहीं रचे जाते। चौथी रात की साधना इसीलिए भीतर की प्रसन्नता की साधना है — अनाहत (हृदय) की वह लोक-योग योजना (ग्रेड C — चिह्नित) व्यावहारिक सत्य पर खड़ी है: हृदय खुला हो, तो हाथ जो भी रचें, उसमें प्राण होता है।
आध्यात्मिक अर्थ — अंधकार का उत्तर
कूष्माण्डा-तत्त्व का शिखर-पाठ उस पहले दृश्य में लौटता है — महाशून्य के विरुद्ध स्मित। सोचिए, परंपरा के पास सृष्टि-आरम्भ के लिए कोई भी चित्र हो सकता था — गर्जना, विस्फोट, तप, आदेश; उसने चुनी एक मुस्कान। यह चयन ही उपदेश है: अंधकार का उत्तर अंधकार की शिकायत नहीं — भीतर से उठा हुआ प्रकाश-भाव है। हर मनुष्य के जीवन में वह "सृष्टि-पूर्व क्षण" आता है — जब कुछ नहीं बचा हो: योजनाएँ शून्य, मार्ग अदृश्य, दिशाहीन तम; कूष्माण्डा उस क्षण की देवी हैं — वे कहती हैं कि नव-सृष्टि का बीज विलाप में नहीं, उस ईषत्-हास्य में है जो टूटे हुए मनुष्य के भीतर भी बचा रह जाता है: मुस्कुरा देना शक्ति का न्यूनतम और महत्तम रूप एक साथ है। दूसरा पाठ — छोटे से विराट: "ईषत्" (थोड़ा-सा) से "अण्ड-ब्रह्मांड" — आरम्भ सदा छोटा होता है; बीज से वट, स्मित से सृष्टि, एक दीये से नवरात्र। तीसरा — तेज का मातृत्व: जो ऊर्जा को जन्म देता है, वह ऊर्जा से नहीं डरता; अपने भीतर की शक्ति से भयभीत मत रहो — उसकी माँ बनो, स्वामी बनो। चौथी रात का दीप जलाते हुए उपासक वस्तुतः यही अभ्यास करता है — अंधकार के आगे एक छोटी-सी लौ, और लौ के पीछे एक मुस्कान: कूष्माण्डा-पूजा इतनी ही है, और इतनी ही में पूरा सृष्टि-दर्शन है। ॥ कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥