देव वरुण

Varuna · ऋत-सम्राट · पाशधारी · जलाधिपति

वैदिक आकाश के वे सम्राट जिनके सहस्र दूत हर हृदय झाँकते थे — झूठ जिनसे छिपता नहीं था, और क्षमा जिनसे बड़ी किसी की नहीं थी। कालांतर के जल-पति, समुद्रों के महाराज, मकर-वाहन पाशधारी।

श्रेणी: वैदिक देवता · आदित्य तत्व: ऋत (विश्व-नैतिक विधान) · जल वाहन-आयुध: मकर · पाश दिक्पाल: पश्चिम
प्रमुख कथा पढ़ें
ऋत-गोपविश्व-विधान के रक्षक
सहस्र-दृक्अंतःकरण तक देखने वाले
अपाम्-पतिनदियों-समुद्रों के अधिराज
क्षमा-सम्राटपाश जिनके, मोचन भी जिनका

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

वरुण वैदिक धर्म की नैतिक चेतना के आदि-देव हैं। ऋग्वेद के प्रारंभिक स्तर में वे सम्राट ("सम्राट् वरुणः") हैं — ऋत के रक्षक: वह विश्व-विधान जिससे सूर्य समय पर उगता है, ऋतुएँ लौटती हैं और सत्य-अनृत का लेखा चलता है। उनकी विलक्षणता उनकी दृष्टि है — सूक्त कहते हैं कि उनके सहस्र-सहस्र दूत (स्पश) लोकों में विचरते हैं; दो व्यक्ति एकांत में जो मंत्रणा करते हैं, उसे तीसरे रूप में वरुण जानते हैं — पलक झपकने तक गिनी जाती है। पाप यहाँ पहली बार "अपराध-बोध" की भाषा पाता है: वरुण-पाश रोग (विशेषतः जलोदर) बनकर बाँधता है, और मुक्ति दंड से नहीं — स्वीकार और क्षमा-याचना से मिलती है। वसिष्ठ के करुण क्षमा-सूक्त (7.86-89) विश्व-प्रार्थना-साहित्य के आदि-रत्न हैं — "जो पाप हमने जाने-अनजाने किए, हे वरुण, उनके पाश ढीले करो।"

उत्तर-वैदिक यात्रा में यह नैतिक-सम्राट पद इन्द्र-प्रजापति की ओर खिसका और वरुण जल-अधिपति रूप में स्थिर हुए — नदियों-समुद्रों के महाराज, मकर-वाहन, पाश-हस्त, पश्चिम दिशा के दिक्पाल (संध्या-अर्घ्य पश्चिमाभिमुख जल को ही तो जाता है)। मित्र के साथ उनका युग्म (मित्रावरुणा) वैदिक शासन-दर्शन है — मित्र दिन/अनुबंध-पक्ष, वरुण रात्रि/अन्तर्दृष्टि-पक्ष; और आदित्यों में वे अदिति-पुत्र हैं। रामकथा में सेतु-पूर्व समुद्र-प्रसंग (D013) उन्हीं की जल-सत्ता का साक्ष्य है, और सिंधु-तट की जीवित परंपरा में सिंधी समाज के इष्ट झूलेलाल वरुण-अवतार रूप में पूजित हैं — वैदिक सम्राट आज भी एक पूरे समुदाय के आराध्य हैं।

स्वरूप एवं संबंध

Form & Relations
  • वैदिक पदआदित्य (अदिति-कश्यप पुत्र); मित्रावरुणा-युग्म के गंभीर-पक्ष
  • पत्नीवरुणानी/गौरी-धाराएँ; परवर्ती में जल-राज्ञी वारुणी-संबंध
  • शिष्य-पुत्र धाराभृगु वारुणि — तैत्तिरीय भृगुवल्ली के जिज्ञासु-पुत्र (कथा में); वसिष्ठ मित्रावरुण-संतति धारा
  • जल-प्रशासननदी-समुद्र-मेघ मंडल; मकर वाहन; पाश आयुध
  • दिक्पाल-पदपश्चिम दिशा के स्वामी
  • जीवित अवतार-परंपराझूलेलाल (सिंधी उदेरोलाल-धारा) — वरुण-रूप इष्ट (ग्रेड B/D)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

पाश और क्षमा — शुनःशेप के बंधन से भृगु के ब्रह्म तक

पृष्ठभूमि — जो सम्राट भीतर तक देखता था

वैदिक कवि जब वरुण को गाते हैं, तो स्वर बदल जाता है — इन्द्र-सूक्तों (D039) का रण-घोष यहाँ श्रद्धा-कंपित फुसफुसाहट बन जाता है। कारण: वरुण से युद्ध नहीं होता, केवल हिसाब होता है। सूक्त-चित्र देखिए — आकाश उनका महल है, सूर्य उनका नेत्र; उन्होंने ही नदियों को मार्ग दिए और समुद्र को मर्यादा; उनके "स्पश" (गुप्त-दूत) अपलक विचरते हैं, और मनुष्य जो भी करता-सोचता है, उनके लेखे में दर्ज है। यह सर्व-साक्षिता ही वैदिक पाप-बोध की जननी है: वरुण-धर्म में अपराध छिपाया नहीं जा सकता, केवल स्वीकारा जा सकता है। और यहीं इस देवता का दूसरा — करुणा-पक्ष खुलता है: वही एकमात्र हैं जिनके सूक्तों में "क्षमा" केंद्रीय शब्द है। वसिष्ठ का आर्त-स्वर (7.86) सुनिए — "कौन-सा वह पुराना पाप है, वरुण, जिसके कारण तुम अपने पुराने स्तोता-सखा को दंड देते हो? बता दो, मैं निष्पाप होकर तुम्हारी शरण आऊँ... जो छल हमसे नींद में हुआ, जागते हुआ, जाने-अनजाने हुआ — वे सब पाश ढीले करो।" — विश्व-साहित्य में अपराध-स्वीकृति की इससे प्राचीन, इससे कोमल प्रार्थना नहीं मिलती।

शुनःशेप — बिका हुआ बालक और खुलते पाश

वरुण-पाश की सबसे नाटकीय कथा ऐतरेय ब्राह्मण (7.13-18) ने सँजोई है — और उसकी ऋचाएँ स्वयं ऋग्वेद (1.24-30) में जीवित हैं। अयोध्या... इक्ष्वाकु-वंशी राजा हरिश्चंद्र निःसंतान थे; नारद-परामर्श पर उन्होंने वरुण से मन्नत बाँधी — पुत्र दो, उसी को तुम्हें यज्ञ-पशु रूप में अर्पित करूँगा। पुत्र रोहित जन्मा — और पितृ-हृदय मुकरता गया: "दाँत निकल आएँ तब... क्षत्रिय तो शस्त्र-धारण पर ही शुद्ध होता है..." टालते-टालते वर्षों बीते; वरुण-पाश ने राजा को जलोदर (महोदर-रोग) से बाँध दिया। युवा रोहित पिता का रोग सुन लौटा, पर इन्द्र-प्रेरणा से (छह वर्ष "चरैवेति" — चलते रहो के प्रसिद्ध प्रबोधन-श्लोक इसी प्रसंग की धरोहर हैं) वन भटकता रहा। छठे वर्ष उसे अजीगर्त ऋषि मिले — दरिद्रता में डूबे — जिन्होंने सौ गायों के मूल्य पर अपना मँझला पुत्र शुनःशेप बेच दिया: पिता के प्राणों के बदले एक और पिता ने पुत्र बेचा। यज्ञ-स्तंभ (यूप) से बँधा बालक — बाँधने वाला कोई और नहीं मिला तो मूल्य बढ़ाकर स्वयं अजीगर्त आगे आए: कथा यहाँ मनुष्य-हृदय का सबसे अँधेरा तल छूती है। तब विश्वामित्र-परामर्श से बँधे बालक ने देवताओं की शरण ली — प्रजापति से उषा तक एक-एक स्तुति; और अंतिम स्तुतियाँ वरुण की — वही ऋचाएँ जो आज ऋग्वेद 1.24-25 में हैं। कहते हैं हर ऋचा के साथ एक पाश ढीला हुआ — अंतिम मंत्र पर बंधन गिर पड़े, हरिश्चंद्र का उदर-रोग भी उतर गया: एक ही क्षण में दो मोचन — बालक का बाहरी पाश, राजा का भीतरी। विश्वामित्र ने शुनःशेप को पुत्र रूप में अपनाया (देवरात नाम); और परंपरा को मिला उसका सबसे तीखा नर-बलि-विमर्श — ब्राह्मण-ग्रंथ ने ही दिखा दिया कि वरुण अंततः पशु-रक्त नहीं, सत्य-स्वीकार चाहते हैं: यज्ञ पूरा हुआ, पर बलि के बिना। धर्म-इतिहास की दृष्टि से यह कथा मानव-बलि की स्मृति और उसके शास्त्रीय निषेध — दोनों का संधि-दस्तावेज़ है (पाठ-स्तर टिप्पणी सहित)।

भृगुवल्ली — पिता वरुण की पाँच कक्षाएँ

वरुण-चरित का उपनिषद्-शिखर तैत्तिरीय की भृगुवल्ली है — जहाँ वे दंडाधीश नहीं, आचार्य-पिता हैं। पुत्र भृगु ने पूछा — "भगवन्, मुझे ब्रह्म पढ़ाइए।" वरुण ने सूत्र-भर दिया: अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी — ये द्वार हैं; और कसौटी यह कि "जिससे ये सब भूत जन्मते हैं, जिससे जीते हैं, जिसमें लौट जाते हैं — वही ब्रह्म है: तप करो, जानो।" पिता ने उत्तर नहीं दिया — विधि दी। भृगु तप में उतरे: पहली अनुभूति — अन्न ब्रह्म है (सब अन्न से जन्मते-जीते हैं); लौटे, पिता ने फिर वही कहा — "तप करो।" दूसरी कक्षा — प्राण ब्रह्म; तीसरी — मन; चौथी — विज्ञान; और पाँचवीं में वह खुला जिसके लिए चार सीढ़ियाँ चढ़नी थीं — आनन्द ब्रह्म है: "आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।" यह "भार्गवी वारुणी विद्या" कहलाई — भृगु की, वरुण से मिली विद्या; वेदांत-प्रस्थान के पंचकोश-दर्शन (अन्नमय से आनंदमय) का उद्गम-पाठ। ध्यान दीजिए कि यह किस देवता के मुख से आया — जो पाश बाँधता था, वही आनंद तक की सीढ़ी बताता है: वरुण-तत्त्व का पूरा चाप यही है — भय से आरंभ, विवेक से यात्रा, आनंद पर विश्राम। और वल्ली का समापन-आदेश आज भी हर भोजन-मंत्र में गूँजता है — "अन्नं न निन्द्यात्... अन्नं बहु कुर्वीत" (अन्न की निंदा न करना, अन्न बहुत बढ़ाना): जल-पति का पुत्र-पाठ अन्न-गरिमा पर पूर्ण होता है — जल और अन्न, जीवन के दोनों स्तंभ एक ही घराने से।

जल-सम्राट — सेतु-तट से झूलेलाल तक

महाकाव्य-पुराण युग का वरुण-अध्याय जल-सिंहासन का है। रामकथा (D013) में समुद्र-रूप वे तीन दिन राम की प्रतीक्षा-परीक्षा लेते हैं और कोप-बाण उठने पर प्रकट होकर मर्यादा-सूत्र देते हैं — "मैं स्वभाव से अगाध हूँ, पर नल-सेतु धारण करूँगा": जल-देवता स्वयं नियम-पालन का उदाहरण बना। खांडव-प्रसंग (D040) में गांडीव-अक्षय-तूणीर के दाता वे ही हैं — जल-कोश ही तो रत्न-कोश है। दिक्पाल-मंडल में पश्चिम उनका है — अस्ताचल की दिशा, जहाँ दिन अपना लेखा सौंपता है: संध्या-अर्घ्य की विधि में हर साँझ वरुण-स्मरण अनजाने चलता आ रहा है। और जीवित लोक में उनका सबसे स्पंदित रूप सिंधु-संस्कृति ने रखा — झूलेलाल/उदेरोलाल: दसवीं शती की परंपरा-कथा में मिरखशाह के अत्याचार से त्रस्त सिंधी हिंदुओं ने चालीस दिन सिंधु-तट पर वरुण-आराधना की, और जल से मत्स्य... पल्ले पर विराजित वह बाल-अवतार प्रकट हुआ जिसने धर्म-रक्षा की; चेटीचंड (चैत्र-प्रतिपदा धारा) आज विश्व-भर के सिंधी समाज का नववर्ष-महापर्व है, "बहराणा साहिब" की जल-शोभायात्राएँ वरुण-पूजा ही हैं (ग्रेड B/D — जीवित परंपरा)। महाराष्ट्र-कोंकण की नारली पूर्णिमा (श्रावणी) पर मछुआरे समुद्र को नारियल अर्पित कर ही नौका उतारते हैं, और तमिल भूमि अनावृष्टि में आज भी "वरुण जपम्" कराती है — वैदिक सम्राट का दरबार तट-तट पर अब भी लगता है।

आध्यात्मिक अर्थ — भीतर का लेखा-सम्राट

वरुण-तत्त्व आधुनिक साधक के लिए चार सूत्र रखता है। पहला — अंतःसाक्षी-बोध: "कोई देख नहीं रहा" मनुष्य का सबसे पुराना भ्रम है; वरुण-दृष्टि का स्मरण ही वैदिक "विवेक-सीसीटीवी" है — आचरण वही शुद्ध, जो एकांत में भी सभा-योग्य हो। दूसरा — पाश का मनोविज्ञान: वरुण-पाश बाहर की रस्सी नहीं, भीतर की ग्रंथि है — दबा हुआ अपराध-बोध रोग बनकर बाँधता है (जलोदर उसका वैदिक रूपक); और चिकित्सा वही जो वसिष्ठ-शुनःशेप ने की — स्वीकार, प्रार्थना, सुधार: क्षमा माँगने की संस्कृति इस देवता की सबसे बड़ी देन है। तीसरा — भृगु-विधि: सच्चा गुरु उत्तर नहीं, तप की विधि देता है; और सत्य की सीढ़ियाँ होती हैं — अन्न से आनंद तक हर पड़ाव "ब्रह्म" है, पर अंतिम नहीं: साधक ठहरे हर अनुभूति को पिता-वरुण के "पुनः तप" से जाँचे। चौथा — जल-धर्म: जल भरता भी है, डुबोता भी — वरुण-मर्यादा का पाठ है कि जीवन-रस (धन, शक्ति, भावना) की हर धारा को तट चाहिए; मर्यादित समुद्र सेतु धारण करता है, अमर्यादित सब कुछ बहा देता है। ऋत के सम्राट का सार-वाक्य एक ही है: सत्य पर चलो, तो सारे पाश स्वयं ढीले हैं — "यही वरुण-व्रत है।"

स्रोत टिप्पणी: सर्व-साक्षिता/स्पश-वर्णन ऋग्वेद-अथर्व वरुण-सूक्त परंपरा (ग्रेड A); वसिष्ठ क्षमा-सूक्त 7.86-7.89 (ग्रेड A); शुनःशेप-आख्यान ऐतरेय ब्राह्मण 7.13-18 + ऋग्वेद 1.24-30 ऋचा-साक्ष्य (ग्रेड A — नर-बलि विमर्श की पाठ-टिप्पणी सहित); "चरैवेति" ऐतरेय-प्रसिद्धि; भृगुवल्ली तैत्तिरीय 3.1-3.10 (ग्रेड A); समुद्र-राम प्रसंग D013-पूरक (वाल्मीकि युद्धकांड); झूलेलाल-चेटीचंड सिंधी जीवित परंपरा, नारली पूर्णिमा व वरुण-जपम् लोक/क्षेत्र विधियाँ (ग्रेड B/D)।

नाम एवं अर्थ

Names
वरुण
"वृ" (आवृत करना/बाँधना) — सबको घेरने वाला आकाश-सम्राट।
ऋतस्य गोपा
ऋत (विश्व-विधान) के रक्षक — वैदिक नैतिक-पद।
पाशी / पाशधारी
पाप-बंधन के पाश जिनके हाथ — और मोचन भी।
अपाम्-पति / जलाधिप
जलों के स्वामी — परवर्ती प्रधान-पद।
प्रचेता
प्रकृष्ट चेतना वाले — सर्वज्ञ-सूचक वैदिक नाम।
झूलेलाल-रूप
सिंधी परंपरा का जीवित वरुण-अवतार नाम (ग्रेड B/D)।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ वरुणाय नमः ॥ · ॐ अपाम्-पतये नमः ॥

शांति-पाठ (मित्रावरुण-स्मरण)

शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥

अर्थ: मित्र हमारे लिए कल्याणकर हों, वरुण कल्याणकर हों, अर्यमा कल्याणकर हों; इन्द्र-बृहस्पति और विशाल-डग विष्णु हमारे लिए कल्याणकर हों। — तैत्तिरीय शीक्षावल्ली।

क्षमा-सूक्त की टेक

…तत् त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानः — उदुत्तमं वरुण पाशमस्मद्
अवाधमं वि मध्यमं श्रथाय ॥

भाव: स्तुति करता हुआ यही माँगता हूँ — हे वरुण, हमारा ऊपरी पाश ऊपर खोलो, निचला नीचे, बीच का बीच में ढीला कर दो। — ऋग्वेद 1.24-धारा (शुनःशेप-स्तुति परिवार)।

पर्व एवं व्रत

Festivals
चेटीचंड (झूलेलाल जयंती)
चैत्र-प्रतिपदा धारा — सिंधी नववर्ष; बहराणा-साहिब जल-शोभायात्रा: जीवित वरुण-महापर्व।
नारली पूर्णिमा
श्रावण पूर्णिमा — समुद्र-वरुण को नारियल अर्पण; कोंकण-तट का नौका-मंगल।
वरुण जपम्
अनावृष्टि-काल की दाक्षिणात्य वर्षा-याचना विधि — मंदिर-जलाशय तट पर सामूहिक जप।
संध्या-अर्घ्य (नित्य)
जल-अर्पण की दैनिक विधि — वरुण-स्मरण का अखंड लोक-रूप।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
वरुण देव मंदिर, मनोरा (सिंध)
कराची-तट का ऐतिहासिक वरुण-पीठ — सिंधु-संस्कृति की जल-उपासना का स्मारक।
झूलेलाल पीठ-जाल
उदेरोलाल (सिंध) से विश्व-भर के सिंधी दरबार — जीवित वरुण-उपासना का भूगोल।
दिक्पाल-भित्तियों में पश्चिम
मंदिर-प्राकारों की पश्चिम-भित्ति पर मकर-वाहन पाशधारी वरुण-अंकन — शिल्प-नियम।
तीर्थ-जल स्वयं
हर नदी-संगम, कुंड और समुद्र-स्नान वरुण-क्षेत्र है — देवता जिसका मंदिर बहता है।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: वरुणदेव पानी के राजा हैं — नदियाँ, समुद्र, बारिश सब उनके राज्य में हैं। वेदों के ज़माने में वे "सच्चाई के सम्राट" थे: कहते हैं उनसे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता, पर सच बोलकर माफ़ी माँगो तो वे सबसे जल्दी माफ़ करते हैं।

रोचक तथ्य:

  • उनकी सवारी मकर (मगर जैसा जल-जीव) है और हाथ में पाश (रस्सी-फंदा)।
  • सिंधी समाज के प्यारे झूलेलाल जी वरुणदेव का ही रूप माने जाते हैं।
  • समुद्र में नारियल चढ़ाने का त्योहार (नारली पूर्णिमा) वरुण-पूजा है।
  • रामसेतु बनने से पहले समुद्र-रूप वरुण ने ही राह दी थी।

सीख: ग़लती हो जाए तो छिपाओ मत — सच बोलकर सुधार लो; सच्चाई सबसे बड़ा "पाश-कटर" है। और पानी का आदर करो — वह देवता का घर है।

मिनी क्विज़:

  1. वरुणदेव किस चीज़ के राजा हैं?
  2. उनकी सवारी क्या है?
  3. सिंधी समाज उन्हें किस रूप में पूजता है?
  4. वे किस दिशा के दिक्पाल हैं?