पाश और क्षमा — शुनःशेप के बंधन से भृगु के ब्रह्म तक
पृष्ठभूमि — जो सम्राट भीतर तक देखता था
वैदिक कवि जब वरुण को गाते हैं, तो स्वर बदल जाता है — इन्द्र-सूक्तों (D039) का रण-घोष यहाँ श्रद्धा-कंपित फुसफुसाहट बन जाता है। कारण: वरुण से युद्ध नहीं होता, केवल हिसाब होता है। सूक्त-चित्र देखिए — आकाश उनका महल है, सूर्य उनका नेत्र; उन्होंने ही नदियों को मार्ग दिए और समुद्र को मर्यादा; उनके "स्पश" (गुप्त-दूत) अपलक विचरते हैं, और मनुष्य जो भी करता-सोचता है, उनके लेखे में दर्ज है। यह सर्व-साक्षिता ही वैदिक पाप-बोध की जननी है: वरुण-धर्म में अपराध छिपाया नहीं जा सकता, केवल स्वीकारा जा सकता है। और यहीं इस देवता का दूसरा — करुणा-पक्ष खुलता है: वही एकमात्र हैं जिनके सूक्तों में "क्षमा" केंद्रीय शब्द है। वसिष्ठ का आर्त-स्वर (7.86) सुनिए — "कौन-सा वह पुराना पाप है, वरुण, जिसके कारण तुम अपने पुराने स्तोता-सखा को दंड देते हो? बता दो, मैं निष्पाप होकर तुम्हारी शरण आऊँ... जो छल हमसे नींद में हुआ, जागते हुआ, जाने-अनजाने हुआ — वे सब पाश ढीले करो।" — विश्व-साहित्य में अपराध-स्वीकृति की इससे प्राचीन, इससे कोमल प्रार्थना नहीं मिलती।
शुनःशेप — बिका हुआ बालक और खुलते पाश
वरुण-पाश की सबसे नाटकीय कथा ऐतरेय ब्राह्मण (7.13-18) ने सँजोई है — और उसकी ऋचाएँ स्वयं ऋग्वेद (1.24-30) में जीवित हैं। अयोध्या... इक्ष्वाकु-वंशी राजा हरिश्चंद्र निःसंतान थे; नारद-परामर्श पर उन्होंने वरुण से मन्नत बाँधी — पुत्र दो, उसी को तुम्हें यज्ञ-पशु रूप में अर्पित करूँगा। पुत्र रोहित जन्मा — और पितृ-हृदय मुकरता गया: "दाँत निकल आएँ तब... क्षत्रिय तो शस्त्र-धारण पर ही शुद्ध होता है..." टालते-टालते वर्षों बीते; वरुण-पाश ने राजा को जलोदर (महोदर-रोग) से बाँध दिया। युवा रोहित पिता का रोग सुन लौटा, पर इन्द्र-प्रेरणा से (छह वर्ष "चरैवेति" — चलते रहो के प्रसिद्ध प्रबोधन-श्लोक इसी प्रसंग की धरोहर हैं) वन भटकता रहा। छठे वर्ष उसे अजीगर्त ऋषि मिले — दरिद्रता में डूबे — जिन्होंने सौ गायों के मूल्य पर अपना मँझला पुत्र शुनःशेप बेच दिया: पिता के प्राणों के बदले एक और पिता ने पुत्र बेचा। यज्ञ-स्तंभ (यूप) से बँधा बालक — बाँधने वाला कोई और नहीं मिला तो मूल्य बढ़ाकर स्वयं अजीगर्त आगे आए: कथा यहाँ मनुष्य-हृदय का सबसे अँधेरा तल छूती है। तब विश्वामित्र-परामर्श से बँधे बालक ने देवताओं की शरण ली — प्रजापति से उषा तक एक-एक स्तुति; और अंतिम स्तुतियाँ वरुण की — वही ऋचाएँ जो आज ऋग्वेद 1.24-25 में हैं। कहते हैं हर ऋचा के साथ एक पाश ढीला हुआ — अंतिम मंत्र पर बंधन गिर पड़े, हरिश्चंद्र का उदर-रोग भी उतर गया: एक ही क्षण में दो मोचन — बालक का बाहरी पाश, राजा का भीतरी। विश्वामित्र ने शुनःशेप को पुत्र रूप में अपनाया (देवरात नाम); और परंपरा को मिला उसका सबसे तीखा नर-बलि-विमर्श — ब्राह्मण-ग्रंथ ने ही दिखा दिया कि वरुण अंततः पशु-रक्त नहीं, सत्य-स्वीकार चाहते हैं: यज्ञ पूरा हुआ, पर बलि के बिना। धर्म-इतिहास की दृष्टि से यह कथा मानव-बलि की स्मृति और उसके शास्त्रीय निषेध — दोनों का संधि-दस्तावेज़ है (पाठ-स्तर टिप्पणी सहित)।
भृगुवल्ली — पिता वरुण की पाँच कक्षाएँ
वरुण-चरित का उपनिषद्-शिखर तैत्तिरीय की भृगुवल्ली है — जहाँ वे दंडाधीश नहीं, आचार्य-पिता हैं। पुत्र भृगु ने पूछा — "भगवन्, मुझे ब्रह्म पढ़ाइए।" वरुण ने सूत्र-भर दिया: अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी — ये द्वार हैं; और कसौटी यह कि "जिससे ये सब भूत जन्मते हैं, जिससे जीते हैं, जिसमें लौट जाते हैं — वही ब्रह्म है: तप करो, जानो।" पिता ने उत्तर नहीं दिया — विधि दी। भृगु तप में उतरे: पहली अनुभूति — अन्न ब्रह्म है (सब अन्न से जन्मते-जीते हैं); लौटे, पिता ने फिर वही कहा — "तप करो।" दूसरी कक्षा — प्राण ब्रह्म; तीसरी — मन; चौथी — विज्ञान; और पाँचवीं में वह खुला जिसके लिए चार सीढ़ियाँ चढ़नी थीं — आनन्द ब्रह्म है: "आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।" यह "भार्गवी वारुणी विद्या" कहलाई — भृगु की, वरुण से मिली विद्या; वेदांत-प्रस्थान के पंचकोश-दर्शन (अन्नमय से आनंदमय) का उद्गम-पाठ। ध्यान दीजिए कि यह किस देवता के मुख से आया — जो पाश बाँधता था, वही आनंद तक की सीढ़ी बताता है: वरुण-तत्त्व का पूरा चाप यही है — भय से आरंभ, विवेक से यात्रा, आनंद पर विश्राम। और वल्ली का समापन-आदेश आज भी हर भोजन-मंत्र में गूँजता है — "अन्नं न निन्द्यात्... अन्नं बहु कुर्वीत" (अन्न की निंदा न करना, अन्न बहुत बढ़ाना): जल-पति का पुत्र-पाठ अन्न-गरिमा पर पूर्ण होता है — जल और अन्न, जीवन के दोनों स्तंभ एक ही घराने से।
जल-सम्राट — सेतु-तट से झूलेलाल तक
महाकाव्य-पुराण युग का वरुण-अध्याय जल-सिंहासन का है। रामकथा (D013) में समुद्र-रूप वे तीन दिन राम की प्रतीक्षा-परीक्षा लेते हैं और कोप-बाण उठने पर प्रकट होकर मर्यादा-सूत्र देते हैं — "मैं स्वभाव से अगाध हूँ, पर नल-सेतु धारण करूँगा": जल-देवता स्वयं नियम-पालन का उदाहरण बना। खांडव-प्रसंग (D040) में गांडीव-अक्षय-तूणीर के दाता वे ही हैं — जल-कोश ही तो रत्न-कोश है। दिक्पाल-मंडल में पश्चिम उनका है — अस्ताचल की दिशा, जहाँ दिन अपना लेखा सौंपता है: संध्या-अर्घ्य की विधि में हर साँझ वरुण-स्मरण अनजाने चलता आ रहा है। और जीवित लोक में उनका सबसे स्पंदित रूप सिंधु-संस्कृति ने रखा — झूलेलाल/उदेरोलाल: दसवीं शती की परंपरा-कथा में मिरखशाह के अत्याचार से त्रस्त सिंधी हिंदुओं ने चालीस दिन सिंधु-तट पर वरुण-आराधना की, और जल से मत्स्य... पल्ले पर विराजित वह बाल-अवतार प्रकट हुआ जिसने धर्म-रक्षा की; चेटीचंड (चैत्र-प्रतिपदा धारा) आज विश्व-भर के सिंधी समाज का नववर्ष-महापर्व है, "बहराणा साहिब" की जल-शोभायात्राएँ वरुण-पूजा ही हैं (ग्रेड B/D — जीवित परंपरा)। महाराष्ट्र-कोंकण की नारली पूर्णिमा (श्रावणी) पर मछुआरे समुद्र को नारियल अर्पित कर ही नौका उतारते हैं, और तमिल भूमि अनावृष्टि में आज भी "वरुण जपम्" कराती है — वैदिक सम्राट का दरबार तट-तट पर अब भी लगता है।
आध्यात्मिक अर्थ — भीतर का लेखा-सम्राट
वरुण-तत्त्व आधुनिक साधक के लिए चार सूत्र रखता है। पहला — अंतःसाक्षी-बोध: "कोई देख नहीं रहा" मनुष्य का सबसे पुराना भ्रम है; वरुण-दृष्टि का स्मरण ही वैदिक "विवेक-सीसीटीवी" है — आचरण वही शुद्ध, जो एकांत में भी सभा-योग्य हो। दूसरा — पाश का मनोविज्ञान: वरुण-पाश बाहर की रस्सी नहीं, भीतर की ग्रंथि है — दबा हुआ अपराध-बोध रोग बनकर बाँधता है (जलोदर उसका वैदिक रूपक); और चिकित्सा वही जो वसिष्ठ-शुनःशेप ने की — स्वीकार, प्रार्थना, सुधार: क्षमा माँगने की संस्कृति इस देवता की सबसे बड़ी देन है। तीसरा — भृगु-विधि: सच्चा गुरु उत्तर नहीं, तप की विधि देता है; और सत्य की सीढ़ियाँ होती हैं — अन्न से आनंद तक हर पड़ाव "ब्रह्म" है, पर अंतिम नहीं: साधक ठहरे हर अनुभूति को पिता-वरुण के "पुनः तप" से जाँचे। चौथा — जल-धर्म: जल भरता भी है, डुबोता भी — वरुण-मर्यादा का पाठ है कि जीवन-रस (धन, शक्ति, भावना) की हर धारा को तट चाहिए; मर्यादित समुद्र सेतु धारण करता है, अमर्यादित सब कुछ बहा देता है। ऋत के सम्राट का सार-वाक्य एक ही है: सत्य पर चलो, तो सारे पाश स्वयं ढीले हैं — "यही वरुण-व्रत है।"