वेदमाता गायत्री

Gayatri · सावित्री-धारा · पंचमुखी · छंदसां माता

यह कोश देवताओं के मंत्र गिनाता आया है — यह पृष्ठ उल्टी गंगा है: यहाँ मंत्र स्वयं देवी है। ऋग्वेद के चौबीस अक्षर — "तत्सवितुर्वरेण्यं..." — सहस्राब्दियों में मूर्त होकर वेदमाता बने: गायत्री, जिसे परंपरा ने वेदों की माँ, द्विज-जीवन की प्राण-धुरी और सब मंत्रों की गर्भ-वाणी कहा।

श्रेणी: वैदिक देवी (B) · मंत्र-मूर्ति मूल: ऋग्वेद 3.62.10 (विश्वामित्र-दृष्ट) स्वरूप: पंचमुखी दश-भुजा (पौराणिक-स्तर) विधि-केंद्र: संध्या-वंदन · उपनयन
प्रमुख कथा पढ़ें
वेदमातावेदों की माँ — मंत्रों की गर्भ-वाणी
सविता-शक्तिउदय-सूर्य के वरणीय तेज की देवी
धी-प्रेरिकाबुद्धियों को प्रेरित करने वाली — मंत्र का फल-पद
संध्या-देवीदिन में तीन बार जपी जाने वाली नित्य-विद्या

परिचय — मंत्र जो देवी हुआ

Introduction

"गायत्री" मूलतः देवी-नाम नहीं — छंद-नाम है: चौबीस अक्षरों (तीन पाद × आठ अक्षर) का वैदिक छंद। उस छंद में रची सहस्रों ऋचाएँ हैं — पर एक ऋचा ऐसी हुई कि छंद का नाम ही उसका नाम हो गया: ऋग्वेद मंडल 3, सूक्त 62, ऋचा 10 — विश्वामित्र-दृष्ट सविता-ऋचा, जिसे परंपरा "गायत्री-मंत्र" या "सावित्री" कहती है। सहस्राब्दियों के जप ने फिर वह किया जो भारतीय उपासना की विलक्षण प्रक्रिया है — वाणी मूर्त हुई: मंत्र देवी बना — वेदमाता गायत्री; जैसे इस कोश में नदी देवी हुई (D056 गंगा) और भूमि देवी (D060), वैसे यहाँ मंत्र देवी हुआ — शब्द-ब्रह्म का देवी-अवतार।

उनका प्रचलित ध्यान-रूप पंचमुखी दश-भुजा है — पाँच मुख, जिनकी व्याख्या परंपरा पंच-प्राण, पंच-तत्त्व, या मंत्र के पंच-खंड (ॐ + भूर्भुवः स्वः + तीन पाद) से करती है (पौराणिक-तांत्रिक स्तर — वैदिक ऋचा में कोई मूर्ति-विधान नहीं; भेद चिह्नित); हंस/कमल-आसना, वर-अभय सहित विविध आयुध। सम्बन्ध-सूत्र दो: सविता (उदय-सूर्य तत्त्व — D043 सूर्य-मंडल की वरेण्य-धारा) की वे शक्ति हैं — "सावित्री" नाम वहीं से; और ब्रह्मा (D001) की द्वितीय-पत्नी वाली पुष्कर-कथा — जिसका ब्रह्मा-पक्ष D001 पर है, देवी-पक्ष यहाँ कथा-खंड में।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-सम्बन्धसविता/सूर्य (D043) — मंत्र का देवता; गायत्री उसकी वाक्-शक्ति
  • पुराण-धाराब्रह्मा (D001) — पुष्कर-यज्ञ द्वितीय-पत्नी प्रसंग (सावित्री-गायत्री द्वैध)
  • वाक्-वर्गसरस्वती (D008) — वेद-वाणी सहोदरा; त्रयी-रूप में सावित्री-सरस्वती-गायत्री
  • छंद-परिवार"छंदसां माता" — गायत्री-उष्णिक्-अनुष्टुप् आदि वैदिक छंद-मंडल की ज्येष्ठा
  • ऋषि-सूत्रविश्वामित्र — मंत्र-द्रष्टा (ऋग्वेद 3 विश्वामित्र-मंडल)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / श्रुति-इतिहास

चौबीस अक्षरों की यात्रा — ऋचा से वेदमाता तक

ऋचा — सविता से बुद्धि माँगने वाली प्रार्थना

आरम्भ मूल से: "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥" (ऋग्वेद 3.62.10) — उस सविता देव का वरणीय तेज हम धारण करें; जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे। जप-परंपरा में इसके आगे महाव्याहृतियाँ (भूर्भुवः स्वः) और ॐ जुड़ते हैं — वह त्रि-स्तरीय पूर्ण-रूप जो संध्या-विधि का प्राण है। अब इस छोटी-सी ऋचा का शिल्प तौलिए — क्योंकि उसी शिल्प में उसका सहस्राब्दी-जीवन छिपा है। पहला: यह प्रार्थना कुछ माँगती नहीं — न धन, न आयु, न विजय; माँगती है केवल धी — बुद्धि की प्रेरणा। भारतीय प्रार्थना-साहित्य का यह विलक्षण क्षण है: सूर्य के सम्मुख खड़ा वैदिक मनुष्य कह रहा है — मुझे वस्तुएँ मत दो, वह बुद्धि दो जो सब वस्तुओं का मूल है; परंपरा ने इसीलिए इसे सब मंत्रों का सार कहा — जो बुद्धि माँग ले, उसने सब माँग लिया। दूसरा: "नः" — हमारी बुद्धियों को: प्रार्थना बहुवचन है, एकवचन नहीं — वैदिक ऋषि अकेले अपने लिए नहीं माँगता; गायत्री जन्म से सामूहिक प्रार्थना है। तीसरा: देवता सविता हैं — सूर्य का वह विशिष्ट पद जो प्रेरक-उदय का है (सू-धातु: प्रसव करना, गति देना — D043-मंडल): ठहरा हुआ प्रकाश नहीं, जगाने वाला प्रकाश; इसीलिए गायत्री संध्याओं की — दिन के संधि-क्षणों की — विद्या है: जब आकाश जग रहा हो, तब भीतर की धी को जगाना।

उपनिषदों से स्मृतियों तक — "सार का सार"

वैदिक-उत्तर साहित्य में इस ऋचा का पद असाधारण गति से चढ़ा। बृहदारण्यक उपनिषद् गायत्री-मीमांसा में उसके पादों को लोकों-वेदों-प्राणों पर व्याप्त करता है और घोषणा करता है कि गायत्री गयों (प्राणों) की त्राता है; छांदोग्य कहता है — "गायत्री वा इदं सर्वं भूतम्" — जो कुछ है, वह गायत्री ही है (3.12.1): एक छंद को सृष्टि-व्यापी कहने का यह साहस उपनिषद्-युग में ही हो चुका था। स्मृति-युग ने उसे विधि-केंद्र बनाया — मनुस्मृति (2.83) ने एकाक्षर ॐ, व्याहृतियों और सावित्री (गायत्री) को परम-पवित्र त्रय कहा और द्विज की नित्य-संध्या का प्राण ठहराया; उपनयन-संस्कार का हृदय ही गायत्री-दीक्षा है — आचार्य कान में यही मंत्र देता है, और "द्विज" (दूसरा जन्म) की परिभाषा परंपरा में यही रही: जिसका गायत्री-जन्म हो चुका। भगवद्गीता में स्वयं भगवान की विभूति-घोषणा है — "गायत्री छन्दसामहम्" (10.35): छंदों में मैं गायत्री हूँ। और लोक-निरुक्त ने नाम का हृदय खोल दिया: "गायन्तं त्रायते" — जो जपने वाले की रक्षा करे, वह गायत्री। एक ऋचा — जिसे श्रुति ने सर्व कहा, स्मृति ने नित्य, गीता ने विभूति: देवी-पद अब केवल औपचारिकता-भर दूर था।

पुष्कर — ग्वालिन जो देवी हो गई

देवी-रूप की पुराण-कथा पुष्कर (D001-मुख्य) से आती है, और उसका देवी-पक्ष यहाँ पढ़ने योग्य है (पद्म पुराण धारा — ग्रेड B): ब्रह्मा का महायज्ञ मुहूर्त पर अटका — पत्नी सावित्री गृह-कार्य में विलम्बित थीं, और यज्ञ-विधि पत्नी-सहित ही पूर्ण होती। मुहूर्त टल न जाए, इसलिए तत्काल-विवाह का निर्णय हुआ — और चुनी गईं एक गोप-कन्या (धाराओं में ग्वालिन/गुर्जर-कन्या), जिन्हें गायत्री नाम-दीक्षा देकर ब्रह्मा-वाम में बिठाया गया; यज्ञ पूर्ण हुआ — और फिर सावित्री का वह शाप-प्रकरण घटा जिसकी पूरी नीति-मीमांसा D001 पर है। यहाँ देवी-कोण देखिए: कथा में गायत्री लोक की बेटी हैं — राजकन्या नहीं, ऋषि-कन्या नहीं: दूध बेचने वाली सामान्या, जो यज्ञ-संकट के क्षण में देव-पत्नी पद पर बिठाई गई। पुराण-लेखकों की यह चेतना विलक्षण है — जिस मंत्र पर शताब्दियों तक अधिकार-सीमाएँ खिंचती रहीं (कौन जपे, कौन नहीं), उसी की देवी-कथा ने घोषित कर दिया कि गायत्री जन-सामान्य से उठी है; पुष्कर में आज भी ब्रह्मा-मंदिर के पीछे की पहाड़ियों पर सावित्री और गायत्री के अलग-अलग मंदिर उस द्वैध की स्मृति में खड़े हैं — विधि की रानी और लोक की बेटी, दोनों पूज्य। और आधुनिक युग ने इस लोक-द्वार को पूरा खोल दिया: 20वीं सदी के गायत्री-पुनर्जागरण आंदोलनों (हरिद्वार-शांतिकुंज धारा प्रमुख) ने गायत्री-जप को जाति-लिंग-भेद से मुक्त घोषित कर घर-घर पहुँचाया — करोड़ों स्त्री-पुरुषों की नित्य-साधना; इतिहास का चक्र पूरा हुआ: जो मंत्र कभी दीक्षित-सीमित था, उसकी देवी अब आँगन-आँगन जपी जाती है (आधुनिक इतिहास — ग्रेड A; आंदोलन-विवरण तटस्थ-अभिलेख)

देवता-विशिष्ट गायत्रियाँ — एक छंद, अनेक द्वार

गायत्री की "छंदसां माता" पदवी का एक जीवित प्रमाण इस कोश के भीतर ही बिखरा है। परंपरा ने मूल सविता-गायत्री के ढाँचे पर — "तत्पुरुषाय विद्महे... महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" शैली में — प्रायः हर देवता की अपनी गायत्री रची: विद्महे (हम जानें) - धीमहि (ध्यान करें) - प्रचोदयात् (वह प्रेरित करे) का त्रिपद-साँचा। तैत्तिरीय आरण्यक-धारा से चली यह पद्धति पुराण-आगम में फैलती गई — और इस ज्ञानकोश के अनेक पृष्ठ (गणेश-विष्णु-महालक्ष्मी गायत्री आदि यथा-स्थान, स्रोत-ग्रेड सहित) उसी परिवार के प्रकाशित सदस्य हैं। अर्थ ध्यान देने योग्य है: हर देवता का ध्यान अंततः उसी एक साँचे में ढलता है जिसका फल-पद सदा वही रहता है — प्रचोदयात्: प्रेरणा। यानी उपास्य कोई भी हो, वैदिक प्रार्थना-व्याकरण की माँग एक ही रही — बुद्धि की प्रेरणा; गायत्री इस अर्थ में केवल एक मंत्र नहीं — भारतीय प्रार्थना की मातृ-भाषा है, जिसमें सब देव-स्तुतियाँ बोली गईं।

चौबीस अक्षर — जीवन-विधि की देवी

गायत्री-दर्शन का समापन-पाठ उसकी विधि में है — क्योंकि यह देवी मंदिर से अधिक दिनचर्या में रहती है। संध्या-वंदन का शिल्प देखिए: दिन में तीन संधियाँ — प्रातः (उदय), मध्याह्न, सायं (अस्त) — और तीनों पर वही चौबीस अक्षर: अर्थ यह कि साधना जीवन से अलग "कार्यक्रम" नहीं — दिन की धुरी है; सूर्य जितनी नियमितता से उगता है, उतनी ही नियमितता से भीतर की धी को प्रेरित करना है। जप-विधि का हर अंग व्यावहारिक मनोविज्ञान है: उदय-सूर्य के सम्मुख (दृष्टि-लक्ष्य), जल-अर्घ्य (अहं का विसर्जन-चिह्न), नियत माला-संख्या (मन को गिनती का लंगर), और मानस-अर्थ-भावना — केवल ध्वनि नहीं, अर्थ का ध्यान: "मेरी बुद्धि प्रेरित हो।" आधुनिक विद्यार्थी के लिए यह प्राचीनतम "फोकस-अभ्यास" है — परीक्षा-भय की जगह बुद्धि-प्रार्थना; और परिवारों के लिए वह सेतु-विद्या, जो पीढ़ियों को एक ही चौबीस-अक्षरी धागे में बाँधती आई है — दादा की संध्या, पोते की स्कूल-प्रार्थना (अनेक विद्यालयों की प्रातः-सभा गायत्री से खुलती है), एक ही स्वर। वेदमाता का "माता" पद अब पूरा खुलता है: माँ वह जो भाषा सिखाती है — गायत्री ने भारत को प्रार्थना की भाषा सिखाई; वेदों की माता होना पीछे का सत्य है, जपने वालों की माता होना आज का। ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः... धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

स्रोत टिप्पणी: मूल-ऋचा ऋग्वेद 3.62.10 — शब्दशः (ग्रेड A — सर्वोच्च); महाव्याहृति-ॐ पूर्ण-रूप — तैत्तिरीय आरण्यक/संध्या-विधि परंपरा (ग्रेड A/B); बृहदारण्यक 5.14 गायत्री-मीमांसा, छांदोग्य 3.12.1 "गायत्री वा इदं सर्वम्" (ग्रेड A); मनुस्मृति 2.83 धारा (ग्रेड A — स्मृति-स्तर); गीता 10.35 "गायत्री छन्दसामहम्" (ग्रेड A शब्दशः); "गायन्तं त्रायते" निरुक्त — परंपरा-सूत्र (ग्रेड B); पुष्कर गोप-कन्या प्रसंग — पद्म पुराण धारा (ग्रेड B; ब्रह्मा-पक्ष एवं सावित्री-शाप D001-कथा पूर्व-प्रकाशित — अनुपूरक-विभाजन); पंचमुखी-रूप पौराणिक-तांत्रिक स्तर (वैदिक-स्तर से भेद स्पष्ट चिह्नित); 20वीं सदी पुनर्जागरण (शांतिकुंज-धारा) — आधुनिक इतिहास तटस्थ-अभिलेख (ग्रेड A); जप-अधिकार का ऐतिहासिक विमर्श संकेत-मात्र — कोश की मानव-गरिमा नीति अनुसार सार्व-जनीनता पक्ष अभिलिखित। विधि-मनोविज्ञान खंड व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
गायत्री
"गायन्तं त्रायते" — जपने वाले की त्राता; मूलतः छंद-नाम।
सावित्री
सविता-सम्बन्धिनी ऋचा — मंत्र का श्रुति-नाम; ब्रह्माणी-धारा में पृथक् व्यक्तित्व (D001)।
वेदमाता
वेदों की माँ — "स्तुता मया वरदा वेदमाता" धारा (अथर्व-परंपरा)।
छंदसां माता
छंदों की माता — गीता-विभूति "छन्दसामहम्" की प्रतिध्वनि।
पंचमुखी
पाँच मुखों वाली — मंत्र-पंचखंड/पंचप्राण व्याख्याएँ (पौराणिक-स्तर चिह्नित)।

मंत्र — मूल एवं अर्थ

Mantra

गायत्री महामंत्र (ऋग्वेद 3.62.10 + महाव्याहृति)

ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अन्वय-अर्थ: ॐ — परब्रह्म; भूः-भुवः-स्वः — (जो) पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक (तीनों में व्याप्त है); उस सविता देव का वरणीय (वरण करने योग्य) तेज हम (अपनी बुद्धि में) धारण करें; जो हमारी बुद्धियों (धियों) को (सत्-पथ पर) प्रेरित करे।

पद-टिप्पणी: ऋचा-भाग ऋग्वेद 3.62.10 शब्दशः; ॐ+व्याहृतियाँ जप-रूप की परंपरा-संहिता (तैत्तिरीय आरण्यक धारा)। द्रष्टा: विश्वामित्र; देवता: सविता; छंद: गायत्री (निचृद्-पाठ भेद वैदिक-स्वर परंपरा में)।

गीता-विभूति

गायत्री छन्दसामहम् ॥ — गीता 10.35

गायत्री-कवच, गायत्री-सहस्रनाम एवं तांत्रिक गायत्री-भेद (देवता-विशिष्ट गायत्रियाँ — जिनकी कई इस कोश के पेजों पर यथा-स्थान प्रकाशित हैं) का समेकित सूचकांक भावी मंत्र-शोध-चरण में।

पर्व एवं विधि

Festivals
गायत्री-जयंती
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (गंगा-दशहरा संधि-धारा) — प्राकट्य-स्मरण।
श्रावणी-उपाकर्म
श्रावण-पूर्णिमा — यज्ञोपवीत-नवीकरण, सामूहिक गायत्री-जप का महादिन।
नित्य त्रि-संध्या
प्रातः-मध्याह्न-सायं — देवी का असली "पर्व" प्रतिदिन तीन बार।
उपनयन-संस्कार
गायत्री-दीक्षा — द्विज-जन्म; कान में दिया जाने वाला मंत्र यही।

मंदिर एवं क्षेत्र

Temples
गायत्री मंदिर, पुष्कर
ब्रह्मा-क्षेत्र की पहाड़ी-पीठ — सावित्री-गायत्री द्वैध-भूगोल (D001)।
शांतिकुंज, हरिद्वार
आधुनिक गायत्री-पुनर्जागरण का केंद्र — अखंड-जप परंपरा।
गायत्री-तपोभूमि, मथुरा
पुनर्जागरण-धारा की यज्ञ-भूमि — सामूहिक महायज्ञ परंपरा।
हर संध्या-स्थल
नदी-घाट, छत, आँगन — जहाँ कोई सूर्य-सम्मुख जप रहा है, वही गायत्री-मंदिर।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: गायत्री माता एक अनोखी देवी हैं — वे असल में एक मंत्र हैं जो देवी बन गया! "तत्सवितुर्वरेण्यं..." वाला गायत्री-मंत्र हज़ारों साल पुराना है — ऋग्वेद से। इस मंत्र में भगवान सूर्य (सविता) से बस एक चीज़ माँगी जाती है — अच्छी बुद्धि!

रोचक तथ्य:

  • गायत्री-मंत्र में ठीक 24 अक्षर हैं — 8-8 के तीन चरण।
  • यह दुनिया के सबसे पुराने, आज भी रोज़ जपे जाने वाले मंत्रों में है!
  • इसमें धन या खिलौने नहीं — सिर्फ़ अच्छी बुद्धि माँगी जाती है।
  • कई स्कूलों की सुबह की प्रार्थना यही मंत्र है।

सीख: भगवान से माँगना ही हो तो सबसे अच्छी चीज़ माँगो — अच्छी बुद्धि। क्योंकि जिसके पास अच्छी सोच है, वह बाक़ी सब अच्छा ख़ुद कर लेगा!

मिनी क्विज़:

  1. गायत्री-मंत्र किस वेद से है?
  2. उसमें कितने अक्षर हैं?
  3. मंत्र में क्या माँगा जाता है?
  4. मंत्र के देवता कौन हैं?